Prakhar Samajik, Sahitik Avam Sanskritik Sanstha Bhopal

  • Home
  • India
  • Bhopal
  • Prakhar Samajik, Sahitik Avam Sanskritik Sanstha Bhopal

Prakhar Samajik, Sahitik Avam Sanskritik Sanstha Bhopal प्रखर सामाजिक साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था भोपाल मध्य प्रदेश| पंजीकरण दिनांक 16 नवंबर 1999

12/06/2025

प्रेम के कई चेहरे
(कविता/काव्य गीत)

“राष्ट्रीय प्रेम दिवस पर आप सभी मित्रों एवं साथियों को हमारी ओर से ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं एवं अशेष बधाइयां।“

प्रेम के कई चेहरे हैं, जानता सारा जहान,
जो जानता है इसे, है वही असली इंसान।
सबके वश की बात नहीं है कि जान सके,
सिर्फ प्रेमी को ही होती है इसकी पहचान।
प्रेम के कई चेहरे………….

चेहरे पर प्रेम को, हर कोई नहीं पढ़ पाता,
इसके लिए आवश्यक है प्रेम ग्रंथ का ज्ञान।
प्रेम दिल में अनुभव करने की चीज होती है,
चेहरे पर कभी आंसू है, तो कभी मुस्कान।
प्रेम के कई चेहरे………….

प्रेम का कोई भी चेहरा सुंदर हो या ना हो,
परंतु सारे चेहरे पर, होते हैं कुछ निशान।
हर रिश्ते के साथ, प्रेम जुड़ा हुआ होता है,
हर रिश्ते का चेहरा, करता है इसे बखान।
प्रेम के कई चेहरे………….

कोई भी असली प्रेमी, चेहरे पे नहीं जाता,
चेहरे से ज्यादा, दिल का होता है स्थान।
प्रेम के हर चेहरे पर, मासूमियत होती है,
हर चेहरा तैयार रहता है होने को कुर्बान।
प्रेम के कई चेहरे…………

प्रमाणित किया जाता है कि यह रचना स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसका सर्वाधिकार कवि/कलमकार के पास सुरक्षित है।

सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह,
जयनगर (मधुबनी) बिहार/
नासिक (महाराष्ट्र)

12/06/2025

*जय श्री कृष्ण*
*आज की मधुरिम सुंदर शानदार बेला में प्रातः कालीन हरि स्मरण*

*बचपन में भरी दुपहरी में नाप आते थे, पूरा मोहल्ला।*
*जब से डिग्रियां समझ में आई पांव जलने लगे*

*समय की फितरत भी*
*बिलकुल सिक्के जैसी है*
*एक दिन पलटेगा जरूर*
*सिर्फ उसे उछालने का*
*हौसला रखिये।*
*आपका दिन मंगलमय हो*।
*आपका दिन मस्ती भरा हो।*

*डॉ नीलू सक्सेना*

12/06/2025

शीर्षक - अनुष्ठान

मन के भावों का समाधान,
कविता मेरी इक अनुष्ठान,

ये संबल है ज्यों सांसों की,
आभा है मेरे मुखड़े की,
हर पीड़ा की है मित्र महान,
कविता मेरी इक अनुष्ठान,

दिल में उठती जब कोई कसक,
मन होमाग्नि हो जाता है,
आहुति दूं तब कलम से मैं,
मन फिर गंगाजल हो जाता है,

ये कान्हा सी संग मेरे है,
अब नहीं जरूरत कोई मुझे,
मन के सारों को लिख कागज पर,
तर्पण पीड़ा का मैं करती,

भावों के धूम्रावरण में मैं,
खुश्बू सी अविरल बह जाती हूं,
शब्द स्नान की गंगा में,
गोते खा निर्मल हो जाती हूं...

