20/04/2025
!!!---: तैंतीस प्रकार के देवता :---!!!
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(१.) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु ।
आर्य सिद्धान्त विमर्श
(२.) प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रूद्र इसलिए कहते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं, तब रोदन कराने वाले होते हैं । आर्य सुविचार
(३.) संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिए हैं कि यह सब की आयु को लेते जाते हैं । आर्ष दृष्टि
(४.) बिजली का नाम इन्द्र इस हेतु से है कि परम ऐश्वर्य का हेतु है । ॥ आर्य भजन संग्रह ॥
(५.) यज्ञ को प्रजापति कहने का कारण यह है कि जिससे वायु वृष्टि जल औषधि की शुद्धि, विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्प विद्या से प्रजा का पालन होता है । गर्व से कहो,हम आर्य हैं…
ये तैंतीस पूर्वोक्त गुणों के योग से देव कहाते हैं ।
भाषाणां जननी संस्कृत भाषा
इनका स्वामी और सबसे बड़ा होने से परमात्मा चौंतीसवां उपास्य देव शतपथ के चौदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है ।इसी प्रकार अन्यत्र भी लिखा है । जो ये इन शास्त्रों को देखते तो वेदों में अनेक ईश्वर मनाने रूप भ्रमजाल में गिरकर क्यों बहकते ? वैदिक ऋषिकाएँ
अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश , सप्तम समुल्लास
योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री