27/08/2022
जानें, शनि अमावस्या का महत्व, ऐसे करें पूजन
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का खास महत्व होता है. शनि अमावस्या के दिन इस विधि से पूजन करने से कई लाभ होते हैं.
अमावस्या तिथि विशेष प्रभाव की तिथि मानी जाती है. इस दिन स्नान, दान और पूजा उपासना का विशेष महत्व होता है. अगर यह अमावस्या शनिवार को पड़ जाती है तो यह और भी फलदायी हो जाती है. शनि अमावस्या पर विशेष प्रयोगों से शनि की कृपा आसानी से मिल सकती है. ख़ास तौर से रोजगार और नौकरी की समस्याएं आसानी से दूर हो सकती हैं
इस दिन किस तरह करें शनि देव का पूजन?
- शनि देव की पूजा प्रदोष काल या रात्रि में करें.
- चाहें तो इस दिन व्रत भी रख सकते हैं.
- पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं.
- इसके बाद शनि चालीसा या शनि मंत्र का जाप करें.
- किसी निर्धन को खाने पीने की चीज़ों का दान करें.
- शनिदेव से कृपा पाने की प्रार्थना करें.
नौकरी या रोजगार पाने के लिए इस दिन क्या करें?
- सायंकाल पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं.
- इसके बाद "ॐ शं शनैश्चराय नमः" का जाप करें.
एक काला धागा पीपल वृक्ष की डाल में बांध दें.
- इसमें तीन गांठ लगाएं.
जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए क्या करें?
- एक कटोरी में सरसों का तेल ले लें.
- उसमे बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली डालकर शनि मंत्र का जाप करें.
- मंत्र होगा - "ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः"
- सरसों के तेल को पीपल के वृक्ष के नीच रख दें.
साढ़े साती और ढैया से बचने का उपाय-
- एक लोहे का छल्ला ले आएं.
- उसे शनिवार की सुबह सरसों के तेल में डुबा कर रख दें.
- शाम को शनिदेव के मन्त्रों का जाप करें.
- उनकी विधिवत आरती करें.
- इसके बाद लोहे के छल्ले को बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण कर लें.
शनिदेव की पूजा में क्या-क्या सावधानी रखें?
- सरसों के तेल की बर्बादी न करें.
- निर्धनों की सेवा और दान जरूर करें.
- जहां तक हो सके आचरण उत्तम रखें.
शनि अमावस्या का महत्व, 4 उपाय और 1 मंत्र
शनिवार को आने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। इस दिन शनि से पीड़ित व्यक्तियों के लिए दान का महत्व बढ़ जाता है। शनि से प्रभावित व्यक्ति कई प्रकार के अनावश्यक परेशानियों से घिरे हुए रहते हैं। कार्य में बाधा का होना, कोई भी कार्य आसानी से न बनना जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है।
इस समस्या को कम करने हेतु शनिचरी अमावस्या के दिन शनि से संबंधित वस्तुओं का दान करना उत्तम रहता है। जिन लोगों की जन्म कुंडली में शनि का कुप्रभाव हो उन्हें शनि के पैरों की तरफ ही देखना चाहिए, जहां तक हो सके शनि दर्शन से भी बचना चाहिए।
शनि जाते हुए अच्छा लगता है ना कि आते हुए। शनि जिनकी पत्रिका में जन्म के समय मंगल की राशि वृश्चिक में हो या फिर नीच मंगल की राशि मेष में हो तब शनि का कुप्रभाव अधिक देखने को मिलता है। बाकि की राशियां सिर्फ सूर्य की राशि सिंह को छोड़ शनि की मित्र, उच्च व सम होती है।
शनि-शुक्र की राशि तुला में उच्च का होता है। शनि का फल स्थान भेद से अलग-अलग शुभ ही पड़ता है। सम में ना तो अच्छा ना ही बुरा फल देता है। मित्र की राशि में शनि मित्रवत प्रभाव देता है। शत्रु राशि में शनि का प्रभाव भी शत्रुवत ही रहता है, जो सूर्य की राशि सिंह में होता है।
शनि के अशुभ प्रभाव को कैसे करें कम, शनिदेव सज्जनों को नहीं करते तंग
1. शनि के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए तिल का तेल एक कटोरी में लेकर उसमें अपना मुंह देखकर शनि मंदिर में रख आएं (जिस कटोरी में तेल हो उसे भी घर ना लाएं)। कहते हैं तिल के तेल से शनि विशेष प्रसन्न रहते हैं।
2. सवापाव साबुत काले उड़द लेकर काले कपड़े में बांध कर शुक्रवार को अपने पास रखकर सोएं। ध्यान रहे अपने पास किसी को भी ना सुलाएं। फिर उसको शनिवार को शनि मंदिर में रख आएं।
3. काला सुरमा एक शीशी में लेकर अपने ऊपर से शनिवार को नौ बार सिर से पैर तक किसी से उतरवा कर सुनसान जमीन में गाड़ देवें।
4. ना तो नीलम पहने, ना ही लोहे का बना छल्ला पहने। इसके पहनने से शनि का कुप्रभाव और बढ़ जाता है।
शनि मंत्र का जप भी किया जाए तो काफी हद तक शनि के कुप्रभाव से बचा जा सकता है।
मंत्र इस प्रकार है- ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः।
शनि देव न्यायप्रिय राजा हैं। अगर आप बुरे काम नहीं करते हैं किसी से धोखा, छल-कपट आदि नहीं करते हैं तो इस ग्रह से डरने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि शनिदेव सज्जनों को तंग नहीं करते।