स्वयंसेवक ब्रह्मपुर

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कभी थे अकेले हुए आज इतनेनही तब डरे तो भला अब डरेंगेविरोधों के सागर में चट्टान है हमजो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगेलिया हाथ म...
26/02/2026

कभी थे अकेले हुए आज इतने
नही तब डरे तो भला अब डरेंगे
विरोधों के सागर में चट्टान है हम
जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे
लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा
कदम बढ रहा है कभी न रुकेगा
न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा
निडर है सभी हम अमर है सभी हम
के सर पर हमारे वरदहस्त करता
गगन में लहरता है भगवा हमारा

न स्वार्थ का भाव, न दिखावे की राह,RSS चलता है सेवा और संस्कार की चाह।
08/02/2026

न स्वार्थ का भाव, न दिखावे की राह,
RSS चलता है सेवा और संस्कार की चाह।

"भोजशाला प्रतिबंधों से मुक्त होनीचाहिये। वह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।किसी भी राष्ट्र की जीवंतता उसकीधरोहरों से होती है ...
23/01/2026

"भोजशाला प्रतिबंधों से मुक्त होनी
चाहिये। वह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।
किसी भी राष्ट्र की जीवंतता उसकी
धरोहरों से होती है और भोजशाला भारत
की उसी गौरवमयी मेधा का प्रतीक है।"
मुनि तरुणसागर जी महाराज

#भोजशाला_में_वाग्देवी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सत्य -  बड़े लोगों की जुबानी !
19/01/2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सत्य -
बड़े लोगों की जुबानी !

एक आकस्मिक फोन कॉल, जब पीएमओ से श्रीगुरुजी को आया बुलावायह 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहा...
18/01/2026

एक आकस्मिक फोन कॉल, जब पीएमओ से श्रीगुरुजी को आया बुलावा

यह 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव राव 'गुरुजी' गोलवलकर के बीच हुए उस ऐतिहासिक संवाद और समन्वय की कहानी है, जिसने राष्ट्र को संकट के समय एक सूत्र में पिरो दिया था।

​सितंबर 1965 की एक दोपहर, श्रीगुरुजी भोजन के पश्चात विश्राम कर रहे थे। तभी एक संदेशवाहक ने सूचना दी कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) उनसे सम्पर्क करना चाहता है। मामले की गम्भीरता को देखते हुए गुरुजी तुरन्त फोन पर आए। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। शास्त्री जी ने संक्षिप्त शब्दों में राष्ट्र की परिस्थिति बतायी और कहा, "युद्ध चल रहा है, मुझे आपकी सहायता चाहिए। कल सुबह सर्वदलीय बैठक है, आप उसमें सादर आमंत्रित हैं।"

• ​"मैं राजनीतिज्ञ नहीं, कार्यकर्ता हूँ" : श्रीगुरुजी का स्पष्ट उत्तर

​शास्त्री जी के निमंत्रण पर श्रीगुरुजी ने विनम्रता से उत्तर दिया, "शास्त्री जी, मैं किसी राजनीतिक दल का नेता नहीं हूँ, मात्र एक संस्था का कार्यकर्ता हूँ।" शास्त्री जी ने उनकी बात स्वीकार की, लेकिन जोर देकर कहा कि देश इस समय एक ऐसे दौर में है जहाँ उन्हें श्रीगुरुजी के मार्गदर्शन और संघ के सहयोग की आवश्यकता है। श्रीगुरुजी ने तुरन्त सहमति दी, लेकिन नागपुर से सुबह तक दिल्ली पहुँचने की चुनौती थी। शास्त्री जी ने इसका प्रबन्ध पहले ही कर रखा था और उन्हें तुरन्त बॉम्बे (मुंबई) के लिए रवाना होने को कहा, जहाँ से उनके दिल्ली आने की विशेष व्यवस्था की गयी थी।

