16/03/2026
शिक्षा का स्वयंभू सम्राट : “महान” प्रोफेसर अजयदेव
समाज में शिक्षक का स्थान सदियों से अत्यंत सम्मानित माना गया है और भारतीय परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक की उपाधि दी गई है क्योंकि कहा गया कि गुरु वह दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, लेकिन समय के साथ शिक्षा जगत में कुछ ऐसे भी गुरु रुपी दीपक पैदा हो गए हैं जो रोशनी कम और धुआँ अधिक फैलाते हैं और जिनके आसपास ज्ञान की जगह प्रचार, दिखावा और आत्मप्रशंसा का कुहासा ज्यादा दिखाई देता है! ऐसे ही एक विलक्षण और आत्मघोषित महापुरुष हैं शिक्षा नगर के प्राइमरी विद्यालय के शिक्षक अजयदेव, जो सरकारी कागज़ों में भले ही एक साधारण अध्यापक हों लेकिन अपने मन की संसद में वे स्वयं को किसी महान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से कम नहीं समझते और उनका आत्मविश्वास इतना प्रबल है कि वे स्वयं को शिक्षा जगत का कुलपति, राष्ट्रीय विचारक, शिक्षक नेता, समाज सुधारक और समय आने पर लोकतंत्र का महान प्रहरी भी मानते हैं, उनका दृढ़ विश्वास है कि अगर शिक्षा जगत में कोई वास्तविक प्रतिभा है तो वह स्वयं और उनके स्वंमभू संगठन से जुड़े हुए शिक्षक हैं और बाकी शिक्षक केवल उनके प्रभाव की परिक्रमा करने के लिए पैदा हुए हैं, जिस विद्यालय में वे कार्यरत हैं उसे विद्यालय कहना उनके आत्मसम्मान के विरुद्ध है इसलिए उन्होंने अपने मन में उसका नाम बदलकर “ राष्ट्रीय जनकल्याण बहुउद्देशीय अंतरराष्ट्रीय यूनिवर्सिटी” रख दिया है क्योंकि उनका मानना है कि किसी संस्थान की महानता भवन से नहीं बल्कि वहाँ उपस्थित महान व्यक्तित्व से तय होती है और जब वहाँ अजयदेव जैसा विराट व्यक्तित्व मौजूद हो तो वह विद्यालय नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी ही कहलाएगा! विद्यार्थियों के बीच भी अजयदेव का स्थान कुछ रहस्यमय है क्योंकि बच्चे कहते हैं कि सर का स्कूल में पढाना वैसा ही होता है जैसे गधे के सिर पर अचानक सिंग दिखाई दे जाना, महीने-दो महीने में अचानक एक दिन उनकीउपस्थिति कक्षा में होती है, वे तेज़ कदमों से अंदर प्रवेश करते हैं, स्टाफ रूम में दो-चार आदेश देते हैं, कुछ गंभीर चेहरे बनाते हैं और फिर किसी से मोबाइल लेकर पाँच-सात फोटो खिंचवाकर उसी गति से प्रस्थान कर जाते हैं जैसे कोई नेता चुनावी सभा करके हेलीकॉप्टर से वापस लौट जाता है, कई विद्यार्थियों को तो यह संदेह होने लगा है कि सर का असली कार्यक्षेत्र कक्षा नहीं बल्कि फोटो गैलरी और बैनर प्रिंटिंग प्रेस है और फिर दलाल मीडिया जो उनको प्रचारित करता है , दरअसल अजयदेव का वास्तविक कार्यालय विद्यालय का स्टाफ रूम नहीं बल्कि राजनीतिक गलियारे हैं जहाँ वे इतने आत्मविश्वास से घूमते हैं कि पहली बार देखने वाला व्यक्ति यही समझता है कि शायद यह किसी मंत्री का विशेष सलाहकार है और उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा यह है कि वे सत्ता की हवा की दिशा को बहुत जल्दी पहचान लेते हैं क्योंकि जैसे ही सत्ता बदलती है वैसे ही प्रोफेसर यानि थर्ड ग्रेड मास्टर अजयदेव भी अपनी चाटुकारिता की चाल बदल लेते हैं, कल तक वे नेता मोहनलाल के जूते चाटते हुए उनके चरणों में बैठकर अपने राजनीतिक प्रभाव की कहानियाँ सुनाया करते थे लेकिन जैसे ही सत्ता का सूरज दूसरी दिशा में उगा उन्होंने भी गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए तुरंत वर्तमान सत्ता के पावरफुल नेता बिहारीलाल के दरबार में हाजिरी लगानी शुरू कर दी और देखते ही देखते उनकी वफादारी का केंद्र भी बदल गया! अब वही अजयदेव जो कल तक मोहनलाल को शिक्षा जगत का सूर्य बताते नहीं थकते थे आज बिहारीलाल