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‘BJP सहयोगियों को खा जाती है’: अन्नामलाई के जाने के बाद फिर उठा पुराना आरोप, लेकिन बिहार से महाराष्ट्र तक क्या कहते हैं ...
07/06/2026

‘BJP सहयोगियों को खा जाती है’: अन्नामलाई के जाने के बाद फिर उठा पुराना आरोप, लेकिन बिहार से महाराष्ट्र तक क्या कहते हैं तथ्य?

अन्नामलाई ने BJP से दिया इस्तीफा
अन्नामलाई ने BJP से दिया इस्तीफा
ना केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे दक्षिण में बीजेपी के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ दी है। अन्नामलाई ने ‘वी द लीडर्स’ नाम से अपनी पार्टी का गठन किया है और वो अब तमिलनाडु में जन आंदोलन करेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। अन्नामलाई के जाने के बाद सोशल मीडिया पर यह बात तैरने लगी है कि बीजेपी बीच सफर में अपने नेताओं या अपने सहयोगियों को छोड़ देती हैं।

हालाँकि, इस बात में कितनी सच्चाई है ये हम इस लेख में जानेंगे। पहली शुरुआत BJP और अन्नामलाई से ही करते हैं। चाहते तो अन्नामलाई तमिलनाडु में बैठ इस्तीफा दे देते लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बीजेपी ने उन्हें साथ रखने की लगातार कोशिशें कीं, पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे बातचीत की उनकी शिकायतों को समझा और साथ देने की भी बात कही। लेकिन बात नहीं बनी और इसमें अन्नामलाई की भी अपनी वजह रही होंगी।

वो बीजेपी ही थी जिसने अन्नामलाई को तमिलनाडु में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका दिया और पूरी ताकत उनके पीछे लगा दी। सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता जिस अपनेपन के साथ अन्नामलाई को संबोधित करते उससे साफ नजर आता था कि वो अन्नामलाई में एक भविष्य का नेता देखते हैं लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला तो इसके लिए बीजेपी ही जिम्मेदार नहीं।

यह आरोप कि बीजेपी अपने सहयोगियों को खत्म कर देती है, उन्हें धीरे-धीरे कमजोर कर देती है और अंततः उनकी राजनीतिक जमीन अपने कब्जे में ले लेती है। यह आरोप इतना दोहराया गया है कि कई लोगों ने इसे लगभग सत्य मान लिया। लेकिन क्या वास्तव में तस्वीर इतनी सीधी है? क्या हर राज्य में BJP ने अपने सहयोगियों को किनारे लगाया या कई मामलों में उसने राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व, सम्मान और जगह दी?

अगर भारतीय राजनीति को सिर्फ आरोपों से नहीं बल्कि उदाहरणों और घटनाओं के क्रम से समझा जाए, तो एक दूसरा पक्ष भी साफ दिखाई देता है कि BJP की गठबंधन राजनीति का एक बड़ा आधार सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति रही है। यह रणनीति हमेशा सफल रही हो, ऐसा नहीं है। मतभेद भी हुए, रिश्ते टूटे भी लेकिन यह कहना कि BJP का स्वभाव ही सहयोगियों को खत्म करना है, तथ्यों के सामने अधूरा तर्क नजर आता है।

सबसे पहले बिहार को देखिए। नीतीश कुमार की जेडीयू और BJP के बीच लंबे समय से संबंध है। नीतीश लंबे वक्त तक बीजेपी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2020 विधानसभा चुनाव में BJP ने 74 सीटें जीतीं जबकि जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। BJP स्पष्ट रूप से बड़ी पार्टी बन चुकी थी। सामान्य राजनीतिक गणित कहता कि मुख्यमंत्री BJP का होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने। BJP ने अपने बड़े जनादेश के बावजूद गठबंधन धर्म को प्राथमिकता दी और सहयोगी दल के नेता को शीर्ष पद पर बनाए रखा। यह कोई छोटी राजनीतिक घटना नहीं थी। भारतीय राजनीति में सत्ता अक्सर संख्या के हिसाब से चलती है लेकिन यहाँ BJP ने संख्या से ऊपर गठबंधन को रखा।

बाद में 2022 में जेडीयू ने खुद NDA छोड़ा और महागठबंधन में चली गई यानी रिश्ता टूटने की शुरुआत BJP की ओर से नहीं हुई। अब दोनों दल साथ हैं और जेडीयू का राजनीतिक स्पेस आज भी उनता ही मजबूत है।

