नेपाल भारत मैत्री संगठन

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नेपाल भारत मैत्री संगठन "वसुधैव क़ुटुम्बकम" की प्रेरणा से ओतप्रोत महासंगठन संजाल ।

09/05/2026
08/05/2026

हमारे महर्षि चरक आज से हज़ारों वर्ष पहले ही कह चुके हैं
"यस्य देशस्य जन्मस्थ जो जंतु तस्य औषधि हितम् तस्य भोजन हितम् "
जो व्यक्ति जहाँ जन्मा है उसके लिए उसी देश के आहार विहार ही लाभ दायक हैं
यानी जिन खाद्य पदार्थों को हमारे पूर्वज पीढी दर पीढी खाते आ रहे हैं हमारे लिए उन्ही खाद्य पदार्थों का सेवन लाभदायक है।

संगठन के ज़मीन स्तर के कार्यकर्ता – नगर एवं खंड कार्यकर्ता - वास्तव में समाज जीवन के केंद्र में कार्य करते हैं। हमारा हि...
08/05/2026

संगठन के ज़मीन स्तर के कार्यकर्ता – नगर एवं खंड कार्यकर्ता - वास्तव में समाज जीवन के केंद्र में कार्य करते हैं। हमारा हिंदू समाज केवल एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक दल, वर्ग, क्षेत्र और विचारधारा में व्यापक रूप से उपस्थित है। ऐसी स्थिति में पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को अपने आचरण से आदर्श प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा संगठन का समाज में सहज विलय और व्यापक स्वीकार कठिन हो जाएगा।

जब सार्वजनिक रूप से किसी एक दल विशेष के प्रति अत्यधिक झुकाव दिखाई देता है, तब धरातल पर कार्य करने वाले स्वयंसेवकों के सामने कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े हिंदू समाज के बीच संवाद और संपर्क स्थापित करना चुनौतीपूर्ण बन जाता है। कई स्थानों पर कार्यकर्ता चाहकर भी सहजता से समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँच नहीं बना पाते।

संघ का मूल कार्य समाज संगठन और व्यक्ति निर्माण है, राजनीति नहीं। इसलिए कार्यकर्ता का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे हर हिंदू उसे अपना मान सके, चाहे उसकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो। यह विषय केवल चिंतनीय ही नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन और विचार का विषय है।

यदि मैं यह कहूं कि मेरे जैसा तरुण भी इस गुमनामी व्यक्ति का सानिध्य पाया है तो अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए।घोष में सारिका ...
07/05/2026

यदि मैं यह कहूं कि मेरे जैसा तरुण भी इस गुमनामी व्यक्ति का सानिध्य पाया है तो अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए।घोष में सारिका की मार यदि पहली बार खाया तो इस गुमनामी दा के हाथों।
बंगाल में जीत के पीछे एक गुमनाम चेहरे की भी बात हो जाए….
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पूर्व राष्ट्रपति स्व. प्रणब दा को 2018 में आरएसएस के नागपुर कार्यक्रम में जाने के लिए राज़ी करने के पीछे संघ के एक गुमनाम मगर धुरंधर प्रचारक हैं। नाम है- रामचंद्र पांडेय। बंगाल से आने वाले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे प्रणव दा के नागपुर जाने की घटना ने बंगाली भद्रलोक में संघ और भाजपा के प्रति भरोसा भर दिया। बंगाल में बीजेपी की जीत के यूँ तो बहुत से सूत्रधार हैं। फ़्रंट पर कार्य करने वालों को दुनिया जानती है, किंतु पांडेय जी का नाम पहले भी गुमनाम था, आज भी गुमनाम है। मौजूदा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को मिर्जापुर में आरएसएस का जिला कार्यवाह बनाकर पहली बार संगठन सिस्टम में सक्रिय करने वाले रामचंद्र जी हैं। अब बात बंगाल में उनके योगदान की।

