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सिलेंडर की चिंता तुम्हें होगी लाडले हमारे यहां तो स्टॉक फुल है  😂😆
12/03/2026

सिलेंडर की चिंता तुम्हें होगी लाडले
हमारे यहां तो स्टॉक फुल है 😂😆

मेला खत्म,चलो रे लोहा पीटने गुजरात,
14/11/2025

मेला खत्म,
चलो रे लोहा पीटने गुजरात,

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: अलीनगर सीट से मैथिली ठाकुर की जीत होगी या हार? कमेंट बॉक्स में दीजिए अपनी राय?
13/11/2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: अलीनगर सीट से मैथिली ठाकुर की जीत होगी या हार? कमेंट बॉक्स में दीजिए अपनी राय?

12/11/2025

भगत सिंह के बाद अगर कोई युवा ने अपनी छाप छोड़ी है तो वह धीरेंद्र शास्त्री है ! 27 28 साल के लड़के ने कमाल कर रखा है कितने भाई खुलकर समर्थन करते हैं 🙏

EVM नंबर 3 दबाइए, लालटेन जलाइए! जनता का सच्चा बेटा — विनोद मिश्रा को विजयी बनाइए!
05/11/2025

EVM नंबर 3 दबाइए, लालटेन जलाइए!
जनता का सच्चा बेटा — विनोद मिश्रा को विजयी बनाइए!

23/10/2025

आज अत्यंत दुःख और अफसोस का विषय है कि आज के दृश्य ने पूरे मैथिल समाज को शर्मसार कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपालजी ठाकुर, पप्पू सिंह और स्वयं केंद्रीय मंत्री ...जो गुज्जर
समुदाय से आते हैं .. उनके समक्ष मैथिल पहचान “कोकिल विद्यापति की पाग” का अपमान किया गया। वह भी एक सार्वजनिक सभा में, खुले मंच से, पाग को फेंककर!
क्या यही हमारी पहचान है? क्या ऐसे लोग हमारे समाज के नेता कहलाने योग्य हैं? मैथिल समाज में पाग केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति, सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक है। उसका अपमान कर उन्होंने न केवल एक परंपरा का, बल्कि पूरे मिथिला के आत्म-सम्मान का तिरस्कार किया है।
सबसे अधिक पीड़ा तो इस बात की है कि उस क्षण जब हमारी संस्कृति का अपमान हो रहा था, तब उपस्थित जनसमूह ताली बजा रहा था, जयकार कर रहा था। यह दृश्य प्रत्येक मैथिल के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
हे मिथिलावासियों, अब भी समय है .... जागो! अगर हमने ऐसे लोगों को फिर से सिर पर बैठाया, तो हमारी भाषा, हमारी संस्कृति और हमारी पहचान धूमिल होकर विलुप्त हो जाएगी, जैसे आज मैथिली भाषा अपने ही घर में उपेक्षित हो चली है।
अब समय है ऐसे नेताओं को समाज से उखाड़ फेंकने का, और उन लोगों को आगे लाने का जो हमारी संस्कृति का सम्मान करें, जो मिथिला की अस्मिता को समझें और उसके गौरव को पुनर्जीवित करें।

हमारा सम्मान हमारी पाग में है .... और उसका अपमान, पूरे मिथिला के अपमान के समान है।

जय विनोद तय विनोद अलीनगर कँ बाहरी सँ बचाउ विनोद अहींक घरक बेटा भारी वोटसँ सब मिलि जीताउ ।मोदी जीक कहल बात मानू लोकल फॉर ...
19/10/2025

जय विनोद तय विनोद अलीनगर कँ बाहरी सँ बचाउ विनोद अहींक घरक बेटा भारी वोटसँ सब मिलि जीताउ ।

मोदी जीक कहल बात मानू लोकल फॉर भोकलक गीत गाउ पिछला बिसरि एहि बेर जीताउ ।

सदिखन लागल अपन क्षेत्र बन्हकी, श्राप थिक ई, आब अपना अस्मिता बचाउ लोकल फॉर भोकलक गीत गाउ। विनोद अहींक घरक बेटा, हिनका जीताउ ।

मैथिली छथि बेटी मुदा एतए नहि रहतीह अगबे चुनावी मौसममे नजरि औतीह, अपन प्रोग्रामक चक्कर मे देश विदेश मे ओ घूमैत रहतीह।

काज परत अलीनगर मे त ओ दिल्ली मे रहती सब साधारण नक फोनो नहीं उठौती। विनोद अहींक घरक बेटा, सब मिली विनोद के जीताउ।




दरभंगा का दोनार... जहाँ flyover सिर्फ सपनों में बनता है!दरभंगा के दोनार मोड़ पर रोज जाम में फँसे लोग पूछते हैं कब बनेगा ...
20/06/2025

दरभंगा का दोनार... जहाँ flyover सिर्फ सपनों में बनता है!

