गुरु महिमा

गुरु महिमा गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर?

एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में रहकर वेदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन करते रहे। समय के साथ उन्हें सभी शास्त्रों का अच्...
01/04/2026

एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में रहकर वेदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन करते रहे। समय के साथ उन्हें सभी शास्त्रों का अच्छा ज्ञान हो गया। अब उन्हें लगने लगा कि वे अपने गाँव के सबसे बड़े विद्वान बन चुके हैं। इस ज्ञान के साथ उनके भीतर धीरे-धीरे अहंकार भी उत्पन्न हो गया।

एक दिन वे अपने गाँव लौटे। गाँव पहुँचते ही एक किसान ने उनसे पूछा—
“पंडित जी, क्या आप बता सकते हैं कि हमारे समाज में लोग दुखी क्यों रहते हैं?”

पंडित जी ने उत्तर दिया—
“लोगों के पास जीवनयापन के पर्याप्त साधन नहीं होते। धन की कमी के कारण वे दुखी रहते हैं।”

किसान ने विनम्रता से कहा—
“लेकिन पंडित जी, जिनके पास धन-दौलत है, वे भी तो दुखी रहते हैं। मेरे पास भी संपत्ति है, फिर भी मैं दुखी हूँ। ऐसा क्यों?”

पंडित जी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके। वे कुछ देर मौन रहे।
तब किसान ने कहा—
“यदि आप मेरे दुख का कारण बता दें, तो मैं अपनी सारी संपत्ति आपको दान कर दूँगा।”

संपत्ति के लालच में पंडित जी ने कहा—
“ठीक है, मैं कुछ ही दिनों में इसका उत्तर खोजकर लाऊँगा।”
यह कहकर वे फिर काशी लौट गए और पुनः शास्त्रों का अध्ययन करने लगे। परंतु उन्हें उस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।

अब वे अत्यंत चिंतित रहने लगे। उन्हें डर था कि यदि उत्तर न मिला तो वे बड़ी संपत्ति से वंचित हो जाएंगे।

एक दिन उनकी मुलाकात एक भिखारिन से हुई, जो सड़क पर भीख माँगकर अपना जीवनयापन करती थी। उसने पंडित जी से उनकी चिंता का कारण पूछा। पंडित जी ने उसे अपनी पूरी समस्या बता दी।

उस स्त्री ने कहा—
“मैं आपको उत्तर दे सकती हूँ, लेकिन इसके लिए आपको कुछ दिन मेरे साथ रहना होगा।”

पंडित जी दुविधा में पड़ गए। वे सोचने लगे कि एक ब्राह्मण होकर किसी भिखारिन के साथ रहना उचित नहीं है। उन्हें लगा कि इससे उनका धर्म नष्ट हो जाएगा।

परंतु फिर उन्होंने सोचा—
“कुछ दिनों की ही तो बात है। उत्तर मिलते ही मैं किसान की संपत्ति का स्वामी बन जाऊँगा।”

लालच के कारण उन्होंने उसकी बात मान ली।
कुछ दिनों तक वे उसके साथ रहे, लेकिन उत्तर नहीं मिला।

फिर उस स्त्री ने कहा—
“आपको मेरे हाथ का बना भोजन खाना होगा।”
पंडित जी ने यह भी स्वीकार कर लिया। जो कभी किसी के हाथ का पानी तक नहीं पीते थे, वे अब उसका बनाया भोजन करने लगे।

फिर भी उत्तर नहीं मिला।
इसके बाद स्त्री ने कहा—
“अब आपको मेरे साथ सड़क पर खड़े होकर भीख माँगनी होगी।”

उत्तर पाने की इच्छा में पंडित जी इसके लिए भी तैयार हो गए। वे उसके साथ भीख माँगने लगे।
फिर भी उन्हें उत्तर नहीं मिला।

एक दिन उस स्त्री ने कहा—
“आज आपको मेरा जूठा भोजन खाना होगा।”

यह सुनकर पंडित जी क्रोधित हो गए। उन्होंने गुस्से में कहा—
“यदि तुम्हें मेरे प्रश्न का उत्तर पता है, तो अभी बता दो।”

स्त्री मुस्कुराई और बोली—
“पंडित जी, यही तो आपके प्रश्न का उत्तर है।
यहाँ आने से पहले आप किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे।

मेरे जैसी स्त्रियों को देखना तक पसंद नहीं करते थे।
लेकिन किसान की संपत्ति के लालच में आपने सब कुछ स्वीकार कर लिया। आपने अपना सम्मान, अपने सिद्धांत और अपनी मर्यादा तक छोड़ दी।”

