Rajput of M.P.

Rajput of M.P. Jay rajputana jay maa bhwani

उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट है हमीरपुर-महोबा, जिसे अक्सर लोधलैंड कहा जाता है। लेकिन यह नामकरण असलियत से ज्यादा एक राजन...
03/11/2025

उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट है हमीरपुर-महोबा, जिसे अक्सर लोधलैंड कहा जाता है। लेकिन यह नामकरण असलियत से ज्यादा एक राजनीतिक मिथक है।

अब तक इस सीट से लोधी समाज के 6, ब्राह्मण समाज के 5 और ठाकुर (क्षत्रिय) समाज के 4 सांसद बन चुके हैं। (जिनमें तेज प्रताप सिंह, अशोक सिंह चंदेल, बहादुर सिंह और पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।)

यहां के जातीय समीकरण की बात करें तो लोधी 12.8 प्रतिशत, ब्राह्मण 12 प्रतिशत और क्षत्रिय 13 प्रतिशत।
यानि इस क्षेत्र में लोधलैंड का जो फर्जी नैरेटिव गढ़ा गया है, वह वास्तविक आंकड़ों से मेल नहीं खाता। असल में यहां क्षत्रिय सबसे अधिक हैं, उसके बाद लोधी और ब्राह्मण।

इस सीट पर एक पैटर्न हमेशा से देखने को मिलता है कि जब भी ब्राह्मण और क्षत्रिय उम्मीदवार आमने-सामने होते हैं, तो लोधी प्रत्याशी को फायदा मिल जाता है।
जैसे 2024 के चुनाव में हुआ — सपा के अजेंद सिंह लोधी जीत गए और भाजपा के पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल हार गए क्योंकि बसपा ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतार दिया था।

अगर इस सीट का सबसे बड़ा नेता कोई रहा है तो वह हैं तेज प्रताप सिंह, जिन्होंने BLD पार्टी से चुनाव जीतकर इतिहास रचा था। बाद में उनकी पार्टी का विलय चौधरी चरण सिंह की जनता पार्टी में हुआ।
1977 के लोकसभा चुनाव में तेज प्रताप सिंह को 55 प्रतिशत वोट मिले थे — जो आज तक किसी भी हमीरपुर-महोबा उम्मीदवार को नहीं मिले।
उन्होंने उस चुनाव में दो बार के सीटिंग सांसद स्वामी ब्रह्मानंद को हराया था, जो लोधी समाज से थे और पहली बार जनसंघ से सांसद बने थे।

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इस क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा सीट तिंदवारी मानी जाती है, जहां करीब 70 हजार ठाकुर मतदाता हैं।
जब वी.पी. सिंह मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने उपचुनाव में यहीं से जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया था। पहले यह सीट फतेहपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती थी।
बाद में प्रधानमंत्री बनने पर भी उन्होंने फतेहपुर लोकसभा से चुनाव लड़ा, जिसमें पहले तिंदवारी आती थी।
तिंदवारी को बुंदेलखंड का मिनी चित्तौड़गढ़ कहा जाता है, क्योंकि यहां ठाकुरों का प्रभाव रहा है। मगर आज वहां से निषाद विधायक चुने जा रहे हैं।

निष्कर्ष यही है कि जहां भी संघ (RSS) मजबूत होता है, वहां ठाकुरों की राजनीतिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर कर दी जाती है।
हमीरपुर-महोबा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है — सांसदी देकर विधानसभा में ठाकुरों को हाशिये पर कर दिया गया और अब सांसदी भी चली गई।
सपा जातीय हिस्सेदारी की बात तो करती है, लेकिन इस क्षेत्र में आज तक ठाकुरों को उनका हक नहीं मिला।

साभार :- भदौरिया साहब

Boss मैदान में उतार रहा है साथियों स्वागत नहीं करोगे हमारे इस शेर का ✊बीएन राव को सम्मान दिलाकर रहेंगे हम 💪💪जय राजपुताना...
12/10/2025

Boss मैदान में उतार रहा है साथियों स्वागत नहीं करोगे हमारे इस शेर का ✊

बीएन राव को सम्मान दिलाकर रहेंगे हम 💪💪
जय राजपुताना
जय स्वर्ण एकता 🔥

जय राजपुताना 🔥🔥🔥कितने भाई हैं जो ओकेंद्र राणा को राजपूत समाज का शेर मानते हैं 💪💪चलो ग्वालियर ✊
12/10/2025

