Shri Hari Sewa Katha trust - Anantacharya ji Maharaj

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30/06/2026

श्रीमद्भागवत—भगवान् को प्रसन्न करने का सरलतम साधन -
स्वयं श्रीहरि ने ब्रह्माजी से कहा है—
श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं लोकविश्रुतम्।
श्रृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो मम संतोषकारणम्॥
भावार्थ :
जो भक्त भगवान् को प्रसन्न करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह संसार में विख्यात श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रतिदिन श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ श्रवण करे।
श्रीमद्भागवत का श्रवण केवल कथा सुनना नहीं है, बल्कि भगवान् के श्रीचरणों में अपने हृदय को समर्पित करने का दिव्य अवसर है। जहाँ श्रीमद्भागवत का श्रवण होता है, वहाँ भक्ति जागृत होती है, मन निर्मल होता है और जीवन में ईश्वर की कृपा का प्रकाश फैलता है।
आइए, प्रतिदिन कुछ समय श्रीमद्भागवत के श्रवण और मनन के लिए निकालें। यही भगवान् को प्रसन्न करने का सरल, सहज और कल्याणकारी मार्ग है।
॥ जय श्रीराधाकृष्ण॥ जय श्री हरि।।
- अनंताचार्य
#भारत #अध्यात्म

15/05/2026

आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम् ।
सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम् ॥
अर्थ :
आचारः कुलमाख्याति — व्यक्ति के आचरण (व्यवहार) से उसके कुल अथवा संस्कारों का परिचय मिलता है।
देशमाख्याति भाषणम् — व्यक्ति की भाषा, बोली अथवा बोलने के ढंग से उसके देश या क्षेत्र का पता चलता है।
सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति — आदर, सम्मान और व्यवहार की विनम्रता से व्यक्ति के स्नेह (प्रेम) का ज्ञान होता है।
वपुराख्याति भोजनम् — शरीर की अवस्था और रूप-रंग से उसके भोजन एवं खान-पान का परिचय मिलता है।
सरल भावार्थ :
मनुष्य का
आचरण उसके संस्कार बताता है,
भाषा उसके क्षेत्र का परिचय देती है,
सम्मानपूर्ण व्यवहार उसके प्रेम को प्रकट करता है,
और शरीर उसके खान-पान का संकेत देता है।
जय श्री हरि। -अनंताचार्य
#सनातन #सेवा
#संस्कार #भारत #ज्ञान

18/04/2026
01/04/2026

Major General Bakshi shares a powerful perspective on history, strength, and preparedness.The message is simple —peace is respected only when backed by stren...

25/03/2026

अव्यभिचारिणी भक्ति – सच्ची भक्ति का स्वरूप

जब भक्ति में कोई शर्त नहीं होती,
जब प्रेम में कोई स्वार्थ नहीं होता,
जब भगवान के सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं होता—
उसी को अव्यभिचारिणी भक्ति कहते हैं।

आज अधिकांश लोग भगवान को तभी याद करते हैं
जब जीवन में दुख आता है, संकट आता है, या कोई इच्छा पूरी करनी होती है।
परंतु सच्ची भक्ति वह है—
जो सुख में भी उतनी ही हो, जितनी दुख में होती है।

भगवद्गीता (14.26) में भगवान कहते हैं—

मां च योऽव्यभिचारेण भक्ति योगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

अर्थ:
जो मनुष्य अव्यभिचारिणी भक्ति से मेरी सेवा करता है,
वह तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से ऊपर उठकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

भक्ति का अर्थ केवल मांगना नहीं,
भक्ति का अर्थ है — स्वयं को भगवान को समर्पित कर देना।

जब भक्त कहे—
“हे प्रभु! आप जैसा रखें, वैसा ही अच्छा है”
और परिस्थिति कैसी भी हो, उसका विश्वास न डगमगाए—
तभी भक्ति सच्ची बनती है।

यही भक्ति हमें शांति देती है
यही भक्ति हमें निर्भय बनाती है
यही भक्ति हमें भगवान के निकट ले जाती है

संदेश:
भक्ति बदलनी नहीं चाहिए,
परिस्थितियाँ बदल जाएँ तो भी।

— संत श्री अनंताचार्य जी महाराज (अनंत महाराज)

19/03/2026

मेरी प्रार्थना सुनो - "तरुण" तुम जवान हो जाओ सभी सनातनियों के विचारों में। "उत्तम नगर "तुम संपूर्ण भारत के वातावरण में छा जाओ।

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