फिर उसने शांत स्वर में कहा—
“मनुष्य का लालच और उसकी बढ़ती हुई इच्छाएँ ही उसके दुख का कारण हैं। यही इच्छाएँ उसे वे काम करने पर मजबूर कर देती हैं, जिनके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होता।”

पंडित जी को अपनी भूल का अहसास हो गया। उनका अहंकार और लालच टूट चुका था। उन्होंने समझ लिया कि सच्चा सुख संतोष और संयम में ही है।

सीख:
मनुष्य की असीमित इच्छाएँ और लालच ही उसके जीवन के सबसे बड़े दुख का कारण बनते हैं। संतोष ही सच्चा सुख है।

मथुरा बाबू की परीक्षा और श्री रामकृष्ण परमहंस जी की दिव्यतादक्षिणेश्वर के काली मंदिर की मालकिन रानी रासमणि के दामाद, मथु...
30/03/2026

मथुरा बाबू की परीक्षा और श्री रामकृष्ण परमहंस जी की दिव्यता

दक्षिणेश्वर के काली मंदिर की मालकिन रानी रासमणि के दामाद, मथुर मोहन विश्वास (मथुरा बाबू), श्री रामकृष्ण परमहंस जी के अनन्य भक्त थे। लेकिन एक संसारी व्यक्ति होने के नाते, उनके मन में कभी-कभी यह संदेह आता था कि क्या कोई मनुष्य वास्तव में "काम-कांचन" (वासना और धन) के मोह से पूरी तरह मुक्त हो सकता है?

मथुरा बाबू का मानना था कि शायद श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने अभी तक संसार के सबसे बड़े आकर्षण का सामना नहीं किया है, इसलिए वे विचलित नहीं होते। उन्होंने सोचा कि यदि वे इस परीक्षा में सफल हो गए, तो उनकी दिव्यता पर मुहर लग जाएगी।

प्रचलित कहानियों में यह घटना दक्षिणेश्वर की बताई जाती है, लेकिन प्रामाणिक जीवनी के अनुसार, मथुरा बाबू ने एक बार श्री रामकृष्ण परमहंस जी को अपने साथ मेहरपुर (या अन्य किसी उद्यान गृह) में ठहराया था। वहां उन्होंने गुप्त रूप से दो अत्यंत सुंदर और चतुर वारांगनाओं (गणिकाओं) को श्री रामकृष्ण परमहंस जी के कमरे में भेजा।

जैसे ही वे स्त्रियाँ हाव-भाव दिखाकर उन्हें लुभाने लगीं, श्री रामकृष्ण परमहंस जी डरे नहीं और न ही उन्होंने उन्हें डांटा। इसके विपरीत:
* वे एक छोटे बालक की तरह सहम गए।
* उन्होंने अपनी इष्ट देवी को याद किया और जोर-जोर से "माँ! माँ!" पुकारने लगे।
* वे तुरंत भाव-समाधि में चले गए। उनकी दृष्टि में वे स्त्रियाँ हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि साक्षात् 'जगदम्बा' का रूप बन गईं।

जब उन स्त्रियों ने देखा कि यह पुरुष उन्हें भोग की दृष्टि से नहीं, बल्कि एक 'अबोध बालक' की पवित्र दृष्टि से देख रहा है, तो उनका सारा अहंकार और काम-भाव शांत हो गया।
* उन्हें अपनी नीचता पर घृणा होने लगी।
* उनकी 'मातृत्व शक्ति' जाग गई।
* वे रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ीं और क्षमा मांगकर वहां से चली गईं।

श्री रामकृष्ण परमहंस जी हर स्त्री को 'आनंदमयी माँ' का रूप मानते थे। |

उन्होंने सिद्ध किया कि ईश्वर प्राप्ति के लिए मन का 'बालक' की तरह निर्मल होना अनिवार्य है। |

इस घटना के बाद मथुरा बाबू ने स्वीकार किया कि श्री रामकृष्ण परमहंस जी कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि ईश्वर के अवतार हैं। |

"जिसके मन में काम का लेशमात्र भी अंश नहीं है, उसके लिए पूरा संसार ही ब्रह्ममय है।" — श्री रामकृष्ण परमहंस

16/03/2026

अघोर जोगी मस्तक चंदन,
अंग भभूत और मन पावन।
शीश जटा का मुकुट सुहाए,
भक्ति में डूबा हर एक जीवन।

हाथ त्रिशूल कंधे पर झोली,
बोले जोगी मीठी बोली।
फक्कड़ मौज में चलता जाए,
खेले वो भस्म की होली।

धुना जल रहा भक्ति की आग,
जगा हृदय में प्रेम का राग।
पानी सा निर्मल मन उसका,
सोया हुआ जगा दे भाग्य।

