20/12/2025
पर्दा - निकाब 🌿
जापान की औरतों का पारंपरिक सांस्कृतिक लिबास किमोनो है, भारत के बड़े हिस्से में औरतों की पहचान साड़ी से जुड़ी है - ये सिर्फ़ कपड़े नहीं हैं - ये सभ्यताओं की आत्मा हैं - इतिहास की सांसें हैं - पीढ़ियों की स्मृतियाँ हैं.
ज़रा आंख उठाकर देखिए - अमेरिका और यूरोप के किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्थान में आपको शायद ही कोई जापानी औरत किमोनो में दिखे, या कोई भारतीय औरत साड़ी में मिले, वहां सब एक ही साँचे में ढले हुए नज़र आते हैं - यूरोपीय - वेस्टर्न लिबास में.
यह सिलसिला सिर्फ़ पश्चिम तक सीमित नहीं है, एशिया और अफ़्रीका के कॉर्पोरेट कार्यस्थलों में भी स्थानीय पहनावे धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं.
उनकी जगह वही पश्चिमी ड्रेस-कोड ले रहा है - वही “प्रोफेशनल लुक” का पैमाना तय कर रहा है,
यह महज़ फ़ैशन नहीं है बल्कि यह वेस्टर्न सिविलाइज़ेशन का सांस्कृतिक वर्चस्व (cultural hegemony) है - जिसमें स्थानीय संस्कृतियाँ चुपचाप अपनी पहचान खोती जा रही हैं, पूरी दुनिया को एक ही रंग में रंगा जा रहा है, पश्चिम के रंग में.
लेकिन इसी एकतरफ़ा सांस्कृतिक कब्ज़े के बीच, कुछ चेहरे ऐसे हैं जो अब भी वेस्ट के सांस्कृतिक वर्चस्व का इंकार करते हैं.
कुछ मुस्लिम ख़्वातीन, जो हिजाब पहनती हैं, आज भी इस वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं,
आपको व्हाइट हाउस में काम करने वाली किसी महिला के कंधों पर साड़ी नहीं मिलेगी. अमेरिकी यूनिवर्सिटी की किसी प्रोफ़ेसर को किमोनो पहने हुए ढूंढने में आपको नाकामी हाथ लगेगी, लेकिन वहां हिजाब में कुछ मुस्लिम महिलाएँ - आपको ज़रूर मिल जाएँगी - और यही वह बात है जो पश्चिम को चुभती है,
जब पूरी दुनिया ने वेस्टर्न सिविलाइज़ेशन के सामने घुटने टेक दिए.
अपनी शर्तों पर जीना छोड़ दिया, अपनी पहचान को Not-Cool और un-professional मान लिया, तब हिजाब पहनने वाली कुछ दीनदार मुस्लिम ख़्वातीन अब भी कह रही हैं, हम अपनी शर्तों पर जिएँगी.
और पश्चिम को यही बात सबसे ज़्यादा नागवार गुज़रती है,
पश्चिम का अहंकार यह बर्दाश्त नहीं कर पाता कि उसकी नाक के नीचे कोई दूसरी संस्कृति, कोई दूसरी पहचान, बिना झुके फलती-फूलती रहे,
इसीलिए हिजाब उसके लिए सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं, बल्कि एक चुनौती बन जाता है,
यही वजह है कि पश्चिम ने अपने प्रोपेगेंडा तंत्र, मीडिया, एनजीओ, तथाकथित फ़ेमिनिस्ट विमर्श,सबको हिजाब के ख़िलाफ़ लगा दिया है,
और अफ़सोस की बात यह है कि पश्चिमी सभ्यता के स्थानीय गुलाम भी पूरे जोश से इस मुहिम में शामिल हैं.
जो लोग अपनी सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान नहीं बचा पाए.
जो अपने पहनावे की आज़ादी की हिफ़ाज़त नहीं कर सके.
जो पश्चिमी मानकों के सामने सिर झुकाकर मॉडर्न कहलाने लगे.
वही लोग आज हिजाब पहनने वाली, अपनी शर्तों पर जीने वाली मुस्लिम महिलाओं को "गुलाम" होने का सर्टिफ़िकेट बाँट रहे हैं,
यानी जिनकी अपनी आज़ादी गिरवी पड़ चुकी है, वही आज़ाद लोगों को गुलाम होने का ताना दे रहे हैं.
एक तरफ़ देशद्रोही लोग देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट बाँटते फिरते हैं, और दूसरी तरफ़ पश्चिमी गुलामी में जीने वाले लोग, आज़ाद सोच रखने वालों को गुलाम घोषित कर रहे हैं.
इसी को कहते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे,
यह बहस कपड़े की नहीं है.
यह बहस पहचान, आत्मसम्मान और अपनी शर्तों पर जीने के हक़ की है.
(ओबैदुर रहमान भाई के वाल से)