20/06/2026
एक तरफ मोहम्मद फैज़ दरभंगा के तो दूसरी तरफ भरत तिवारी आरा के।
एक को एक सनकी अपराधी ने क्रूरता के साथ मौत के घाट उतार दिया तो दूसरे को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया। जब उसने आत्मसमर्पण कर दिया तो फिर उसका एनकाउंटर क्यों हुआ?
मैं जाति धर्म और राजनीति से ऊपर उठकर इन दोनों मामलों में निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग करता हूँ।
किसी भी निर्दोष की जान की कीमत एक समान होती है। न्याय का तराजू नाम जाति या धर्म देखकर नहीं झुकना चाहिए।
मोहम्मद फैज़ हों या भरत तिवारी यदि उनके साथ अन्याय हुआ है तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। इंसाफ सबके लिए बराबर होना चाहिए क्योंकि न्याय ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
न किसी का धर्म देखो न किसी की जाति;
अगर देखना है तो बस इंसानियत और सच्चाई देखो।
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इंसाफ_सबके_लिए