मुख से निकले अलख निरंजन,
मिट जाए सारा भव-बंधन।
सिद्धों की वाणी गूंज रही,
करते सब देवों का वंदन।

नाथ निरंजन आदि अनंता,
ज्ञान की गंगा सदा बहंता।
कण-कण में है ईश्वर वास,
यही सिखाता सच्चा संता।

अलख पुरुष की माया भारी,
श्रद्धा रखते दुनिया सारी।
माला जपते नाम की पल-पल,
शिव चरणों की महिमा न्यारी।

साधु की संगत सुखकारी,
तज दी उसने दुनियादारी।
सन्यासी का भेख निराला,
भक्ति की है राह संवारी।

स्वयं में बैठे भगवान हैं,
आत्मा का वो ज्ञान महान हैं।
धुना तापकर सत्य को पाया,
जोगी शिव का ही रूप समान हैं।

मिट गया द्वेष और मोह का जाला,
पहन ली प्रेम की उसने माला।
त्रिशूल शक्ति का प्रतीक बना,
पिया भक्ति का अमृत प्याला।

अलख निरंजन गूंज रहा है,
सत्य का मार्ग सूझ रहा है।
झोली में है सत्य की पूंजी,
जग का शोर अब बुझ रहा है।

सिद्धों ने जो ज्ञान सुनाया,
वाणी ने वो भेद बताया।
नाथ सरन में जो भी आए,
उसने ही मोक्ष का फल पाया।

पानी सा जो बहता जाए,
वही असल में जोगी कहाए।
फक्कड़ बन जो मस्त रहे,
ईश्वर उसके पास ही आए।

साधु का यह भेख सुहाना,
छोड़ दिया है सारा ज़माना।
अघोर राह पर चल कर ही,
सच्चे शिव को है पहचानना।

"ॐ सोहं" का जाप कर, सुरत शब्द को जोड़।माया की सब बेड़ियाँ, पल भर में तू तोड़॥बिना जिव्हा के मंत्र जप, बिना कान के सुन।जोगी ...
16/03/2026

"ॐ सोहं" का जाप कर, सुरत शब्द को जोड़।
माया की सब बेड़ियाँ, पल भर में तू तोड़॥
बिना जिव्हा के मंत्र जप, बिना कान के सुन।
जोगी भीतर झांक ले, अनहद बाजे धुन॥
पाँच तत्व की देहली, दस द्वारे का मकान।
जोगी भीतर बैठकर, सुमिरे ब्रह्म ज्ञान॥
धूनी धू धू जल रही, इड़ा पिंगला बीच।
सच्चा जोगी सोई है, जो अमृत लेवे खींच॥
जोग जोग सब कोई कहे, जोग न जाने कोय।
मन मारै जो अपना, जोगी सोई होय॥
पाप पुण्य से परे जो, अलख जगावे नीत।
फकीरी का मार्ग है, सबसे गहरी प्रीत॥