बिहार की बात सिर्फ जेडीयू तक सीमित नहीं है। भाजपा ने जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को लगातार राजनीतिक स्पेस दिया। मुकेश सहनी की VIP पार्टी को भी गठबंधन में जगह दी गई, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) लगातार NDA में है और राजनीतिक महत्व बना हुआ है।

ये वे दल थे जिनकी अपनी सीटें सीमित थीं लेकिन BJP ने उन्हें राजनीतिक प्रासंगिकता दी। अगर उद्देश्य केवल सहयोगियों को खत्म करना होता, तो छोटे दलों को सीटें देकर अपने वोट बैंक का हिस्सा साझा करने की मजबूरी BJP क्यों स्वीकार करती?

महाराष्ट्र का उदाहरण भी कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा और शिवसेना का रिश्ता कोई 5-10 साल का नहीं था बल्कि यह लगभग तीन दशक तक चला। 1980 के दशक के अंत से दोनों दल साथ आए और महाराष्ट्र की राजनीति में एक वैचारिक साझेदारी बनी।

2019 विधानसभा चुनाव में दोनों ने साथ चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया। भाजपा 105 सीटों पर और शिवसेना 56 सीटों पर जीती। लेकिन सरकार गठन के समय मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ और उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाने का फैसला किया। यहाँ भी यह गठबंधन तोड़ने की पहल भाजपा की तरफ से नहीं की गई थी।

हाँ, बाद के वर्षों में शिवसेना में विभाजन हुआ और एकनाथ शिंदे गुट भाजपा के साथ आया। आलोचक इसे भाजपा की रणनीति कह सकते हैं लेकिन उतना ही बड़ा तथ्य यह भी है कि भाजपा चाहती तो मुख्यमंत्री पद अपने पास रख सकती थी, फिर भी शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद सहयोगी चेहरे को आगे रखना भाजपा की गठबंधन शैली का हिस्सा था।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी था। दोनों का रिश्ता दो दशक से अधिक समय तक चला। कृषि कानूनों के मुद्दे पर मतभेद बढ़े और 2020 में अकाली दल ने एनडीए छोड़ने का फैसला किया। यह अलग बात है कि किसान आंदोलन के दबाव और पंजाब की राजनीति ने अकाली दल को यह निर्णय लेने पर मजबूर किया, लेकिन तथ्य यह है कि गठबंधन से बाहर निकलने की घोषणा अकाली दल की ओर से हुई थी। भाजपा ने अपने सबसे पुराने सहयोगी को बाहर नहीं किया बल्कि सहयोगी ने खुद रास्ता अलग चुना।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति को देखें तो यहाँ भी सहयोगियों को साथ रखने का एक मॉडल दिखता है। अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल हों या निषाद पार्टी के संजय निषाद दोनों दलों को भाजपा ने केवल चुनावी समय की जरूरत नहीं माना।

मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, सीटों में भागीदारी दी गई और सामाजिक समीकरणों में उन्हें जगह मिली। भाजपा समझती रही कि उत्तर प्रदेश जैसी विशाल राजनीति केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती, सामाजिक आधार का विस्तार सहयोगियों के साथ ही संभव है।

पूर्वोत्तर में भाजपा की गठबंधन नीति शायद सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। नागालैंड में भाजपा ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के साथ चुनाव लड़ा और क्षेत्रीय नेतृत्व को स्वीकार किया। असम में असम गण परिषद (AGP) को साथ रखा गया।

मेघालय और मणिपुर में भी क्षेत्रीय दलों के साथ साझा सत्ता मॉडल अपनाया गया। भाजपा चाहती तो अपनी राष्ट्रीय ताकत के आधार पर ‘बड़े भाई’ की राजनीति कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर में उसने स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ समन्वय का रास्ता चुना। यही कारण है कि एनडीए का विस्तार पूर्वोत्तर में सबसे तेज हुआ।

आंध्र प्रदेश इसका नया उदाहरण है। 2024 के बाद जब चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी एनडीए के लिए अहम सहयोगी बनकर उभरी, तब भाजपा ने न केवल उन्हें महत्व दिया बल्कि गठबंधन को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत के समीकरण में सहयोगियों की अहमियत को भाजपा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। यह वही राजनीति है जिसमें ‘एकला चलो’ के बजाय ‘साथ लेकर चलो’ का संकेत दिखता है।

