कुड़मि 81

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Department of Kudmali
@कुड़मि 81- Kudmi :- Mahato/Mahata/Mohanta
जय ग्राम देवता
कुड़मियो को अपना परब , त्योहार,
अपनी संस्कृति परब को बचाने हेतु इस पेज का निर्माण गया है किसी की आहत को ठेस पहुंचाने का हमे कोई मकशद नही है |

आप सभी को चड़क,भोक्ता बिशु परब की ढेर सारी शुभकामनाएं।जोहार बूढ़ा बाबा 🙏 #चड़क  #परब  #भोक्ता  #परब
14/04/2026

आप सभी को चड़क,भोक्ता बिशु परब की ढेर सारी शुभकामनाएं।
जोहार बूढ़ा बाबा 🙏
#चड़क #परब
#भोक्ता #परब

भगता_परब : कुंढ़ा-नाड़ा का अंतिम नेग(लेख: महादेव डुंगरियार |  )भगता परब के तीसरे दिन, यानी संक्रांति के दिन, "भगता घुरा"...
14/04/2026

भगता_परब : कुंढ़ा-नाड़ा का अंतिम नेग
(लेख: महादेव डुंगरियार | )

भगता परब के तीसरे दिन, यानी संक्रांति के दिन, "भगता घुरा" होता है। और अगले दिन तेल-हरइद तथा पुरखों को कुंढ़ा देने की परंपरा के साथ भगता परब का समापन होता है, जिसे कुड़मालि में "कुंढ़ा-नाड़ा" कहा जाता है।

इस दिन माँ या पत्नी उपवास रखती हैं और नहा-धोकर सात प्रकार के अनाज—
चावल, गेहूँ, चना, सेम, मकई, अरहर, मूंग—
को भूनकर ढेंकी में कूटती हैं। इससे बनने वाले कुंढ़ा में महुआ और आम भी मिलाया जाता है।

घर के बुजुर्ग पुरुष डुभा (मिट्टी का पात्र) में यह कुंढ़ा लेकर नदी या तालाब जाते हैं और अपने *पुरखों को जल में अर्पित* करते हैं। यह घर के भुत-पिंढ़ा और घर भीतर में भी अर्पित किया जाता है।

कुंढ़ा शब्द आज लुप्त होता जा रहा है। बहुत लोग इसे सत्तू कहने लगे हैं और 'सतुआ' शब्द प्रचलन में आ गया है।
याद रखें, यह भगता परब हमारे पुरखों की याद और सम्मान का पर्व है, जब उनके घाट उठते हैं। यही कुड़मालि संस्कृति की परंपरा है।

परंतु अब कुछ कुड़मी घराने पितृपक्ष के आर्य कर्मकांडों की ओर झुकने लगे हैं, जिससे हमारी मूल सांस्कृतिक पहचान खतरे में है।

अब समय है लौटने का...
अपने नेगाचारि (परंपरा) की ओर, अपने असल जड़ों की ओर।

नयी पीढ़ी को जोड़िए,
कुड़मालि संस्कृति को बचाइए।

5 साल बाद झारखण्ड लौटेंगे सिंदरी के पूर्व विधायक इंद्रजीत महतोअच्छी खबर - सिंदरी विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक इंद्रज...
11/04/2026

5 साल बाद झारखण्ड लौटेंगे सिंदरी के पूर्व विधायक इंद्रजीत महतो

अच्छी खबर - सिंदरी विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक इंद्रजीत महतो लगभग पांच वर्षों के लंबे अंतराल के बाद झारखंड लौटने वाले हैं। आगामी 14 अप्रैल को वे हैदराबाद से एयर एंबुलेंस के जरिए रांची पहुंचेंगे।
झारखंड वापसी के बाद वे सीधे अपने घर नहीं जाएंगे, बल्कि बोकारो स्थित मेडिकेंट हॉस्पिटल & रिसर्च सेंटर में चिकित्सकीय निगरानी में ही रहेंगे।
ज्ञात हो कि श्री महतो का कोरोना संक्रमित होने के बाद 17 अप्रैल 2021 से हैदराबाद के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था। अब स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद चिकित्सकों ने उन्हें यात्रा की अनुमति दे दी है।
जानकारी के अनुसार रांची एयरपोर्ट से लेकर बोकारो अस्पताल तक उनके स्वागत के लिए समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा विशेष कार्यक्रमों की तैयारी की जा रही है।
इधर इंद्रजीत महतो की वापसी की खबर से सिंदरी और धनबाद क्षेत्र में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। अपने नेता की वापसी को लेकर समर्थकों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है...

