07/05/2026
एक नेता, दल या सत्ता कभी भी राष्ट्र से बड़ा नही हो सकता है। जैसे स्थिर पड़ा जल समय के साथ दूषित हो जाता है, वैसे ही लोकतंत्र में लंबे समय तक बिना परिवर्तन के सत्ता भी अहंकार, निरंकुशता और जनविमुखता की ओर बढ़ सकती है।
इतिहास साक्षी है कि चाहे राजतंत्र रहा हो, औपनिवेशिक शासन रहा हो अथवा लोकतांत्रिक सरकारें — जब भी सत्ता ने स्वयं को जनता से ऊपर समझना शुरू किया, तब परिवर्तन अनिवार्य हुआ।
एक स्वस्थ लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नियमित जनमत, जवाबदेही और सत्ता परिवर्तन की संभावना में निहित होती है। इसलिए किसी भी जनप्रतिनिधि या सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह स्वयं को जनता का सेवक समझे, शासक नहीं।
राष्ट्रहित सर्वोपरि है, व्यक्ति या पद नहीं।”