12/05/2026
अपरा एकादशी (13 मई 2026)
13 मई 2026, बुधवार को रखा जाएगा। यह ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। इस व्रत को अचला एकादशी भी कहते हैं, जो अपार पुण्य, धन और सफलता प्रदान करने वाला माना जाता है।
अपरा एकादशी शुभ अवसर के उपलक्ष्य पर भव्य खाटू धाम - श्री खाटू श्याम मंदिर चांदपुर का निर्माण होने जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य एक ऐसा दिव्य स्थान बनाना है जो न केवल भक्तों के लिए आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करे बल्कि क्षेत्र के विकास में भी सहायक हो कृपया दिए गए लिंक पर क्लिक करके दान करें।
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अपरा एकादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
1. धार्मिक महत्व: पापों का शमन
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के ज्ञात-अज्ञात सभी पापों का नाश होता है।
• पाप मुक्ति: ब्रह्महत्या, परनिंदा और असत्य बोलने जैसे गंभीर दोषों के प्रभाव को कम करने के लिए इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है।
• पुण्य फल: पद्म पुराण के अनुसार, इस व्रत का फल गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने या कुंभ मेले में स्नान करने के समान माना जाता है।
2. आध्यात्मिक महत्व: चित्त की शुद्धि
आध्यात्मिक दृष्टि से अपरा एकादशी केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन की सफाई का एक माध्यम है:
• इंद्रिय नियंत्रण: एकादशी का व्रत मन और इंद्रियों को वश में करने का अभ्यास है। भोजन का त्याग कर ध्यान और भक्ति में समय बिताने से मानसिक अनुशासन बढ़ता है।
• सद्गुणों का संचार: यह दिन लोभ, मोह और क्रोध जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्याग कर सात्विकता की ओर बढ़ने का संदेश देता है।
दान का आध्यात्मिक महत्व
1. मोह और माया का त्याग
आध्यात्मिक दृष्टि से दान केवल वस्तु का लेन-देन नहीं, बल्कि 'ममत्व' (मोह) का त्याग है। जब आप अपनी प्रिय वस्तु या धन किसी जरूरतमंद को देते हैं, तो यह आपके भीतर से "यह मेरा है" वाले अहंकार को कम करता है। अपरा एकादशी पर दान करने से चित्त शुद्ध होता है और विनम्रता आती है।
2. कर्मों का शोधन
अपरा एकादशी को पापों का नाश करने वाली तिथि माना जाता है। मान्यता है कि अनजाने में हुए सूक्ष्म पापों (जैसे असत्य बोलना या किसी का मन दुखाना) के नकारात्मक प्रभाव को मिटाने के लिए दान एक 'प्रायश्चित' के रूप में कार्य करता है। यह आपके संचित कर्मों के भार को हल्का करने में सहायक होता है।
3. भौतिक आसक्ति से मुक्ति
शास्त्रों में उल्लेख है कि इस दिन किया गया दान कई जन्मों के अनजाने में किए गए पापों को नष्ट कर देता है। विशेषकर अन्न और जल का दान करने से पितरों को भी तृप्ति मिलती है और साधक को मानसिक शांति प्राप्त होती है।
4. वैशाख मास की महिमा
एकादशी का व्रत मानसिक अनुशासन सिखाता है, और दान भौतिक वस्तुओं के प्रति हमारी आसक्ति (Attachment) को कम करता है। यह हमें सिखाता है कि हम संसार में जो कुछ भी अर्जित करते हैं, वह अंततः समाज और ईश्वर का ही है।
आपके दान किये गए पैसों को कहाँ इस्तेमाल किया जायेगा?
आपका दिया हुआ दान मंदिर निर्माण सामग्री जैसे ईंट, रोड़ी, बजरी, बदरपुर, सरिया, रेत, लेबर की दिहाड़ी आदि की खरीदारी में उपयोग किया जाएगा। हर छोटी से छोटी सहायता इस पवित्र उद्देश्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
अपरा एकादशी की सरल पूजा विधि:
अपरा एकादशी की पूजा विधि अत्यंत सरल है, जिसे आप घर पर ही श्रद्धापूर्वक संपन्न कर सकते हैं। ज्येष्ठ मास की गर्मी को देखते हुए इस पूजा में शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुओं का विशेष महत्व होता है।
यहाँ चरण-दर-चरण सरल विधि दी गई है:
1. प्रातः काल की तैयारी
• स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। साफ वस्त्र (संभव हो तो पीले वस्त्र) धारण करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें कि "हे भगवान विष्णु, मैं आज अपरा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से रखूँगा/रखूँगी, मेरी पूजा स्वीकार करें।"
• सफाई: पूजा घर को साफ करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से शुद्ध करें।
2. पूजा की मुख्य विधि
• दीप प्रज्ज्वलन: भगवान के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं और अगरबत्ती या धूप अर्पित करें।
• अभिषेक व तिलक: भगवान विष्णु को पीले चंदन या केसर का तिलक लगाएं। यदि आपके पास लड्डू गोपाल या विष्णु जी की मूर्ति है, तो उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं।
• पुष्प अर्पण: भगवान को पीले फूल (जैसे गेंदा या पीले गुलाब) चढ़ाएं।
3. भोग और तुलसी का महत्व
• सात्विक भोग: भगवान को ऋतु फल (जैसे आम, खरबूजा) या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
• तुलसी दल: भगवान विष्णु की पूजा बिना तुलसी के अधूरी मानी जाती है। भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य रखें।
ध्यान दें: एकादशी के दिन तुलसी नहीं तोड़ी जाती, इसलिए एक दिन पहले ही पत्ते तोड़कर रख लें।
4. पाठ और आरती
• मंत्र जाप: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का यथाशक्ति जाप करें।
• कथा व पाठ: अपरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत श्रेष्ठ होता है।
• आरती: पूजा के अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें।
5. दिन भर का नियम
• खान-पान: इस दिन पूर्ण उपवास रखें। यदि सामर्थ्य न हो तो एक समय फलाहार (फल, दूध, कूटू या सिंघाड़े का आटा) कर सकते हैं। अन्न (विशेषकर चावल) का त्याग करें।
• व्यवहार: मन को शांत रखें, परनिंदा से बचें और सात्विक विचार बनाए रखें।
6. पारण (व्रत खोलना)
• एकादशी का व्रत अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में खोला जाता है।
• द्वादशी को सुबह पुनः स्नान-पूजा करें, ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को भोजन या दान दें और उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करके व्रत संपन्न करें।
खाटू धाम - श्री खाटू श्याम मंदिर चांदपुर
निर्माण व संस्थापक - खाटू श्याम बाबा सेवा फाउंडेशन
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