01/05/2026
"श्रीयं परार्ध्यां विद्धद्विधातृजित् तमो निरस्यान्नभिभूतभानुभृत्।
नुदन्निदघं जितचारुचन्द्रमाः स वन्द्यते ऽर्हन्निह यस्य नोपमा॥"
अर्थात् उस अर्हत को यहाँ प्रणाम किया जाता है, जिसका कोई सादृश्य नहीं है, जो परम सुख प्रदान करने में सृष्टिकर्ता (ब्रह्म) से भी श्रेष्ठ है, जो अंधकार को दूर भगाने में सूर्य को भी पराजित करता है, और समस्त ज्वलनशील ऊष्मा को दूर करने में सुंदर चंद्रमा से भी श्रेष्ठ है।
यह पावन वंदन उन तथागत बुद्ध के प्रति है, जिन्होंने शांति, करुणा और अहिंसा के मार्ग से संपूर्ण मानवता का पथ प्रशस्त किया। राजसी वैभव का त्याग कर 'बोध' प्राप्त करने वाले सिद्धार्थ गौतम ने संसार को केवल दुखों से मुक्ति का मार्ग ही नहीं दिखाया, अपितु 'अप्प दीपो भव' के मंत्र के साथ स्वयं की अंतरात्मा को जागृत करने का संकल्प भी दिया।
वैशाख पूर्णिमा के पवित्र दिन जन्मे भगवान बुद्ध का जीवन दर्शन जाति, वर्ण हर प्रकार के भेदभाव से परे एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज की नींव रखता है। उनके विचार आज भी हमें घृणा पर विजय पाने और प्राणी मात्र के प्रति दया रखने की प्रेरणा देते हैं।
तूर्यनाद समिति की ओर से मध्यम मार्ग के प्रणेता एवं मानवता के उद्धारक तथागत बुद्ध को कोटि-कोटि नमन।