शब्द-शब्द हैं नैवेद्य के जैसे
अक्षर-अक्षर एक हवन है,
धूमायमान हैं कोरे पन्ने,
कलम धूपबत्ती सी सुरभित है,

इनसे पूर्ण हो यज्ञ महान,
कविता मेरी इक अनुष्ठान।

12/06/2025

*आधार छंद-- हरिप्रिया*
*परिचय -सम मात्रिक दंडक*
*प्रति पंक्ति--46 मात्रा*
*पदांत- एक गुरु आवश्यक*
*यति-- 12, 12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- आँगन महकाते (2 युग्म)*

🔅🔅🔅🔅
निर्मल पावन बहार, भक्ति प्रीत उर उदार, सुखद लगन ईश द्वार,
गुरुवर समझाते।
पावन सुंदर विचार,
नैन हर्ष सुख निखार, प्रीत बहे उर अपार, नैना छलकाते।
हरदम रहते हताश, कण-कण करते तलाश, दिव्य ज्ञान का प्रकाश, ऑंगन महकाते।
पग -पग मिलती बहार , खुशियाॅं अचला अपार, दिव्य प्रेम की बयार, जीवन दमकाते।

श्याम नाम हिय जयंत,
खुशी मिले उर अनंत, ऑंगन बैठे महंत, सत ज्ञान पाइए।
मन हो हर्षित विभोर, हिय में तरंग हिलोर, पूजा करती कठोर,
मंदिर बुलाइए।।
पूजन अर्चन अपार, हुआ हृदय अब उदार, द्वारे ऑंगन बहार, दीपक जलाइए।
क्या है अपना सुधर्म, सुधरेगा मनुज कर्म, जान लिया ईश मर्म, राहें दिखाइए।।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
उमा मिश्रा

16/05/2025

*सभी को नमस्कार!*

भीषण गर्मी पड़ रही है दिल्ली में बिजली के समस्त रिकार्ड टूट गए|
इतनी अधिक बिजली की खपत हो रही है क्योंकि गर्मी अधिक|
भीषण गर्मी से केवल मानव समाज ही नहीं ,अभी तो जीव जंतु ,पशु पक्षी सभी ठंडक की तलाश में है|

पेड़ों की छाया कम होती जा रही है !

कंक्रीट के जाल बढ़ते जा रहे हैं| पेड़ों की कटाई रोकना पड़ेगा!

जन्मोत्सव अपने पूर्वजों की याद में स्मृति वन्य को प्राथमिकता देनी होगी|
पानी को व्यर्थ नहीं जाने देना|
जितना भी हो सके जल संवर्धन पर विशेष रूप से ध्यान देना है!
पर्यावरण सुरक्षित रखने के लिए जल को स्वच्छ रखने के लिए| हमें निरंतर प्रयासरत रहना है| नवीन युवा पीढ़ी इस बात को अच्छी तरह से समझ ले| आने वाले भविष्य में पानी की कमी होने वाली है| हम सब का दायित्व है यह बात हमें समझना चाहिए!