को राष्ट्र का भविष्य और समाज का महान मसीहा घोषित करते हुए उनके जूतों की चटाई बनने में गर्व महसूस करते दिखाई देते हैं! अजयदेव की यह अद्भुत प्रतिभा देखकर उनके मित्र मज़ाक में कहते हैं कि अगर कभी गिरगिट रंग बदलना भूल जाये तो वह भी रंग बदलने की उच्च शिक्षा लेने अजयदेव की यूनिवर्सिटी में ही दाखिला लेगा क्योंकि वहाँ यह कला व्यवहारिक प्रशिक्षण के साथ सिखाई जाती है! अपनी महानता को संस्थागत रूप देने के लिए अजयदेव ने एक विशाल संगठन भी बना रखा है जिसका नाम इतना लंबा है कि उसे बोलते-बोलते ही आधा कार्यक्रम समाप्त हो जाता है और नाम सुनकर लगता है कि अब शिक्षा व्यवस्था में कोई महान क्रांति होने वाली है लेकिन जब कार्यक्रम होते हैं तो पता चलता है कि उनका मुख्य उद्देश्य प्रतिभा सम्मान समारोह, शिक्षा गौरव सम्मेलन, राष्ट्र निर्माण संवाद और शिक्षक एकता महापंचायत जैसे कार्यक्रम करना है जिनमें प्रतिभा से ज्यादा फोटोग्राफी और बैनरबाज़ी होती है, मंच पर जितने लोग होते हैं उससे ज्यादा बैनर लगे होते हैं और हर बैनर पर किसी न किसी कोने में अजयदेव की तस्वीर अनिवार्य रूप से मुस्कुरा रही होती है! अगर गलती से कोई बैनर ऐसा लग जाए जिस पर उनकी तस्वीर न हो तो उसे तुरंत बदल दिया जाता है क्योंकि ऐसा बैनर कार्यक्रम की महान आत्मा के विरुद्ध माना जाता है! कार्यक्रम समाप्त होते ही अगले दिन स्थानीय अखबार में एक फोटो छपती है जिसमें बीच में अजयदेव मुस्कुरा रहे होते हैं और बाकी लोग उनके आसपास ऐसे खड़े होते हैं जैसे किसी स्मारक के चारों ओर लगी सजावटी मूर्तियाँ, कई लोग मज़ाक में कहते हैं कि अगर फोटो खिंचवाने की कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता हो जाए तो अजयदेव निश्चित रूप से स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन कर सकते हैं! इन कार्यक्रमों के लिए चंदा भी बड़े पवित्र भाव से इकट्ठा किया जाता है और शिक्षकों से कहा जाता है कि यह विद्यार्थियों की प्रतिभा को सम्मानित करने का अभियान है गरीब बालिकाओं के भविष्य का सवाल है इसलिए समाज निर्माण और गरीब बालिकाओं के भविष्य के इस महान कार्य में सहयोग देना हर शिक्षक का कर्तव्य है, भोले-भाले शिक्षक अपनी जेब से पैसे दे देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद इससे सचमुच विद्यार्थियों का भला होगा लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ में आने लगता है कि इस अभियान का असली उद्देश्य विद्यार्थियों की प्रतिभा नहीं बल्कि आयोजक की प्रतिष्ठा को चमकाना है, सत्ता के नजदीक जाना है! अजयदेव के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण आयाम है जिसे उनके करीबी लोग मज़ाक में “महिला प्रशंसा विज्ञान” कहते हैं क्योंकि जब भी किसी विद्यालय में नई महिला शिक्षिका नियुक्त होकर आती है तो अजयदेव का व्यवहार अचानक अत्यंत विनम्र और स्नेहपूर्ण हो जाता है और वे बड़े आत्मीय स्वर में बताते हैं कि शिक्षा विभाग के बड़े-बड़े अधिकारी उनके बहुत करीबी मित्र हैं, किसी का तबादला करवाना हो, ए सी पी लगवाना हो, डेपुटेशन करवाना हो या कोई फाइल आगे बढ़वानी हो तो सब कुछ उनके एक फोन से हो सकता है और उनकी ये बातें इतनी आत्मविश्वास से भरी होती हैं कि सामने वाला कुछ देर के लिए सचमुच यह मानने लगता है कि शायद यह व्यक्ति शिक्षा विभाग का कोई छिपा हुआ पावरफुल आदमी है, लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे लोगों को समझ में आने लगता है कि यह प्रभाव वास्तविकता से ज्यादा कल्पना की दुनिया में बना हुआ एक महल है जिसकी नींव हवा पर टिकी हुई है! अजयदेव की प्राइमरी स्कूल यानि तथाकथित महान यूनिवर्सिटी के पड़ोस के विद्यालय