JOY of TRUTH

JOY of TRUTH joy, peace and happiness program with motivation

अब जबकि गंदी गंदी अश्लील अभिव्यक्तियों से सार्वजनिक स्पेस का अपवित्रीकरण( profanation) आम हो गया है, मुझे मनुस्मृति याद ...
08/10/2026

अब जबकि गंदी गंदी अश्लील अभिव्यक्तियों से सार्वजनिक स्पेस का अपवित्रीकरण( profanation) आम हो गया है, मुझे मनुस्मृति याद आती है जब उसके आठवें अध्याय में वाक्पारुष्य को स्वतन्त्र विवाद-पद (व्यवहारपद) के रूप में गिना गया था, जिसमें दण्डपारुष्य (शारीरिक आघात) के साथ वाक्पारुष्य (वाचिक आघात) का दण्ड-विधान है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी वाक्पारुष्य का प्रकरण था, जिसमें अपमान, आक्षेप और निन्दा के प्रकार गिनाकर उनके अनुरूप दण्ड बताया गया है।

भर्तृहरि ने कहा था कि कंकण, हार, स्नान, चन्दन और केश-सज्जा, ये सब पुरुष को अलंकृत नहीं करते; केवल वह वाणी अलंकृत करती है जो संस्कार-सम्पन्न होकर धारण की जाती है, क्योंकि और सब आभूषण क्षीण हो जाते हैं, वाणी का भूषण ही स्थायी भूषण है (नीतिशतक)।

जो समाज अपनी वाणी का भूषण उतारकर फेंक देता है, वह शेष सारी सम्पन्नता के बावजूद दरिद्र है।

प्राचीन विधिकार यह जानते थे कि वाणी का आघात भी आघात है और वह सामाजिक व्यवस्था को वैसे ही क्षति पहुँचा सकता है जैसे लाठी का आघात।

हमारे वर्तमान में यह कैसी नीच छूट मिली हुई है?

मनोज श्रीवास्तव जी की फेसबुक वालों से साभार

08/10/2026

गाली , तर्क की मृत्यु है

🚩                 li.Joy.of.Truth.li  *“ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियॉं हैं “*आपको यह संवाद (डाय...
04/10/2026

🚩
li.Joy.of.Truth.li

*“ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियॉं हैं “*
आपको यह संवाद (डायलाग) तो याद ही होगा ?

फिल्म आनंद, अभिनेता राजेश खन्ना, लिखने वाले भी कोई प्रसिद्ध ही होंगे,

फिर किसी रामचरित मानस के पाठी ने कहा - नहीं, उनका भी मूल सुंदरकांड में है, भगवान भोला ने भोली को बोला -

उमा दारु जोषित की नाईं।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
हे उमा, जैसे दारु (लकड़ी) देवदारु की बनी कठपुतलियां यंत्रवत नाचती हैं,
पर सूत्रधार, धागा पकड़नेवाले राम जी दीखते नहीं, परदे के पीछे से सबको नचाते हैं ..
एक ने कहा - बाबा तुलसीदास जी ने व्यास रचित महाभारत (गीता)से लिया -

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया,
बोले, नहीं , उसके बाद की रचना भागवत से लिया है, वहां देवर्षि नारद ने व्यास जी को सुनाया-
ईशस्य हि वशे लोको योषा दारुमयी यथा
(भागवत १.६.७)
जैसे कठपुतली नचानेवाले की इच्छानुसार नाचती है, वैसे ही यह सारा संसार ईश्वर के अधीन है,
किसी ने कहा- नहीं , वेद में भी है .. वहां धागे को मोह-माया बोल दिया
लीजिए... डायलॉग से आरम्भ हुई बात वार्त विश्राम ले लेती है गीत पर ..
ये मोह मोह के धागे ...