शिवाजी समाज के संस्थापक, झामुमो के संस्थापक सदस्य एवं वरिष्ठ झारखंड आंदोलनकारी स्वर्गीय टेकलाल महतो जी की जयंती पर उनको ...
11/04/2026

शिवाजी समाज के संस्थापक, झामुमो के संस्थापक सदस्य एवं वरिष्ठ झारखंड आंदोलनकारी स्वर्गीय टेकलाल महतो जी की जयंती पर उनको शत् शत् नमन 🙏
झारखंड आंदोलन में आपका योगदान और समाज के प्रति आपका समर्पण सदैव प्रेरणादायी रहेगा।

विनम्र श्रद्धांजलि

भगता परब: एक जनजातीय परंपरा की पुकारभगता परब – पहचान के कई नामभगता परब को अलग-अलग क्षेत्रों में कई नामों से जाना जाता है...
11/04/2026

भगता परब: एक जनजातीय परंपरा की पुकार
भगता परब – पहचान के कई नाम

भगता परब को अलग-अलग क्षेत्रों में कई नामों से जाना जाता है – चइत (छुइत) परब, मड़ा (मंडा) परब, चड़क पूजा, बिसु परब, और भी कई।

🌑 यह वैदिक परंपरा से जुड़ा पर्व नहीं है,
बल्कि यह एक शुद्ध आदिवासी (जनजातीय) सांस्कृतिक आयोजन है।
इसीलिए हिंदू मुख्यधारा में इसे नहीं मनाया जाता।
हाँ, कुछ दलित (शूद्र) समुदाय के लोग जो वर्षों से आदिवासियों के साथ रहते आए हैं,
उन्होंने भी इसे आस्था और सम्मान के साथ अपनाया है।

🌑 शिव नहीं, बुढ़ाबाबा की आराधना
समकालीन समाज में कई लोग भगता परब को 'शिव पूजा' मान लेते हैं,
लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
यह 'शिव' नामक हिंदू देवता की आराधना नहीं है,
बल्कि 'बुढ़ाबाबा', यानी आदिवासी समुदाय के आदि-पुरखों की सामूहिक श्रद्धांजलि (मरखि-छुत) का पर्व है।
अगर शिव और बुढ़ाबाबा एक होते,
तो हर शिवालय में भगता परब मनाया जाता।
पर ऐसा कभी नहीं होता।

शिव की पूजा शिवालय (मंदिर) में होती है,
जबकि बुढ़ाबाबा की आराधना मड़प-थान में की जाती है।
मुगल काल के दौरान, जब ब्राह्मणों को इस क्षेत्र में बसाया गया,
तो उन्होंने राजपुरोहित बनकर धीरे-धीरे जनजातीय परबों में भी
अपनी घुसपैठ शुरू कर दी।

भगता परब में पंडित या ठाकुर का आना इसका जीता-जागता प्रमाण है। जबकि आज तक किसी ब्राह्मण को भगता परब का “भगतिआ” बनते नहीं देखा गया।
वे इसे हमेशा राड़-चुआड़ों का परब कहकर अलग मानते रहे हैं।

🌑 विश्वविख्यात मानवशास्त्री H.H. Risley ने
अपनी कृति "The Tribes and Castes of Bengal (1891), Vol-1" में जनजातीय समाज में ब्राह्मणवादी प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। यह एक ऐसी पुस्तक है, जिसे हर शोधकर्ता और जनजागृत व्यक्ति को पढ़ना चाहिए।

आज कई आदिवासी परबों को
पौराणिक कथाओं और वैदिक प्रतीकों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यह एक सुनियोजित सांस्कृतिक षड़यंत्र का हिस्सा है – जिसका उद्देश्य जनजातीय समाज को गुलाम बनाना, उनकी अस्मिता और पहचान को मिटाना है।

जाँत, करम, जितिआ, सहराइ, टुसु, भगता –
इन सभी परबों के साथ यही प्रक्रिया चलाई जा रही है।

भगता परब की विधि और परंपरा
भगता परब एक शोक-पर्व है – जहाँ पुरखों की मरखि-छुत (मृत्यु तिथि) को सामूहिक रूप से मनाया जाता है।
इसकी तैयारी 15 दिन पहले से शुरू हो जाती है,
जिसे "धुमइल" यानी छुत-सूचना कहा जाता है।

