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1931 में पंजाब में कुल राजपूतों की संख्या ले 62% मुस्लिम राजपूत थे। 1931 का पंजाब आज के पंजाब (पाकिस्तान), पंजाब (भारत),...
30/07/2026

1931 में पंजाब में कुल राजपूतों की संख्या ले 62% मुस्लिम राजपूत थे।
1931 का पंजाब आज के पंजाब (पाकिस्तान), पंजाब (भारत), हरियाणा व हिमाचल प्रदेश को मिलाकर था।

30/07/2026

रांघड़ों के बाहुबल का वो नाम—कास्सू रांघड़

कहा जाता है कि पुराने हरियाणा में मुस्लिम राजपूत—रांघड़ बड़े ज़मींदार और प्रभावशाली समुदायों में गिने जाते थे। उनकी बहादुरी, दबदबे और जुझारू मिज़ाज के किस्से आज भी बुज़ुर्गों की जुबानी सुनने को मिलते हैं।

इन्हीं लोक-किस्सों में एक नाम बड़ी हैबत के साथ लिया जाता है—कासम अली उर्फ़ “कास्सू रांघड़”।

कास्सू रांघड़ के बाहुबल और लठैती के ऐसे किस्से मशहूर हुए कि कहा जाता था—उस दौर में हरियाणा में उनके मुकाबले का लठैत मिलना मुश्किल था। उनकी मौजूदगी ही काफी मानी जाती थी; विरोधियों की बड़ी से बड़ी टोली के सामने भी पीछे हटना उनके मिज़ाज में नहीं था।

ये वो दौर था जब पहचान सिर्फ नाम से नहीं, दम और दबदबे से बनती थी—और कास्सू रांघड़ का नाम उसी दौर की एक मशहूर दास्तान बन गया।

मुस्लिम राजपूतों का अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष - 3राय अहमद खाँ खरल (पंवार) 72 साला बुज़ुर्ग जो अंग्रजो के ख़िलाफ़ लड़ते लड़ते ...
30/07/2026

मुस्लिम राजपूतों का अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष - 3

राय अहमद खाँ खरल (पंवार) 72 साला बुज़ुर्ग जो अंग्रजो के ख़िलाफ़ लड़ते लड़ते शहीद हो गए।

राय अहमद खरल का तअल्लुक़ पंजाब के इलाके संदल बार के झमरा गांव के ज़मींदार राजपूत घराने से था। ये घराना खरल राजपूतों का सरदार भी था।

बताया जाता है, राय साहब बचपन से बहादुर थे, वो अपनी जवानी के दिनों में सिख हमलों के खिलाफ भी लड़े और आपने बुज़ुर्गी में अंग्रज़ों के खिलाफ जंग ए आज़ादी में लड़ते हुए 1857 में शाहदत पाई।

1857 का साल हिन्दोस्तान की तारीख में बहुत अहम था, कंपनी राज के खिलाफ बगावत छिड़ गई थी और कंपनी के सिपाही अँगरेज़ फ़ौज से बगावत करने लगे। इसी कड़ी में अंग्रेजों को अपनी फ़ौज के लिए सिपाहियों की ज़रूरत पड़ने लगी। अँगरेज़ फ़ौज की कमी पूरी करने के लिये पंजाब के क़बीलों से अपने साथ मिलने की दरख़्वास्त करने लगे अँगरेज़ क़बीलों को तमाम तर जागीर और ज़मीनों का लालच दे रहे थे।

इसी पेशकश के साथ अंग्रेज़ "खरल सरदार राय अहमद खाँ" के पास पहुंचे। राय अहमद खाँ को अंग्रेजों से सख्त नफ़रत थी उन्होंने अंग्रेज़ों की इस पेशकश को ठुकरा दिया। दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह ज़फर को अपनी हिमायत की पेशकश के बाद राय साहब ने अपने क़बीले के साथ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एलान ए जंग कर दिया।

इस एलान को अंग्रेजों में हल्के में नहीं लिया और खरलो को दबाने की हर मुमकिन कोशिश की तैयारी करने लगे। खरलो की हिम्मत देख कर साहिवाल और गोगेरा के दीगर कबाईल ने भी अंग्रेज़ों को लगाने देने से मना कर दिया। और अपनी सदारत राय अहमद खरल को सौंप दी।

इसके बाद अँगरेज़ हुकूमत ने साहिवाल के कमिश्नर बर्कले को ये इंक़लाब दबाने और क़बीलों से लगान वसूलने की ज़िम्मेदारी सौंप दी। जिसके बाद बर्कले ने बड़ी तादाद में बागियों को गिरफ्तार कर गोगेरा जेल में बंद कर दिया। बर्कले की इस हिमाकत के बाद राय अहमद खरल गुस्से में आ गए और एक रोज़ रात के अंधेरे में लोगों के साथ गोगेरा जेल पर हमला कर सभी कैदियों को छुड़ा लिया। इस शिकश्त के बाद अँगरेज़ बौखला गये जिसके बाद साहिवाल में बहुत से गांव अंग्रेज़ों ने जला दिए।

