04/04/2026
🙏*नम्र निवेदन, एक प्रार्थना*🙏
मार्गशीर्ष वदि नवमी संवत 1593 को गुरु जाम्भोजी ने अपनी लीला संवरण करते हुए लालासर साथरी में बैकुंठ धाम के लिए प्रस्थान किया और अपनी दिव्य देह भक्तों के संबल के लिए यहीं पर छोड़ दी। जिसे लेकर भक्तजन जाम्भोलाव के लिए रवाना हुए परन्तु बीकानेर के राजा राव जेतसी को इसका पता चल गया और उसने अगले दिन दसमीं को तालवा नामक स्थान पर उन्होंने उनको रोक लिया तथा देवजी को अपने देस बीकाणे का बताकर दूसरे राज्य में न ले जाने देने के लिए अड़ गए। भक्तों ने हरि इच्छा जानकर उस दिव्य देह के साथ वहीं विश्राम किया और निर्णय अगले दिन पर छोड़ दिया। रात्रि को संत निहालदासजी को स्वप्न हुआ की यह भूमि भी अति पवित्र है सदियों से ऋषि मुनियों ने यहां तपस्या की है, आप यहीं समाधि खोदकर नीचे कुछ दिव्य वस्तुओं की प्राप्ति के स्थान पर मुझे स्थापित कर दो।इस प्रकार अगले दिन एकादशी को तालवा गांव के निकट समाधि दी गई । गुरु जांभोजी का अंतिम ऐहिक मुकाम होने के कारण उनका समाधि- स्थान 'मुकाम' नाम से प्रसिद्ध हुआ-
सिरजणहारो साध का,सदा सुवांरै काम।
तकि जन आया ताळवै,मिलि थापियौ मुकाम।।
- (केसौजी)
उस समय साधुओं में गुरु जांभोजी के लाडले रणधीरजी बाबल मुख्य थे। इनका पंथ में बहुत आदर था। इन्होंने ही समाधि के 38 दिन बाद पोह सुदी दूज सोमवार को समाधि मंदिर की नींव रखी और 3 साल 3 महीना और 5 दिन में संवत 1597 के चैत सुदी सप्तमी शुक्रवार को मुख्य मंदिर बनकर तैयार हो गया। मंदिर रणधीरजी ने अपने अथक प्रयास, पंचायत और अन्य साधुओं की सहायता से बनाया था। बीकानेर के राव जेतसी ने भी इसमें सहायता की थी।
इस प्रकार मुकाम में आज से 490 वर्ष पूर्व एक अलौकिक मंदिर की नींव रखी गई थी और कालांतर में वह ऐसा ही बनकर तैयार भी हुआ। परन्तु गुरु भगवान और संतों द्वारा रचित ग्रंथों को भी उनका ही स्वरुप माना जाता है - 'गुरु मानियो ग्रंथ।' ऐसे गुरु और संतों की वाणी के साहित्य का भी एक मंदिर मुकाम में होना चाहिए,यह अभिलाषा सदैव जाम्भाणी साहित्य साधकों के मन में रही है। *अंतस की अरदास* को भगवान अवश्य सुनते हैं और उन्होंने हमारी सुन ली। 490 वर्ष बाद इस पावन भूमि पर एक दिव्य और भव्य साहित्य मंदिर बनकर तैयार हो रहा है।
490 वर्ष पूर्व हम नहीं थे और उस निज मंदिर के निर्माण में हम कोई योगदान नहीं दे सके परन्तु आज हरिकृपा से हमें यह सौभाग्य मिला है, अवश्य ही चूकना नहीं चाहिए। यह साहित्य मंदिर इतना महनीय बने की आने वाली पीढ़ियां यह सोचे की काश! हम भी उस समय साक्षी और सहयोगी रहे होते।
सभी जाम्भाणी साहित्य अनुरागियों को जैसा की विदित है कि सन् 2012 में स्थापित जाम्भाणी साहित्य अकादमी पर्यावरणीय चेतना और युक्ति- मुक्ति की संदेश वाहिनी गुरु जाम्भोजी की सबदवाणी और जाम्भाणी संत कवियों की वाणियों के संरक्षण,संवर्धन, प्रकाशन और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत है,अब तक चालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों, राष्ट्रीय संगोष्ठियों,बाल संस्कार शिविरों, जाम्भाणी साहित्य ज्ञान परीक्षा,शोध कार्यों आदि द्वारा जन-जन तक गुरु जाम्भोजी का संदेश पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। पिछली जाम्भाणी साहित्य ज्ञान परीक्षा में देशभर के पचास हजार परिक्षार्थी पंजीकृत हुए। समाज के सभी साधु-संत विद्वत प्रबुद्ध जन, भामाशाह अकादमी के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हृदय से सहयोग प्रदान कर रहे हैं। एक बड़े भव्य भवन में अकादमी का मुख्यालय बीकानेर में स्थापित है जहां से अकादमी गतिविधियां निरंतर संचालित होती है।
अब साहित्य अनुरागियों की दीर्घ काल से की जा रही मांग को देखते हुए अकादमी का साहित्य सदन मुकाम में बन रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग अकादमी की गतिविधियों का लाभ उठा सके। इस दिव्य और भव्य भवन में विद्वत संगोष्ठियों, धार्मिक प्रवचनों, सामाजिक कार्यक्रमों के लिए एक बहुत बड़ा कॉन्फ्रेंस हॉल जिसमें लगभग पांच सौ लोग एक साथ बैठ सके। जाम्भाणी साहित्य, संस्कारों, इतिहास और परंपरा को प्रर्दशित करती चित्र दीर्घा, पुस्तकालय, बुक स्टॉल, शोधकर्ताओं के रुकने की सुविधा के लिए कमरों का निर्माण किया जा रहा है। अकादमी चाहती है अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार हर घर की ईंट इसमें लगनी चाहिए और इसके लिए महनीय और अलौकिक कार्य को सम्पन्न करवाने में आपके सहयोग की अति आवश्यकता है। इसके लिए आप अपना सहयोग अकादमी के खाते (Jambhani Sahitya Akademi
7692000100000243
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Punjab National Bank
JNV Colony Bikaner) में जमा करवाकर इसकी सूचना अकादमी कार्यालय (9462232829) में अवश्य करें ।धन्यवाद।
🙏निवेदक🙏
महंत स्वामी डॉ सच्चिदानंद आचार्य ( प्रणयन प्रबोधक)
प्रो (डॉ) इंद्रा विश्नोई
(अध्यक्षा, अकादमी)
श्री राजाराम धारणियां
(निर्माण संयोजक)
श्री मोहनलाल लोहमरोड़
(उपाध्यक्ष, अकादमी)
डॉ बी एल बिश्नोई
(कोषाध्यक्ष, अकादमी)
विनोद जम्भदास
(महासचिव, अकादमी)
एवं समस्त अकादमी परिवार