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एक दिन पहले तक वो किसी और के जाने का दुख लिख रहे थे…और आज उनकी कहानी खुद एक याद बन गई है।कामरेड एडवोकेट नवरंग चौधरी को व...
28/04/2026

एक दिन पहले तक वो किसी और के जाने का दुख लिख रहे थे…
और आज उनकी कहानी खुद एक याद बन गई है।

कामरेड एडवोकेट नवरंग चौधरी को विनम्र श्रद्धांजलि

श्रीगंगानगर की धरती ने आज एक ऐसे सपूत को खो दिया, जिसकी कमी शायद ही कभी पूरी हो पाए। सीनियर वकील, माकपा नेता और जन आंदोलनों की अग्रिम पंक्ति में खड़े रहने वाले कामरेड एडवोकेट नवरंग चौधरी का आज निधन हो गया। यह खबर जितनी अप्रत्याशित है, उतनी ही दुखद भी।

सोशल मीडिया पर हमेशा सक्रिय रहने वाले Navrang Choudhary जी ने कल ही केसरीसिंहपुर के कामरेड सोहन सिंह मंडेर के निधन पर श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए एक भावुक पोस्ट लिखी थी। किसे पता था कि अगले ही दिन उन्हीं के लिए ऐसी ही श्रद्धांजलि लिखनी पड़ेगी। यह संयोग जीवन की नश्वरता का एक गहरा अहसास कराता है।

1954 में सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील के रोरू बड़ी गांव में जन्मे नवरंग जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की और उच्च शिक्षा श्रीगंगानगर व जयपुर में हासिल की। उनके जीवन का वैचारिक सफर भी बेहद रोचक रहा, नौवीं कक्षा में वे आरएसएस की शाखा से जुड़े लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हो गया। 1974 में उन्होंने सीपीएम की सदस्यता ग्रहण की और जीवन भर उसी विचारधारा के प्रति समर्पित रहे।

नवरंग जी का जीवन केवल विचारों तक सीमित नहीं था बल्कि वह सड़कों पर संघर्ष का पर्याय थे। श्रीगंगानगर में छात्रों, युवाओं, वकीलों, किसानों और मजदूरों के हर आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही। शहर के मुद्दों पर लड़े गए लगभग हर आंदोलन में उनकी भागीदारी रही। उन्होंने लाठियां खाईं, मुकदमे झेले और जेल यात्राएं भी कीं।

उनकी व्यक्तिगत जिंदगी भी उनके संघर्ष से अछूती नहीं रही। 6 मई 1981 को उनका विवाह होना था लेकिन उससे तीन दिन पहले बिजली समस्याओं के खिलाफ आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें अन्य कामरेडों के साथ गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। बाद में वरिष्ठ वकील कामरेड करनैल सिंह ने 3 से 15 मई तक उनकी अग्रिम जमानत करवाई, तब जाकर वे विवाह के बंधन में बंध सके। यह प्रसंग उनके जीवन के जज्बे और प्रतिबद्धता को बखूबी दर्शाता है।

नवरंग जी केवल आंदोलनों के नेता ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील और प्रतिबद्ध वकील भी थे। वे बार कौंसिल ऑफ़ राजस्थान के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने मजदूरों और जरूरतमंदों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ी। उन्होंने संगरिया के पास एक गांव के सिंचाई विभाग के श्रमिक नाजर सिंह का केस लेबर कोर्ट में लड़ा और उसे न्याय दिला बरसों बाद नौकरी पर रखवाया। आज भले ही नाजर सिंह इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी पत्नी को मिलने वाली मासिक पेंशन नवरंग जी के संघर्ष की गवाही देती है।

समाज के वंचित वर्गों के लिए उनके योगदान को देखते हुए राजस्थान सरकार ने वर्ष 2013 में उन्हें प्रतिष्ठित अम्बेडकर सामाजिक न्याय पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोगों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक उत्थान में योगदान देने वालों को दिया जाता है। इस सम्मान को प्राप्त करना उनके कार्यों की व्यापकता और समर्पण का प्रमाण है।

जब उनसे पूछा जाता था कि वे मार्क्सवादी क्यों बने तो उनका जवाब बेहद सरल लेकिन गहरा होता था। वे कहते, “एक इंसान के रूप में मुझमें जो भी अच्छा है, वह मार्क्सवादी विचारधारा की देन है।” वे मानते थे कि मार्क्सवाद के निरंतर अध्ययन और विचारों की साधना ने ही उन्हें बेहतर इंसान बनाया। हालांकि उन्हें इस बात का मलाल भी रहता था कि आज के कामरेड पहले जैसे नहीं रहे। कारों में घूमने और बड़ी कोठियों में रहने वालों को वे सच्चा कामरेड नहीं मानते थे।

नवरंग जी का व्यक्तित्व जितना संघर्षशील था, उतना ही सहज और मानवीय भी। वे अति विनम्र, मिलनसार और हमेशा हँसते-मुस्कुराते रहने वाले इंसान थे। उनकी खासियत थी कि वे रोते हुए व्यक्ति को भी हंसा देते थे। चुटकुले सुनाना और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करना उनकी आदतों में शामिल था। संघर्ष के बीच भी जीवन को हल्केपन से जीने का यह उनका अनोखा तरीका था।

आज नवरंग चौधरी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें, उनका संघर्ष, उनकी विचारधारा और उनके द्वारा छोड़ी गई प्रेरणाएं हमेशा जीवित रहेंगी। वे हमें सिखाकर गए हैं कि अपने हकों के लिए लड़ना ही असली जीवन है।

कामरेड एडवोकेट नवरंग चौधरी को शत-शत नमन।
लाल सलाम कामरेड।

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कामरेड अमराराम ने लोकसभा में भारत सरकार से सवाल किया कि केंद्र सरकार ने उद्योगपतियों का कितना कर्ज माफ किया?

भारत सरकार ने जवाब दिया है 25 लाख करोड रुपए।

यह जवाब भारत की संसद में दिया है।

मोदी सरकार 9.8 करोड़ यानी मोटा मोटी तौर पर 10 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि देती है।

यानी भारत में 10 करोड लोगों के पास खेती योग्य जमीन है।

अगर 25 लाख करोड रुपए को 10 करोड़ किसानों में विभाजित किया जाए तो प्रत्येक किसान का हिस्सा 2.5 करोड रुपए बनता है।

भारत के किसानों को 15 लख रुपए सालाना का झांसा देकर अमित शाह ने उद्योगपतियों का 25 लाख करोड रुपए माफ कर दिया।

इसी रकम से भारत का प्रत्येक किसान करोड़पति बन सकता था।

लेकिन भाजपा का झंडा उठाने वाली किसानी कौम के हिस्से में सिर्फ तालाबंदी गरीबी बेरोजगारी और बेगारी आई।

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