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा पर सबसे ज्यादा आरोप वही लोग लगाते हैं जो कॉन्ग्रेस की गठबंधन राजनीति को भूल जाते हैं, इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। हाल ही में तमिलनाडु में भी ऐसा ही दिखा। कॉन्ग्रेस वर्षों तक DMK के साथ रही लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलते ही रिश्तों में दूर बढ़। कॉन्ग्रेस ने DMK की पीठ में छुरा घोंप दिया और विजय की TVK के साथ हाथ मिला लिया।

यह भी सच है कि गठबंधन राजनीति हमेशा बराबरी का रिश्ता नहीं होती। बड़ी पार्टी स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली होती है। भाजपा भी अपवाद नहीं। कई सहयोगी कमजोर भी पड़े, कुछ दलों का जनाधार भाजपा के विस्तार से प्रभावित भी हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भाजपा की ‘साजिश’ थी या भारतीय राजनीति का स्वाभाविक परिणाम।

इतना जरूर दिखता है कि भाजपा ने कई बार राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व दिया, मुख्यमंत्री पद छोड़ा, सीटें साझा कीं और छोटे दलों को राष्ट्रीय राजनीति में जगह दी। बिहार में नीतीश कुमार, महाराष्ट्र में शिंदे, उत्तर प्रदेश में अपना दल और निषाद पार्टी और भी तमाम उदाहरण केवल संयोग नहीं लगते।

इसलिए जब यह कहा जाता है कि भाजपा सहयोगियों को ‘खा जाती’ है, तब शायद यह भी पूछना चाहिए कि अगर ऐसा ही होता तो इतने क्षेत्रीय दल बार-बार उसके साथ क्यों लौटते?

 #ग्रेट_निकोबार_सीरीज_3राहुल गांधी Rahul Gandhi आखिर Muscat में कर क्या रहे हैं, और अभी क्यों?.....Rahul Gandhi के Nicob...
07/05/2026

#ग्रेट_निकोबार_सीरीज_3
राहुल गांधी Rahul Gandhi आखिर Muscat में कर क्या रहे हैं, और अभी क्यों?.....Rahul Gandhi के Nicobar Islands में फोटोशूट के बाद, लोकसभा में विपक्ष के नेता मस्कट में दिखाई दिए हैं।

लेकिन एक विदेशी दौरे की साधारण छवि से आगे बढ़कर, कुछ ऐसे पहलू सामने आते हैं जो गहराई से देखने लायक हैं।

मस्कट में अपने समय के दौरान, Rahul Gandhi ने “कैफे फराह” का दौरा किया, जो शहर के कूटनीतिक इलाके में स्थित है।

पहली नजर में यह एक सामान्य पड़ाव लग सकता है, लेकिन इस स्थान के मालिकाना हक और उससे जुड़े संबंधों को ध्यान से देखने पर तस्वीर कुछ जटिल लगती है।

यह कैफे Al Zaman Hospitality LLC द्वारा संचालित बताया जाता है, जिसके मालिक खालिद ज़मान हैं।
खास बात यह है कि ज़मान का संबंध एक अन्य कंपनी, BlueFive Capital, से भी बताया जाता है। यहीं से कड़ियां स्थानीय व्यापार से आगे बढ़ती हुई नजर आती हैं।

BlueFive Capital के बोर्ड में फांग फेंगलेई Fang Fenglei शामिल हैं, जो एक प्रमुख चीनी फाइनेंसर हैं। (🙄🙄 समझ रहे है चीनी फाइनेंसर 😄😄)

फांग, Hopu Investments के चेयरमैन भी हैं और उन्हें चीन के राजनीतिक और वित्तीय हलकों में काफी प्रभावशाली माना जाता है। रिपोर्ट्स में उनके वरिष्ठ नेतृत्व, जैसे वांग चीशान, से करीबी संबंधों का भी उल्लेख मिलता है।

इन सभी जुड़ावों—
एक कैफे विज़िट,
बिजनेस मालिकाना हक, और
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय हस्तियों—को देखते हुए एक बड़ा सवाल उठता है:

क्या यह सिर्फ एक सामान्य मुलाकात थी,
या इस दौरे में कुछ और भी छिपा है?

इंडियन चीनी एजेंट और चीनी फाइनेंसर की मुलाकात....?!