2016 विधानसभा चुनाव के बाद आरएसएस ने अपने इस धुरंधर प्रचारक का केंद्र कोलकाता बनाकर उन्हें पूरे राज्य में संगठन को चुस्त-दुरुस्त रखने की कमान सौंपी। यह रामचंद्र पांडेय थे, जिन्होंने सिलिगुड़ी से लेकर बर्दवान, आसनसोल तक, कोलकाता के गली-कूचों से लेकर मुर्शिदाबाद, मालदा तक आम लोगों में छिपे बीजेपी और संघ कार्यकर्ताओं की कड़ियों को जोड़ना शुरु किया। कांग्रेस, टीएमसी और लेफ्ट के उन लोगों से संपर्क साधा जो बंगाल की दुर्दशा से अपने संगठनों में अंसतुष्ट थे। टीएमसी में सबसे मुखर सुवेंदु अधिकारी से लेकर प्रणब दा के संपर्क-सूत्र मनोज कुमार तक रामचंद्र पांडेय ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का इस्तेमाल किया, और यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब दा को आरएसएस के नागपुर कार्यक्रम तक पहुंचा कर बंगाली भद्रलोक और कांग्रेस के काडर में आरएसएस और बीजेपी के प्रति हर तरह के भरोसे और आश्वस्ति से भर दिया। उसी समय भविष्य के बंगाल की इबारत वस्तुतः रामचंद्र पांडेय के संपर्कों ने रच दी थी।
यह सारा कार्य रामचंद्र पांडेय के संपर्क सूत्रों से आरएसएस के नागपुर केंद्र ने साकार कर दिखाया।

रामचंद्र पांडेय कोई साधारण नाम नहीं है। 1967 में जब मोदीजी ने प्रचारक जीवन शुरु किया, उसी समय रामचंद्र पांडेय ने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के अपने गांव को अलविदा कह दिया। वह प्रो. राजेंद्र सिंह के संपर्क में आए और फिर आरएसएस के होकर रह गए। 1967 से 2000 तक रामचंद्र पांडेय ने 33 साल अपनी जवानी पूर्वी यूपी से लेकर अवध, बुंदेलखंड आदि इलाकों में आरएसएस को मजबूत करने में खपा दी। बीजेपी के अनेक संगठन महामंत्री रामचंद्र पांडेय से प्रशिक्षित हैं।

रामचंद्र जी आज भी गुमनाम तरीके से रहते हैं। दो जोड़ी कपड़ों में वह अपना साल गुजार देते हैं। उनकी साधारण चप्पल और निरंतर चलते रहने की उनकी इच्छाशक्ति ने उन्हें आरएसएस के सभी प्रचारकों में सबसे जमीनी स्तर पर खड़ा किया है। कोलकाता का कोई गली-कूचा नहीं, किसी आरएसएस और पुराने बीजेपी कार्यकर्ता का घर नहीं, जहां रामचंद्र पांडेय ने प्रवास न किया और बैठकी नहीं लगाई। उनके साथ इस कार्य में आरएसएस के युवा प्रचारकों की पूरी टोली दिन-रात संपर्क में जुटी रही। आरएसएस की घोषवादकों की टीम के वह पूरे देश के मार्गदर्शक संचारक हैं। और तो और, उत्तर प्रदेश के अवध, गोरखपुर, काशी, बुंदेलखंड के इलाकों में अधिकांश आरएसएस कार्यकर्ताओं के निर्माण में यदि सबसे ज्यादा सक्रिय भूमिका किसी ने निभाई तो 1967 से 2000 के मध्य रामचंद्र पांडेय ने निभाई।

सूत्र बताते हैं कि बीजेपी में नेताओं के चयन से लेकर टिकट बंटवारे तक में युवाओं को चुन चुनकर रामचंद्र पांडेय ने आगे किया और केंद्रीय नेतृत्व को सही सूचनाएं दीं। बीते 10 साल में रामचंद्र पांडेय ने पश्चिम बंगाल की जमीन के चप्पे चप्पे को छान मारा। बदलाव की बयार ऐसे ही आरएसएस कार्यकर्ताओं के बूते भी बीजेपी ने बंगाल में खडी की है
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