02/10/2026
मुस्लिम राजपूत समाज को आखिर कब तक अपनी ही कमजोरियों का खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा?
मुस्लिम राजपूत समाज को सबसे ज्यादा नुकसान हमेशा बाहर वालों ने नहीं पहुँचाया। कई बार हमारी अपनी आपसी खींचतान, गुटबाजी, व्यक्तिगत स्वार्थ और नेतृत्व की निष्क्रियता ने समाज को कमजोर किया है।
समाज के नाम पर बड़े-बड़े दावे करना आसान है, लेकिन जब शिक्षा, रोजगार, सामाजिक संगठन, युवाओं के भविष्य और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे वास्तविक मुद्दों पर काम करने की बारी आती है, तो अक्सर एक-दूसरे को पीछे खींचने की कोशिश शुरू हो जाती है।
व्यक्ति बड़ा नहीं, समाज बड़ा होना चाहिए।
नेतृत्व का मतलब केवल मंच पर भाषण देना या तस्वीर खिंचवाना नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं को समझना, लोगों को जोड़ना और आने वाली पीढ़ी के लिए मजबूत रास्ता तैयार करना है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम यह तय करें कि हमें छोटे-छोटे गुटों में बंटकर अपनी ताकत कमजोर करनी है या एकजुट होकर अपने समाज के भविष्य के लिए काम करना है।
मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद और व्यक्तिगत दुश्मनी बना देना पूरे समाज के लिए नुकसानदेह है।
अब समय किसी एक व्यक्ति को दोष देने का नहीं, बल्कि हर जिम्मेदार व्यक्ति से जवाबदेही और हर सक्षम व्यक्ति से योगदान मांगने का है।
अगर नेतृत्व एकजुट, सक्रिय और दूरदर्शी होगा, तो समाज की आवाज भी मजबूत होगी और युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर भी मिलेंगे।
अब समाज को आरोप नहीं—आत्ममंथन चाहिए।
गुटबाजी नहीं—एकजुटता चाहिए।
निष्क्रियता नहीं—जिम्मेदार नेतृत्व चाहिए।
क्योंकि समाज की ताकत उसकी संख्या में नहीं, उसकी एकता में होती है।