05/12/2025
सल्तनत से लोकतंत्र तक — दलित पीड़ा और सामाजिक क्रांति की अंतहीन निरंतर यात्रा चलती रहना है ।
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*हे अंबेडकर!!!*
*आज भी कुछ चेहरे “*बराबरी की बात करने पर सुलगने क्यों लगते हैं ।?*
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*06 दिसंबर,बाबा साहेब की पुण्य तिथि पर विशेष ।*
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भारत की सभ्यता जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी यहाँ सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव की जड़ें भी हैं। समय बदला, सत्ता बदलती रही, राजवंश आए और गए — पर इस धरती के सबसे पीड़ित वर्ग की आँखों में जलते हुए दुःख और उनके शरीर पर पड़े अपमान के निशान कभी नहीं बदले। दलितों का इतिहास केवल उत्पीड़न का इतिहास नहीं है, यह उस निरंतर संघर्ष का इतिहास भी है जिसने आधुनिक भारत को उसके नैतिक विवेक से जोड़ा। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसी सच्चाई को शब्द देते हुए कहा था — “सत्ता परिवर्तन समाज परिवर्तन की गारंटी नहीं देता।” यह वाक्य भारतीय इतिहास की तीन शक्तिशाली सल्तनतों पर हूबहू लागू होता है — दिल्ली सल्तनत, मुग़ल साम्राज्य और ब्रिटिश राज।
दिल्ली सल्तनत के शासन से पहले ही भारतीय समाज जाति-आधारित उत्पीड़न से ग्रसित था। कुछ जातियाँ शुद्ध, कुछ अपवित्र; कुछ देवत्व के करीब, कुछ मनुष्यों से भी दूर। अस्पृश्यता केवल एक व्यवहार नहीं थी, वह एक ऐसी दीवार थी जिस पर दलितों की हर उम्मीद टकराकर टूट जाती थी। जब तुर्क और अफ़ग़ान शासक भारत आए, उन्होंने प्रशासन, राजकोष और सेना को बदला, पर समाज की जातिगत संरचना को यथावत रहने दिया। इतिहासकार मोहम्मद हबीब लिखते हैं — “सल्तनत की राजनीति बदली, पर समाज नहीं बदला।”
दलितों के हिस्से वे सारे काम आए जिन्हें समाज “अशुद्ध” घोषित करता था। शव-संसाधन, चमड़ा कार्य, सफाई, बेगारी — यह सब सल्तनती ढांचे की रीढ़ थे, किन्तु उन्हें सामाजिक दर्जा नहीं मिला। उनका श्रम दिखता था, उनका अस्तित्व नहीं। इतिहासकार इरफ़ान हबीब के शब्दों में — “उनके श्रम की कीमत थी, पर उनके जीवन की कोई कीमत नहीं थी।” शहरों की रौनक बढ़ी, कारीगरी के नए अवसर आए, लेकिन दलितों के लिए सामाजिक दरवाजे वैसे ही बंद रहे।
बाद में मुग़ल शासन आया, जिसे इतिहास भारतीय कला, संस्कृति और प्रशासन का स्वर्णकाल कहता है। पर समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग उसी अंधेरे में रहे। ताजमहल, लालक़िला, फतेहपुर सीकरी — इन इमारतों की सुंदरता का गुणगान इतिहास करता है,
पर इन पत्थरों के नीचे छिपे दलित मजदूरों का खून और पसीना कभी दिखाई नहीं देता।
अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक उदारता दिखाई, पर जातिगत भेदभाव को नहीं छुआ। कारण स्पष्ट था — जाति हिंदू समाज का आंतरिक ढांचा थी, और शासकों ने इसे “स्थानीय परंपरा” मानकर छोड़ दिया। ज्योतिराव फुले ने ठीक ही लिखा — “शासन बदलता रहा, पर शूद्र-अतिशूद्रों की गुलामी स्थायी रही।”
कारीगरी, हथकरघा, धातुकर्म — इन सभी क्षेत्रों में दलित समुदायों के कौशल से साम्राज्य मजबूत हुआ, पर उन्हें न सम्मान मिला, न बराबरी। पूजा स्थलों से दूरी, कुएँ तक पहुँच पर रोक, गाँव की व्यवस्था में मानव से नीचा दर्जा — ये सब इस युग में भी जस के तस रहे। गांधी ने आगे चलकर इसी क्रूरता को “मानवता के माथे पर कलंक” कहा।
अंग्रेज़ों के भारत में आगमन के साथ जाति-व्यवस्था को नया रूप मिला — वह प्रशासनिक दस्तावेज़ बन गई। 1871 से शुरू हुई जनगणना के साथ अंग्रेज़ों ने भारतीय समाज को जातियों की सूची में बाँधना शुरू किया। ब्रिटिश इतिहासकार Nicholas Dirks ने सटीक विश्लेषण किया —
“The British did not create caste, but they re-cast caste into a rigid administrative system.”
