Ajjaks, Madhya Pradesh

Ajjaks, Madhya Pradesh AJJAKS MP is the Scheduled Caste and Scheduled Tribe, OBC Officers and Employees Association. It works on the principle enriched in our Constitution.

06/12/2025
06/12/2025

*डॉ अंबेडकर जी की पुण्य तिथि 06 दिसंबर पर विशेष.*
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*हे अंबेडकर, आज भी तुम्हारी आवाज़ गूँजती है — अब अछूत नहीं, संविधान हैं हम*.
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भारत के इतिहास में दो विदेशी यात्रियों — फाहियान (5वीं सदी) और ह्वेनसांग/हेनसांग (7वीं सदी) — ने जिस समाज को अपनी आँखों से देखा और दस्तावेज़ में लिखा, वह हमें यह समझने पर मजबूर करता है कि इस देश की सभ्यता जितनी महान कही जाती है, उतनी ही गहरी और निर्दय जातिगत दरारें भी इसमें मौजूद थीं। उन्होंने एक ऐसे भारत का वर्णन किया जहाँ कुछ मनुष्य देवताओं की तरह पूजे जाते थे, और कुछ मनुष्यों को मनुष्य माना ही नहीं जाता था। यह केवल वर्ण व्यवस्था नहीं, बल्कि एक संगठित अमानवीय प्रणाली थी, जिसने लाखों–करोड़ों लोगों के जीवन को जन्म से मृत्यु तक अपमान की बेड़ियों में बाँध दिया।

*फाहियान के अनुसार, भारत में चार वर्णों का ढाँचा स्पष्ट रूप में विद्यमान था। लेकिन इस ढाँचे के नीचे ऐसा वर्ग था जिसका नाम ही “अछूत” था — जिन्हें चांडाल कहा जाता। उनकी बस्तियाँ नगर की सीमा से बाहर थीं। यदि वे शहर में प्रवेश करते, तो एक लकड़ी की थाली या घंटी बजानी पड़ती ताकि ऊँची जाति के लोग दूरी बना सकें। यह केवल दूरी नहीं, बल्कि यह संदेश था कि वे दूषित हैं, और उनकी छाया तक से सावधान रहो। यह सोच किसी नैतिकता या धर्म की नहीं, मानवता के साथ विश्वासघात की थी।*

हेनसांग ने भारत में यही वास्तविकता और अधिक कठोर रूप में देखी। जन्म ही उनका अपराध था। उनके घर गाँव के अंत में, या बिल्कुल बाहर। उनके हिस्से में ज्ञान नहीं, केवल श्रम। मृत पशुओं की खाल उतारना, मृतक उठाना, मैला ढोना — इन्हें पेशा नहीं, उनके अस्तित्व का भाग बना दिया गया। मंदिर, तालाब, कुएँ — सबके द्वार बंद। ऊँची जातियों के सामने आने पर रास्ता बदलना। अछूत की छाया तक “अशुद्ध” घोषित। यह उस समय के समाज की निर्मम सच्चाई थी कि मनुष्य की गरिमा जन्मपत्री देखकर तय होती थी।

*सोचिए, एक मासूम शिशु जन्म लेते ही अपराधी घोषित हो जाए, बिना कुछ किए ही वह अपमानित हो जाए — तो उसके लिए जीना कैसा रहा होगा? वह जहाँ पैदा होता, वही उसका पिंजरा तय कर दिया जाता। उसके सपनों का कोई अधिकार नहीं था। शिक्षा उसकी किस्मत में नहीं थी। वह श्रम करता, पर श्रमिक नहीं — वह सबका बोझ उठाता, पर किसी का सम्मान नहीं। प्रेम के द्वार भी बंद। यदि किसी ऊँची जाति की लड़की से प्रेम कर ले, तो हत्या को भी “सम्मान” का नाम दिया जाता। प्यास हो जाए तो भी ऊँची जाति के कुएँ से पानी लेना पाप। भूख लग जाए तो भी भोजन के पात्र तक स्पर्श की इजाज़त नहीं।*

इतना सब झेलकर भी वे जीते रहे, क्योंकि मरने का अधिकार भी समाज के हाथ में था। यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, यह सदियों तक चले व्यवस्थित अत्याचार का इतिहास है। यह इतिहास कहता है कि भारत में कुछ लोग जन्म से श्रेष्ठ, और कुछ जन्म से ही अपमानित घोषित कर दिए गए। यह अमानवीय स्थिति न किसी देवता की देन थी और न किसी प्रकृति की — यह मनुष्यों द्वारा बनाई गई संरचना थी, जिसने मनुष्यों को ही मनुष्य होने से वंचित कर दिया।