• ​सर्वदलीय बैठक : 'आपकी सेना' नहीं, 'हमारी सेना' कहिए

​7 सितंबर की उस ऐतिहासिक बैठक में एक दिलचस्प वाकया हुआ। बैठक में उपस्थित एक राजनैतिक दल के नेता बार-बार भारतीय सेना को 'आपकी सेना' (प्रधानमंत्री की सेना) कहकर संबोधित कर रहे थे। श्रीगुरुजी को यह बात खटक गयी। उन्होंने उस नेता को तब तक बीच में टोका, जब तक कि उन्होंने 'हमारी सेना' कहना शुरू नहीं किया। श्रीगुरुजी का मानना था कि युद्ध केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का होता है।

• ​राष्ट्र के नाम अपील : स्वयंसेवकों का रणघोष

​बैठक के अगले ही दिन, 8 सितंबर को श्रीगुरुजी ने देशवासियों और स्वयंसेवकों के नाम एक संदेश जारी किया। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि इस संकट की घड़ी में कानून-व्यवस्था बनाए रखने, घायलों की सेवा करने और जनता का मनोबल ऊंचा रखने के लिए सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करें। उन्होंने आह्वान किया कि जीत की इच्छाशक्ति हर नागरिक के भीतर जगनी चाहिए।

• ​युद्ध के मैदान में 'दूसरी सेना' : संघ का समर्पण

संघ स्वयंसेवक नागरिक प्रशासन की मदद में जुट गये साथ ही जब दिल्ली की पुलिस सीमावर्ती कार्यों में व्यस्त हुई, तो संघ के स्वयंसेवकों ने पूरी मुस्तैदी से शहर की ट्रैफिक व्यवस्था संभाली।

• ​हवाई पट्टियों की सफाई

कश्मीर में बर्फबारी के बीच हवाई पट्टियों से बर्फ हटाने का कठिन कार्य स्वयंसेवकों ने किया ताकि सैन्य विमान उड़ान भर सकें।

• ​रसद और सेवा

सैनिकों के लिए भोजन के पैकेट तैयार करने से लेकर अस्पतालों में रक्तदान करने तक, स्वयंसेवक हर मोर्चे पर सक्रिय रहे।

• ताशकंद और शास्त्री जी को अन्तिम विदाई

​युद्ध विराम के बाद जब शास्त्री जी रूस के ताशकंद जा रहे थे, तो गुरुजी ने उन्हें पत्र लिखकर समझौते के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपने सुझाव भेजे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। ताशकंद में शास्त्री जी के निधन की खबर मिलते ही गुरुजी सीधे गुवाहाटी से दिल्ली पहुँचे और अपने प्रिय प्रधानमंत्री को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की।

​1965 का यह कालखंड भारतीय इतिहास में 'जय जवान, जय किसान' के साथ 'राष्ट्रीय एकजुटता' का भी प्रतीक बना, जहाँ वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर नेतृत्व और संगठन ने राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा।।

भारत माँ के चरण कमल पर तन मन धन कर दे नौछावरसाधक आज प्रतिज्ञा कर ले जननी के इस संकट क्षण पर ॥धृ॥रुदन कर रहा आज हिमालय सि...
17/01/2026

भारत माँ के चरण कमल पर तन मन धन कर दे नौछावर
साधक आज प्रतिज्ञा कर ले जननी के इस संकट क्षण पर ॥धृ॥

रुदन कर रहा आज हिमालय सिसक रही गंगा की धारा
दग मग है कैलास शंभु का व्यथित आज बद्रिश्वर प्यारा
उधर सुलगती वन्हि शिखा लख भयकम्पित निज नन्दनवन है
अमरनाथ के पावन मंदिर पर अरियोंका कृद्ध नयन है
निज माता की लाज बचाने हम सब आज बने प्रलयंकर ॥१॥

मातृभूमी का कंकर कंकर आज महा शंकर बन जाये
थिरक उठे ताण्डव की गती फिर विश्व पुनः कम्पित हो जाये
खुले तीसरा नेत्र तेज से अरी दल सारा भस्मसात हो
चमके त्रिशूल पुनः करों में अरी षोणित से तप्तपात हो
जय के नारे गून्जे नभ में जले विजय का दीप घर घर ॥२॥

