23/08/2026
वन्दे मातरम् केवल गीत नहीं, भारत की प्राण-चेतना और अखंड राष्ट्रीयता का महामंत्र है : श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव
भोपाल: यंग थिंकर्स फोरम (YTF) के तत्वावधान में स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी, भोपाल में प्रख्यात चिंतक, लेखक, पूर्व आईएएस अधिकारी एवं मध्य प्रदेश के राज्य निर्वाचन आयुक्त श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव के व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय उनकी पुस्तक 'वन्दे मातरम्: एक क्रांतिगीत का साहित्येतिहासिक अध्ययन' पर आधारित था। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश श्री अशोक पाण्डे ने की, जिसमें शहर के साहित्यकार, बुद्धजीवी, शिक्षकों व युवाओं ने सहभागिता की।
श्री श्रीवास्तव ने अपने उद्बोधन में वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक, साहित्यिक, दार्शनिक और संवैधानिक पहलुओं का विशद विश्लेषण करते हुए इसके वास्तविक स्वरूप और सामर्थ्य को रेखांकित किया।
उद्बोधन के प्रमुख बिंदु -
‘वन्दे मातरम् और 'आनंदमठ' का कालक्रमिक यथार्थ’
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वन्दे मातरम्' की रचना 1875 में की थी, जबकि उनका उपन्यास 'आनंदमठ' 1882 में प्रकाशित हुआ। गीत की रचना उपन्यास से 7 वर्ष पूर्व स्वतंत्र रूप से हुई थी; अतः उपन्यास की कथावस्तु के आधार पर मूल गीत के भाव को खारिज करना ऐतिहासिक रूप से सर्वथा अनुचित है।
‘वन्दे मातरम् मंत्र की अखंडता और विभाजन का ऐतिहासिक प्रभाव’
किसी भी मंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी समग्रता और अखंडता में होती है। 1875 से 1937 तक यह गीत अखंड रूप में गाया गया। इसकी सामूहिक ऊर्जा का ही प्रभाव था कि ब्रिटिश हुकूमत को 1911 में 'बंग-भंग' का निर्णय वापस लेने पर बाध्य होना पड़ा। पर जब 1937 में इस गीत को खंडित किया गया, उसके ठीक 10 वर्ष बाद देश और बंगाल दोनों का विभाजन हो गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी आज़ाद हिंद फ़ौज में सभी पंथों और आस्थाओं के सैनिकों के साथ मिलकर वन्दे मातरम् के सभी छंदों का सस्वर गान कराया था।
‘गीत को खंडित करना असंवैधानिक’
श्री श्रीवास्तव ने कानूनी तर्क देते हुए कहा कि संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर का दर्जा दिया था और इसे ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला गीत बताया था। किसी भी संवैधानिक संस्था ने इसे दो छंदों तक सीमित करने का निर्णय नहीं लिया था।
‘काव्य-शिल्प: प्रकृति, जन और संस्कृति का समन्वय’
वन्दे मातरम् का संपूर्ण स्थापत्य तीन प्रमुख तत्वों से मिलकर बना है:
प्रकृति: 'सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्'
जन : 'कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनाद कराले'
संस्कृति: 'त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी'
गीत को खंडित करने से जन और संस्कृति के तत्व छूट जाते हैं, जिससे राष्ट्र केवल एक निर्जीव भौगोलिक संरचना बनकर रह जाता है।
‘काव्य-बिंब (Imagery) और दार्शनिक आयाम’
गीत में उल्लिखित दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संदर्भ मूर्तियों के नहीं, बल्कि उच्चतर काव्य-बिंब (Cultural Imagery) हैं, जो शक्ति, समृद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं। साहित्यिक दृष्टि से बिंब चेतना में ऊर्जा का संचार करते हैं।
‘औपनिवेशिक दुष्प्रचार को बंकिम का करारा उत्तर’
श्री श्रीवास्तव ने गीत के गूढ़ शब्दों की व्याख्या करते हुए बताया कि इनमें भारत का पूरा ऐतिहासिक अनुभव छिपा है:
• बहुबलधारिणी: जेम्स मिल, चार्ल्स डिल्के, सेसिल रोड्स और लॉर्ड कर्जन जैसे औपनिवेशिक विचारकों ने भारतीयों को शारीरिक रूप से दुर्बल, कायर और स्त्रैण (Effeminate) उनके प्रचारित कर शासन को सही ठहराने का प्रयास किया था। बंकिम ने 'अबला केन मा एतो बले' और 'बहुबलधारिणीम्' के माध्यम से भारत को उसकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराया। यह स्वामी विवेकानंद और गीता के उस संदेश के समान था जो कायरता और दुर्बलता को त्यागकर आत्मबल जगाने का आह्वान करता है।
• रिपुदलवारिणी: यह शब्द भारत के ऐतिहासिक शत्रु बोध (Oppositional consciousness) का परिचायक है, जो सदियों के आक्रमणों और संघर्षों से उपजा है।
• भूषिताम्: अंग्रेज भारत को अपने मुकुट का रत्न (Jewel in the Crown) मानते थे और उसका वस्तुकरण (Commodification) करते थे। बंकिम ने भारत माता को ‘भूषिताम’ (स्वयं आभूषित) कहकर स्पष्ट किया कि भारत किसी का सजावटी सामान नहीं, सजीव, जाग्रत चेतना है।
• त्वम् हि प्राणाः शरीरे: उपनिषदों (छांदोग्य एवं बृहदारण्यक) में प्राण को सर्वोच्च चेतना माना गया है। जब नागरिक राष्ट्र को अपने शरीर में बहते 'प्राण' की तरह अनुभव करते हैं, तब राष्ट्रहित के लिए बलिदान देना कोई एहसान नहीं बल्कि स्वाभाविक जैविक दायित्व बन जाता है।
विश्व के राष्ट्रगानों से तुलना और संप्रभुता का बोध
• विश्व भर के राष्ट्रगानों—जैसे अज़रबैजान, मॉरीशस, मिस्र, चिली आदि में देश को 'माता' के रूप में संबोधित किया गया है। बांग्लादेश के राष्ट्रगान में भी 'माता' शब्द का चार बार उल्लेख है। भारत में राष्ट्र को मातृरूप में देखने पर आपत्ति जताना औपनिवेशिक हीनग्रंथि और विरोधाभासी मानसिकता का परिचायक है।