समझ रहे हो समझ रहे हो...न....

साल 1970 की एक सुबह बरनावा में मुकीम खान नाम का एक आदमी सोकर उठा और मेरठ की सरधना कोर्ट की ओर चल पड़ा। कोर्ट में उसने ला...
30/04/2026

साल 1970 की एक सुबह बरनावा में मुकीम खान नाम का एक आदमी सोकर उठा और मेरठ की सरधना कोर्ट की ओर चल पड़ा। कोर्ट में उसने लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त महाराज को प्रतिवादी बनाते हुए एक वाद दायर कर दिया कि महाभारत कालीन लाक्षागृह और उससे जुड़े अवशेष वक्फ बोर्ड की संपत्ति है।

लाक्षागृह और उसके आसपास की 100 एकड़ से भी ज्यादा की जमीन को शेख बदरुद्दीन की मजार और कब्रिस्तान बता कर उस पर पूर्ण अधिकार मांगा गया। हिन्दू पक्ष को 53 साल तक कोर्ट में केस लड़ना पड़ा और अब जाकर कोर्ट ने हज़ारो साल पुराने अवशेषों और प्रमाणों के आधार पर फैसला सुनाया है कि ये कोई मजार या कब्रिस्तान नहीं है बल्कि महाभारत कालीन लाक्षागृह ही है।

नीचता देखिये कि लाक्षागृह साबित होने के बाद अब मजार पक्ष इस फैसले को अब हाईकोर्ट में चुनौती देगा, वहां भी हारेगा। फिर सुप्रीम कोर्ट जाएगा और वहाँ भी हारेगा। सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में पांच पांच दस दस हज़ार साल पुराने स्ट्रक्चर को साढ़े चौदह साल पहले टपके लोग पूरी बेशर्मी से अपना बता रहे हैं और कब्जे करने में सफल भी हो रहे है।

अपने जन्म के साथ ही अरब कुरैशों का पूजा स्थल कब्जा कर उसे अपनी सबसे पवित्र जगह बना ली। यहूदियों के सबसे पवित्र स्थान माउंट टेम्पल पर जबरन अतिक्रमण कर उसे अपनी तीसरी सबसे पवित्र जगह बना दी। श्रीलंका में एडम्स पीक पर बुद्ध पदचिन्ह को आदम का पदचिह्न बता कर वहां भी कब्जा कर रखा है। तुर्की में ईसाइयों की हागिया सोफिया चर्च को मस्जिद में बदल कर कब्जा कर लिया।

संसार की कोई भी सभ्यता इनसे कब्जे वाला अपना धार्मिक स्थल वापस नहीं ले पा रही है। लेकिन इनका दुर्भाग्य है कि भारत में इनका मुकाबला संसार की उस इकलौती और जीवट सभ्यता से है जिसे जो इनकी छाती पर पैर रखकर अपने धार्मिक स्थलों को वापस लेने की क्षमता रखती है। हां, आप इनके हलक में हाथ डाल कर अपनी धरोहरें वापस खींच वाली दुनिया की इकलौती सभ्यता है।

29/04/2026

Mira Road में 25 अप्रैल की सुबह security guards पर चाकू से हमला - आरोपी ने पहले धर्म पूछा, फिर कलमा पढ़ने को कहा।

घर से ISIS-linked notes मिलने के बाद ATS इसे lone-wolf radicalization angle से जांच रही है।

टीसीएस केस-जबरन धर्मांतरण में शामिल थी निदा खानः पुलिस का दावा-दो महीने की प्रेग्नेंसी का हवाला देकर अग्रिम जमानत मांगी....
22/04/2026

टीसीएस केस-जबरन धर्मांतरण में शामिल थी निदा खानः पुलिस का दावा-दो महीने की प्रेग्नेंसी का हवाला देकर अग्रिम जमानत मांगी...

