अपनी माटी

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अपनी माटी संस्थान चित्तौड़गढ़' ( पंजीयन संख्या 50 /चित्तौड़गढ़/2013 ) के द्वारा अप्रैल, 2013 से संचालित साहित्यिक पत्रिका 'अपनी माटी' है जहां कला, साहित्य, रंगकर्म, सिनेमा, समाज, संगीत, पर्यावरण से जुड़े शोध, निबंध, साक्षात्कार, आलेख, सहित तमाम विधाओं में समाज-विज्ञान और साहित्य से सम्बद्ध रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। पत्रिका चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से छपती हैं मगर इसमें देशभर के विभिन्न राज्यों से कई साथ

ी जुड़े हुए हैं। यह कथेतर रचनाओं के प्रकाशन में अधिक केन्द्रित रहती है। पत्रिका का E-ISSN कोड E-ISSN 2322-0724 Apni Maati है। जून,2020 में प्रकाशित अंक 32 से ही यह पत्रिका 'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' (Peer Reviewed/Refereed Journal) के रूप में प्रकाशित हो रही है। देशभर में वर्तमान में अपनी माटी अब एक सुपरिचित नाम है। यह पत्रिका केवल हिंदी भाषा में त्रैमासिक आधार पर प्रकाशित होती है। वर्तमान में इसके सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव हैं। संस्थान के बैनर के तहत जनपक्षधर विचारों को पोषित करने वाले आयोजनों में कविता कार्यशाला, रंगमंचीय प्रदर्शन, थिएटर कार्यशाला, प्रतिरोध से जुड़े फिल्म फेस्टिवल, कहानी-उपन्यास से सम्बद्ध संगोष्ठियाँ, राष्ट्रीय सेमीनार आदि को अंजाम देने का उद्देश्य है। गौरतलब है कि पत्रिका और संस्थान पूरी तरह से गैर-सरकारी और गैर-व्यावसायिक नज़रिए के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। जुलाई 2021 से UGC CARE Approved Journal है। Multi Disciplinary श्रेणी में क्रम संख्या 1 पर दर्ज रही है। 11 फरवरी 2025 को एक आदेश के अनुसार यूजीसी केयर सूची को बंद किया है तो उसके अनुसार यह पत्रिका अपने अंक-58 'सिनेमा विशेषांक' (प्रकाशन दिसम्बर, 2024) तक उस सूची में रही है। इससे पहले भी अंक संख्या 25 और 26 यूजीसी केयर लिस्टेड अंक थे। वर्तमान में यह पत्रिका ई-माध्यम के साथ हार्ड प्रिंट में भी प्रकाशित होने लगी है। पत्रिका का इम्पेक्ट फेक्टर क्रमांक अभी जारी नहीं करवाया है। यह पत्रिका 'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' (Peer Reviewed/Refereed Journal) फॉर्म में हमेशा से ही बनी हुई है।

सम्पर्क सूत्र
सचिव,अपनी माटी संस्थान
चित्तौड़गढ़-312001,राजस्थान

स्वतंत्र भारत में दो शताब्दियों तक दलित आन्दोलन लगभग निष्क्रिय रहे, 1970 ई. के दशक के प्रारंभिक वर्षों में फिर उठ खड़े हु...
20/06/2026

