19/09/2026
il.Joy.of.Truth.li `मन`
*मन का स्वभाव बड़ा विचित्र है*
*जिस काँटे से वह बिंधता है, बार-बार उसी के पास जाना चाहता है।*
*जैसे दाँत में दर्द हो तो जिह्वा बार-बार उसी जगह पहुँच जाती है।*
*कोई फोड़ा फुंसी या घाव है तो हाथ बार-बार वही पहुंचता है उसी को कोई देता है और फिर कष्ट भी पाता है।*
*वैसे ही मन भी जिस बात ने उसे चोट पहुँचाई हो,उसी को बार-बार कुरेदता रहता है।*
*घटना बीत जाती है, व्यक्ति दूर चला जाता है,शब्द हवा में विलीन हो जाते हैं, लेकिन मन उन्हें भीतर जीवित रखता है।*
*यहीं से एक और जाल बनता है।*
*मन जितना प्रतिक्रिया करता है, उतना ही उस अनुभव को अपने भीतर गहरा करता जाता है।हम गुण-दोष का विचार करते हैं,निर्णय सुनाते हैं।सही-गलत की कसौटी पर संसार को तौलते हैं।किसी के व्यवहार को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं।और अनजाने में अपने ही भीतर संस्कारों की नई परतें चढ़ाते जाते हैं।
*फिर जिससे मुक्त होना चाहते हैं,उसी से अपने मन को बाँध लेते हैं।*
*अब मन को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए,उतना ही अच्छा है कि वह अपनी ही प्रकृति का शिकार स्वयं बनता है।
मुक्ति संसार को बदलने से नहीं, संसार के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को देखने से शुरू होती है।
स्वयं के दैहिक कार्यों को स्वयं आत्मरूप देखना, साक्षी भाव है और हम साक्षी भाव में जितना-जितना रहना सीखते हैं, उतना-उतना भीतर एक दूरी बनने लगती है,घटना होती तो है, पर हम स्वयं घटना नहीं बनते।
कोई कुछ कहता है, पर हर शब्द हमारे भीतर घर नहीं बना पाता,कोई प्रशंसा करता है, तो हम उड़ते नहीं ,कोई आलोचना करता है, तो हम टूटते नहीं।
धीरे-धीरे समझ आता है कि शांत होना परिस्थितियों की कृपा नहीं, अपने स्वभाव में लौट आने की कला है.
जो अपने स्वभाव में स्थित होना सीख जाता है,
जगत उसे प्रभावित तो करता है,
लेकिन अपने साथ बहाकर नहीं ले जाता.
उसे हर बार कुछ करके स्वयं को सिद्ध नहीं करना पड़ता.
हर व्यक्ति से अपनी कीमत मनवाने की आवश्यकता नहीं रहती.
हर विवाद में जीतना जरूरी नहीं लगता.
हर संबंध में अंतिम शब्द अपना हो
यह आग्रह भी छूटने लगता है.
वह सहज होता जाता है, संतुष्ट होता जाता है.
और फिर निर्लिप्त होकर जगत के इस विराट खेल को देखता है.
इसका अर्थ यह नहीं कि वह जीवन से भाग जाता है; बल्कि वह पहली बार जीवन को बिना अपने अहं के बीच में लाए जीना सीखता है.
इसलिए अपना मूल्य पहचानो.
लेकिन अपने मूल्य का प्रमाण
दूसरों की स्वीकृति में मत खोजो.
विश्वास रखो— तुम्हारा होना ही पर्याप्त है.
तुम्हें संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति
दूसरों को सिद्ध करके नहीं बनना है;
तुम्हारे जीवन की अपनी एक अद्वितीय जगह है.
और हाँ, झुकना कमजोरी नहीं है.
जो वृक्ष फल से भरता है, वही झुकता है.
जो नदी ऊँचाई छोड़ती है वही समुद्र तक पहुँचती है
जो झुकना जानता है, दुनिया उसे उठाती है.
जो केवल अकड़ना जानता है,
समय उसे एक दिन उखाड़ देता है.
सफलता मिले तो रुकना मत लेकिन सफलता के नशे में अपने भीतर से दूर भी मत होना.
आगे बढ़ो— क्योंकि रास्ता अभी समाप्त नहीं हुआ है.
हो सकता है जिस सफलता की तुम तलाश कर रहे हो, वह अगले मोड़ पर खड़ी हो.
लेकिन उससे भी बड़ी सफलता यह होगी कि उस मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते तुम स्वयं को खोओ नहीं.
क्योंकि अंततः जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि
दुनिया को जीत लेना नहीं,
अपने मन को अपना बना लेना है।
और जिस दिन मन प्रतिक्रिया करना छोड़कर
साक्षी होकर देखना सीख जाता है,
उसी दिन भीतर मुक्ति की पहली आहट सुनाई देती है.
*🌷जय श्री कृष्ण 🙏*