| *डॉ साधना शुक्ला*

16/05/2025

*हर फौजी उस कवि के हाथ चूमना चाहता था*
सफेद गुजराती आधी बाँह की कमीज़ और धोती में सजे-सँवरे उस बुजुर्ग को रेलगाड़ी में चढ़ने के लिए अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी. किसी भी डिब्बे में जगह नहीं थी और जाना भी ज़रूरी था. अचानक एक ऐसे डिब्बे पर नज़र पड़ी जिसमें फौजी सवार थे. बुजुर्गवार ने थोड़ी हिम्मत की और एक फौजी से बात करके डिब्बे में प्रवेश कर लिया. यात्रा शुरु हुई. एक जगह उन्हें जैसे-तैसे सीट भी मिल गई.सब अपने में मस्त थे. अचानक एक ने पूछा—'बाबा करते क्या हो?' बुजुर्गवार मुस्कुराये और बोले—'कवि हूँ...गीत-वीत लिख लेता हूँ.' पूछनेवाले ने कहा -'अच्छा...तो हमें भी कोई गीत-वीत सुनाओ.' बुजुर्गवार बोले—'एक तो आप लोगों ने सुना ही होगा, लता मँगेशकर ने गाया है—'ऐ मेरे वतन के लोगों..'
कुछ क्षण के लिए पूरे डिब्बे में सन्नाटा छा गया और फिर मानों एक जलजला सा आ गया.यह अहसास होने पर कि बुजुर्गवार व्यक्ति कवि प्रदीप हैं और साथ में सफ़र कर रहे हैं हर फौजी उनके हाथ चूमने के लिए आतुर हो उठा.प्रदीप भी ऐसी प्रतिक्रिया पर चकित थे. पूछने पर एक फौजी ने बताया-'राष्ट्रप्रेम के गीत तो बहुतों ने लिखे हैं लेकिन किसी ने हिंद की सेना की जय पहली बार ही लिखा है. देश की सेना इस गीतकार के सामने नतमस्तक थी.
*—दिनेश लखनपाल के संस्मरण से*

16/05/2025

आदरणीय वंदना त्रिपाठी जी आपका हार्दिक स्वागत है!
💐💐🙏🏻🙏🏻

16/05/2025

Sunita Sharma ji

13/05/2025

सहस्ररावण (उपन्यास)
क्रमांक -20
*रावण की कूटनीति*:-
सोमालिया सुमाली का वह निवास जहां वह देवताओं से डरते हुये छिपकर रहते थे । इस समय रावण के विवाह की खुशियां मनाते हुये हर्षोल्लास से भरे थे । तभी एक दिन सुमाली ने समी को बुलाकर सभा करते हुये कहा कि-"अब हमें लंका को पाने का प्रयास करना चाहिए परंतू रावण इसके लिये बिल्कुल ही तैयार नहीं था ‌। बात के उपक्रम को दूसरी ओर घुमाते हुये उसने कहा -"हमें इस समय युद्ध नहीं
वरन् उनसे उनका आशीर्वाद प्राप्त करन है अपने वैवाहिक जीवन के लिये । इस शुभ मंगल की सूचना पहले आप उन्हें अपने किसी संदेश वाहक से पत्र द्वारा भेजिये और तब तक उनके उत्तर की प्रतीक्षा कीजिये। यदि वह हमें सम्मान पूर्वक बुलाते हैं तो हम वहां रहकर ही रक्ष संस्कृति का विस्तार करेंगे । यक्षों के द्वारा रक्ष संस्कृति न मानने पर हम उन्हें लंका छोड़ने पर विवश कर देंगे ।
इस प्रकार से विना किसी युद्ध के आपको अपनी लंका प्राप्त हो जायेगी और मुझ अपने ही भाई की ब्रह्महत्या का दोष भी नहीं लगेगा । रावण की इस कूटनीति के समक्ष समाली भी हर गया और गदगद होते हुये मुक्त कंठ से रावण की प्रशंसा करते हुये कहा:- *दशमुख रावण तूने आज अपने नाम की सार्थकता सिद्ध कर दी जो बात हम ईर्ष्या द्वेष के कारण प्रतिशोध की भावना से भर कर कभी सोच ही नही सके उसे तुमने नीतिपूर्वक सौहार्द से संयोजन करते हुये सुलझा दिया।*
अब देर किस की पुत्र !मैं अभी अपने सबसे बड़े पुत्र प्रहस्त को ही उसकै कुछ साथियों के साथ संदेश देकर भेजता हूं ।।वह वहां जाकर स्थिति का आकलन भी कर लेगा और आपके विवाह क सूचना देकर उनकी प्रतिक्रिया भी क्या होती है ज्ञात हो जायेगा। तब तक हमें प्रतीक्षा करनी होगी प्रहस्त के लौटकर आने तक । उसके बाद क्या करना है उस पर विचार करेंगे ।अभी तो आप प्रमुदित होकर आमोद -मोद मंगल करो ।

