Being Uttarakhandi

Being Uttarakhandi "Being Uttarakhandi" is all about celebrating the spirit and identity of Uttarakhand.
(2073)

Through this platform, we aim to connect Uttarakhandis with the achievers, thinkers, and intellectuals from our community. ये पेज एक राजनितिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जागरूपता को बढ़ावा देता है, हमारा मानना है की जब तक किसी समाज के लोग राजनितिक रूप पर जागरूप नहीं होंगे बदलाव नहीं आएगा. Being Uttarakhandi earlier known as official group of narendra Singh Negi, is an Uttarakhandi secular organisa

tion dedicated to change in Uttarakhand India by focusing on culture, history, quality of life, education and environment in the belief that culture, history, life, education and environment is a critical requisite for socio-economic change in Uttarakhand, India. In keeping with this focus, our volunteers are involved with and support projects that are secular and have an education-environment-related component to them. The objectives of this group are:
• To provide quality education to underprivileged children in Uttrakhand, India.
• To encourage the formation of various local groups across india to reach out to larger sections of the population.
• To support and cooperate with persons and groups already engaged in similar activities.
• To raise the required human and other resources to achieve the group objectives.
• To provide opportunities to individuals living outside India who wish to participate in Shivprabha activities in Uttrakhand, India.
• To address, whenever possible, other issues affecting human life such as health care, socio-economic aspects and women’s issues.
• To encourage local people for plantation and conservation of forest.

बडा या अमीर इन्सान होना नही, बडा काम करना आपको महान बनाता है। शाबास पूजा परमार उत्तराखण्ड का नाम रोशन किया है आपने
13/05/2026

बडा या अमीर इन्सान होना नही, बडा काम करना आपको महान बनाता है। शाबास पूजा परमार उत्तराखण्ड का नाम रोशन किया है आपने

"तेरा भाई बदला लेगा" के मूड मे खेल रहा है आज हार्दिक का भाई कुणाल पाड्या...
10/05/2026

"तेरा भाई बदला लेगा" के मूड मे खेल रहा है आज हार्दिक का भाई कुणाल पाड्या...

इस बात पर हमें गर्व होना चाहिए कि उत्तराखंड की राजनीति सादगी, जवाबदेही और लोकतंत्र की असली पहचान है। बंगाल केरल, महाराष्...
08/05/2026