दरभंगा के दोनार मोड़ पर रोज जाम में फँसे लोग पूछते हैं
कब बनेगा flyover?
पर सरकार कहती है ..
"अरे ये मिथिला है भाई, यहाँ इंतज़ार करो... development का नम्बर आखिरी में आता है!
दूसरी तरफ, साउथ बिहार के हर शहर में flyover की बरसात हो रही है .... चाहे ज़रूरत हो या न हो।
क्यों? क्योंकि ये मिथिला है....वोट तो मिल जाता है, पर विकास? वो तो सिर्फ चुनावी भाषण का हिस्सा है!
दरभंगा को flyover नहीं, बस आश्वासन का traffic signal मिला है!
#मिथिला_का_विकास #दरभंगा_का_सच ा_सपना #झूठा_विकास #राजनीति_का_खेल #मिथिलवासि

15/06/2025

मैथिली, जो कभी विद्वत्ता, संस्कृति और साहित्य की समृद्ध भाषा थी, आज अपने ही घर में उपेक्षित होती जा रही है। यह वही भाषा है जिसमें विद्यापति जैसे कवियों ने प्रेम और भक्ति के गीत रचे, और नागार्जुन जैसे कवियों ने क्रांति की आग भरी। लेकिन आज की पीढ़ी में मैथिली बोलना पिछड़ेपन की निशानी माना जाने लगा है। माता-पिता तक अपने बच्चों से हिंदी या अंग्रेज़ी में बात करते हैं, मानो मैथिली बोलना शर्म की बात हो। यह मानसिकता केवल भाषा का नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से कटने का संकेत है।
शिक्षा व्यवस्था में मैथिली को कोई ठोस स्थान नहीं मिला है। न तो स्कूलों में इसे गंभीरता से पढ़ाया जाता है, न ही प्रशासनिक कामकाज में इसका उपयोग होता है। मीडिया, सिनेमा और इंटरनेट की दुनिया में भी मैथिली को वह स्थान नहीं मिला, जो उसकी गरिमा के अनुरूप होना चाहिए था। सरकारें सिर्फ घोषणा करती हैं, मगर कोई ठोस प्रयास नहीं करतीं।
मैथिली भाषा का ह्रास केवल एक भाषा का लोप नहीं है, यह पूरे मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मिटा देने जैसा है। जब एक बच्चा अपनी मातृभाषा में सोचता नहीं, बोलता नहीं, तो वह अपनी संस्कृति और परंपरा से भी दूर हो जाता है। यह चिंता का विषय है कि मैथिली आज केवल बुज़ुर्गों तक सीमित होती जा रही है, जबकि युवा पीढ़ी में इसका उपयोग तेजी से घट रहा है।
हमें यह समझना होगा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी आत्मा का आईना है। अगर मैथिली को बचाना है, तो पहले हमें इसे अपनाना होगा – अपने घर में, अपने व्यवहार में, अपने बच्चों की शिक्षा में। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को यह गौरवशाली विरासत सौंपें, वरना एक दिन हमें अपनी पहचान खोजने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने पड़ेंगे।
"मैथिली जिये, त मिथिला जिये – नहि त खाली नक्शा रहि जेतै, संस्कृति खत्म भ' जेतै।"

"कतेको बात, कतेको सपना – हम सभक जीबनक हिस्सा बनल अछि।ई किताब हमर कॉलेजक याद आ दोस्ती केर मधुर एहसास के समर्पित अछि।एहन य...
11/06/2025

"कतेको बात, कतेको सपना – हम सभक जीबनक हिस्सा बनल अछि।
ई किताब हमर कॉलेजक याद आ दोस्ती केर मधुर एहसास के समर्पित अछि।
एहन याद जकरा समय के संग मिटाओल नै जा सकैत अछि।
कनेक समय निकालू, आ एक बेर जरूर पढ़ू –
"कुछ यादें जो जिंदा हैं" – अपन जीवनक झलक पा सकब!"

🛒 बाजार मे उपलब्ध अछि – Flipkart, e book आ Chyren Publication पर।
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#कुछ_यादें_जो_जिंदा_हैं #मधुर_यादें

मैथिल संस्कृति अपन गौरवशाली इतिहास, समृद्ध साहित्यिक परंपरा, आ वैचारिक उन्नयन हेतु प्रसिद्ध रहल अछि। एहि संस्कृति मे भोज...
10/06/2025

मैथिल संस्कृति अपन गौरवशाली इतिहास, समृद्ध साहित्यिक परंपरा, आ वैचारिक उन्नयन हेतु प्रसिद्ध रहल अछि। एहि संस्कृति मे भोज-भात अर्थात् सामूहिक भोजनक परंपरा के विशेष स्थान प्राप्त अछि। मैथिल भोज केवल भोजनक आयोजन नहि, बल्कि ओ एक सामाजिक बन्धनक प्रतीक, परंपरागत रीति-रिवाजक निर्वाह आ अतिथि सत्कारक विशिष्ट उदाहरण मानल जाइत अछि।
यद्यपि, बदलैत समयक संग संग मैथिल भोजक स्वरूप सेहो परिवर्तित भेल अछि। एखन ई परंपरा एक दिस अपन सांस्कृतिक गरिमा सं गौरवान्वित करैत अछि, तऽ दोसर दिस एक आर्थिक आ सामाजिक बोझक रूप धारण कऽ लेने अछि। समाज मे प्रतिष्ठा आ मान-सम्मानक नाम पर, विशेषतः विवाह वा श्राद्ध-जैसन अवसर पर, भोजक आयोजन मे असंगत खर्च, दिखावा आ प्रतियोगिता उत्पन्न भऽ गेल अछि। एहि परिस्थिति मे गरीब आ मध्यम वर्गक लोक आर्थिक संकट मे पड़ि जाइत छथि।
एहि दृष्टिकोण सं, मैथिल भोज के एक दिस ‘वरदान’ कहि सकैत छी—जतए ई लोकक बीच प्रेम, सद्भाव आ एकता के पोषित करैत अछि; आ दोसर दिस ‘अभिशाप’—जतए ई अनावश्यक भार बनि कऽ लोकक मानसिक आ आर्थिक संतुलन पर प्रभाव पारैत अछि।
ताहि हेतु आवश्यक अछि जे हम सभ ई परंपरा के नव दृष्टिकोण सं देखी, ओकर मूल भावना के बचबैत, आधुनिक यथार्थ सं मेल खबैत, संतुलित आ सार्थक रूप मे आगाँ बढ़ाबी।

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