वैदिक संस्कार

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02/03/2026
भोलेनाथ के सच्चे भक्त लाइक करें और शेयर करें । ये किस मन्दिर का चित्र है ?  #भोलेनाथ
23/05/2025

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!!!---: तैंतीस प्रकार के देवता :---!!!================≠=======आर्य फेसबुक arya facebook (१.) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आक...
20/04/2025

!!!---: तैंतीस प्रकार के देवता :---!!!
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(१.) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु ।
आर्य सिद्धान्त विमर्श

(२.) प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रूद्र इसलिए कहते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं, तब रोदन कराने वाले होते हैं । आर्य सुविचार

(३.) संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिए हैं कि यह सब की आयु को लेते जाते हैं । आर्ष दृष्टि

(४.) बिजली का नाम इन्द्र इस हेतु से है कि परम ऐश्वर्य का हेतु है । ॥ आर्य भजन संग्रह ॥

(५.) यज्ञ को प्रजापति कहने का कारण यह है कि जिससे वायु वृष्टि जल औषधि की शुद्धि, विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्प विद्या से प्रजा का पालन होता है । गर्व से कहो,हम आर्य हैं…

ये तैंतीस पूर्वोक्त गुणों के योग से देव कहाते हैं ।
भाषाणां जननी संस्कृत भाषा

इनका स्वामी और सबसे बड़ा होने से परमात्मा चौंतीसवां उपास्य देव शतपथ के चौदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है ।इसी प्रकार अन्यत्र भी लिखा है । जो ये इन शास्त्रों को देखते तो वेदों में अनेक ईश्वर मनाने रूप भ्रमजाल में गिरकर क्यों बहकते ? वैदिक ऋषिकाएँ

अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश , सप्तम समुल्लास

योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

!!!---: व्रत पालन :---!!!=================वैदिक संस्कार व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षया आप्नोति दक्षिणाम् ।दक्षिणा श्रद्धा...
18/04/2025

!!!---: व्रत पालन :---!!!
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वैदिक संस्कार

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षया आप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥
(यजुर्वेद १६/ ३०) आर्य सिद्धान्त विमर्श

जब मनुष्य ब्रह्मचर्यादि तथा सत्यभाषणादि व्रत अर्थात् नियम धारण करता है, तब उस (व्रतेन) व्रत से उत्तम प्रतिष्ठारूप (दीक्षाम् ) दीक्षा को (आप्नोति) प्राप्त होता है, (दीक्षया ) ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के नियम पालन से (दक्षिणाम्) सत्कारपूर्वक धनादि को (आप्नोति) प्राप्त होता है, (दक्षिणा) उस सत्कार से (श्रद्धाम् ) सत्य धारण में प्रीति को (आप्नोति ) प्राप्त होता है, और (श्रद्धया) सत्य धार्मिक जनों में प्रीति से (सत्यम्) सत्य विज्ञान वा सत्य पदार्थ (धर्मेश्वर) मनुष्य को (आप्यते) प्राप्त होता है।
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इसलिये श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य और गृहाश्रम का अनुष्ठान करके वानप्रस्थ आश्रम अवश्य करना चाहिये । आर्ष दृष्टि

(महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि वानप्रस्थप्रकरण)
वैदिक ऋषिकाएँ

भावार्थ:---

मनुष्यों को ईश्वर का आदेश ''मनुष्य सत्यभाषण ब्रह्मचर्य आदि का पालन करें, असत्य भाषण व्यभिचार आदि ना करें या छोड़ देवें। सत्यभाषण आदि का फल परमेश्वर ने इस मन्त्र में बताया है और सत्यभाषण आदि करने की प्रेरणा दी है। गर्व से कहो,हम आर्य हैं…

जैसे भूमि के रूपादि गुण ही को देख जान के गुणों से अव्यवहित सम्बन्ध से पृथिवी प्रत्यक्ष होती है, वैसे इस सृष्टि में परमात्मा के रचना विशेष लिङ्ग (चिह्न ) देख के परमात्मा प्रत्यक्ष होता है और जो पापाचरणेच्छा समय में भय, शंका, लज्जा उत्पन्न होती है वह अन्तर्यामी परमात्मा की ओर से है। इससे भी परमात्मा प्रत्यक्ष होता है। अनुमान के होने में क्या सन्देह हो सकता है ।

अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश
द्वादशसमुल्लास

योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

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