राणा के उस भीषण प्रण को आज पुनः हम सब दोहराए
त्यज देंगे सारा सुख वैभव जब तक माँ का कष्ट न जाए
क्या होगा माता के कारण अगर राष्ट्र के लिये मरेंगे
भूमी शयन घांसों की रोटी खाकर भी सब व्यथा हरेंगे
निश्चित होगी विजय सत्य की दुष्मन काँपेंगे थर थर थर ॥३॥

'गर्व से कहो, हम हिंदू हैं'भारतीय ज्ञान-परंपरा के ध्वजवाहक, विश्व मंच पर सनातन संस्कृति को पुनर्स्थापित करने वाले राष्ट्...
12/01/2026

'गर्व से कहो, हम हिंदू हैं'

भारतीय ज्ञान-परंपरा के ध्वजवाहक, विश्व मंच पर सनातन संस्कृति को पुनर्स्थापित करने वाले राष्ट्रप्रेरक युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन एवं 'राष्ट्रीय युवा दिवस' की सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

स्वामी जी के विचारों ने यह सिद्ध किया कि हिंदू धर्म मानवता के समग्र उत्कर्ष एवं कल्याण का सर्वोच्च मार्गदर्शक है।

आइए, 'राष्ट्रीय युवा दिवस' पर उनके विचारों को जीवन में धारण कर राष्ट्र सेवा और समाज-उत्थान के संकल्प को और दृढ़ करें।

✍️ 1997… संसद के भीतर वह दिन इतिहास की स्मृतियों में दर्ज हो गया, जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई ...
03/01/2026

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1997… संसद के भीतर वह दिन इतिहास की स्मृतियों में दर्ज हो गया, जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई थी।
पराजय का वह पल किसी और नेता को तो तोड़ देता — मगर अटल जी का व्यक्तित्व ही कुछ और था।

वह खड़े हुए… आवाज़ धीमी थी, मगर आत्मविश्वास पहाड़ जैसा—

“आज हमारी सरकार 1 वोट से गिर गई है। कांग्रेस हम पर हंस रही है… मगर मेरी बात कांग्रेस कभी न भूले — एक दिन ऐसा आएगा जब पूरे भारत में हमारी सरकार होगी, और तब पूरा देश कांग्रेस पर हंस रहा होगा।”

यह सिर्फ एक बयान नहीं था — यह दूरदर्शिता, साहस, और लोकतंत्र में अटूट विश्वास की घोषणा थी।

समय बदला… परिस्थितियाँ बदलीं… लेकिन अटल जी के शब्द वर्षों बाद हकीकत बनकर सामने आए।
छोटे कदमों से शुरू हुई यात्रा आज एक विशाल राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक बन चुकी है।

अटल जी ने सिखाया — हार अंत नहीं होती…
कभी-कभी हार ही वह चिंगारी बनती है,
जो आने वाले समय में इंतिहास बदल देती है।

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि, अटल जी सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं थे — वह दृष्टा, विचारक, और लोकतांत्रिक भारत की रीढ़ थे।

उनके शब्द आज भी प्रेरणा देते हैं- संघर्ष करो, धैर्य रखो… इतिहास तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।

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शताब्दी वर्ष..... लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगाकदम बढ रहा है कभी न रुकेगान सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगानिडर है सभी हम अ...
29/12/2025

शताब्दी वर्ष.....

लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा
कदम बढ रहा है कभी न रुकेगा
न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा
निडर है सभी हम अमर है सभी हम
के सर पर हमारे वरदहस्त करता
गगन में लहरता है भगवा हमारा🚩

संघ शताब्दी.... मैंने संघ को पहले जिया बाद में उसे समझा हैं, यह मेरे जीवन का अनुशासन हैं : प्रो. कल्पना शर्मा, कुलपति, ल...
28/12/2025

संघ शताब्दी....
मैंने संघ को पहले जिया बाद में उसे समझा हैं, यह मेरे जीवन का अनुशासन हैं : प्रो. कल्पना शर्मा, कुलपति, लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फिजिकल एजुकेशन, ग्वालियर

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