15/03/2026

अजपा जाप (Ajapa Japa) योग और अध्यात्म की एक अत्यंत प्रभावशाली और सहज विधि है। इसे 'हंस जाप' भी कहा जाता है। सरल शब्दों में, जब मंत्र का जाप बिना किसी प्रयास के, श्वास-प्रश्वास के साथ अपने आप होने लगे, तो उसे अजपा जाप कहते हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य मन को शांत करना और उसे अंतर्मुखी बनाकर परमात्मा या आत्म-स्वरूप से जोड़ना है।
अजपा जाप का अर्थ
साधारण जाप में हम अपनी जीभ या कंठ का उपयोग करके मंत्र का उच्चारण करते हैं, लेकिन अजपा जाप में मंत्र हमारी सांसों में बस जाता है। शास्त्रों के अनुसार, एक मनुष्य एक दिन में लगभग 21,600 बार सांस लेता है। इस विधि का लक्ष्य हर सांस के साथ ईश्वर का स्मरण जोड़ना है।
इसमें आमतौर पर 'सो-हं' (So-Ham) मंत्र का प्रयोग होता है:
* 'सो' (So): सांस अंदर लेते समय।
* 'हं' (Ham): सांस बाहर छोड़ते समय।
इसका अर्थ है— "वही (ब्रह्म) मैं हूँ।"
अजपा जाप की विधि (Step-by-Step)
इस साधना को आप कहीं भी कर सकते हैं, लेकिन शुरुआत में शांत जगह पर बैठना बेहतर होता है:
* आसन: किसी भी आरामदायक आसन (सुखासन या सिद्धासन) में बैठ जाएं। अपनी रीढ़ की हड्डी, गर्दन और सिर को सीधा रखें।
* शरीर को ढीला छोड़ें: अपनी आँखें बंद करें और पूरे शरीर को शिथिल (Relax) कर दें। अपना पूरा ध्यान अपनी आती-जाती सांसों पर टिका दें।
* सांसों का अवलोकन: जबरदस्ती गहरी सांस न लें। सांस जैसी चल रही है, उसे बस महसूस करें।
* मंत्र का जुड़ाव:
* जब आप सांस अंदर लें, तो मन ही मन 'सो' की ध्वनि सुनें।
* जब आप सांस बाहर छोड़ें, तो मन ही मन 'हं' की ध्वनि सुनें।
* एकाग्रता: शुरुआत में मन भटकेगा, लेकिन जैसे ही याद आए, वापस अपना ध्यान सांस और 'सो-हं' की ध्वनि पर ले आएं।
* निरंतरता: धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ने पर यह जाप मानसिक से 'अजपा' हो जाता है, यानी आपको इसे करना नहीं पड़ता, यह अपने आप होने लगता है।
इसके मुख्य लाभ
* तनाव से मुक्ति: यह मन को तुरंत शांत करता है और घबराहट (Anxiety) को कम करता है।
* एकाग्रता: इससे मानसिक स्पष्टता और फोकस बढ़ता है।
* ऊर्जा का संचार: यह शरीर के चक्रों को जागृत करने और प्राण शक्ति बढ़ाने में सहायक है।
* सहजता: इसके लिए किसी माला या विशेष स्थान की अनिवार्यता नहीं है; आप चलते-फिरते या काम करते हुए भी इसे मन ही मन कर सकते हैं।
> सुझाव: शुरुआत में इसे रोज 10-15 मिनट सुबह या रात को सोने से पहले करने का प्रयास करें।

26/02/2026

जान लो समय की महिमा

🌺🙏🌺🙏*///गुरु* *तत्व///*🌺🙏🌺🙏सकल जगत गुरुमय, गुरु तत्व प्रधान।गुरु मंत्र जगमूल है, गुरु सकल विधान।।गुरु मूल से जगत बना, गु...
24/02/2026

🌺🙏🌺🙏*///गुरु* *तत्व///*🌺🙏🌺🙏

सकल जगत गुरुमय, गुरु तत्व प्रधान।
गुरु मंत्र जगमूल है, गुरु सकल विधान।।

गुरु मूल से जगत बना, गुरु मूल अवधार।
गुरु प्रेरणा जगत की, गुरु ही तारणहार।।

गुरु जगत संगीत है, गुरु सुधा का सार।
गुरु भक्ति का भाव है, गुरु जगत आधार।।

गुरु जगत को पालते, गुरु जगत करतार।
गुरु तत्व मृदु स्पर्श से, हो भवसागर पार।।

गुरु तत्व की मधुरिमा, गुरु तत्व प्रसार।
गुरु करे सोई होत है, गुरु जगत उच्चार।।

गुरु मिले सब ही मिले, गुरु सकल संसार।
गुरु तत्व अवधारयो, भवसागर के पार।।

22/02/2026

कलयुग में नाम अधारा
"कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा" गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस की एक प्रसिद्ध चौपाई है। इसका अर्थ है कि कलयुग में ईश्वर (मुख्यतः राम नाम) का स्मरण ही मोक्ष प्राप्ति और भवसागर से पार उतरने का सबसे आसान व प्रभावी साधन है। इस युग में कठिन तपस्या के बिना सिर्फ प्रभु नाम जप ही पर्याप्त है।

मुख्य बातें:
भावार्थ: यह पंक्तियाँ उत्तरकाण्ड (रामायण) से हैं, जो कहती हैं कि इस युग में कोई अन्य सहारा नहीं, केवल भगवान का नाम ही एक सहारा है।

नाम की महिमा: नाम स्मरण के लिए कोई नियम या विधि-विधान की आवश्यकता नहीं है; इसे किसी भी अवस्था में किया जा सकता है।

उदाहरण: प्रह्लाद, शबरी, और द्रौपदी जैसे भक्तों ने नाम का सहारा लेकर ही कल्याण प्राप्त किया।

तात्पर्य: यह कलयुग में भक्ति मार्ग की सुलभता को दर्शाता है, जहाँ प्रभु नाम ही एकमात्र मुक्ति का मार्ग है।

आप किसी भी तरह से, कैसी भी स्थिति में भगवान का नाम जपे, तो भगवान की कृपा बनी रहती है।

18/02/2026

साक्षी भाव

Address

9
Delhi
110058

Telephone

+919958905566

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when गुरु महिमा posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share