13/06/2026
13 जून: वह दिन जब एक क्रांतिकारी मुस्कुराते हुए फांसी पर चढ़ गया
13 जून भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब एक ऐसे सपूत को फांसी दी गई जिसने 21 वर्षों तक अपने सीने में जलियांवाला बाग के घाव को जिंदा रखा। वह सपूत था – शहीद ऊधम सिंह।
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग हत्याकांड में हजारों निहत्थे भारतीयों पर गोलियां बरसाई गईं। चारों ओर चीखें थीं, लाशें थीं, खून से लाल हुई धरती थी। कहा जाता है कि उस समय युवा ऊधम सिंह भी वहां मौजूद थे। उन्होंने अपनी आंखों से माताओं को बच्चों पर गिरते, बेटों को पिता की लाश से लिपटकर रोते और कुएं में कूदते लोगों को देखा था।
उस दिन उन्होंने एक संकल्प लिया—"इस खून का हिसाब जरूर होगा।"
21 वर्षों तक वह उस दर्द को अपने भीतर जलती हुई आग की तरह लेकर जीते रहे। आखिरकार 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में उन्होंने माइकल ओ'डायर को गोली मार दी, जिसे जलियांवाला बाग नरसंहार के प्रमुख जिम्मेदारों में माना जाता था।
गिरफ्तारी के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें अपने किए पर पछतावा है, तो उन्होंने निर्भीक होकर कहा—
> "मैंने यह अपने देश के लिए किया है। मुझे मौत का कोई डर नहीं।"
फांसी से पहले जेल अधिकारियों ने देखा कि ऊधम सिंह बिल्कुल शांत थे। मानो उन्हें किसी सजा के लिए नहीं, बल्कि अपने अधूरे वचन को पूरा करने के पुरस्कार के लिए बुलाया गया हो।
31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। कहते हैं कि आखिरी क्षणों में भी उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि संतोष था। एक ऐसा संतोष, जो केवल उस व्यक्ति के चेहरे पर होता है जिसने अपने शहीद भाइयों-बहनों का बदला ले लिया हो।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तो यह याद रखना चाहिए कि यह आजादी केवल आंदोलनों से नहीं, बल्कि उन लोगों के लहू से भी मिली है जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दिया।
जलियांवाला बाग के शहीदों का बदला लेने वाले अमर क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह को शत-शत नमन।
"कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ लोग इतिहास लिखते हैं, और कुछ लोग अपने बलिदान से इतिहास बन जाते हैं। ऊधम सिंह उन्हीं में से एक थे।"
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