में एक दिन एक नई शिक्षिका आई जिसका नाम सुहानी था जो आत्मसम्मान से भरी हुई थी और अपने काम को ईमानदारी से करना चाहती थी, अजयदेव ने सोचा कि यह भी बाकी लोगों की तरह उनके प्रभाव से प्रभावित हो जाएगी इसलिए कुछ समय बाद उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ उसे अपने विशेष प्रेम का प्रस्ताव दे दिया क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था कि उनके प्रभाव और संपर्कों के सामने कोई भी “ना” नहीं कह पाएगा, लेकिन इस बार समय ने अचानक करवट ले ली क्योंकि सुहानी ने शांत लेकिन स्पष्ट शब्दों में उनका प्रेम प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और यह “ना” अजयदेव के अहंकार पर ऐसा प्रहार था जिसे वे सहन नहीं कर पाए इसलिए यहीं से शुरू हुआ चरित्र हनन का वह पुराना अभियान जो अक्सर ऐसे लोगों का सबसे प्रिय हथियार होता है जब व्यक्ति के पास तर्क कम और अहंकार ज्यादा होता है तो वह अपने विरोधियों का चरित्र हनन करने लग जाता है और अजय ने भी कुछ ऐसा ही किया, कुछ ही दिनों में स्टाफ रूम में कानाफूसी शुरू हो गई, चाय की दुकानों पर चर्चाएँ होने लगीं और अफवाहों का ऐसा जाल बुना गया मानो किसी व्यक्ति के चरित्र पर अंतिम निर्णय देने का अधिकार केवल अजयदेव को ही प्राप्त हो, जो व्यक्ति कल तक सम्मान और प्रेम के शब्द बोल रहा था वही अब फुसफुसाहटों में चरित्र प्रमाण पत्र देने वाला बन गया, इतना ही नहीं उन्होंने अपने कथित राजनीतिक संपर्कों का भी सहारा लिया और उच्च अधिकारियों तक शिकायतें पहुँचाई गईं, दबाव बनाने की कोशिशें की गईं और प्रशासनिक स्तर पर परेशान करने के छोटे-छोटे प्रयास किए गए क्योंकि अजयदेव को विश्वास था कि इस दबाव से सुहानी झुक जाएगी और वही होगा जो अक्सर ऐसे मामलों में होता आया है, लेकिन इस बार कहानी वैसी नहीं थी जैसी अजयदेव ने सोची थी क्योंकि सुहानी न डरी और न झुकी बल्कि उसने हर आरोप का जवाब तथ्यों के साथ दिया और अपने आत्मसम्मान के साथ खड़ी रही! धीरे-धीरे शिक्षा जगत के लोगों को समझ में आने लगा कि असली चरित्र किसका गिरा है और समाज में एक पुरानी कहावत है कि झूठ के पैर नहीं होते इसलिए अजयदेव का झूठ भी ज्यादा दूर तक नहीं चल पाया, धीरे-धीरे अफवाहों की धुंध छँटने लगी और सच्चाई सामने आने लगी! , आज भी अपनी आदत से मजबूर अजयदेव मंचों पर भाषण देते हैं, आज भी वे अपने विद्यालय को यूनिवर्सिटी कहते हैं, आज भी वे प्रतिभा सम्मान के कार्यक्रम करते हैं और अपने प्रभाव के किस्से सुनाते हैं लेकिन शिक्षा नगर के लोग अब उनकी राम कहानी को एक अलग नजर से देखते हैं क्योंकि वे समझ चुके हैं कि यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि उस मानसिकता की कहानी है जिसमें शिक्षक का पद सेवा का माध्यम नहीं बल्कि अहंकार, दिखावे, चाटुकारिता और निजी लालसाओं की सीढ़ी बना लिया जाता है और इतिहास ने हमेशा यही साबित किया है कि जो लोग शिक्षा के मंदिर को अपनी महत्वाकांक्षाओं का मंच बना लेते हैं वे समाज में सम्मान नहीं बल्कि हास्य के पात्र बनकर ही रह जाते हैं! आज प्रोफेसर अजयदेव और उनकी महान यूनिवर्सिटी धीरे-धीरे ज्ञान का केंद्र कम और हास्य का पात्रअधिक बन गई जिसके किस्से शिक्षा नगर के लोग मुस्कराते हुए सुनाते हैं और नएआये शिक्षको से कहते हैं कि अगर आपको सचमुच बच्चो को पढ़ाई करानी हो तो अजयदेव से बच जाइए लेकिन अगर आपको फोटो खिंचवाने, नेता बदलने, चंदा जुटाने, चरण चाटने और प्रभाव के किस्से सुनाने की उच्च शिक्षा लेनी हो तो अजयदेव और उनके तथाकथित शिक्षक संगठन में चले जाईये जहां शराब शबाब और कबाब आपका हार्दिक स्वागत करते मिलेंगे । डॉ राजेंद्र यादव आजाद मोबाइल 9414 27 1288