15/06/2025
मैथिली, जो कभी विद्वत्ता, संस्कृति और साहित्य की समृद्ध भाषा थी, आज अपने ही घर में उपेक्षित होती जा रही है। यह वही भाषा है जिसमें विद्यापति जैसे कवियों ने प्रेम और भक्ति के गीत रचे, और नागार्जुन जैसे कवियों ने क्रांति की आग भरी। लेकिन आज की पीढ़ी में मैथिली बोलना पिछड़ेपन की निशानी माना जाने लगा है। माता-पिता तक अपने बच्चों से हिंदी या अंग्रेज़ी में बात करते हैं, मानो मैथिली बोलना शर्म की बात हो। यह मानसिकता केवल भाषा का नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से कटने का संकेत है।
शिक्षा व्यवस्था में मैथिली को कोई ठोस स्थान नहीं मिला है। न तो स्कूलों में इसे गंभीरता से पढ़ाया जाता है, न ही प्रशासनिक कामकाज में इसका उपयोग होता है। मीडिया, सिनेमा और इंटरनेट की दुनिया में भी मैथिली को वह स्थान नहीं मिला, जो उसकी गरिमा के अनुरूप होना चाहिए था। सरकारें सिर्फ घोषणा करती हैं, मगर कोई ठोस प्रयास नहीं करतीं।
मैथिली भाषा का ह्रास केवल एक भाषा का लोप नहीं है, यह पूरे मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मिटा देने जैसा है। जब एक बच्चा अपनी मातृभाषा में सोचता नहीं, बोलता नहीं, तो वह अपनी संस्कृति और परंपरा से भी दूर हो जाता है। यह चिंता का विषय है कि मैथिली आज केवल बुज़ुर्गों तक सीमित होती जा रही है, जबकि युवा पीढ़ी में इसका उपयोग तेजी से घट रहा है।
हमें यह समझना होगा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी आत्मा का आईना है। अगर मैथिली को बचाना है, तो पहले हमें इसे अपनाना होगा – अपने घर में, अपने व्यवहार में, अपने बच्चों की शिक्षा में। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को यह गौरवशाली विरासत सौंपें, वरना एक दिन हमें अपनी पहचान खोजने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने पड़ेंगे।
"मैथिली जिये, त मिथिला जिये – नहि त खाली नक्शा रहि जेतै, संस्कृति खत्म भ' जेतै।"