स्वतंत्र भारत में दो शताब्दियों तक दलित आन्दोलन लगभग निष्क्रिय रहे, 1970 ई. के दशक के प्रारंभिक वर्षों में फिर उठ खड़े हुए। 1970 ई. में ही ‘दलित पैंथर’ स्थापित कर लिया गया। मार्क्सवादी सिद्धांतशास्त्री इमानुल वैलेन्सटीन ने कहा- “दलित और गैर-ब्राह्मण जाति विरोधी आन्दोलनों को व्यवस्था विरोधी आन्दोलनों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि प्रकार्यात्मक समाजशास्त्री की भाषा में कहें, तो बजाय इसके कि इन्हें मानक संबंधी आन्दोलन कहें, इन्हें मूल्य संबंधी आंदोलन कहना उचित होगा।”[1] इन आन्दोलनों का प्रयास था कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था की मूल संरचना को रुपान्तरित किया जाय, जिससे जाति और उसके साथ जुड़े सामाजिक दमन, आर्थिक शोषण तथा राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त कर उसके स्थान पर एक समतावादी समाज स्थापित किया जा सके। महाराष्ट्र के एक पत्रकार जो जाति विरोधी सत्यशोधक समाज के मुख्य लोगों में एक थे, ने लिखा- “हिन्दुस्तान एक अजीब जगह है। जिसमें हर प्रकार के सामाजिक समूह हैं जो विभिन्न धर्म, विचारों, प्रचलनों तथा तरह-तरह की सूझ-बूझ से विभाजित है। लेकिन मोटे तौर पर यदि कहें तो इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला भाग नीची जातियों के बहुमत का है जो शताब्दियों से अपमानित होते रहें हैं। दूसरा थोड़े से मुट्ठीभर लोग जो सारा आनन्द प्राप्त करते हैं, अपने आप को श्रेष्ठ कहते हैं और बहुमत की कीमत पर जीते हैं। एक का कल्याण दूसरे की आपदा है और यही इसका पारस्परिक संबंध है।

[" शोध : दलितों के संघर्ष का जीवंत दस्तावेज ‘सलाम’ / डॉ.आलोक कुमार "अपनी माटी के इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए कॉमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक पर जाएं ( अंक-35-36 ) ]

लखनऊ से आया स्नेह। डॉ. राकेश कबीर और डॉ. अरविन्द चौहान को अपनी प्रति भेंट करते हुए विशेषांक के संपादक डॉ. बृजेश कुमार या...
18/06/2026

लखनऊ से आया स्नेह। डॉ. राकेश कबीर और डॉ. अरविन्द चौहान को अपनी प्रति भेंट करते हुए विशेषांक के संपादक डॉ. बृजेश कुमार यादव और संपादन सहायक डॉ. कंचनलता यादव।

रांगेय राघव के लेखन की शुरूआत पाँचवें दशक से होती है, जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका देख चुकी है। देश में भारत छ...
18/06/2026

रांगेय राघव के लेखन की शुरूआत पाँचवें दशक से होती है, जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका देख चुकी है। देश में भारत छोड़ो आन्दोलन, मजदूरों की देशव्यापी हड़तालें, विभाजन के कारण सांप्रदायिक उन्माद और ब्रिटिश साम्राज्यवादी कहर से जनता त्रस्त है। ‘साम्राज्य का वैभव’(1947), ‘देवदासी’(1947), ‘समुद्र के फेन’(1947), ‘अधूरी मूरत’(1949), ‘जीवन के दाने’(1949), ‘अंगारे न बुझे’(1951), ‘ऐयाश मुर्दे’(1953), ‘इन्सान पैदा हुआ’(1957), ‘पाँच गधे’(1960) तथा ‘एक छोड़ एक’(1963) कहानी-संग्रह अपने समय के सच को मानव-मूल्यों के साँचे में मूल्यांकित करते हैं। अशोक शास्त्री लिखते हैं- “रांगेय राघव के कहानी-लेखन का मुख्य दौर भारतीय इतिहास की दृष्टि से बहुत हलचल भरा विरल कालखंड है; कम मौकों पर भारतीय जनता ने इतने स्वप्न और दुःस्वप्न एक साथ देखे थे - आशा और हताशा ऐसे अड़ोस-पड़ोस में खड़ी देखी थी।”1 उपनिवेशवादी बर्बरता के विरोध में चेतना का स्वर उनकी कहानी ‘यह ग्वालियर है’, ‘चंगेज़ की तलवार’, ‘उपचेतना का ताण्डव’, ‘धूल की आँधी’ आदि में प्रकट होता है। ‘यह ग्वालियर है’ कहानी में मजदूरों पर बेरहमी से गोलियाँ चलाकर साम्राज्यवादी ताकतों के कहर को चित्रित करते हुए वे मजदूरों की शक्ति को चिह्नित करते हैं। मजदूरों की गरीबी में भी शक्ति को प्रकट करते हुए वे लिखते हैं- “.... यह सच है कि गरीब के पास जब तक एक ही बण्डी है तब तक जूँ उसमें रेंगती ही रहेगी। लेकिन मजदूर की उँगलियों को भूल जाना क्या ठीक होगा, जिसके बीच में कैसी भी जूँ पीस दी जा सकती है।