राय अहमद खरल ने गिशकोरी के जंगलों में पनाह ले रखी थी, और अंग्रेज़ों के खिलाफ अपनी जद्दोजहद गुरिल्ला लड़ाई के तौर पर यही से जारी रखी। राय अहमद खरल को पकड़ना अंग्रेज़ों के लिए आसान नहीं था। राय अहमद खरल एक बेहद बहादुर और जंगी तरबियत याफ्ता सरदार थे। और किशकोरी के जंगलों से बख़ूबी वाक़िफ़ थे।

राय अहमद खरल को पकड़ने के लिए अंग्रेज़ों को खरलो के बीच से एक मीर जाफर चाहिए था। जो उन्हें सरफ़राज़ खरल के तौर पर मिल गया। सरफ़राज़ खरल ने अंग्रेजों को खबर दे दी कि राय अहमद खरल अपने जंगजुओं के साथ दरिया ए रावी को पार करने वाले हैं।

इस ख़बर के मिलते ही कमिश्नर बर्कले अँगरेज़ फ़ौज के साथ खरालों के पीछे लगा गया। जहाँ अंग्रेज़ों का सामना राय अहमद खरल से हुआ। खरल के बागी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बहुत बहादुरी से लड़े और अंग्रेज़ों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

अब अहमद खरल दरिया ए रावी पार कर गए। कुछ दूरी पर ही बागियों ने पड़ाव डाला और राय अहमद खाँ खरल नमाज़ अदा करने मुसल्ले पर खड़े हो गए। राय अहमद खरल नमाज़ अदा ही कर रहे थे की बर्कले अँगरेज़ सिपाहियो के साथ आ धमका।

नमाज़ अदा मरते हुए राय अहमद खाँ खरल पर कमिश्नर बर्कली ने गोलियां दागी दीं, और एक हिन्दोस्तां की आज़ादी का परवाना शहीद हो गया।

ये 21 सितम्बर 1857 का दिन था, यानि की 10वां मुहर्रम। ये वही दिन था जब हज़रत इमाम हुसैन र०अ० को सजदे में शहीद कर दिया गया था। इसी मुक़द्दस दिन मुस्लिम राजपूत सूरमा राय अहमद खाँ खरल अपने वतन की आज़ादी के लिए शहीद हो गए।

30/07/2026

1947 का दौर, मुनक की यादें और रांघड़ों के किस्से। ताऊ बताते हैं उस जमाने में रांघड़ राजपूत कितने ताकतवर, जुझारू और प्रभावशाली माने जाते थे।

मुस्लिम राजपूत राजा आज़म खाँ, जिन्होंने आजमगढ़ बसाया.राजा आज़म खाँ का ताल्लुक़ राजपूतों की गौतम शाख से था. आज़म खाँ, राज...
28/07/2026

मुस्लिम राजपूत राजा आज़म खाँ, जिन्होंने आजमगढ़ बसाया.

राजा आज़म खाँ का ताल्लुक़ राजपूतों की गौतम शाख से था. आज़म खाँ, राजा विक्रमजीत के बेटे थे, जो अपने पिता के कहने पर पर इस्लाम क़ुबूल कर मुसलमान हुए. राजा आज़म खाँ की माँ सिकरवार राजपूत थीं.

ये वही आज़म खाँ हैं जिन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश के मशहूर शहर आजमगढ़ को बसाया था. और इनके भाई राजा अजमत खाँ ने अजमतगढ़ बसाया।

भारतीय सेना की 61वीं कैवेलरी (61st Cavalry) दुनिया की इकलौती सक्रिय घुड़सवार सेना है। यह अपनी गौरवशाली सैन्य परंपरा और ऐ...
27/07/2026

भारतीय सेना की 61वीं कैवेलरी (61st Cavalry) दुनिया की इकलौती सक्रिय घुड़सवार सेना है। यह अपनी गौरवशाली सैन्य परंपरा और ऐतिहासिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

इस रेजीमेंट की ऐतिहासिक Class Composition (भर्ती संरचना) इस प्रकार रही है—

• 33% कायमखानी (मुस्लिम राजपूत)
• 33% राजपूत
• 33% मराठा

ध्यान रहे कि यह Class Composition (भर्ती संरचना) है, संवैधानिक आरक्षण नहीं। अर्थात, इस रेजीमेंट की भर्ती ऐतिहासिक रूप से इन तीन वर्गों के बीच संतुलित संरचना के आधार पर की जाती रही है।