13/05/2025

बुद्ध पूर्णिमा:-
भारतभूमि की अपनी महिमा यहां भोग से हटकर योग का मार्ग चुनकर महान बनते हैं । चाहे जैन मुनि वर्धमान हो या महावीर 24वें तीर्थंकर अथवा राजकुमा सिद्धार्थ सभी ने राज्य सुख त्याग कर योग के माध्यम से अध्यात्म का मार्ग चुना । यह ज्ञान और तप की भूमि है भोग की नहीं ।बौद्ध धर्मके प्रवर्तक सिद्धार्थ से भगवान गौतम बुद्ध बनने की यात्रा कोई सहज नही थी । उन्होंने भूख प्यास सहकर घने जंगल में तपस्या कि दु:खों से निर्वृत्ति का उपाय खोजा और तब जाकर उन्हें बोध हुआ कि हमारे दु:ख का कारण क्या है ? हमारी सोच ही दु:खों का कारण हैं।बुद्धि का कार्य सोचना है औरजैसा हम सोचते हैं हमारे मनोभाव भी उसी प्रकार के हो जाते है । बुद्ध ने बुद्धि को आत्मा से जुड़ना सिखाया कि किस प्रकार से हम अपने चिंतन की दिशा को मन से अलग कर आत्म चिंतन की ओर मोड़ते‌ हैं तब बुद्धिका बोधशुद्ध होकर बोधिसत्व हो जाता है। अत:बुद्धि का आत्मा से सम्बन्ध स्थापित करना ही बुद्धि की बुद्ध बनने की यात्रा है । आज बुद्ध पूर्णिमा पर आइये हम सब अपने आप को बुद्धि के माध्यम से ज्ञान प्राप्त कर अंतर्जगत की यात्रा करते हुये आत्मा से संबंध स्थापित करने का प्रयास कर दु:खों से निर्वृत्ति पायें । इस संसार मे आत्म सुख से बड़ा कोई सुख नहीं । सिद्धार्थ के भगवान बुद्ध बनने की यात्रा में उनके सहभागी बनें ।पथ कठिन अवश्य है पर दुर्गम नहीं है । धन्यवाद ।जै भगवान बुद्ध ।
सभी को आत्म शांति दें ।
बुद्धं शरणं गच्छामि
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।।
उषा सक्सेना

13/05/2025

बुद्ध पूर्णिमा
(कविता)

“बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान बुद्ध को कोटि कोटि प्रणाम और आप सभी मित्रों, साथियों एवं प्यारे बच्चों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाईयां।“

बैसाख महीना पूर्णिमा की, है खास बात
इसी दिन भगवान बुद्ध ने रचा इतिहास।
महाराज शुद्धोदन बने पिता सिद्धार्थ के,
महारानी माया की, पूरी हो गई थी आस।
राजकुमार सिद्धार्थ ही महात्मा बुद्ध बने,
भगवान बुद्ध के कारण दिन हुआ खास।
बैसाख महीना पूर्णिमा……….

राजपाट से मोह भंग, जब आई जवानी,
राजमहल से बाहर शुरू हुई नई कहानी।
पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़ा,
धन दौलत और राज सुख से मन मोड़ा।
बीमारों, बूढ़ों को देखते ही दिल पसीजता, हो गया उनको जीवन मृत्यु का एहसास।
बैसाख महीना पूर्णिमा…………

महात्मा के रूप में जग को दिया संदेश,
घर घर में गूंज रहे हैं उनके सारे उपदेश।
सभी को सत्य, अहिंसा की दिखलाई राह,
परोपकार हेतु अपनी बिल्कुल नहीं परवाह।
गया बिहार का, बौद्ध धर्म का केंद्र बना,
कहीं विरोध भी हुआ, पर हुए नहीं उदास।
बैसाख महीना पूर्णिमा………..