[" शोध आलेख : रांगेय राघव की कहानियों में पीड़ित मानवता / राजेन्द्र कुमार सिंघवी "अपनी माटी के इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए कॉमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक पर जाएं ( अंक-64 ) ]

देश के नामी पत्रकार और संपादक ओम थानवी जी को अपनी माटी का नामवर सिंह जन्मशताब्दी विशेषांक मिल गया है। जयपुर से आया स्नेह...
17/06/2026

देश के नामी पत्रकार और संपादक ओम थानवी जी को अपनी माटी का नामवर सिंह जन्मशताब्दी विशेषांक मिल गया है। जयपुर से आया स्नेह।

महात्मा गाँधी की गणना बीसवीं शताब्दी के महानतम व्यक्तियों में की जाती है। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यक्तित्व से करोड़ों लो...
17/06/2026

महात्मा गाँधी की गणना बीसवीं शताब्दी के महानतम व्यक्तियों में की जाती है। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यक्तित्व से करोड़ों लोगों में क्रांतिकारी चेतना जागृत की। गाँधी जी ने राजनीति के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाया। उन्होंने न केवल जीवन के हर पहलू का गम्भीरता से चिन्तन किया अपितु समस्याओं की तह तक पहुँचकर उनके सार्थक समाधान भी खोजे। उनका सम्पूर्ण चिन्तन भारतीय समाज और संस्कृति से सम्बद्ध था। उनके विचार आज भी तर्कसंगत, वैज्ञानिक, प्रभावी तथा अनुकरणीय हैं। गाँधी जी के शिक्षा के विषय में जो विचार हैं वे व्यक्ति के सम्पूर्ण आचरण, व्यवहार तथा जीवनमूल्यों को प्रभावित करने वाले हैं। उनके अनुसार शिक्षा से केवल शिक्षार्थी ही प्रभावित नहीं होता अपितु प्राप्त शिक्षा से वह अपने व्यक्तित्व द्वारा पूरे परिवेश, समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणा प्रदान करता है।
शिक्षा का, मानव-सभ्यता के इतिहास के आदिकाल से ही, विकास होता रहा है और इसके मूल्यों में समयानुसार परिवर्तन भी हुआ है। हर देश अपनी समाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए समसामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी शिक्षा-प्रणाली में परिवर्तन व परिवर्धन करता है। परन्तु कोई भी शिक्षा-नीति राष्ट्र के लिए तभी उपयोगी मानी जा सकती है जब वह अपने राष्ट्र की संस्कृति व भौतिक प्रगति के साथ-साथ सामान्य मानवी के जीवन मूल्यों तथा एकता की भावना को भी सुदृढ़ करे।

[" आलेख : भारतीय शिक्षा में गाँधी जी का योगदान / मनीषा वधवा "अपनी माटी के इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए कॉमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक पर जाएं ( अंक-33 ) ]

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध एक सशक्त राजनीतिक रूप ग्रहण क...
16/06/2026

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध एक सशक्त राजनीतिक रूप ग्रहण किया, किंतु इस आंदोलन की सामाजिक अंतर्वस्तु गहरी असमानताओं से ग्रस्त रही। कांग्रेस के नेतृत्व में विकसित राष्ट्रवाद राजनीतिक स्वतंत्रता को प्राथमिक लक्ष्य मानता था, जबकि जाति–आधारित दमन, अस्पृश्यता और दलित समुदायों की ऐतिहासिक पीड़ा उसके विमर्श में गौण बनी रही। ऐसे समय में स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ का उदय एक ऐसे दलित नेता के रूप में होता है, जिन्होंने राष्ट्र, इतिहास और अधिकार की अवधारणाओं को दलित दृष्टि से पुनर्परिभाषित किया। स्वामी अछूतानन्द न केवल औपनिवेशिक सत्ता से संवाद करते है, बल्कि कांग्रेस–केन्द्रित राष्ट्रवादी विमर्श को भी मूलतः चुनौती देते है। उनकी राजनीति का केंद्र ‘मुल्की हक’, ऐतिहासिक स्वदेशीयता, पृथक् प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक आत्मसम्मान था। उन्होंने दलितों को इस भूमि के आदि–निवासी और ऐतिहासिक अधिकार–सम्पन्न समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया। प्रिंस ऑफ वेल्स के समक्ष प्रस्तुत उनकी सत्रह माँगें, पृथक निर्वाचक–मंडल का समर्थन, डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व का समर्थन और ‘हरिजन’ नामकरण का प्रतिरोध—ये सभी उनके वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण आयाम हैं। यह शोध–पत्र स्वामी अछूतानन्द के इन्हीं हस्तक्षेपों के माध्यम से दलित राजनीति को भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचनात्मक पुनर्रचना के रूप में समझने का प्रयास करता है।