जय राजपुताना 🔥🔥🔥

कितने भाई हैं जो ओकेंद्र राणा को राजपूत समाज का शेर मानते हैं 💪💪

चलो ग्वालियर ✊

आज हिंदुत्व के नाम पर दिन-रात सोशल मीडिया पर गला फाड़ने वाले तथाकथित हिंदूवादी इन्फ्लुएंसर्स पर सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा ह...
21/09/2025

आज हिंदुत्व के नाम पर दिन-रात सोशल मीडिया पर गला फाड़ने वाले तथाकथित हिंदूवादी इन्फ्लुएंसर्स पर सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है। ये वही लोग हैं जो कभी कश्मीर फाइल्स, कोलकाता फाइल्स, छावा जैसी फ़िल्मों पर अपनी छाती पीटते नहीं थकते थे। हर वक्त खुद को हिंदू समाज का बड़ा पैरोकार साबित करने का दावा करते थे।

लेकिन जब बात राजपूत वीरता और राजपूत अस्मिता पर आई, तब सबकी ज़ुबान क्यों सिल गई? वीर केसरी जैसी फ़िल्म, जो एक शूरवीर राजपूत के बलिदान और साहस पर आधारित थी, उसके समय पर इन इन्फ़्लुएंसर्स ने चुप्पी साध ली। और अब जब योगी आदित्यनाथ जी की अजेय फ़िल्म रिलीज़ हुई, तब भी इनकी चुप्पी उतनी ही गहरी है। दोनों ही फ़िल्में उन राजपूत महापुरुषों से जुड़ी थीं, जिन पर पूरा समाज गर्व करता है। फिर भी इनकी खामोशी राजपूत समाज के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है।

राजपूत समाज सवाल पूछ रहा है – जब हमारे इतिहास, हमारी वीरता और हमारे नेताओं पर बनी फ़िल्मों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो ये तथाकथित इन्फ्लुएंसर आखिर कहाँ गायब हो जाते हैं? क्या उनकी आवाज़ सिर्फ़ उन्हीं मुद्दों के लिए है, जहाँ से उन्हें ताली, भीड़ और पैसा मिलता है?

यही कारण है कि लोगों को अब यह शक होने लगा है कि इनका असली चेहरा कुछ और है। बाहर से यह लोग धर्म और हिंदुत्व का नारा लगाते हैं, मगर भीतर से सिर्फ़ मौकापरस्ती और स्वार्थ की राजनीति खेलते हैं। यही तो असली मायने हैं “मुख में राम, बगल में छुरी” के।

राजपूत समाज अब यह अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा। हमें असली और नकली हिंदुत्व की पहचान करनी होगी। असली हिंदुत्व वही है जो हर परिस्थिति में सत्य और न्याय के साथ खड़ा हो, चाहे सामने राजपूत वीरों की गाथा हो या किसी महापुरुष का संघर्ष। बाकी सब केवल दिखावा और खोखली बयानबाज़ी है, जो समय आने पर बेनक़ाब हो ही जाएगी।

दिग्विजय सिंह को पसंद करने का मेरा एक बड़ा कारण उनका अटूट स्वाभिमान है।कहानी यूं है कि उनके पिता बालभद्र सिंह एक कट्टर ह...
20/09/2025

दिग्विजय सिंह को पसंद करने का मेरा एक बड़ा कारण उनका अटूट स्वाभिमान है।

कहानी यूं है कि उनके पिता बालभद्र सिंह एक कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा के नेता थे। उन्होंने राघोगढ़ से निर्दलीय विधायक का चुनाव जीता था, जिसमें उन्हें हिंदू महासभा का समर्थन भी प्राप्त था। पिता की इस पृष्ठभूमि के चलते यह स्वाभाविक था कि लोग मानते थे—दिग्विजय सिंह भी आगे चलकर संघ या हिंदुत्ववादी राजनीति की राह पकड़ेंगे।