इस बात पर हमें गर्व होना चाहिए कि उत्तराखंड की राजनीति सादगी, जवाबदेही और लोकतंत्र की असली पहचान है। बंगाल केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे भारत के अलग-अलग राज्यों की हत्या, गुण्डागर्दी, घूसखोरी की राजनीति को अगर ध्यान से देखा जाए, तो हर राज्य की अपनी एक अलग राजनीतिक संस्कृति बहुत ही अपराधिक दिखाई देती है। कहीं जातिवाद हावी है, कहीं परिवारवाद, कहीं हिंसा और राजनीतिक गुंडागर्दी। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति इन सबसे अलग दिखाई देती है। यह परफेक्ट नहीं है, इसमें कमियां बहुत हैं, लेकिन फिर भी यह कई बड़े राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और अन्य राज्यों की राजनीति से अधिक शांत, सरल और लोकतांत्रिक लगती है।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां की जनता अपने नेताओं को आंख बंद करके सत्ता नहीं सौंपती। लगभग हर चुनाव में सरकार बदल जाती है। इसका मतलब यह नहीं कि जनता अस्थिर है, बल्कि इसका अर्थ है कि उत्तराखंड की जनता अपने नेताओं के काम का मूल्यांकन करती है। जब लोगों को लगता है कि सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, तो वे उसे बदल देते हैं। जनता हर बार इस उम्मीद से नया विकल्प चुनती है कि शायद अगली सरकार बेहतर काम करेगी। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है कि जनता सीधी होने के बाद भी जागरूक है।
सच यह भी है कि हर बार उम्मीदें पूरी नहीं होतीं। विकास के बड़े-बड़े वादे अक्सर अधूरे रह जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति की खूबसूरती यह है कि यहां नेताओं ने कभी राजनीति को हिंसा का माध्यम नहीं बनाया। यहां राजनीतिक मतभेद हैं, अहंकार भी है, लेकिन बंगाल जैसी राजनीतिक हिंसा या कुछ अन्य राज्यों जैसी गुंडागर्दी की संस्कृति नहीं है। उत्तराखंड के नेता शायद बहुत चालाक राजनीतिक खिलाड़ी नहीं हैं, लेकिन वे आम तौर पर अपराधी मानसिकता वाले भी नहीं हैं।उत्तराखंड के नेता आज भी अपेक्षाकृत सरल दिखाई देते हैं। वे दिल्ली की बड़ी राजनीतिक चालों में भले कमजोर हों, लेकिन जमीन से जुड़े हुए लगते हैं। यही कारण है कि यहां की राजनीति में व्यक्तिगत दुश्मनी कम और सामाजिक संबंध अधिक दिखाई देते हैं। अगर उत्तराखंड की राजनीति में किसी ऐसे नेता का नाम लिया जाए जो हर परिस्थिति में खुद को ढालने की क्षमता रखता हो, तो वह मेरे लिए नाम हरक सिंह रावत का है। वे उत्तराखंड की राजनीति के सबसे अनुभवी नेता है। अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में खुद को फिट करना, संगठन और सत्ता दोनों में अपनी जगह बनाए रखना, यह उनकी राजनीतिक चापलूसी या यूँ कहूँ समझ को दिखाता है।
जहां तक कांग्रेस और बीजेपी की बात है, तो मुझे लगता है कि कांग्रेस के पास राज्य स्तर पर बेहतर और अनुभवी नेता हैं। लेकिन इसके बावजूद बीजेपी की सरकारें अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती दिखाई देती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण केंद्र का समर्थन है। बीजेपी के राज्य नेताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार का पूरा सहयोग मिलता है, जबकि कांग्रेस के नेताओं को सोनिया गांधी या राहुल गांधी के नेतृत्व से वैसा मजबूत समर्थन या सहयोग नहीं मिल पाता। असल समस्या यह है कि दोनों ही पार्टियों के अधिकांश नेताओं के पास उत्तराखंड के दीर्घकालिक विकास का स्पष्ट विजन नहीं दिखता। राज्य की राजनीति आज भी “रेत-बजरी, शराब और चारधाम” जैसे मुद्दों के आसपास घूमती रहती है। उद्योग, शिक्षा, पलायन, पहाड़ी अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार जैसे असली मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं।उत्तराखंड में यदि किसी नेता ने कभी अलग सोच दिखाने की कोशिश की, तो उनमें हरीश रावत का नाम जरूर लूँगा। उन्होंने “काफल पार्टी” जैसे स्थानीय संस्कृति और पहाड़ी पहचान से जुड़े विचारों को सामने लाने की कोशिश की। हालांकि वे भी राज्य की राजनीति को पूरी तरह नई दिशा नहीं दे सके, लेकिन कम से कम उन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग सोचने का प्रयास किया। उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के संस्थापकों के पास भी राज्य के लिए स्पष्ट विजन था। उन्होंने अलग उत्तराखंड राज्य का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए संघर्ष किया। लेकिन समय के साथ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और आपसी संघर्षों ने इस पार्टी को कमजोर कर दिया। आज नई पीढ़ी के युवा नेताओं के पास शब्द तो हैं, भाषण भी हैं, लेकिन अब भी एक ठोस विजन की कमी महसूस होती है। फिर भी, उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी अच्छाई यही है कि यहां राजनीति अभी पूरी तरह अपराध और भय के हाथों में नहीं गई है। यहां के नेता साधारण हैं, कई बार राजनीतिक रूप से बहुत चतुर भी नहीं लगते, लेकिन शायद यही उनकी सबसे बड़ी अच्छाई है। वे “पॉलिटिक्स” कम जानते हैं, लेकिन इंसानियत अभी भी बाकी है।
उत्तराखंड की राजनीति में कमियां बहुत हैं, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा आज भी जिंदा है। यहां जनता सवाल पूछती है, सरकार बदलती है, लेकिन समाज को तोड़ने वाली हिंसा को स्वीकार नहीं करती। और शायद यही कारण है कि मुझे उत्तराखंड की राजनीति, अपनी सादगी कई बड़े राज्यों से बेहतर महसूस होती है। और बाकि हम अपने पहाडी नेताओं से सबाल पूछते रहैं किसी दिन कोई नेता समझ, राजनैतिक ज्ञान और राजनैतिक स्मार्टनेस भी लेकर आयेगा।

चुनाव होते रहते हैं पर जब जनता सही समझ से वोट करे तो सही उम्मीद्वार चुना जा सकता है। ये एक माँ की जीत नही ये जागरूक जनता...
04/05/2026

चुनाव होते रहते हैं पर जब जनता सही समझ से वोट करे तो सही उम्मीद्वार चुना जा सकता है। ये एक माँ की जीत नही ये जागरूक जनता की जीत है।
हमारे यहां क्या कोई बडी राजनैतिक पार्टी अंकिता भुली के परीवार वालों को टिकट देगी और क्या हम लोग उन्हे जीता पायेगें।

Didn't forget, didn't forgive. कभी कभी ये भी जरूरी है
04/05/2026

Didn't forget, didn't forgive. कभी कभी ये भी जरूरी है

04/05/2026
कोई इनको बताओ कि अब छौल पुजने हर साल उत्तराखण्ड आना पडेगा
02/05/2026

कोई इनको बताओ कि अब छौल पुजने हर साल उत्तराखण्ड आना पडेगा

गढ़वाल की दूरस्थ पहाड़ियों में बसा जी.आई.सी. लमगौण्डी आज गर्व, प्रेरणा और समर्पण की एक जीवंत मिसाल बन गया है। उत्तराखंड ...
26/04/2026

