20/06/2026
स्वतंत्र भारत में दो शताब्दियों तक दलित आन्दोलन लगभग निष्क्रिय रहे, 1970 ई. के दशक के प्रारंभिक वर्षों में फिर उठ खड़े हुए। 1970 ई. में ही ‘दलित पैंथर’ स्थापित कर लिया गया। मार्क्सवादी सिद्धांतशास्त्री इमानुल वैलेन्सटीन ने कहा- “दलित और गैर-ब्राह्मण जाति विरोधी आन्दोलनों को व्यवस्था विरोधी आन्दोलनों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि प्रकार्यात्मक समाजशास्त्री की भाषा में कहें, तो बजाय इसके कि इन्हें मानक संबंधी आन्दोलन कहें, इन्हें मूल्य संबंधी आंदोलन कहना उचित होगा।”[1] इन आन्दोलनों का प्रयास था कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था की मूल संरचना को रुपान्तरित किया जाय, जिससे जाति और उसके साथ जुड़े सामाजिक दमन, आर्थिक शोषण तथा राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त कर उसके स्थान पर एक समतावादी समाज स्थापित किया जा सके। महाराष्ट्र के एक पत्रकार जो जाति विरोधी सत्यशोधक समाज के मुख्य लोगों में एक थे, ने लिखा- “हिन्दुस्तान एक अजीब जगह है। जिसमें हर प्रकार के सामाजिक समूह हैं जो विभिन्न धर्म, विचारों, प्रचलनों तथा तरह-तरह की सूझ-बूझ से विभाजित है। लेकिन मोटे तौर पर यदि कहें तो इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला भाग नीची जातियों के बहुमत का है जो शताब्दियों से अपमानित होते रहें हैं। दूसरा थोड़े से मुट्ठीभर लोग जो सारा आनन्द प्राप्त करते हैं, अपने आप को श्रेष्ठ कहते हैं और बहुमत की कीमत पर जीते हैं। एक का कल्याण दूसरे की आपदा है और यही इसका पारस्परिक संबंध है।
[" शोध : दलितों के संघर्ष का जीवंत दस्तावेज ‘सलाम’ / डॉ.आलोक कुमार "अपनी माटी के इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए कॉमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक पर जाएं ( अंक-35-36 ) ]