👉 मुंबई के नासिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में यौन उत्पीड़न मामले में कंपनी की प्रोसेस एसोसिएट आरोपी निदा खान अब तक फरार है। पुलिस ने दावा किया है कि वह जबरन धर्मांतरण में शामिल थी। सेशंस कोर्ट से गिरफ्तारी पर अंतरिम सुरक्षा नहीं मिलने के बाद पुलिस ने कहा है कि निदा खान की तलाश जारी है।

जयपुर पुलिस ने इस केस को जिस तरह से हैंडल किया है, उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है। क्योंकि इस केस में विक्टिम की तरफ से क...
20/04/2026

जयपुर पुलिस ने इस केस को जिस तरह से हैंडल किया है, उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है। क्योंकि इस केस में विक्टिम की तरफ से कोई शिकायत नहीं थी। शिकायत सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो पर किसी यूज़र (सचेत नागरिक) की थी।

हम जानते हैं ये पुलिस का काम है लेकिन जब आलोचना की जाती है, पुलिस को कोसा जाता है तब ऐसे केस में एप्रिसिएशन भी बनता है।

ये केस महत्वपूर्ण भी है क्योंकि जिस तरह से लड़कियों के साथ सरेआम न सिर्फ छेड़छाड़ हो रही है बल्कि उसके वीडियो भी ये बदमाश ही वायरल कर रहे हैं तब इन बदमाशों के दुस्साहस को कानून द्वारा कुचला जाना अति आवश्यक है और ये पब्लिक में होना चाहिए ताकि इन आवारा अय्याशों के हौसले पस्त हो जाएँ लड़कियों को छेड़ने, वीडियो बनाने के।

कुछ दिन पहले जयपुर में एक छात्रा पढ़ाई करके बाइक बुक कर घर लौट रही थी। पीछे से इन चार आवारा अय्याशों ने जो कि जयपुर शराब पार्टी करने आए थे, बाइक पर ही उससे छेड़छाड़ की और वीडियो बनाकर खुद ही सोशल मीडिया पर डाल दिया।

किसी यूज़र ने NCRB को टैग करके पूछा कि ये सब क्या है? एनसीआरबी ने जयपुर पुलिस को टैग करके जाँच करने के लिए कहा।

उसके बाद जयपुर पुलिस ने डीसीपी साउथ राजर्षि राज सर के नेतृत्व में शानदार काम किया। सोशल मीडिया के वीडियो, जो कि बाद में आरोपी ने डिलीट कर दिया था, से लगाकर इनको दबोचने तक में बहुत बारीकी से काम किया। बदमाशों की बाइक पर नम्बर भी नहीं था, आस पास की लोकेशन, गाड़ियों के नम्बर की सहायता से काम किया गया। पीड़िता तक पहुँचना भी चुनौती थी।

ऐसा ही एक और केस है जिसमें जयपुर में ही एक आदतन अपराधी ने घर लौटती गर्भवती महिला के साथ घटिया हरकत की। उसे भी पकड़ लिया गया है। उस आरोपी ने होशियारी लगाई। वो पहले से एक केस में फरारी काट रहा था। वहाँ जाकर उसने सरेंडर कर दिया लेकिन पुलिस ने इस केस में भी पकड़ ही लिया और यहाँ ले आई। महिलाओं से छेड़छाड़ का आदतन अपराधी है वो और 30 से ज़्यादा केस उस पर चल रहे हैं। उसने पुलिस को चकमा देने के लिए हुलिया बदल लिया था। हाथ पैर टूट चुके हैं उस बदमाश के जिन हाथों से एक गर्भवती के साथ घिनौनी हरकत की थी। एक एक हड्डी पसली तोड़ देनी चाहिए इन अय्याशों की‌। ताकि जब इनका शरीर सही हो जाए तो ये उसका सही इस्तेमाल करना सीख जाए। हालाँकि श्वान की पूँछ... इसीलिए सज़ा सबसे ज़रूरी है।

दोनों केस में गौर करने लायक बात ये है कि अपराधियों पर पहले से ही इतने केस चल रहे हैं। ये खुलेआम बाहर घूमते हैं।

फिलहाल वाले केस में छात्रा नाबालिग है और ये चारों अपराधी पॉक्सो में सज़ा पाएँगे। पुलिस जल्दी से जल्दी इनको सज़ा दिलवाने में प्रयासरत है।

ऐसे केस में सज़ा आजीवन जेल में सड़ने की ही होनी चाहिए। सश्रम कठोर कारावास की क्योंकि अगर ये कीटाणु समाज में खुलेआम घूमेंगे तो कोई शांति से जी नहीं पाएगा। मुफ्त की रोटियों के लायक नहीं हैं ये समाज के दुश्मन।

जयपुर में एक विदेशी नागरिक के साथ बद्तमीज़ी करने वाले को भी सोशल मीडिया के वीडियो से ही पकड़ा गया था‌। वो वीडियो भी आरोपी ने ही डाला था।