केवल 22 वर्ष की आयु में दिग्विजय सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव जीत लिया। यह जीत उनकी लोकप्रियता और नेतृत्व क्षमता का प्रमाण थी। इसी समय ग्वालियर रियासत की महारानी विजयाराजे सिंधिया की नजर उन पर पड़ी। राजमाता ने भरपूर प्रयास किया कि यह होनहार युवक उनके साथ जुड़ जाए।

लेकिन बात इतनी आसान नहीं थी। दरअसल, राघोगढ़ ग्वालियर रियासत के अंतर्गत आता था, और राजमाता का व्यवहार राघोगढ़ घराने के प्रति व्यवहार अक्सर अधीनस्थों की तरह था। मगर दिग्विजय सिंह यह सब चुपचाप सहने वालों में से नहीं थे। उन्होंने राजमाता का प्रस्ताव ठुकरा कर साफ जता दिया कि राघोगढ़ का राजा किसी का अधीन नहीं है।

यही स्वाभिमान उन्हें उस रास्ते पर ले गया जहाँ उन्होंने राजमाता सिंधिया की नहीं सुनी, बल्कि उनके विरोधी दल कांग्रेस का दामन थाम लिया। मध्यप्रदेश के पहले राजपूत मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह उनके पिता के करीबी मित्र थे। इन्हीं के सानिध्य में दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस ज्वाइन की थी।

इस तरह दिग्विजय सिंह ने अपने करियर की शुरुआत में ही यह जता दिया कि सत्ता या पद की लालच से बढ़कर उनके लिए आत्मसम्मान और स्वतंत्र निर्णय मायने रखते हैं।

31/08/2025

चलो आज राजपूत एकता का परिचय हो जाए मैं मध्यप्रदेश से हूं और आप?

राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना जी की बेटी बाईसा पूर्वी चौहान को स्टेट कराटे प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल ज...
30/08/2025

राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना जी की बेटी बाईसा पूर्वी चौहान को स्टेट कराटे प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतने पर हार्दिक शुभकामनाएं !

29/08/2025

सिकंदर की लंबाई - 5 फीट 6-8 इंच
अकबर की लंबाई - 5 फीट 7-8 इंच

महाराणा प्रताप - 6 फीट 7 इंच 😎🗿

उत्तर प्रदेश के भाईयों ने पूरण सिंह के चूरण में आकर इन्हें वोट किया था, और अंजाम यह मिला है...इतिहास चोरी!
27/08/2025

उत्तर प्रदेश के भाईयों ने पूरण सिंह के चूरण में आकर इन्हें वोट किया था, और अंजाम यह मिला है...

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इतने लंबे समय से जो राजपूत समाज राजपूत सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी को लेकर लडाई लड़ रहा था उसमें हमारी जीत होती दिख रही...
26/08/2025

इतने लंबे समय से जो राजपूत समाज राजपूत सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी को लेकर लडाई लड़ रहा था उसमें हमारी जीत होती दिख रही है।

अब साबित हो चुका है कि गुर्जर स्थानवाचक शब्द है जिसका आज की गुज्जर या गौ चर जाति से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है।

गुर्जर शब्द का प्रयोग आज के गुजरात के लिए स्थान वाचक के रूप में भूतकाल में किया जाता था।
जैसे कोई गुर्जर देश को जीतता था तो उसे गुर्जरश्वर संज्ञा से सम्मानित किया जाता था।
मराठा गायकवाड़ों को भी गुर्जरश्वर कहा जाता है।

ज्यादा लम्बे समय की बात नहीं करते हैं मोहम्मद अली जिन्ना, महात्मा गांधी और सरदार पटेल ने भी खुद को गुर्जर कहा है क्योंकि वो गुर्जर देश से संबंध रखते थे।

राजनैतिक लाभ के लिए राजाओं‌ सामांतो को शोषक बोलना है और समाजिक सम्मान के लिए खुद को राजाओं का वंशज भी बोलना है।कभी वोट क...
26/08/2025

राजनैतिक लाभ के लिए राजाओं‌ सामांतो को शोषक बोलना है और समाजिक सम्मान के लिए खुद को राजाओं का वंशज भी बोलना है।

कभी वोट के लिए राजाओं को गालियां भी देनी हैं तो कभी वोटों के लिए उनकी जय भी बोलनी है।

वाह रे वाह!

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