लेकिन इसी इतिहास के संघर्षपूर्ण अंधकार में एक ऐसा प्रकाश प्रकट हुआ, जिसने यह व्यवस्था चुनौती दी। डॉ. भीमराव अम्बेडकर — एक ऐसा नाम, जो इस पीड़ा की राख से उठकर प्रतिरोध की ज्वाला बना। उन्होंने जीवन में स्वयं यह अपमान झेला। पानी पीने की मनाही, स्कूल में अलग बैठना, रास्ता बदलना, मंदिर के बाहर खड़े रहना। पर इस असहनीय यातना ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक अटूट संकल्प की शक्ति दी।

*भारतीय संविधान की संरचना करते हुए, अम्बेडकर ने उन सभी जंजीरों को क़ानूनी रूप से तोड़ दिया जिन्होंने सदियों से जाति के नाम पर मानवता को कैद कर रखा था। उन्होंने समानता को कानूनी अधिकार बनाया, अवसरों को जन्म नहीं, प्रतिभा से जोड़ा, और अछूतता को अपराध घोषित कर दिया। अब कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता था कि कुछ लोग छूने योग्य नहीं। अब कोई भी यह नहीं मान सकता था कि किसी का पेशा जन्म बताता है। अब कोई भी मंदिर का दरवाज़ा किसी से केवल जाति के आधार पर बंद नहीं कर सकता था। यह केवल कानून नहीं था — यह मानव गरिमा का पुनर्जन्म था।*

लेकिन अम्बेडकर की सबसे बड़ी उपलब्धि यही नहीं थी कि उन्होंने क़ानून लिखा, बल्कि यह कि उन्होंने समाज की आत्मा को झकझोर दिया। उन्होंने दुनिया के सामने यह सत्य रखा कि “मनुष्य बराबर है, क्योंकि वह मनुष्य है” — इससे अधिक कोई प्रमाण आवश्यक नहीं।

*आज सवाल यह नहीं कि संविधान क्या कहता है — आज सवाल यह है कि समाज क्या करता है। आज भी खबरें आती हैं कि किसी ने दलित के साथ भोजन करने से इंकार किया, मंदिर में प्रवेश रोका गया, प्रेम करने पर हत्या कर दी गई। इसका अर्थ यह है कि अछूतता कानून में मर गई है, पर समाज में उसका भूत अभी भी ज़िंदा है। जब तक सामाजिक चेतना में बदलाव नहीं आता, डॉ. अम्बेडकर के सपने अधूरे रहेंगे।*

हमारे लिए यह याद रखना आवश्यक है कि फाहियान और हेनसांग ने जिस अन्याय को देखा था, वह संयोग नहीं था — वह सामाजिक ढाँचे में गहरे उतरा हुआ सच था। और डॉ. अम्बेडकर ने उस ढाँचे को केवल कानूनी रूप से ध्वस्त नहीं किया, बल्कि हमें यह अवसर दिया कि हम एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और मानवीय भारत बना सकें।

*इसलिए आज हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम संविधान की उस आत्मा की रक्षा करें, जिसने हर मनुष्य को मनुष्य होने का अधिकार दिया। जाति की जंजीरें टूट चुकी हैं, पर कही–कहीं उन्हें फिर से जोड़ने की कोशिश होती है। हमें ही उन हाथों को रोकना होगा।*

*अन्ततः यह सत्य स्वीकारना होगा कि भारत की असली पहचान तभी बनेगी जब समाज में सबसे नीचे समझे गए व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि होगी। यही हमारी सभ्यता की असली परीक्षा है। और यही डॉ. अम्बेडकर का संदेश — अछूत नहीं, संविधान हैं हम।*
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लेख-एमसी अहिरवार
06.12.2025.