गढ़वाल की दूरस्थ पहाड़ियों में बसा जी.आई.सी. लमगौण्डी आज गर्व, प्रेरणा और समर्पण की एक जीवंत मिसाल बन गया है। उत्तराखंड बोर्ड की मेरिट सूची में एक ही विद्यालय के तीन विद्यार्थियों लघुता पोस्ती (कक्षा 12), प्रियंक राणा (कक्षा 12) और स्नेहा जुगरान (कक्षा 10) का स्थान पाना केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि उस शैक्षिक वातावरण का प्रमाण है जो सीमित संसाधनों के बावजूद असाधारण परिणाम देता है। पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ लंबी दूरी, सीमित साधन, मौसम की चुनौतियाँ अक्सर शिक्षा की राह में बाधा बनती हैं। लेकिन इन्हीं चुनौतियों के बीच जब कोई विद्यालय निरंतर उत्कृष्ट परिणाम देता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वहाँ कुछ विशेष अवश्य हो रहा है। जी.आई.सी. लामगोंडी के शिक्षक और प्रधानाचार्या महोदया का समर्पण, अनुशासन और विद्यार्थियों के प्रति व्यक्तिगत मार्गदर्शन ही वह अदृश्य आधार है, जो इन बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।इन विद्यार्थियों की सफलता यह भी दर्शाती है कि मजबूत नींव कितनी महत्वपूर्ण होती है। संभवतः इनकी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थानों में हुई होगी, जहाँ संस्कार, अनुशासन और बुनियादी ज्ञान पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उसी मजबूत आधार पर इंटर कॉलेज के शिक्षकों ने इन बच्चों को सही दिशा, निरंतर अभ्यास और आत्मविश्वास प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने आज एक उच्च मानक स्थापित किया है । लघुता पोस्ती, प्रियंक राणा और स्नेहा जुगरान की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मार्गदर्शन सही हो और मेहनत सच्ची हो, तो सफलता निश्चित है। ये बच्चे उन हजारों विद्यार्थियों के लिए उदाहरण बन गए हैं, जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मान लेते हैं। जी.आई.सी. लमगौण्डी के लिए यह क्षण अत्यंत गौरवपूर्ण है। विद्यालय की प्रधानाचार्या और समस्त शिक्षकगण निश्चित ही इस सफलता के वास्तविक नायक हैं, जिन्होंने अपने प्रयासों से यह संभव बनाया। ऐसे विद्यालय और ऐसे शिक्षक समाज की रीढ़ होते हैं, जो न केवल शिक्षा देते हैं, बल्कि भविष्य गढ़ते हैं। आज जब हम इन तीनों विद्यार्थियों की सफलता का जश्न मनाते हैं, तो यह भी स्वीकार करना चाहिए कि यह जीत केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे विद्यालय, शिक्षकों और उस पहाड़ी परिवेश की है, जिसने कठिनाइयों के बीच भी सपने देखने और उन्हें साकार करने का साहस दिया। यह उपलब्धि एक संदेश है अगर इरादे मजबूत हों, तो दूरियां और कठिनाइयाँ भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। सरकार को ऐसे शिक्षकों और प्रधानाचार्या महोदय को भी जरूर पुरूस्कृत करना चाहिए। ये वो शोसियल मिडिया के शिक्षक नही हैं ये सही में बच्चों के भविष्य में अपना जीवन खपा रहे हैं।

केजरी के दोस्त केशरी रंग में रंग गये हैं।राजनिती अब पैशा है बस जनता ही है जो इनके नाम से लडती रहती है।
24/04/2026

केजरी के दोस्त केशरी रंग में रंग गये हैं।
राजनिती अब पैशा है बस जनता ही है जो इनके नाम से लडती रहती है।

22/04/2026

अब केदारनाथ से रील पर रील आयेंगी, किसी को पहले ही दिन सारी सुविधा चाहिए किसी को लगता है पुरी सुविधा है। ये रील की भीड अब चलती रहेगी कोई सही तीर्थ यात्रीयों को भी दिखाते रहना, संस्कृति और धाम की महत्ता उन्ही से बनी रहेगी

ये हमारे देश मे यहीं दोगलापन है। बातें ये आदमी भी बडी बडी करता है। पर काम करेंगें देश की संस्कृति के विरूद्ध ही। ये ऐसी ...
19/04/2026

ये हमारे देश मे यहीं दोगलापन है। बातें ये आदमी भी बडी बडी करता है। पर काम करेंगें देश की संस्कृति के विरूद्ध ही।
ये ऐसी पीढी है जिनको बाप का धोती पहनना गंवारपना लगता है, माँ का स्थानीय भाषा में बोलना पिछडापन लगता है। और बिन्दी सिन्दूर चूढा पिछौडा महिला अधिकार का हनन।

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