दिनों का क्रम

1. पहला दिन – फलहार:
हल्का भोजन, मांसाहार निषेध, संयम की शुरुआत।

2. दूसरा दिन – उपवास और घाट उठाना:
नदी-तालाब से घाट उठाकर, रात भर गाजन और
छऊ-नाच के साथ जागरण।

3. तीसरा दिन – भगतिआ की तपस्या:
भगता पीठ और छाती में लोहे के हुक छेदवाकर
ऊँचे खूँटे से लटककर श्रद्धा अर्पित करता है।

4. चौथा दिन – तेल-हरइद और बलि:
भगता को हल्दी-तेल लगाया जाता है,
और मड़प थान में बलिदान देकर परब की समाप्ति होती है।

भगता परब केवल एक पर्व नहीं,
बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति, पूर्वजों की पुकार,
और हमारी पहचान की रक्षा का प्रतीक है।

✍️.... Mahadeo Dungriar

खुद जागरूक बनें, समाज को भी जागरूक करें — यही हमारी ताकत है।
11/04/2026

खुद जागरूक बनें, समाज को भी जागरूक करें — यही हमारी ताकत है।

चुआड़ विद्रोह के महानायक रघुनाथ महतो  अमर रहे।।।।।🙏chandankiyari 🙏🙏
05/04/2026

चुआड़ विद्रोह के महानायक रघुनाथ महतो अमर रहे।।।।।
🙏chandankiyari 🙏🙏

चुहाड़ विद्रोह के महानायक अमर सहिद रघुनाथ महतो की जयंती पर कोटि-कोटि नमन शहीद रघुनाथ महतो एवं चुआड़ विद्रोह में कुड़मि म...
05/04/2026

चुहाड़ विद्रोह के महानायक अमर सहिद रघुनाथ महतो की जयंती पर कोटि-कोटि नमन

शहीद रघुनाथ महतो एवं चुआड़ विद्रोह में कुड़मि महतो समुदाय की ऐतिहासिक भूमिका
📚 प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथों और शोधपत्रों की सूची

🔖 प्रशासनिक दस्तावेज़ एवं प्रारंभिक साक्ष्य:
1. "लेटर टू मिस्टर डाउडेसवेल"
➤ 29 जनवरी 1794 को राजस्व बोर्ड द्वारा मिदनापुर के एक्टिंग कलेक्टर को प्रेषित ऐतिहासिक पत्र।
🏛️ इतिहास ग्रंथ एवं स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित प्रकाशन:
2. बेली, एच.वी. – मेमोरांडा ऑफ मिदनापुर
➤ प्रकाशन वर्ष: 1902, कोलकाता।
3. नरेंद्रनाथ दास – मिदनापुर का इतिहास (खंड-1)
➤ प्रकाशन: 1956, मिदनापुर।
4. श्री ताराशंकर भट्टाचार्य – स्वाधीनता संग्राम में मेदिनीपुर
➤ प्रकाशक: भूतपूर्व राजबंदी ग्रंथालय, कोलकाता। जून 1973
5. बसंतकुमार दास – *स्वाधीनता संग्राम में मेदिनीपुर
➤ मुख्य वितरक: दे बुक स्टोर, कोलकाता। 1 अगस्त 1980।
6. श्यामापद भौमिक – मेदिनीपुर की रानी शिरोमणि और किसान विद्रोह
➤ प्रकाशक: सुवर्णरेखा, कोलकाता। सितंबर 1999
7. श्रमिक सेन – एक नज़र में पुरुलिया
➤ प्रकाशक: क्रिएटिव एसोसिएट्स, कोलकाता। अप्रैल 1999
8. दीपश्री प्रकाशन – *जिला मिदनापुर: स्वतंत्रता आंदोलन
➤ प्रथम प्रकाशन: 23 नवंबर 2001, तामलुक, पूर्व मिदनापुर।
9. धीरजमोहन भट्टाचार्य – मेदिनीपुर के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास (1760–1905)
➤ सूचना एवं संस्कृति विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार।
जनजातीय इतिहास एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से प्रकाशन:
10. बी.के. रॉय बर्मन – Tribes in Perspective
➤ प्रकाशक: मित्तल पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली। 1994
11. डॉ. पी. एन. चोपड़ा (संपादक) – भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष: सहायक आंदोलनों की भूमिका (खंड-3)
➤ भूमिका: श्री राजीव गांधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री), अगम प्रकाशन, दिल्ली। 1985
12. बी.के. मेहता – कुड़मालि चारी
प्रकाशन: 1989
13. डॉ. रामदयाल मुंडा एवं एस. बसु मुलिक – झारखंड आंदोलन
➤ प्रकाशन: कोपेनहेगन। 2003
14. आनंद भट्टाचार्य – Tribal-led People's Resistance in Transition: 1765–1800
➤ Ethnic Studies Review, खंड 36(1), वर्ष 2013
15. अमीनुल इस्लाम – मेदिनीपुर का किसान विद्रोह
➤ प्रकाशक: शिखा प्रकाशनी, कोलकाता। नवंबर 2019। ISBN: 978-984-484-610
शोधपत्र एवं शैक्षणिक दस्तावेज़:
16. डॉ. पी. पी. महाता का शोधपत्र
➤ अंतरराष्ट्रीय नृविज्ञान एवं मानवशास्त्र कांग्रेस, दिल्ली (10–16 दिसंबर, 1978)।
17. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC-NET)
➤ उल्लेख: 2010, 2014, 2019
18. झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC)
➤ वर्ष: 2007
🎓 पीएच.डी. शोधप्रबंधों में समावेश:
19. "चुआड़ विद्रोह: एक ऐतिहासिक अध्ययन (1765–1857)"
➤ शोधकर्ता: राजीव कुमार महतो, इतिहास विभाग, रांची विश्वविद्यालय। वर्ष: 2014। (पृष्ठ: 127–134)
20. "चुआड़ विद्रोह:: तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था"
➤ शोधकर्ता: विश्वनाथ मुखोपाध्याय, इतिहास विभाग, कल्याणी विश्वविद्यालय। वर्ष: 2010।
✊ आख़िर में एक स्पष्ट सन्देश:
💥 यदि किसी को कोई आपत्ति है — तो वे भारत के संविधान के अनुरूप न्यायालय में जाकर अपना पक्ष रखें।