05/12/2025

सल्तनत से लोकतंत्र तक — दलित पीड़ा और सामाजिक क्रांति की अंतहीन निरंतर यात्रा चलती रहना है ।
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*हे अंबेडकर!!!*
*आज भी कुछ चेहरे “*बराबरी की बात करने पर सुलगने क्यों लगते हैं ।?*
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*06 दिसंबर,बाबा साहेब की पुण्य तिथि पर विशेष ।*
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भारत की सभ्यता जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी यहाँ सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव की जड़ें भी हैं। समय बदला, सत्ता बदलती रही, राजवंश आए और गए — पर इस धरती के सबसे पीड़ित वर्ग की आँखों में जलते हुए दुःख और उनके शरीर पर पड़े अपमान के निशान कभी नहीं बदले। दलितों का इतिहास केवल उत्पीड़न का इतिहास नहीं है, यह उस निरंतर संघर्ष का इतिहास भी है जिसने आधुनिक भारत को उसके नैतिक विवेक से जोड़ा। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसी सच्चाई को शब्द देते हुए कहा था — “सत्ता परिवर्तन समाज परिवर्तन की गारंटी नहीं देता।” यह वाक्य भारतीय इतिहास की तीन शक्तिशाली सल्तनतों पर हूबहू लागू होता है — दिल्ली सल्तनत, मुग़ल साम्राज्य और ब्रिटिश राज।

दिल्ली सल्तनत के शासन से पहले ही भारतीय समाज जाति-आधारित उत्पीड़न से ग्रसित था। कुछ जातियाँ शुद्ध, कुछ अपवित्र; कुछ देवत्व के करीब, कुछ मनुष्यों से भी दूर। अस्पृश्यता केवल एक व्यवहार नहीं थी, वह एक ऐसी दीवार थी जिस पर दलितों की हर उम्मीद टकराकर टूट जाती थी। जब तुर्क और अफ़ग़ान शासक भारत आए, उन्होंने प्रशासन, राजकोष और सेना को बदला, पर समाज की जातिगत संरचना को यथावत रहने दिया। इतिहासकार मोहम्मद हबीब लिखते हैं — “सल्तनत की राजनीति बदली, पर समाज नहीं बदला।”

दलितों के हिस्से वे सारे काम आए जिन्हें समाज “अशुद्ध” घोषित करता था। शव-संसाधन, चमड़ा कार्य, सफाई, बेगारी — यह सब सल्तनती ढांचे की रीढ़ थे, किन्तु उन्हें सामाजिक दर्जा नहीं मिला। उनका श्रम दिखता था, उनका अस्तित्व नहीं। इतिहासकार इरफ़ान हबीब के शब्दों में — “उनके श्रम की कीमत थी, पर उनके जीवन की कोई कीमत नहीं थी।” शहरों की रौनक बढ़ी, कारीगरी के नए अवसर आए, लेकिन दलितों के लिए सामाजिक दरवाजे वैसे ही बंद रहे।

बाद में मुग़ल शासन आया, जिसे इतिहास भारतीय कला, संस्कृति और प्रशासन का स्वर्णकाल कहता है। पर समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग उसी अंधेरे में रहे। ताजमहल, लालक़िला, फतेहपुर सीकरी — इन इमारतों की सुंदरता का गुणगान इतिहास करता है,
पर इन पत्थरों के नीचे छिपे दलित मजदूरों का खून और पसीना कभी दिखाई नहीं देता।

अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक उदारता दिखाई, पर जातिगत भेदभाव को नहीं छुआ। कारण स्पष्ट था — जाति हिंदू समाज का आंतरिक ढांचा थी, और शासकों ने इसे “स्थानीय परंपरा” मानकर छोड़ दिया। ज्योतिराव फुले ने ठीक ही लिखा — “शासन बदलता रहा, पर शूद्र-अतिशूद्रों की गुलामी स्थायी रही।”

कारीगरी, हथकरघा, धातुकर्म — इन सभी क्षेत्रों में दलित समुदायों के कौशल से साम्राज्य मजबूत हुआ, पर उन्हें न सम्मान मिला, न बराबरी। पूजा स्थलों से दूरी, कुएँ तक पहुँच पर रोक, गाँव की व्यवस्था में मानव से नीचा दर्जा — ये सब इस युग में भी जस के तस रहे। गांधी ने आगे चलकर इसी क्रूरता को “मानवता के माथे पर कलंक” कहा।

अंग्रेज़ों के भारत में आगमन के साथ जाति-व्यवस्था को नया रूप मिला — वह प्रशासनिक दस्तावेज़ बन गई। 1871 से शुरू हुई जनगणना के साथ अंग्रेज़ों ने भारतीय समाज को जातियों की सूची में बाँधना शुरू किया। ब्रिटिश इतिहासकार Nicholas Dirks ने सटीक विश्लेषण किया —
“The British did not create caste, but they re-cast caste into a rigid administrative system.”
अर्थात — ब्रिटिशों ने जाति को जन्म नहीं दिया,
लेकिन उसे शासन की स्थायी जंजीर बना दिया।