लंबी तपस्या बाद उनको प्राप्त हुआ ज्ञान,
बौद्ध धर्म के कारण मिली विशेष पहचान।
सम्राट अशोक ने भी, बौद्ध धर्म अपनाया,
अनुयायियों ने संदेश सारे जग में पहुंचाया।
लुंबिनी के जंगल से मंगल की शुरुआत है,
कम ही संत हैं भगवान बुद्ध के आसपास।
बैसाख महीना पूर्णिमा………..

प्रमाणित किया जाता है कि यह रचना स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसका सर्वाधिकार कवि/कलमकार के पास सुरक्षित है।

सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह,
जयनगर (मधुबनी) बिहार/
नासिक (महाराष्ट्र)

13/05/2025

कथा नचिकेता
द्वितीय परिच्छेद---१५
ईश्वर अथवा सबसे भिन्न है वह धर्म अधर्म से दूर है
एक गुरु ने शिष्य को दो बीज दिए । कहा , एक की सूक्ष्म परीक्षा करो। एक बीज को तोड़ तोड़ कर देखो कि इसमे कैसा बीज तत्व है ,है तो कहां है ? इसमें अंकुरण शक्ति कहां है ? क्यो आती है ? उसने बीज को तोडकर, कूटपीस कर देखा । केवल चूर्ण बना कर देखा । उसमे कुछ नहीं मिला । फिर भी गुरु कहते हैं दूसरा लीजिए इसी तरह का है। पर उसको खेत में बो दो, भूमि में, या प्याले मे रख थोडा जल डाल दो । तीन दिन के पश्चात अंकुरित हो जाएगा क्यो ? कैसै ? यह अंकुरण शक्ति कितनी सूक्ष्म है ? कैसै प्राण आते है इसमे ? इस सूक्ष्म ज्ञान को नचिकेता तुम समझ गये हो।
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मान्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भवाच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ।।१४/2।।

नचिकेता यमाचार्य से कहता है, वह ब्रह्म और उसका ज्ञान सबसे पृथक है, अन्यत्र [ जिसकी आप कल्पना नही कर सकते वह सर्वथा भिन्न है ] धर्मादन्यत्राधर्मान्यत्रास्मात्कृताकृतात् [ ।[ वह धर्म और अधर्म से भी पृथक है और कर्तव्य अकर्तव्य से पृथक है। अन्यत्र भूताच्च भवाच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ।।१४/2।। कार्य कारण से भी भिन्न है । जो भूतकाल , वर्तमान काल से आनेवाले समय भावी समय से भी वह भिन्न है यह सब कृपया मुझे उसका ज्ञान दो ]
ईश्वरीय शक्ति का क्या कहने अपरम्पार है । जो परमात्मा जन्म नही लेता, उसे कैसा दुख सुख,आनंद और योग वियोग ? उसमें मोह माया, ईर्षा द्वेष और मतभेद कैसे हो सकता है ? उसमे कैसा धर्म अधर्म होगा ? उसमें कैसा सत्य असत्य ? उसमें किस प्रकार और क्यो मानवीय दोष आ सकते हैं ? उसकी कोई कामनाए ही नही है।कुछ नहीं । वह सबसे भिन्न है अनंत है विराट है सर्वव्यापक है। वह भूतकाल से पहले भी था, वर्तमान में भी है, और भविष्य में भी रहेगा। उसकी शक्ति सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च है । वह न्यायकारी है सर्वज्ञ और सर्वत्र है । ऐसे अदृश्य महाशक्ति का जितना वर्णन किया जाए कम है । नचिकेता विनयपूर्वक कहता है, तो है गुरुदेव यमाचार्य , मुझे इसी की जानकारी नही चाहिए, मुझे तो इस ब्रह्म की अनुभूति कराईयै , जिससे मैं संतुष्ट हो सकूं वह कार्य नहीं करता कार्य हो जाता है। वह दिखाई नही देता किंतु वह सब देखता है। उसकी सबसे अलग दृष्टि है। मैं उस अनंत को जानना चाहता हूं।आनंद की चाह करनेवाला क्षणिक आनंद नही चाहता वह नित्य परमानंद चाहता है।
प्रत्येक क्रिया का कोई कोई कारण प्रयोजन होता है और क्रिया तभी संपन्न होती है जब कारण होता है । क्रिया की प्रतिक्रिया होती है । इस जड प्रकृति मे क्या शाश्वत है और क्या नष्ट होता रहता है और क्या है जो शेष रहता है ? जिसे परम सुख कहा जाता है , कहा है ? वह जानता चाहता था कि उसे किस प्रकार परमानंद की प्राप्ति क्या और कैसी होती है । नचिकेता को भौतिक संम्पदा, धन- धान्य, पशु-पक्षी , सोना -चांदी, हीरे- मोती आदि का मोह नहीं था । यदि मोह होता तो यमाचार्य के पास क्यो जाता ? अपने पिता से विवाद करता रहता ! यह सब सुनने के पश्चात यमाचार्य उत्तर देते है। उसे ब्रह्म को प्राप्त करने की इच्छा थी और इसीलिए यमाचार्य से प्रार्थना कर रहा था।