घिनौने काम करना, उसके वीडियो बनाना, खुद ही वायरल करना ये दुस्साहस आ कहाँ से रहा है इन बदमाशों में! इसे कुचलना अतिआवश्यक है। ऐसे केस पब्लिक में आने ज़रूरी है कि किस तरह से सोशल मीडिया पर नाचकर अपनी घिनौनी हरकत दिखाते ये अपराधी बाद में टूटे हुए हाथ पैर के साथ, "माफ कर दो बहन" करते दिखते हैं।

धन्यवाद जयपुर पुलिस क्योंकि इस केस में आपके पास विक्टिम की शिकायत नहीं थी। यहाँ विक्टिम आप तक नहीं, आप विक्टिम तक पहुँचे। इस केस में अपराधियों को‌ पकड़ने में हेड कॉन्स्टेबल लोकेश, भंवर लाल और ओमप्रकाश का अहम रोल रहा है।‌

ऐसे केस, पुलिस के लिए भी केस स्टडी का काम करते हैं क्योंकि बिना शिकायत के विक्टिम तक पहुँचना भी एक चुनौती है।

अपराधियों में कानून का खौफ पैदा करना है तो काम इसी तरह से होना चाहिए। सोशल मीडिया के अगर नुकसान हैं तो कुछ फायदे भी हैं।

भारती गौड़

TCS कॉर्पोरेट जिहाद को लेकर कई लोगों ने पीयूष बंसल की Lenskart की HR पॉलिसी वायरल की जिसमें कर्मचारियों को बिंदी-तिलक लग...
16/04/2026

TCS कॉर्पोरेट जिहाद को लेकर कई लोगों ने पीयूष बंसल की Lenskart की HR पॉलिसी वायरल की जिसमें कर्मचारियों को बिंदी-तिलक लगाने, कलावा पहनने पर बैन लगा दिया गया, लेकिन हिजाब को छूट दी गई।
पीयूष ने आखिरकार खुलासा किया कि वर्तमान में ऐसी कोई नीति नहीं है। (मेरा मतलब है कि यह पहले था)। पुलिस लगातार विकसित हो रही है, (इसलिए पहले गड़बड़ थी) भाषा और नीति के दोष लगातार दूर होते जा रहे हैं। (ये दोषपूर्ण नीति किसने बनाई? बड़े बिजनेस का मैनेजर जो खुद हिंदू है उसे पता नहीं चलेगा की उसकी कंपनी में हिंदू सजावट पर प्रतिबंध क्यों है? )
शेफाली वैद्य ने कहा है वायरल एचआर पॉलिसी असली है। थोड़ी देर पहले हम खुद तीन लेंसकार्ट में घूमे, कर्मचारियों की रचना टीसीएस, नासिक जैसी महसूस हुई।
अब नीचे पीयूष का ट्वीट पढ़ें।
नमस्ते सभी को मैं लेन्सकार्ट के बारे में एक गलत नीति दस्तावेज वायरल होते देख रहा हूं।
मैं सीधे बात करना चाहता हूं कि यह दस्तावेज हमारे वर्तमान दिशानिर्देशों को प्रतिबिंबित नहीं करता है।
हमारी नीति में बिंदी और तिलक सहित किसी भी प्रकार की धार्मिक अभिव्यक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और हम नियमित रूप से अपने दिशानिर्देशों की समीक्षा करते रहते हैं।
हमारी ग्रूमिंग नीति वर्षों से विकसित हुई है और पुराने संस्करण यह प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं कि हम आज कौन हैं। हम इस स्थिति के कारण हुई भ्रम और चिंता के लिए खेद व्यक्त करते हैं।
हम एक कंपनी के रूप में, सीखना और निर्माण करना जारी रखते हैं। हमारी भाषा या नीतियों में किसी भी चूक को संबोधित किया गया है और किया जाएगा।
हमारे पास भारत भर में हजारों टीम सदस्य हैं जो हर दिन हमारे स्टोर पर अपनी आस्था और संस्कृति को गर्व से पहनते हैं। ये Lenskart हैं।
Lenskart का निर्माण भारत में हुआ था, भारतीयों ने, भारतीयों के लिए। हर प्रतीक और हर परंपरा जो हमारे लोग निभाते हैं वह एक हिस्सा है जो हम एक कंपनी के रूप में हैं। मैं उस से कभी समझौता नहीं होने दूंगा।

