11/04/2026
भगता परब: एक जनजातीय परंपरा की पुकार
भगता परब – पहचान के कई नाम
भगता परब को अलग-अलग क्षेत्रों में कई नामों से जाना जाता है – चइत (छुइत) परब, मड़ा (मंडा) परब, चड़क पूजा, बिसु परब, और भी कई।
🌑 यह वैदिक परंपरा से जुड़ा पर्व नहीं है,
बल्कि यह एक शुद्ध आदिवासी (जनजातीय) सांस्कृतिक आयोजन है।
इसीलिए हिंदू मुख्यधारा में इसे नहीं मनाया जाता।
हाँ, कुछ दलित (शूद्र) समुदाय के लोग जो वर्षों से आदिवासियों के साथ रहते आए हैं,
उन्होंने भी इसे आस्था और सम्मान के साथ अपनाया है।
🌑 शिव नहीं, बुढ़ाबाबा की आराधना
समकालीन समाज में कई लोग भगता परब को 'शिव पूजा' मान लेते हैं,
लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
यह 'शिव' नामक हिंदू देवता की आराधना नहीं है,
बल्कि 'बुढ़ाबाबा', यानी आदिवासी समुदाय के आदि-पुरखों की सामूहिक श्रद्धांजलि (मरखि-छुत) का पर्व है।
अगर शिव और बुढ़ाबाबा एक होते,
तो हर शिवालय में भगता परब मनाया जाता।
पर ऐसा कभी नहीं होता।
शिव की पूजा शिवालय (मंदिर) में होती है,
जबकि बुढ़ाबाबा की आराधना मड़प-थान में की जाती है।
मुगल काल के दौरान, जब ब्राह्मणों को इस क्षेत्र में बसाया गया,
तो उन्होंने राजपुरोहित बनकर धीरे-धीरे जनजातीय परबों में भी
अपनी घुसपैठ शुरू कर दी।
भगता परब में पंडित या ठाकुर का आना इसका जीता-जागता प्रमाण है। जबकि आज तक किसी ब्राह्मण को भगता परब का “भगतिआ” बनते नहीं देखा गया।
वे इसे हमेशा राड़-चुआड़ों का परब कहकर अलग मानते रहे हैं।
🌑 विश्वविख्यात मानवशास्त्री H.H. Risley ने
अपनी कृति "The Tribes and Castes of Bengal (1891), Vol-1" में जनजातीय समाज में ब्राह्मणवादी प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। यह एक ऐसी पुस्तक है, जिसे हर शोधकर्ता और जनजागृत व्यक्ति को पढ़ना चाहिए।
आज कई आदिवासी परबों को
पौराणिक कथाओं और वैदिक प्रतीकों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यह एक सुनियोजित सांस्कृतिक षड़यंत्र का हिस्सा है – जिसका उद्देश्य जनजातीय समाज को गुलाम बनाना, उनकी अस्मिता और पहचान को मिटाना है।
जाँत, करम, जितिआ, सहराइ, टुसु, भगता –
इन सभी परबों के साथ यही प्रक्रिया चलाई जा रही है।
भगता परब की विधि और परंपरा
भगता परब एक शोक-पर्व है – जहाँ पुरखों की मरखि-छुत (मृत्यु तिथि) को सामूहिक रूप से मनाया जाता है।
इसकी तैयारी 15 दिन पहले से शुरू हो जाती है,
जिसे "धुमइल" यानी छुत-सूचना कहा जाता है।
दिनों का क्रम
1. पहला दिन – फलहार:
हल्का भोजन, मांसाहार निषेध, संयम की शुरुआत।
2. दूसरा दिन – उपवास और घाट उठाना:
नदी-तालाब से घाट उठाकर, रात भर गाजन और
छऊ-नाच के साथ जागरण।
3. तीसरा दिन – भगतिआ की तपस्या:
भगता पीठ और छाती में लोहे के हुक छेदवाकर
ऊँचे खूँटे से लटककर श्रद्धा अर्पित करता है।
4. चौथा दिन – तेल-हरइद और बलि:
भगता को हल्दी-तेल लगाया जाता है,
और मड़प थान में बलिदान देकर परब की समाप्ति होती है।
भगता परब केवल एक पर्व नहीं,
बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति, पूर्वजों की पुकार,
और हमारी पहचान की रक्षा का प्रतीक है।
✍️.... Mahadeo Dungriar