Collected by Chitharai Mahato.

शहीद रघुनाथ महतो अमर रहें
05/04/2026

शहीद रघुनाथ महतो अमर रहें

अमर शहीद रघुनाथ महतो -चुहाड़ विद्रोह के प्रथम जननायक ।रघुनाथ महतो जी का जन्म 21 मार्च 1738 को तात्कालिक जंगल महल (वर्तमा...
05/04/2026

अमर शहीद रघुनाथ महतो -
चुहाड़ विद्रोह के प्रथम जननायक ।

रघुनाथ महतो जी का जन्म 21 मार्च 1738 को तात्कालिक जंगल महल (वर्तमान झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले ) के घुटियाडीह गांव में एक कुड़मि परिवार में हुआ । रघुनाथ महतो जी एक कुशल रणनीतिकार और अपनी माटी के प्रति समर्पित योद्धा थे । रघुनाथ महतो जी केवल एक समुदाय के नेता नहीं थे बल्कि वह भारत के उस स्वाभिमान के प्रतीक थे जिसे 1857 की क्रांति से भी लगभग 90 साल पहले अंग्रेजों की जड़े हिला दी थी ।
उनका विद्रोह और सहादत छोटा नागपुर पठार में चुहाड़ विद्रोह को आगे बढ़ाने एवं आने वाले अन्य आंदोलन जैसे कोल विद्रोह ,संथाल हुल के लिए प्रेरणा का स्रोत बन ।
रघुनाथ महतो जी के विद्रोह का कारण बना ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषणकारी नीतियों । 1765 में जब अंग्रेजों को बंगाल बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसुलने का अधिकार) मिली तो उन्होंने जंगल महल के इलाकों में भारी लगान लगा दिया । लगान में वृद्धि के कारण किसानों की उपज का बड़ा हिस्सा टैक्स में जाने लगा था ।
पारंपरिक जमींदारों और पाइकों ( स्थानीय सैनिकों ) की जमीन छीन कर बाहरी लोगों को दी जाने लगी थी ।
संस्कृत हस्तक्षेप के तहत अंग्रेजों ने स्थानीय स्वशासन और प्राकृति आधारित जीवन शैली में दखल देना शुरू कर दिया था ।
रघुनाथ महतो जी ने महसूस किया कि बिना एकजुट हुए फिरंगियों को बाहर नहीं निकाला जा सकता था । 1769 में उन्होंने नीमड़ीह के मैदान में हजारों लोगों को संबोधित करते हुए ऐतिहासिक नारा दिया :
" अपना गांव , अपना राज , दूर भगाओ विदेशी राज । "
यह नारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दौर के सबसे प्रभावशाली नारों में से एक माना जाता है ।
रघुनाथ महतो जी ने केवल भाषण नहीं दिया बल्कि एक छापामार दस्ता तैयार किया । उनके नेतृत्व में विद्रोहियों ने ब्रिटिश रसद सामग्री और कचहरियों पर हमले शुरू किए । तंग आकर ब्रिटिश अधिकारियों ने इस क्षेत्र के लोगों ( कुडमि ,भूइया, घटवार , भूमिज, मुंडा ) को नीचा दिखाने के लिए चुहाड़ ( लुटेरा /नीच ) का प्रयोग किया । रघुनाथ महतो जी ने इस अपमानजनक शब्द को ही अपनी क्रांति का पहचान बना लिया । समय के साथ उनका प्रभाव क्षेत्र वर्तमान मानभूमि , सिंहभूम और मेदिनीपुर तक फैल गया ।

