Napoleon of Mithila मैथिल नेपोलियन

Napoleon of Mithila मैथिल नेपोलियन We can change

सस्ती दारु, पोर्न फ़िल्में, मोबाइल फोन में आती अनचाही अर्धनग्न तसवीरें, नंगे रील्स, सस्ता नशा, देश में फैले हुए ड्रग माफ...
04/06/2026

सस्ती दारु, पोर्न फ़िल्में, मोबाइल फोन में आती अनचाही अर्धनग्न तसवीरें, नंगे रील्स, सस्ता नशा, देश में फैले हुए ड्रग माफिया, जातिवादी हिंसा, हर वस्तु में हो रही मिलावट, नकली घी, तेल, दाल, चावल, आटा, सब्जियां, लगातार प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण पर्वत पहाड़ जल, वन, पशुओं की हत्या, बेरोजगारी, भूख.. क्या यही हमारा भारत है? तो फिर नर्क किसे कहते हैं? गुगल पर मुफ़त मे पोर्न साइट, फिर ओयो होटेल, 14 फरवरी पूर्ब नियोजित संभोग दिवस, यही तो नर्क है ! देश के युवा सिर्फ सुरा सुन्दरी में डूबा गया है !

फिर live_in_relationships ( विवाह पूर्व संभोग ) आया है, लोगों के 25- 25 वर्ष के रिश्ते टूट गए, कोई सुनवाई नहीं, कोई कानून का भय नहीं, कोई शर्म लिहाज नहीं, रोटी मिले ना मिले सुरा सुन्दरी मिल जाए बस यही ख्वाहिश होती है, अश्लीलता रोकने के बजाय इतनी फैला दी गई है कि अब वैश्यालयों की आवश्यकता नहीं होती है, किसी देश का बेड़ा गर्क करना है तो वहाँ की परम्पराओं को तोड़ दीजिए और यही किया जा रहा है फिल्मी हीरोइन हीरो यही कर रहे हैं, अब तो स्त्रियों ने चड्डी की रंग बताते बताते पहनना भी बंद कर दिया है, स्तन के नीपल्स ढ़ांक कर बाकी सब कुछ दिखा देना फैशन् बन गया है , नग्नता सीधे घरों में आ रही है, पहले फ़िल्में थोड़ी साफ सुथरी होती थी रेडियो पर लता आशा किशोर मुकेश के कर्णप्रिय गीत होते थे, जो आत्मा को प्रेम की पवित्रता से भर देते थे, आजकल संगीत ही फूहड़ है चोली के पीछे क्या है? चने के खेत में, मुझको राना जी माफ करना क्यों की रात मे किसी और के साथ सो गयी इत्यादी द्वीअर्थी और उत्तेज़क गीतों ने लोगों के मस्तिष्क में गन्दगी भर दी है, जब विचार गंदे होते हैं तभी कामुकता जन्म लेती है, विचारों को गीतों द्वारा नग्न स्त्रियों द्वारा जानबूझकर भड़काया जाता है, और फिर अपराध बलात्कार होने पर कड़े कानून का ना होना अपराधी का छूट जाना उसके हौसले बुलंद करता है, कितना हास्यास्पद है कि जमीन के नीचे पानी का दोहन टनों में किया जाता है और लोगों को टूथपेस्ट करते वक्त पानी बचाने की सलाह दी जाती है, उसी प्रकार लोगों की सेक्स भावनाओं को जानबूझकर उत्तेजित किया जा रहा है और फिर बलात्कार के लिए निर्दोष स्त्रियों को दोषी ठहराया जाता है, जातिवाद समाप्त नहीं किया जाता है सरकारी रिकार्ड में सबसे पहले जन्म लेते ही फार्म भरवा लिया जाता है और फिर असमानता कि बात कही जाती है, कैसे आएगी समानता कौन लाएगा? सदियाँ बीत गई लेकिन हम लोग भारतीय नहीं बन सके.... लोग ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है लेकिन अफसोस भारतीय कोई नहीं है, और जाते जाते कड़वा सच - ये सभी नेता विदेशों में भाग जायेगे इनके बच्चे वहीं पढ़ते हैं और बर्बाद होगे आप और हम और हमारी आने वाली पीढ़ी !
विचार अवश्य कीजिये , आपकी ज़ेनरेशन् आपके हाथ
क्या_अगला_दौर_अब_यही_होगा