29/09/2026

🚩*अहो आत्मन स्वाभिमान हमेशा पगड़ी की तरह ऊपर होना चाहिए । जूते चाहे जितने भी कीमती हो उन्हें जगह व समय पर उतरने ही पड़ते हैं । जैसा ठीक समझे फिर जो है सो है । 👏*

24/09/2026

`ॐ तपरूपाय विद्महे सृष्टिकर्ताय।`
`धीमहि तन्नो वामन प्रचोदयात।।` *भगवान श्री विष्णु के पांचवें अवतार भगवान श्री वामन जी की प्रकट्योत्सव एवं एकादशी की हार्दिक मंगलकामनाएं।*

il.Joy.of.Truth.li  `मन`*मन का स्वभाव बड़ा विचित्र है**जिस काँटे से वह बिंधता है, बार-बार उसी के पास जाना चाहता है।**जैस...
19/09/2026

il.Joy.of.Truth.li `मन`
*मन का स्वभाव बड़ा विचित्र है*
*जिस काँटे से वह बिंधता है, बार-बार उसी के पास जाना चाहता है।*
*जैसे दाँत में दर्द हो तो जिह्वा बार-बार उसी जगह पहुँच जाती है।*
*कोई फोड़ा फुंसी या घाव है तो हाथ बार-बार वही पहुंचता है उसी को कोई देता है और फिर कष्ट भी पाता है।*
*वैसे ही मन भी जिस बात ने उसे चोट पहुँचाई हो,उसी को बार-बार कुरेदता रहता है।*
*घटना बीत जाती है, व्यक्ति दूर चला जाता है,शब्द हवा में विलीन हो जाते हैं, लेकिन मन उन्हें भीतर जीवित रखता है।*
*यहीं से एक और जाल बनता है।*
*मन जितना प्रतिक्रिया करता है, उतना ही उस अनुभव को अपने भीतर गहरा करता जाता है।हम गुण-दोष का विचार करते हैं,निर्णय सुनाते हैं।सही-गलत की कसौटी पर संसार को तौलते हैं।किसी के व्यवहार को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं।और अनजाने में अपने ही भीतर संस्कारों की नई परतें चढ़ाते जाते हैं।

*फिर जिससे मुक्त होना चाहते हैं,उसी से अपने मन को बाँध लेते हैं।*

*अब मन को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए,उतना ही अच्छा है कि वह अपनी ही प्रकृति का शिकार स्वयं बनता है।

मुक्ति संसार को बदलने से नहीं, संसार के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को देखने से शुरू होती है।

स्वयं के दैहिक कार्यों को स्वयं आत्मरूप देखना, साक्षी भाव है और हम साक्षी भाव में जितना-जितना रहना सीखते हैं, उतना-उतना भीतर एक दूरी बनने लगती है,घटना होती तो है, पर हम स्वयं घटना नहीं बनते।
कोई कुछ कहता है, पर हर शब्द हमारे भीतर घर नहीं बना पाता,कोई प्रशंसा करता है, तो हम उड़ते नहीं ,कोई आलोचना करता है, तो हम टूटते नहीं।

धीरे-धीरे समझ आता है कि शांत होना परिस्थितियों की कृपा नहीं, अपने स्वभाव में लौट आने की कला है.

जो अपने स्वभाव में स्थित होना सीख जाता है,
जगत उसे प्रभावित तो करता है,
लेकिन अपने साथ बहाकर नहीं ले जाता.

उसे हर बार कुछ करके स्वयं को सिद्ध नहीं करना पड़ता.
हर व्यक्ति से अपनी कीमत मनवाने की आवश्यकता नहीं रहती.
हर विवाद में जीतना जरूरी नहीं लगता.
हर संबंध में अंतिम शब्द अपना हो
यह आग्रह भी छूटने लगता है.

वह सहज होता जाता है, संतुष्ट होता जाता है.
और फिर निर्लिप्त होकर जगत के इस विराट खेल को देखता है.

इसका अर्थ यह नहीं कि वह जीवन से भाग जाता है; बल्कि वह पहली बार जीवन को बिना अपने अहं के बीच में लाए जीना सीखता है.

इसलिए अपना मूल्य पहचानो.
लेकिन अपने मूल्य का प्रमाण
दूसरों की स्वीकृति में मत खोजो.

विश्वास रखो— तुम्हारा होना ही पर्याप्त है.
तुम्हें संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति
दूसरों को सिद्ध करके नहीं बनना है;
तुम्हारे जीवन की अपनी एक अद्वितीय जगह है.