ऐतिहासिक वृतांतों के अनुसार रघुनाथ महतो जी की मृत्यु एक विश्वासघात के कारण अंग्रेजों कि सेना से मुठभेड़ के दौरान हुई । 5 अप्रैल 1778 को जब वह अपने साथियों के साथ लोटा के जंगलों में एक गुप्त सभा कर रहे थे तब अंग्रेजों की सेना ने उन्हें घेर लिया निहत्थे होने के बावजूद उन्होंने कड़ा मुकाबला किया और अंग्रेजों की गोलियों का शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए ।

ब्रिटिश रिकॉर्ड्स , जिला गजेटियर और हंटर की "स्टैटिस्टिकल अकाउंट ऑफ़ बंगाल " में जंगल महल के विद्रोहियों का जिक्र है । जहां स्थानीय नेताओं द्वारा ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने की बात की कही गई है ।
कुड़माली और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लोकगीतों में रघुनाथ महतो जी के शौर्य का वर्णन आज भी मिलता है जो मौखिक इतिहास का सबसे मजबूत प्रमाण है ।
रघुनाथ महतो जी और चुआड़ विद्रोह के संबंध में ब्रिटिश कालीन दस्तावेजों की खोज एक चुनौती पूर्ण कार्य रहा है क्योंकि अंग्रेज अधिकारी रिकॉर्ड्स में भारतीय विद्रोहियों को अक्सर विद्रोही (rebal), डाकू (dacoit) या चुहाड़/चुआड़ (chuar / chuad) कह कर संबोधित करते थे ना कि हमेशा उनके पूरे नाम के साथ । हालांकि जंगल महल के गैजेटियर और सैन्य रिपोर्ट में रघुनाथ महतो जी के नेतृत्व में हुए विद्रोह के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं ।
यहां उन प्रमुख स्रोतों का विवरण है -
मेदिनीपुर और मानभूमि के डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स -
ब्रिटिश काल में एल.एस. एस. ओ मैली ( L.S.S.O MALLEY) द्वारा संकलित गजेट्स में 1769 से 1799 के बीच हुए विद्रोह का विस्तृत ब्यौरा है । इसमें स्पष्ट उल्लेखित है की कैसे 1769 मैं फागुन के महीने में नीमडीह के पास विद्रोहियों की एक विशाल सभा हुई थी । यद्यपि कुछ फाइलों में इन्हें " दंगे का नेता " कहा गया लेकिन स्थानीय इतिहासकार और शोधकर्ता उन विशिष्ट सैन्य रिपोर्ट का हवाला देते हैं जिसमें रघुनाथ महतो जी के दस्ते द्वारा ब्रिटिश रसद रोकने की बात कही गई है ।

"द एनल्स आफ रूरल बंगाल" डब्ल्यू . डब्ल्यू . हंटर -
विलियम विल्सन हंटर की यह पुस्तक 1868 में प्रकाशित हुई थी । यह ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर के विद्रोहों को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्रोत मानी जाती है । इसमें चुआड़ विद्रोह के उन चरणों का विवरण है जिसमें रघुनाथ महतो जी ने छापामार युद्ध पद्धति का उपयोग किया था । हंटर ने लिखा है कि कैसे आदिम जनजातियों और स्थानीय किसानों ने संगठित होकर कंपनी की सेना को छक्काया था ।