[" शोध आलेख : स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ और वैकल्पिक राष्ट्रवाद / अमरदीप "अपनी माटी के इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए कॉमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक पर जाएं ( अंक-64 ) ]

सूचनार्थ : अब *बुक वर्ल्ड राजस्थान विश्वविद्यालय परिसर जवाहरलाल नेहरू मार्ग जयपुर* पर भाई प्रमोद कुमार जी के सहयोग से अब...
16/06/2026

सूचनार्थ : अब *बुक वर्ल्ड राजस्थान विश्वविद्यालय परिसर जवाहरलाल नेहरू मार्ग जयपुर* पर भाई प्रमोद कुमार जी के सहयोग से अब अपनी माटी के अंक जयपुर में भी उपलब्ध हो सकेंगे।

• रीतिकालीन कवि घनानंद 🌟📚👏
15/06/2026

• रीतिकालीन कवि घनानंद 🌟📚👏

मणिपुर अपने शाब्दिपक अर्थ के अनुरूप वास्तव में मणि की भूमि है। इसे देवताओं की रंगशाला कहा जाता है। सदाबहार वन, पर्वत, झी...
15/06/2026

मणिपुर अपने शाब्दिपक अर्थ के अनुरूप वास्तव में मणि की भूमि है। इसे देवताओं की रंगशाला कहा जाता है। सदाबहार वन, पर्वत, झील, जलप्रपात आदि इसके नैसर्गिक सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। अत: इस प्रदेश को भारत का मणिमुकुट कहना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं है। यहां की लगभग दो-तिहाई भूमि वनाच्छाटदित है। प्रदेश के पास गौरवशाली अतीत, समृद्ध विरासत और स्वमर्णिम संस्कृाति है। इस राज्य की स्थापना 21 जनवरी 1972 को की गई थीI यहाँ तीन जातीय समूह के लोग रहते हैं – मैतेई, नागा और कुकी चीनI मणिपुर की प्रमुख भाषा मैतेई है जिसे मणिपुरी भी कहा जाता है। मणिपुरी भाषा की अपनी लिपि है-मीतेई-मएक। इसके अतिरिक्तण राज्य में 29 बोलियां हैं जिनमें प्रमुख हैं- तंगखुल, भार, पाइते, लुसाई, थडोऊ (कुकी), माओ आदि। मणिपुर में ऐमोल, अनल, अंगामी, चिरु, चोथे, गंगते, हमार, लुशोई, काबुई, कचानगा, खरम, कोईराव, कोईरंग, कोम, लम्कांग, माओ, मरम, मरिंग, मोनसंग, मायोन, पाईते, पौमई,पुनरूम, राल्ते, सेमा, तांगखुल, थडोऊ, तराव इत्यादि आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैंI मणिपुर का क्षेत्रफल 22,327 वर्गकिलोमीटर है तथा कुल जनसंख्या 2,721,756 है जिनमें पुरुष 1,369,764 एवं महिला 1,351,992 हैंI जनसंख्या का घनत्व (प्रति वर्गकिलोमीटर ) 122 और लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या) 987 हैI साक्षरता 80 प्रतिशत हैI मणिपुर के प्रमुख शहर इम्फाल, बिसनपुर, उखरुल, थौबल, चंदेल, सेनापति, चूराचांदपुर इत्यादि हैंI

[" लोकरंग: मणिपुर के पर्व–त्योहार/ वीरेन्द्र परमार "अपनी माटी के इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए कॉमेंट बॉक्स में दिए गए लिंक पर जाएं ( अंक-32 ) ]

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