और हाँ, झुकना कमजोरी नहीं है.

जो वृक्ष फल से भरता है, वही झुकता है.
जो नदी ऊँचाई छोड़ती है वही समुद्र तक पहुँचती है

जो झुकना जानता है, दुनिया उसे उठाती है.
जो केवल अकड़ना जानता है,
समय उसे एक दिन उखाड़ देता है.

सफलता मिले तो रुकना मत लेकिन सफलता के नशे में अपने भीतर से दूर भी मत होना.

आगे बढ़ो— क्योंकि रास्ता अभी समाप्त नहीं हुआ है.

हो सकता है जिस सफलता की तुम तलाश कर रहे हो, वह अगले मोड़ पर खड़ी हो.

लेकिन उससे भी बड़ी सफलता यह होगी कि उस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते तुम स्वयं को खोओ नहीं.

क्योंकि अंततः जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि
दुनिया को जीत लेना नहीं,
अपने मन को अपना बना लेना है।

और जिस दिन मन प्रतिक्रिया करना छोड़कर
साक्षी होकर देखना सीख जाता है,
उसी दिन भीतर मुक्ति की पहली आहट सुनाई देती है.

*🌷जय श्री कृष्ण 🙏*

🕉जन्माष्टमी शुभचिंतन!त्रेता में  अयोथ्या के राम नेराक्षसों के राजा रावण के पासहनुमान अंगद जैसे दूत भेजे, धर्म अधर्म समझा...
04/09/2026

🕉
जन्माष्टमी शुभचिंतन!

त्रेता में अयोथ्या के राम ने
राक्षसों के राजा रावण के पास
हनुमान अंगद जैसे दूत भेजे,
धर्म अधर्म समझाया!!
विभीषण को गले लगाया!
लंकाधिपति रावण सहित
जो सही मार्ग पर नहीं आया,
उसे 'देश से नहीं भगाया!'
सेना सहित यमलोक पहुंचाया!!

द्वापर में वृंदावन के 'मोहन' ने
कंस और कौरवों को
स्वयं ही खूब समझाया,
धर्म अधर्म का भेद बताया!
विदुर को गले लगाया! और
जो धर्म मार्ग पर नहीं आया
उसे 'देश से नहीं भगाया!',
धरती से अस्तित्व ही मिटाया!!

धर्म की जय!
अधर्म का नाश!!
प्राणियों में सद्भाव!
विश्व का कल्याण!!

साभार vinitnavathe

🚩              il.Joy.of.Truth.li卐 `धर्म रक्षा का संकल्प सूत्र है राखी!` 卐धर्मो रक्षति रक्षित:धर्म क्या है?धारयति इति 'ध...
28/08/2026

🚩
il.Joy.of.Truth.li

卐 `धर्म रक्षा का संकल्प सूत्र है राखी!` 卐

धर्मो रक्षति रक्षित:

धर्म क्या है?
धारयति इति 'धर्म:'
यानि जो संबंधों की धारणा करता है!
परस्परपूरकता का संदेश देने वाला
सनातन एकात्म मानव दर्शन यही है!

धर्म रक्षा क्या है?
यह भाई-बहन ही नहीं अपितु
गुरु-शिष्य, माता-पुत्र, पिता-पुत्र
राजा-प्रजा, मनुष्य-प्रकृति
राष्ट्र व जन, आदि आदि
इन सभी पवित्र संबंधों की रक्षा है!!

रक्षा सूत्र क्या है?
यह संकल्प है, धर्म रक्षा का
जो इन संबंधों को
शुद्ध सात्विक प्रेम से भर देता है!
कर्तव्य बोध कराता है!

सरल शब्दों में कहें तो
"मेरी मर्जी" से "सहनाववतु" की
दिव्य यात्रा का आरंभ है
रक्षा बंधन!!
साभार vineet
🌷`जय श्री कृष्ण`🙏

Address

A-265 Joy Of Truth Aakriti Highland Opp To Radha Ri Dhani Indore Road Phanda Bhopal
Bhopal
462030

Telephone

+919009761276

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when JOY of TRUTH posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to JOY of TRUTH:

Shortcuts

Share