मिलिट्री डिस्पैचेस - कैप्टन मॉर्गन और लेफ्टिनेंट गुड़यार-
कैप्टन माॅर्गन के रिपोर्ट में " नीमडीह और पातकुम " क्षेत्र में सक्रिय विद्रोहियों का उल्लेख है । ऐतिहासिक शोध के अनुसार इन्हीं सैन्य पत्रचारों में रघुनाथ महतो जी के नेतृत्व वाले समूह को अत्यधिक खतरनाक बताया गया था जिसने ब्रिटिश टैक्स कलेक्टरों के लिए क्षेत्र में प्रवेश वर्जित कर दिया था ।

प्रसिद्ध इतिहासकार जे. सी. झा ने अपने पुस्तक " दी चुआड़ अप्राइजिंग आफ 1799" और उससे संबंधित शोध पत्रों के लिए पुराने ब्रिटिश अभिलेखागारों का अध्ययन किया । उनके शोध में यह स्पष्ट होता है कि 1769 का प्रथम चुहाड़ विद्रोह रघुनाथ महतो जी की रणनीतिक सूझबूझ का परिणाम था । उन्होंने पटना और कोलकाता के राज्य अभिलेखागारों में सुरक्षित जंगल महल के पुराने फाइलों से इन तथ्यों की पुष्टि की है ।
अदालती कार्यवाही और इकरारनामा के कुछ पुराने रिकॉर्ड्स में स्थानीय जमींदारों और ब्रिटिश सरकार के बीच हुए समझौता का जिक्र है, जहां रघुनाथ महतो जैसे प्रभावशाली स्थानीय नायकों के डर के कारण जमींदारों ने ब्रिटिश शर्तों को मानने से असमर्थता जताई थी ।

चुहाड़ विद्रोह के प्रथम चरण 1769 से 1778 को दबाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने सबसे अनुभवी सैन्य अधिकारियों और बटालियनों को तैनात किया था । रघुनाथ महतो महतो जी की छापामार रननीति इतनी सफल थी कि अंग्रेजों को कई बार पीछे हटना पड़ा ।
"लेफ्टिनेंट गुडयार" ( 1769 - 1770) वह पहला सैन्य अधिकारी था जिसने जंगल महल के विद्रोहियों जिनका नेतृत्व रघुनाथ महतो जी कर रहे थे को नियंत्रित करने का जिम्मा सोंपा गया था । गुडयार ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि स्थानीय लोग जिन्हें वह चुहाड़ कहता था , जंगलों और पहाड़ियों का लाभ उठाकर अचानक हमला करते हैं और गायब हो जाते हैं । 1769 में जब रघुनाथ महतो जी ने नीमडीह में सभा की तो गुडयार की सेना ने उन्हें रोकने की कोशिश की , लेकिन हजारों की संख्या में जुटे ग्रामीणों के सामने उसे रक्षात्मक रूप अपनाना पड़ा ।

" कैप्टन फॉर्ब्स " का अभियान कैप्टन फोर्ब्स को विशेष रूप से उन क्षेत्रों में भेजा गया था जहां रघुनाथ महतो जी का प्रभाव सबसे अधिक था । जैसे पातकुम और बड़ाभूम । फोर्ब्स की रिपोर्ट में उल्लेख है कि विद्रोहियों ने ब्रिटिश रसद को पूरी तरह काट दिया था । फोर्ब्स ने ही "जलाओ और नष्ट करो " की नीति अपनाई जिसके तहत विद्रोहियों की मदद करने वाले गांव को जला दिया गया । उसने अपनी चिट्ठियों में लिखा है कि विद्रोहियों का मनोबल तोड़ना कठिन है क्योंकि उन्हें स्थानीय किसानों का पूर्ण समर्थन प्राप्त है ।
1770 के दशक के शुरुआती वर्षों में " कैप्टन मॉर्गन " ने मेदिनीपुर और उससे सटे इलाके में कमान संभाली । माॅर्गन ने कोलकाता को भेजी अपने रिपोर्ट में बताया कि विद्रोही धनुष बाण और कुलहड़ियों से लैस होकर भी आधुनिक बंदूकों वाली ब्रिटिश सेना पर भारी पड़ रही है । माॅर्गन के पत्रों में एक अज्ञात विद्रोही समूह का जिक्र है जो ब्रिटिश कर संग्रहको की हत्या कर रहा था । इतिहासकार इसे रघुनाथ महतो जी के दस्ते के रूप में पहचानते हैं ।