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 ्रेंड्स  जो आज हुए UPSC प्रीलिम्स के पेपर में दिखे 1. ये  ारत का नया UPSC है जो व्यक्ति भारत से प्यार करता है अपने देश ...
25/05/2026

्रेंड्स
जो आज हुए UPSC प्रीलिम्स के पेपर में दिखे

1. ये ारत का नया UPSC है
जो व्यक्ति भारत से प्यार करता है अपने देश की चिंताओं को समझता है और सरकार पर भरोसा रखता है वो बिना पढ़े ये पेपर निकाल सकता है

2. पेपर का 75% हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से #करेंट_अफेयर्स से आया है जो किसी कोचिंग की मैगज़ीन या Youtube ने कवर नहीं किया था

3. सारी कोचिंग के नोट्स रटकर आपसे जितने प्रश्न बनेंगे उससे तीन गुने ज़्यादा प्रश्न केवल के अपडेट्स देखकर बन जाएँगे

4. अब रटने से कुछ नहीं होगा क्योंकि अब पेपर में #सिचुएशनल_Questions आने लगे हैं जिसमें आपको अपनी समझ को एप्लाई करके और अपने आप को उस परिस्थिति में रखकर उत्तर देने होंगे

5. अब ये जनरल स्टडीज का नहीं #इंडियन_एडमिनिस्ट्रेशन का पेपर बन गया है अगर आपको भारत सरकार के सभी विभागों की संरचना,उनकी चुनौतियां,उनकी पहलें और उनकी उपलब्धियाँ पता हैं तो 50 Questions आप एक शब्द पढ़े बिना भी सही कर सकते हैं

तो सार ये हैं कि
कोचिंग नोट्स,मेंटरशिप,मॉक टेस्ट,और YouTube का ज्ञान मोह माया है
UPSC निकालना है तो बस
दिल और दिमाग़ से सरकारी बन जाओ
आप UPSC में टॉप कर जाओगे

इन दोनों को देखकर तो संघर्ष की परिभाषा ही बदल गई है, और साक्षात मेहनत भी कोने में बैठकर आंसू बहा रही होगी। इन दोनों होनह...
18/05/2026

इन दोनों को देखकर तो संघर्ष की परिभाषा ही बदल गई है, और साक्षात मेहनत भी कोने में बैठकर आंसू बहा रही होगी।

इन दोनों होनहारों का 'कड़ा और बिना सहारे वाला' संघर्ष देखकर देश के उन लाखों नौजवानों को चुल्लू भर पानी में डू*ब जाना चाहिए, जो दिन-रात पसीना बहाकर, लाइब्रेरी में आंखें फोड़कर सिर्फ एक अदद नौकरी या छोटे से मौके के लिए तरस रहे हैं। वाकई, कितना भारी त्याग रहा होगा इनका कि इन्हें दुनिया के सबसे बड़े पदों और बोर्ड की कुर्सियों पर बैठने के लिए अपने रसूखदार पिताओं के साए से बाहर निकलकर, सीधे मखमली गद्दों पर लैंड करना पड़ा! असली पहचान तो इसी को कहते हैं, जहाँ बिना किसी पारिवारिक गॉडफादर और बिना किसी राजनीतिक विरासत के, सिर्फ और सिर्फ 'परम पूजनीय सरनेम' के दम पर सफलता घुटने टेक देती है। आम इंसान तो नाहक ही किस्मत और नेपोटिज़्म को दोष देता है, जबकि उसे समझना चाहिए कि असली हिम्मत तो इतनी भारी विरासत का बोझ अपने नाजुक कंधों पर उठाने में लगती है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है!

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