कथा नचिकेता ---29
ओम ही ब्रह्म ज्ञान का पाठ है
नचिकेता को भौतिक संम्पदा, धन ,धान्य, पशु-पक्षी , सोना चांदी, हीरे मोती आदि का मोह नहीं था। यदि मोह होता तो यमाचार्य के पास क्यो जाता ? अपने पिता से विवाद करता रहता ! यह सब सुनने के पश्चात यमाचार्य उत्तर देते है
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाsसि सर्वाणि च यद्वदंति । यदिच्छिन्तो ब्रह्मचर्य चरंति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीन्योमित्तयेत [।।१५/२।। कठ।।

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाsसि सर्वाणि च यद्वदंति । यदिच्छिन्तो ब्रह्मचर्य चरंति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीन्योमित्तयेत ।।१५/२।। कठ।।

सर्वे वेदा [ सभी यानी वेद, चारो ऋग, यजु, साम और अथर्ववेद वेद और उपवेद आदि ] यत्पदमामनन्ति [ जिस ब्रह्मज्ञान के पद का अर्थात ओम का गुणगान गाते है। म तपाsसि [ यम नियम आदि सब प्रकार के तप आदि नियम ] सर्वाणि च यद्वदंति [ जिन्हे सभी गुणी जन बताते रहते है ।] यदिच्छिन्तो ब्रह्मचर्य चरंति [ चाहते हुए ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करते हे ] त्ते पदं संग्रहेण ब्रवीन्योमित्तयेत [ तुझे नचिकेता उस पद का सार संक्षेप बताता हूः वह ओम नाम है ओम पद है।] ।।१५/२।। कठ।।
व्याख्या : हे नचिकेता ,जितने भी हमारे वेद ,दर्शन उपनिषद व पुराणादि ,शास्त्र है। इन सभी में ईश्वर की गुणगान है। इनमें उसकी विहंगम शक्तियो ,कारण परिणाम आदि विज्ञान प्रदर्शित होता है। जितने भी ऋषि मुनि हुए हैं वे सब परमात्मा का गुण गाण गाते रहते हैं । उसी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता होती है, यह मानकर ऋषिमुनी त्मा लोग आराधना साधना मे लीन रहते हैं। उसके लिए तरह-तरह के यज्ञ, मान, नियम, व्रत, उपासना, साधना,तीर्थ, व सत्संग आदि करते रहते हैं । सभी अपनी अपनी योग्यतानुसार संघर्ष करते हुए मार्ग अपनाते रहते है। किसी को सरलता से मिलता है तो किसी को जटिलता से ,बहुतो को तो मिलता ही नही । विभिन्न आश्रमो मे जीवन व्यतीत करते रहे है। ये सारे विषय ब्रह्मज्ञान के ही है । उसी को प्रसन्न करने के लिए, या परमात्मा तक जाने के लिए सब प्रयत्न किए जाते हैं। है नचिकेता, हमारे जितने सारे ग्रंथ है वह सब आत्मज्ञान के मार्ग को दिखाते रहते हैं। इस संसार मे जीवात्मा का एक मात्र लक्ष्य है भोग करते हुए दुखो से छुटकारा पाना । आत्मा की उन्नति ही सब कुछ है । इसे जानने के लिए आप जितना गहरा गहन अध्ययन करते जाओगे, उतना ही ज्ञान की सूक्ष्मता की ओर आपको चले जाओगे। इसका एकमात्र उपाय है ओम की उपासना ही सबकुछ है। ओम अक्षर अनंत है, परमात्मा का द्योतक है । ऐसा अक्षर है जो ईश्वर के समग्र शक्तियों को व्यक्त करता है और इसके उच्चारण से हमारा आत्म बल बढ़ता है।