14/04/2026

>स्टीमर डूबने के बाद पता चलता है कि सवारी ने लाइफ़ जैकेट नहीं पहने थे,
>बस जलने के बाद पता चलता है कि उसमें इमर्जेंसी एग्जिट डोर तो था ही नहीं,
>ट्रॉली पलटने के बाद पता चलता है कि ट्रॉली में सवारी बैठाना मना है,
>ट्रक पलटने के बाद पता चलता है कि वो ओवरलोडेड था।
>1000 करोड़ की संपत्ति बना लेके बाद पता चलता है कि ऑफिसर भ्रष्ट था
> मरीजों के मरने के बाद पता चलता है कि हॉस्पिटल के पास लाइसेंस नहीं था
>लोगों के मरने के बाद पता चलता है कि खाना एक्सपायर्ड था
>दस्त लगने के बाद पता चलता है कि दूध में यूरिया मिला था।

"दरअसल इन सबके बारे में सिस्टम को पता होता है, बस भ्रष्टाचार की वजह से चलता रहता है।

जब पकड़े जाते हैं तब सबकुछ सामने आता है।

09/04/2026
15/02/2026

झारखंड से जुड़ा एक कुख्यात गैंगस्टर.. एक दुर्दांत हिस्ट्रीशीटर, विक्रम शर्मा, जिस पर 30 ह_त्याओं सहित 50 से अधिक मामले दर्ज हैं, वो देहरादून के पोश (हाई प्रोफाइल) रेस कोर्स इलाके में सालों से रह रहा था और काशीपुर में स्टोन क्रेशर का कारोबार चला रहा था।

लेकिन कैसे...?

कल देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल के पास विक्रम शर्मा की तीन अज्ञात हमलावरों ने दिनदहाड़े गो*ली मा_रकर ह_त्या कर दी थी। ये झारखंड में कुख्यात गैंगस्टर अखिलेश का गुरू था। गैंगस्टर विक्रम शर्मा का उत्तराखंड कुमाऊं के काशीपुर में स्टोन क्रशर है और यह उत्तराखंड में प्रॉपर्टी डीलिंग के साथ-साथ कई अन्य कारोबार भी कर रहा था। ये कई सालों से देहरादून को ठिकाना बनाकर रह रहा था। एक बहुत बड़े माफिया के लिए पिछले‌ डेढ़‌ दशक से देहरादून ऐशगाह बना हुआ था। तो फिर क्या उत्तराखंड अब अपराधियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है? क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना ऐसा संभव है? राज्य आंदोलनकारियों ने क्या बदमाशों और हिस्ट्रीशीटरों के लिए माँगा था ये पहाड़ी राज्य उत्तराखंड? उत्तराखंड का ऐसा हाल होगा किसी ने कभी सपनों में भी नहीं सोचा होगा। यह एक गंभीर चिंता का विषय है।

किसी हिस्ट्रीशीटर का राज्य में आकर 'स्टोन क्रशर' जैसा बड़ा और भारी निवेश वाला कारोबार चलाना कई व्यवस्थागत खामियों के कारण ही संभव होता है। ऐसे अपराधी अपनी काली कमाई को रीयल एस्टेट, ट्रांसपोर्ट या खनन जैसे बड़े कारोबारों में निवेश करते हैं। खनन और स्टोन क्रशर जैसे कारोबारों के लिए कई तरह की परमिशन, क्लीयरेंस और स्थानीय प्रशासन की मंजूरी की जरूरत होती है। इतने बड़े लेवल पर बिना रसूखदारों, नौकरशाही या राजनीतिक मिलीभगत के काम करना बेहद मुश्किल है। एक तरीके से नामुमकिन!

सवाल तो यह भी है कि जब देहरादून समेत पूरे प्रदेश में सत्यापन अभियान चलाए जाने की बातें कही गईं, तो फिर विक्रम शर्मा जैसा कुख्यात गैंगस्टर... माफिया कैसे नहीं मिला?

शुक्र मनाओ कि कल की घटना में कोई निर्दोष हताहत नहीं हुआ। वरना जिस तरह से कल ताबड़तोड़ गो*लियां चली, उसमें कई बेकसूर स्थानीय लोग भी चपेट में आ सकते थे! लेकिन हर बार ऐसा नहीं होगा, इसलिए पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था हर हाल में दुरुस्त होनी चाहिए।

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