23/08/2025
लघुकथा – आख़िरी उम्मीद
गाँव की झोपड़ी में रहने वाली मीरा एक गरीब स्त्री थी। दिन-भर दूसरों के घर बर्तन माँजकर कभी आटा, तो कभी मुट्ठीभर चावल जुटाती थी। गरीबी इतनी थी कि बरसों से उसने अपने लिए नई साड़ी तक नहीं खरीदी।
मीरा की सबसे बड़ी परेशानी उसकी लगातार चलती नाक से जुड़ी बीमारी थी। हर सुबह उसे सिरदर्द, छींकें और सांस लेने में तकलीफ़ होती। इलाज करवाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। लोग मज़ाक उड़ाते – "अरे, ये तो नाक से ही बीमार है, इतनी मेहनत कैसे करेगी?"
एक दिन शहर के एक दयालु डॉक्टर गाँव में मेडिकल कैंप लगाने आए। मीरा को भी किसी ने समझाया कि वहाँ जाकर दिखाओ। पहले तो वह झिझकी, लेकिन हिम्मत करके पहुँची। डॉक्टर ने जाँच कर बताया कि उसकी नाक के भीतर एक गांठ जैसी समस्या है, जिसे एंडोनैसल सर्जरी से ठीक किया जा सकता है।
मीरा सोच में पड़ गई, "मेरे पास पैसे कहाँ हैं?" लेकिन डॉक्टर ने कहा, "यह ऑपरेशन गरीबों के लिए बिल्कुल मुफ़्त है।"
कुछ हफ़्तों बाद मीरा की सर्जरी हुई और वह बीमारी से मुक्त हो गई। अब वह पहले से तेज़ और खुशहाल महसूस करने लगी।
उसने आँचल से आँसू पोंछते हुए धीरे से कहा—
"कभी-कभी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा उसी जगह से मिलता है, जहाँ हमें बिल्कुल उम्मीद नहीं होती... मेरी नाक से ही मेरी तकलीफ़ थी, और उसी के इलाज ने मुझे नई ज़िंदगी दे दी।"