अर्थात — ब्रिटिशों ने जाति को जन्म नहीं दिया,
लेकिन उसे शासन की स्थायी जंजीर बना दिया।
Criminal Tribes Act जैसी नीतियों ने कुछ जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। जन्म लेते ही अपराधी! यह उत्पीड़न का सबसे संस्थागत रूप था। स्कूल, नौकरी, कानूनी पहचान — हर स्तर पर जाति एक मुहर बनकर चिपक गई। डॉ. अंबेडकर ने इस युग को विश्लेषित करते हुए कहा —
“जाति एक ऐसी जेल है जिसमें जन्म होता है और मृत्यु भी।”
दलितों की पीड़ा केवल आर्थिक नहीं रही, यह अस्तित्वगत बन गई।
उनके घर समाज से बाहर,
उनके बच्चे शिक्षा से बाहर,
उनके शव तक श्मशानों के बाहर।
ब्रिटिश राज का यह अध्याय जातिगत दमन का शिखर था,
पर — और यही इतिहास का सौभाग्य है —
इसी काल में दलित चेतना की सबसे तीव्र लहर भी उठी।
19वीं–20वीं सदी में
फुले, सावित्रीबाई, पेरियार, स्वामी अछूतानंद —
और फिर डॉ. भीमराव अंबेडकर —
ने जाति के खिलाफ संगठित विद्रोह की लौ जलाई।
भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता 1947 में मिली,
पर दलितों की असली लड़ाई तो थी मानव होने की लड़ाई।
संविधान सभा में अंबेडकर की कलम ने वह इतिहास बदल दिया,
जहाँ Article 17 के जरिए अस्पृश्यता को अपराध करार दिया गया।
यह भारतीय इतिहास का पहला क्षण था
जब राष्ट्र ने अपने ही अत्याचार को स्वीकार कर उसे समाप्त करने का संकल्प लिया।
भारत आज लोकतंत्र पर गर्व करता है,
पर लोकतंत्र की यह जड़ें दलित आंदोलन के खून और बलिदानों में सिंचित हैं।
उन्होंने भारत को सिखाया —
“समानता उपहार नहीं, अधिकार है।”
किन्तु एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है —
क्या केवल क़ानून बदलने से सदियाँ पुरानी मानसिकता बदल जाती है?
उत्तर — दुःखद है — नहीं।
आज भी वह दलित बच्चा स्कूल में सबसे आख़िरी पंक्ति में बैठता है,
आज भी सफाईकर्मी महिला का छूने से पानी का घड़ा बदल दिया जाता है,
आज भी पूजा स्थलों पर उनका प्रवेश विवाद बना रहता है।
इतिहास की परछाइयाँ आज भी हमारे समाज की दीवारों पर जीवित हैं।
दलितों की लड़ाई केवल बीते समय की लड़ाई नहीं है,
यह भारत के भविष्य की लड़ाई है।
क्योंकि जब तक समाज की आत्मा पर लगे घाव नहीं भरेंगे —
भारत पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होगा।
यही वह संदर्भ है जिसमें आज की समरसता की आवाज़ें महत्त्वपूर्ण बन जाती हैं।
किसी भी देश में सामाजिक एकता तब बनती है
जब “हम” की परिभाषा में हर व्यक्ति शामिल हो,
और जाति उस “हम” को सबसे पहले तोड़ देती है।
इसीलिए जब कोई व्यक्ति
जातिगत विषमता मिटाने की बात करता है,
तो वह भारत के भविष्य की बात करता है।
श्री संतोष वर्मा (IAS) ने भरे मंच से
जब समग्र समाज में “रोटी-बेटी व्यवहार” की बात कही,
तो भारत और प्रदेश के कुछ चुनिंदा व्यक्तियों,
कुछ समाचार पत्रों, कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आँखों से
मानो अंगार बरसने लगे —
जैसे वे उन अंगारों में ही
श्री वर्मा को बार-बार झुलसाना चाहते हों,
भस्म कर देना चाहते हों।
विडंबना देखिए —
जिसने समरसता की बात की,
उसे ही विभाजनकारी बताने की कोशिश हुई।
समाज का जो हिस्सा आज भी
जातिगत वर्चस्व को जीवन-मरण का प्रश्न मानता है,
वह समानता की हर आवाज़ को
अपने सिंहासन के ख़िलाफ़ विद्रोह समझ लेता है।
भारत विकसित देश कब बनेगा?
शायद तब…
जब सदियों से चली आ रही इन संकीर्ण राहों का कहीं अंत होगा,
और मानवता उन अँधेरी गलियों से बाहर निकलकर
एक उजले राष्ट्र के द्वार पर खड़ी होगी।
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