"लेफ्टिनेंट नन " की भूमिका रघुनाथ महतो के शहादत के समय के सैन्य अभियानों में प्रमुख मानी जाती है ।
5 अप्रैल 1778 को जब रघुनाथ महतो जी लोटा में अपने साथियों के साथ राजनीतिक चर्चा कर रहे थे तब लेफ्टिनेंट नन के टुकड़ी ने गुप्त सूचना के आधार पर उस क्षेत्र को चारों ओर से घेर लिया था । ब्रिटिश मिलिट्री रिकॉर्ड्स के अनुसार इस मुठभेड़ में विद्रोहियों के मुख्य जत्थे को भारी नुकसान पहुंचाया गया था । रिपोर्ट में रघुनाथ महतो जी का नाम "बागी नेता" के रूप में दर्ज किया गया है । स्थानीय ऐतिहासिक शोध बताते हैं कि बागी नेता रघुनाथ महतो जी इसी मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए थे ।

ब्रिटिश अधिकारियों जैसे " कलेक्टर हिगिंसन और जे. प्राइस " के पत्राचारों से स्पष्ट होती है चुआड़ विद्रोह कोई छिटपुट दंगा नहीं बलिक की रघुनाथ महतो जी द्वारा संगठित एक " स्वतंत्रता युद्ध " था । " अपना गांव, अपना राज " का प्रभाव इतना गहरा था कि अंग्रेज अधिकारियों ने इसे " राजद्रोह " की श्रेणी में रखा । 1778 में रघुनाथ महतो जी की शहादत के बावजूद अंग्रेज इस विद्रोह को पूरी तरह शांत नहीं कर पाए जो आगे चलकर 1799 में दुर्जन सिंह जी के नेतृत्व पुनः भड़का ।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ब्रिटिश दस्तावेजों में चुहाड़ विद्रोहियों को एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया है । लेकिन इन दस्तावेजों में दर्ज स्थान नीमड़ीह , तिथि और विद्रोह की प्रकृति लोक गाथा रघुनाथ महतो जी से पूरी तरह मिलान कर स्थापित करती है ।

5 अप्रैल, पुण्यतिथि पर अमर शहीद , चुहाड़ विद्रोह के महानायक रघुनाथ महतो जी को श्रद्धांजलि।

✍️ Sanjay Kumar Banuaar

#अपना_गांव_अपना_राज

It is your kind information that Jharkhand Kudmali Bhasha Vikas Parishad Rakha , Asantalia Chakradharpur, West Singhbhum...
06/01/2026

It is your kind information that Jharkhand Kudmali Bhasha Vikas Parishad Rakha , Asantalia Chakradharpur, West Singhbhum
Organising
KUD.MALI TEACHING TRAINING CAMP
FROM 11 January 2026 to 13 January 2026
For Details please
Contact
Om Prakash Mahto 9934373420,
Ganeshwar Mahto 8340715812,
Shankar Lal Mahto 9661150695
Seats are limited,
Please Contact & Registere as soon as possible
Registration fee 200
Kudmali Books 500
Pudding and lodging for 3 days 800
Condition for training: intermediate pass from any faculty.
At the time registration please give the copy of Aadhar card and minimum qualification
सूचित किया जाता है कि दिनांक 11 जनवरी 2026 से 13 जनवरी 2026 तक 3 दिन का कुड़मालि शिक्षण प्रशिक्षण शिविर का आयोजन शहीद निर्मल महतो कुड़मि भवन में झारखंड कुरमाली भाषा विकास परिषद राखा आसनतलिया,चक्रधरपुर ,पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड में की जा रही है, प्रशिक्षण प्राप्त करने के इच्छुक अभ्यर्थी न्यूनतम इंटरमीडिएट पास होने चाहिए।
पंजीयन शुल्क-------- ₹200
पुस्तक-------------- 500
भोजन एवं रहने की व्यवस्था------------ 800
कुल ₹1500
सीटों की संख्या सीमित है,
कृपया पंजीयन करा कर अपना सीट सुरक्षित कर लें।
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Chas Bokaro
Bokaro Steel City
827010

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