19/10/2022
प्रेमः एक लयपूर्ण संवाद
प्रेम को समझने के लिये पहले तुम्हें प्रेमपूर्ण होना चाहिए, केवल तभी तुम प्रेम को समझ सकते हो। लाखों लोग पीड़ित हैंः वे प्रेम किया जाना चाहते हैं लेकिन वे र्प्रेम करना नहीं जानते। और प्रेम एकालाप के रूप में नहीं रह सकता; यह संवाद है, बड़ा ही लयपूर्ण संवाद।
लोग तुम्हें जो देते हैं, वह तुम्हें तृप्त नहीं करता, तुम जो लोगों को देते हो वह तुम्हें तृप्त करता है। भिखारी होकर तुम संतुष्ट नहीं हो सकते सम्राट होकर तुम संतुष्ट होगे और प्रेम, जब तुम देते हो, तुम्हें सम्राट बनाता है।
तुम इतना अधिक दे सकते हो, अक्षय रूप से, कि जितना ज्यादा तुम देते हो उतना ही शुद्ध, उतना ही झंकृत, उतना ही सुगंधित तुम्हारा प्रेम होता जाता है।
जिस पल तुम समझते हो कि प्रेम क्या है- तुम अनुभव करते हो कि प्रेम क्या है- तुम प्रेम हो जाते हो। तब तुममें प्रेम पाने की जरूरत नहीं रह जाती, और तुममें यह जरूरत भी नहीं रह जाती कि तुम्हें प्रेमपूर्ण होना चाहिए, प्रेमपूर्ण होना तुम्हारा सहज, स्फूर्त अस्तित्त्व होगा, तुम्हारीश्वास-प्रश्वास।
तुम और कुछ कर ही नहीं सकते, तुम केवल प्रेमपूर्ण होगे।
अब यदि बदले में तुम तक प्रेम नहीं लौटता, तुम चोट नहीं महसूस करोगे, इस सरल से कारण से कि केवल वही व्यक्ति प्रेम कर सकता है जो स्वयं प्रेम हो गया हो। तुम केवल वही दे सकते हो जो तुम्हारे पास है।
लोगों से मांग करना कि वे तुम्हें प्रेम करें- लोग जिनके जीवन में प्रेम है ही नहीं, जो अपने अस्तित्त्व के उन स्रोतों तक पहुंचे ही नहीं है जहां प्रेम का मंदिर है... कैसे वे तुम्हें प्रेम कर सकते हैं? वे दिखावा कर सकते हैं। वे कह सकते हैं कि वे प्रेम करते हैं। वे इस ख्याल में भी हो सकते हैं कि वे प्रेम करते हैं। लेकिन देर-अबेर यह प्रगट होने वाला है कि यह केवल दिखावा है, कि यह केवल अभिनय है, कि यह केवल पाखंड है।
हो सकता है कि तुम्हें धोखा देने का इरादा भी न हो, लेकिन व्यक्ति कर ही क्या सकता है? तुम प्रेम मांगते हो और वह व्यक्ति भी र्प्रेम चाहता है। दोनों इसे समझते हैं- कि उनसे अपेक्षा है प्रेम अपेक्षा करने की, तो ही उन्हें प्रेम मिलेगा- तो दोनों ही प्रेम करने की हर कोशिश करते हैं। यह भावभंगिमा है- लेकिन कोरी भावभंगिमा। दोनों को इस बात का पता चल जाने वाला है और दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ शिकायत करने वाले हैं, कि यह ठीक नहीं है।
शुरू से ही दो भिखमंगे एक-दूसरे से भीख मांग रहे थे, और दोनों के पास केवल खाली भिक्षापात्र हैं।
अहंकार सबसे बड़ा बंधन है, एकमात्र नर्क जो मुझे पता है।
जिन लोगों ने प्रेम का स्रोत स्वयं के भीतर पा लिया है, उनको यह जरूरत नहीं रह जाती कि कोई उन्हें प्रेम करे- और उन्हें प्रेम किया जाएगा।
वे प्रेम किसी और कारण से नहीं करते बल्कि सिर्फ इसलिये कि उनके पास वह बहुत ज्यादा है- जैसे जल से भरा बादल बरसना चाहता है, जैसे फूल अपनी सुगंध लुटाना चाहता है, बिना कुछ मिलने की आकांक्षा के। प्रेम का पुरस्कार प्रेम करने में है, प्रेम पाने में नहीं।
और ये जीवन के रहस्य हैं कि यदि व्यक्ति प्रेम करने में ही प्रेम का पुरस्कार अनुभव करने लगे, तो बहुत लोग उसे प्रेम करेंगे, क्योंकि उसके संपर्क में आने से ही उन्हें धीरे-धीरे अपने स्वयं के भीतर के स्रोत का पता चलने लगता है। अब वे कम से कम एक व्यक्ति को जानते हैं जो प्रेम बरसाता है, और जिसका प्रेम किसी जरूरत से नहीं निकल रहा है। और जितना ज्यादा वह प्रेम बांटता और बरसाता है, उतना ही प्रेम बढ़ता है।
जीवन के विभिन्न आयाम-(प्रवचन-10)