यह भारतीय सेना की उन ऐतिहासिक परंपराओं का हिस्सा है, जो विभिन्न योद्धा समुदायों की सैन्य विरासत को आज भी जीवित रखे हुए हैं। इस रेजिमेंट ने ही 1918 में ओटोमैन साम्राज्य की सेना को हाइफा में शिकस्त दी थी।

61वीं कैवेलरी रेजिमेंट में वर्तमान में इंस्ट्रक्टर लीडर के तौर पर नागौर जिले के गांव छोटी बेरी के निवासी दफादार अबरार खां भारतीय सेना के जवानों को घुड़सवारी की ट्रेनिंग दे रहे है। अबरार खां के पास पांच घोड़ों की एक साथ घुड़सवारी का राष्ट्रीय रिकॉर्ड है। इसके अलावा उन्हें घुड़सवारी में तकरीबन 150 मेडल मिले हैं।

#61कैवेलरी

⚔️ काशू राँघड़ — वार सामने से होता तो कहानी कुछ और होती! ⚔️हरियाणा की धरती ने अपने दौर में अनेक ऐसे नाम देखे हैं जिनकी त...
27/07/2026

⚔️ काशू राँघड़ — वार सामने से होता तो कहानी कुछ और होती! ⚔️

हरियाणा की धरती ने अपने दौर में अनेक ऐसे नाम देखे हैं जिनकी ताकत और दबदबे के किस्से पीढ़ियों तक सुनाए गए। उन्हीं नामों में काशू राँघड़ का नाम भी लोक-किस्सों में लिया जाता है।

काशू राँघड़ के आज भी कई किस्से सुनाए जाते हैं।

उनमें एक प्रचलित दावा यह है कि काशू को खुले मुकाबले में नहीं, बल्कि ईख के खेत की आड़ से गोली मारकर मौत के घाट उतारा गया था।

दुश्मनी अपनी जगह होती है, बहादुरी अपनी जगह।
सामने खड़े होकर मुकाबला करना वीरता है—छिपकर वार करना नहीं।

अगर काशू कमजोर होता, अगर उसका सामना आसान होता, तो खेत की आड़ की जरूरत ही क्या थी?

इतिहास की हर कहानी दस्तावेजों में दर्ज नहीं होती; कुछ घटनाएँ लोगों की जुबान और पीढ़ियों की यादों में जिंदा रहती हैं। काशू राँघड़ का किस्सा भी उसी लोक-स्मृति का हिस्सा है।

दुश्मन कितना भी बड़ा क्यों न हो—वार सामने से हो तो उसे मुकाबला कहते हैं, आड़ लेकर किया गया वार मुकाबला नहीं कहलाता।

🎉 जन्मदिन की दिली मुबारकबाद 💐बुढ़ाना विधानसभा से भावी विधायक Kunwar Shoyab Rana साहब को जन्मदिन की बहुत-बहुत दिली मुबारक...
26/07/2026

🎉 जन्मदिन की दिली मुबारकबाद 💐

बुढ़ाना विधानसभा से भावी विधायक Kunwar Shoyab Rana साहब को जन्मदिन की बहुत-बहुत दिली मुबारकबाद।
अल्लाह आपको हमेशा खुश, सलामत और कामयाब रखे। 🤲🎂💐
Kunwar Shoyab ❤️

ग्राम भैंसानी इस्लामपुर के जनपद शामली निवासी के होनहार बेटों अरशद अली और अब्दुल वारिस को NEET परीक्षा में शानदार सफलता ह...
21/07/2026

ग्राम भैंसानी इस्लामपुर के जनपद शामली निवासी के होनहार बेटों अरशद अली और अब्दुल वारिस को NEET परीक्षा में शानदार सफलता हासिल करने पर मुस्लिम राजपूत समाज की जानिब से बहुत बहुत दिली मुबारकबाद।💐💐

अल्लाह तआला आपको एक कामयाब डॉक्टर बनाकर इंसानियत की ख़िदमत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन। 🤲❤️

अगर तू गाजी बन ना चाहता है तो पहले रांघड को मारना पड़ेगा उसके पीछे/बाद किसी काफर को मारना।आक्रांताओं के समय की ये कहावत ...
20/07/2026

अगर तू गाजी बन ना चाहता है तो पहले रांघड को मारना पड़ेगा उसके पीछे/बाद किसी काफर को मारना।

आक्रांताओं के समय की ये कहावत बताती है कि रांघड़ राजपूत कैसे हर किसी चट्टान से भिड़ जाते थे और उनका सामने वालो के लिए क्या कद था मैदान ए जंग में।

शुरुआत से लेकर अंग्रेजों के जाने और लाल किले पर झंडा फहराने तक अपनी मिट्टी के लिए हमारे बलिदान और इतिहास अनमिट है। रांघड़ राजपूतों की मिसालों से किताबें भरी पड़ी है।

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