Criminal Tribes Act जैसी नीतियों ने कुछ जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। जन्म लेते ही अपराधी! यह उत्पीड़न का सबसे संस्थागत रूप था। स्कूल, नौकरी, कानूनी पहचान — हर स्तर पर जाति एक मुहर बनकर चिपक गई। डॉ. अंबेडकर ने इस युग को विश्लेषित करते हुए कहा —
“जाति एक ऐसी जेल है जिसमें जन्म होता है और मृत्यु भी।”

दलितों की पीड़ा केवल आर्थिक नहीं रही, यह अस्तित्वगत बन गई।
उनके घर समाज से बाहर,
उनके बच्चे शिक्षा से बाहर,
उनके शव तक श्मशानों के बाहर।

ब्रिटिश राज का यह अध्याय जातिगत दमन का शिखर था,
पर — और यही इतिहास का सौभाग्य है —
इसी काल में दलित चेतना की सबसे तीव्र लहर भी उठी।

19वीं–20वीं सदी में
फुले, सावित्रीबाई, पेरियार, स्वामी अछूतानंद —
और फिर डॉ. भीमराव अंबेडकर —
ने जाति के खिलाफ संगठित विद्रोह की लौ जलाई।

भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता 1947 में मिली,
पर दलितों की असली लड़ाई तो थी मानव होने की लड़ाई।
संविधान सभा में अंबेडकर की कलम ने वह इतिहास बदल दिया,
जहाँ Article 17 के जरिए अस्पृश्यता को अपराध करार दिया गया।
यह भारतीय इतिहास का पहला क्षण था
जब राष्ट्र ने अपने ही अत्याचार को स्वीकार कर उसे समाप्त करने का संकल्प लिया।

भारत आज लोकतंत्र पर गर्व करता है,
पर लोकतंत्र की यह जड़ें दलित आंदोलन के खून और बलिदानों में सिंचित हैं।
उन्होंने भारत को सिखाया —
“समानता उपहार नहीं, अधिकार है।”

किन्तु एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है —
क्या केवल क़ानून बदलने से सदियाँ पुरानी मानसिकता बदल जाती है?
उत्तर — दुःखद है — नहीं।

आज भी वह दलित बच्चा स्कूल में सबसे आख़िरी पंक्ति में बैठता है,
आज भी सफाईकर्मी महिला का छूने से पानी का घड़ा बदल दिया जाता है,
आज भी पूजा स्थलों पर उनका प्रवेश विवाद बना रहता है।
इतिहास की परछाइयाँ आज भी हमारे समाज की दीवारों पर जीवित हैं।

दलितों की लड़ाई केवल बीते समय की लड़ाई नहीं है,
यह भारत के भविष्य की लड़ाई है।
क्योंकि जब तक समाज की आत्मा पर लगे घाव नहीं भरेंगे —
भारत पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होगा।

यही वह संदर्भ है जिसमें आज की समरसता की आवाज़ें महत्त्वपूर्ण बन जाती हैं।
किसी भी देश में सामाजिक एकता तब बनती है
जब “हम” की परिभाषा में हर व्यक्ति शामिल हो,
और जाति उस “हम” को सबसे पहले तोड़ देती है।

इसीलिए जब कोई व्यक्ति
जातिगत विषमता मिटाने की बात करता है,
तो वह भारत के भविष्य की बात करता है।

श्री संतोष वर्मा (IAS) ने भरे मंच से
जब समग्र समाज में “रोटी-बेटी व्यवहार” की बात कही,
तो भारत और प्रदेश के कुछ चुनिंदा व्यक्तियों,
कुछ समाचार पत्रों, कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आँखों से
मानो अंगार बरसने लगे —
जैसे वे उन अंगारों में ही
श्री वर्मा को बार-बार झुलसाना चाहते हों,
भस्म कर देना चाहते हों।

विडंबना देखिए —
जिसने समरसता की बात की,
उसे ही विभाजनकारी बताने की कोशिश हुई।

समाज का जो हिस्सा आज भी
जातिगत वर्चस्व को जीवन-मरण का प्रश्न मानता है,
वह समानता की हर आवाज़ को
अपने सिंहासन के ख़िलाफ़ विद्रोह समझ लेता है।

भारत विकसित देश कब बनेगा?
शायद तब…
जब सदियों से चली आ रही इन संकीर्ण राहों का कहीं अंत होगा,
और मानवता उन अँधेरी गलियों से बाहर निकलकर
एक उजले राष्ट्र के द्वार पर खड़ी होगी।
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16/11/2025

कानो में अतर का गया

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