भौतिक जगत तो हम अपने आंखों से देखते हैं और इंद्रियों से उसका छूकर अनुभव करते हैं किंतु हम अपनी आंखों को नहीं देख पाते हमें अपनी आंखों को देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है। इसी तरह यदि हम अपने आप को जांचना चाहते हैं परीक्षा लेना चाहते हैं । तो इसके लिए ज्ञान और प्रकाश की आवश्यकता है होती है ।यह केवल ईश्वर से ही प्राप्त होती है। बिना प्रकाश के हमारी आंखों की ज्योति भी काम नहीं कर सकती । जिस महान निराकार शक्ति ने इस नियम बध्द सृष्टी का सृजन किया है और हमे उसकी महिमा देखने और समझने का सौभाग्य मिला है। हमे भी उसी को समर्पित करना चाहिये । हमे भी उसी की उपासना करनी होगी जो सर्वशक्तिमान है सर्वव्यापी सर्वप्रकाशक, और सर्वांतर्यामी, अनादि है, अनंत है, अजन्मा है । हमे उसी की प्रसंशा ,भक्ति और उपासना करनी चाहिए। जो जो इस मार्ग को अपनाते रहे है वे परम पद पाने मे सफल हुए है।नचिकेता तू भी उसीतरह ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने मे सफल होगा।
****
कथा नचिकेता--
द्वितीय अध्याय श्लोक १६
*ओम अक्षर परम परम ब्रह्मा अक्षर है*
यमाचार्य नचिकेता से कहते हैं सब चारों वेदों में और पुराणों मे ओम शब्द की चर्चा है यही ओम शब्द ही सब कुछ है! यह ओम यह ओम तीन अक्षरों से बना हुआ है अब उ और म से बना हुआ है अ से अभिप्राय परमात्मा की व्यापकता उ से अभिप्राय परम परमात्मा की व्यापकता और म से अभिप्राय प्रकृति को गति देने का ज्ञान इस प्रकार ओम की महिमा ही सब कुछ है उसी से ईश्वर की प्राप्ति होती है । आगे वह नचिकेता से कहते हैं-----
एतध्द्येवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम्।
एतध्द्येवाक्षरं (यह दो अक्षर का ओम सच में अविनाशी है ।ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम्। (यह ब्रह्म होने के कारण सर्व व्यापक है और परम श्रेष्ठ अक्षर है)
एतध्द्येवाक्षरं ज्ञात्वा यदि इच्छिति तस्य तत् (यह हिंदू अक्षरों का इन दो अक्षरों का ज्ञान होने पर मनुष्य जो कुछ इच्छा करता है जो कुछ मनोरथ करता है वह सारे पूर्ण होते हैं )
भावार्थ: यमाचार्य नचिकेता से कहते हैं, ओम अक्षर सबसे महान और ब्रह्म शब्द है! इसको जानना ही परमात्मा को जानना है ओम की महिमा परमात्मा की महिमा है! ओम का गुणगान परमात्मा का गुणगान है! ओम आदि शब्द है अनादि शब्द है। हमारे लगभग सभी आध्यात्मिक ग्रंथों में ओम की चर्चा है ओम से शास्त्र आरंभ होते हैं ओम प्रकृति की पहली ध्वनि है! जो व्यक्ति इस ओम शब्द को जान जाता है समझो उसकी समस्त इच्छाएं और मनोकामनाएं पूरी होने को है इस ओम अक्षर को आत्मा के भीतर गहराई से गूंजायमान करने की आवश्यकता है!
एक अत्यंत लोकप्रिय भजन है *ओम जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करें। ओम जय जगदीश हरे।।*
यह सर्वोत्तम भजन है इस भजन में ईश्वर के सारे गुणों का विस्तार से वर्णन है! इसी के साथ यह संसार यह जगत कैसा है इसकी सारी विवेचना इस भजन में जितने अच्छी तरह से की गई है उतनी विवेचना कहीं नहीं है!

ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी
है‌ यही अनादि नाद, निर्विकल्प निर्विवाद
भूलते ना पूज्य पाद वीतराग योगी।।
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी ।।१
वेद को प्रमाण मान अर्थ वेद का बखान,
गा रहे गुणी सूजान साधूस्वर्ग होगी ।।
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी
शंकरादि नित्य नाम जो जपे बिसार काम
तो बने विवेक धाम मुक्ति क्यों न‌ होगी ।।
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी।।
जब आप किसी शब्द का अत्यंत अच्छे भाव से स्मरण करते हैं! तो उसके सारे अर्थ आपका हृदय में समाहित हो जाते हैं! और यह अर्थ पूर्ण भाव ईश्वर के पास जाते हैं! यही से आपके भीतर आपके भीतर संवेदना जागती है! उदारता आने लगती है आप अपने अस्तित्व को भूलकर परमात्मा के अस्तित्व को मानने लग जाता हैं! तो आपका स्मरण या भजन सार्थक होता है। ओम प्रभु का सर्वश्रेष्ठ नाम है। ओम के ज्ञान से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं! ओम के गुनगुनाने से आचरण विशुद्धता आती है! ओम से ज्ञानवर्धन होता है ज्ञानवर्धन होने से आप अनुचित कार्य नहीं करते पापमय कार्य नहीं करते हैं और पापमय कार्यो से दूर होने से आपकी आत्मा बलवान होती है प्रसन्न होती है !‌ और यही से सुख की प्राप्ति आरंभ होती है! ओम शब्द का उच्चारण करने से अंधकार दूर होता है और मानसिक प्रकाश आरंभ होता है इसलिए ओम का गुणगान ईश्वर का गुणगान माना जाता है ईश्वर का गुणगान अर्थात ईश्वर की हम आभारी है उन्होंने उसने हमें जन्म देकर यह संसार देखने का अवसर ही नहीं हमें समस्त प्रकार के भोग करने की स्वतंत्रता दी!‌ इस संसार में जो कुछ भी है सब जीव जगत के साथ-साथ मानव जाति के लिए ही है! क्योंकि मनुष्य समस्त जानवर में सर्वशक्तिमान है इसलिए इस संसार में सबसे अधिक आनंद लेने का अवसर मानव जाति को मिलता है!

Address

SP-5 Kwality Paradise Kolar Bhopal
Bhopal
462042

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Prakhar Samajik, Sahitik Avam Sanskritik Sanstha Bhopal posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Prakhar Samajik, Sahitik Avam Sanskritik Sanstha Bhopal:

Share