13/05/2025
कथा नचिकेता
द्वितीय परिच्छेद---१५
ईश्वर अथवा सबसे भिन्न है वह धर्म अधर्म से दूर है
एक गुरु ने शिष्य को दो बीज दिए । कहा , एक की सूक्ष्म परीक्षा करो। एक बीज को तोड़ तोड़ कर देखो कि इसमे कैसा बीज तत्व है ,है तो कहां है ? इसमें अंकुरण शक्ति कहां है ? क्यो आती है ? उसने बीज को तोडकर, कूटपीस कर देखा । केवल चूर्ण बना कर देखा । उसमे कुछ नहीं मिला । फिर भी गुरु कहते हैं दूसरा लीजिए इसी तरह का है। पर उसको खेत में बो दो, भूमि में, या प्याले मे रख थोडा जल डाल दो । तीन दिन के पश्चात अंकुरित हो जाएगा क्यो ? कैसै ? यह अंकुरण शक्ति कितनी सूक्ष्म है ? कैसै प्राण आते है इसमे ? इस सूक्ष्म ज्ञान को नचिकेता तुम समझ गये हो।
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मान्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भवाच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ।।१४/2।।
नचिकेता यमाचार्य से कहता है, वह ब्रह्म और उसका ज्ञान सबसे पृथक है, अन्यत्र [ जिसकी आप कल्पना नही कर सकते वह सर्वथा भिन्न है ] धर्मादन्यत्राधर्मान्यत्रास्मात्कृताकृतात् [ ।[ वह धर्म और अधर्म से भी पृथक है और कर्तव्य अकर्तव्य से पृथक है। अन्यत्र भूताच्च भवाच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ।।१४/2।। कार्य कारण से भी भिन्न है । जो भूतकाल , वर्तमान काल से आनेवाले समय भावी समय से भी वह भिन्न है यह सब कृपया मुझे उसका ज्ञान दो ]
ईश्वरीय शक्ति का क्या कहने अपरम्पार है । जो परमात्मा जन्म नही लेता, उसे कैसा दुख सुख,आनंद और योग वियोग ? उसमें मोह माया, ईर्षा द्वेष और मतभेद कैसे हो सकता है ? उसमे कैसा धर्म अधर्म होगा ? उसमें कैसा सत्य असत्य ? उसमें किस प्रकार और क्यो मानवीय दोष आ सकते हैं ? उसकी कोई कामनाए ही नही है।कुछ नहीं । वह सबसे भिन्न है अनंत है विराट है सर्वव्यापक है। वह भूतकाल से पहले भी था, वर्तमान में भी है, और भविष्य में भी रहेगा। उसकी शक्ति सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च है । वह न्यायकारी है सर्वज्ञ और सर्वत्र है । ऐसे अदृश्य महाशक्ति का जितना वर्णन किया जाए कम है । नचिकेता विनयपूर्वक कहता है, तो है गुरुदेव यमाचार्य , मुझे इसी की जानकारी नही चाहिए, मुझे तो इस ब्रह्म की अनुभूति कराईयै , जिससे मैं संतुष्ट हो सकूं वह कार्य नहीं करता कार्य हो जाता है। वह दिखाई नही देता किंतु वह सब देखता है। उसकी सबसे अलग दृष्टि है। मैं उस अनंत को जानना चाहता हूं।आनंद की चाह करनेवाला क्षणिक आनंद नही चाहता वह नित्य परमानंद चाहता है।
प्रत्येक क्रिया का कोई कोई कारण प्रयोजन होता है और क्रिया तभी संपन्न होती है जब कारण होता है । क्रिया की प्रतिक्रिया होती है । इस जड प्रकृति मे क्या शाश्वत है और क्या नष्ट होता रहता है और क्या है जो शेष रहता है ? जिसे परम सुख कहा जाता है , कहा है ? वह जानता चाहता था कि उसे किस प्रकार परमानंद की प्राप्ति क्या और कैसी होती है । नचिकेता को भौतिक संम्पदा, धन- धान्य, पशु-पक्षी , सोना -चांदी, हीरे- मोती आदि का मोह नहीं था । यदि मोह होता तो यमाचार्य के पास क्यो जाता ? अपने पिता से विवाद करता रहता ! यह सब सुनने के पश्चात यमाचार्य उत्तर देते है। उसे ब्रह्म को प्राप्त करने की इच्छा थी और इसीलिए यमाचार्य से प्रार्थना कर रहा था।
कथा नचिकेता ---29
ओम ही ब्रह्म ज्ञान का पाठ है
नचिकेता को भौतिक संम्पदा, धन ,धान्य, पशु-पक्षी , सोना चांदी, हीरे मोती आदि का मोह नहीं था। यदि मोह होता तो यमाचार्य के पास क्यो जाता ? अपने पिता से विवाद करता रहता ! यह सब सुनने के पश्चात यमाचार्य उत्तर देते है
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाsसि सर्वाणि च यद्वदंति । यदिच्छिन्तो ब्रह्मचर्य चरंति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीन्योमित्तयेत [।।१५/२।। कठ।।
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाsसि सर्वाणि च यद्वदंति । यदिच्छिन्तो ब्रह्मचर्य चरंति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीन्योमित्तयेत ।।१५/२।। कठ।।
सर्वे वेदा [ सभी यानी वेद, चारो ऋग, यजु, साम और अथर्ववेद वेद और उपवेद आदि ] यत्पदमामनन्ति [ जिस ब्रह्मज्ञान के पद का अर्थात ओम का गुणगान गाते है। म तपाsसि [ यम नियम आदि सब प्रकार के तप आदि नियम ] सर्वाणि च यद्वदंति [ जिन्हे सभी गुणी जन बताते रहते है ।] यदिच्छिन्तो ब्रह्मचर्य चरंति [ चाहते हुए ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करते हे ] त्ते पदं संग्रहेण ब्रवीन्योमित्तयेत [ तुझे नचिकेता उस पद का सार संक्षेप बताता हूः वह ओम नाम है ओम पद है।] ।।१५/२।। कठ।।
व्याख्या : हे नचिकेता ,जितने भी हमारे वेद ,दर्शन उपनिषद व पुराणादि ,शास्त्र है। इन सभी में ईश्वर की गुणगान है। इनमें उसकी विहंगम शक्तियो ,कारण परिणाम आदि विज्ञान प्रदर्शित होता है। जितने भी ऋषि मुनि हुए हैं वे सब परमात्मा का गुण गाण गाते रहते हैं । उसी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता होती है, यह मानकर ऋषिमुनी त्मा लोग आराधना साधना मे लीन रहते हैं। उसके लिए तरह-तरह के यज्ञ, मान, नियम, व्रत, उपासना, साधना,तीर्थ, व सत्संग आदि करते रहते हैं । सभी अपनी अपनी योग्यतानुसार संघर्ष करते हुए मार्ग अपनाते रहते है। किसी को सरलता से मिलता है तो किसी को जटिलता से ,बहुतो को तो मिलता ही नही । विभिन्न आश्रमो मे जीवन व्यतीत करते रहे है। ये सारे विषय ब्रह्मज्ञान के ही है । उसी को प्रसन्न करने के लिए, या परमात्मा तक जाने के लिए सब प्रयत्न किए जाते हैं। है नचिकेता, हमारे जितने सारे ग्रंथ है वह सब आत्मज्ञान के मार्ग को दिखाते रहते हैं। इस संसार मे जीवात्मा का एक मात्र लक्ष्य है भोग करते हुए दुखो से छुटकारा पाना । आत्मा की उन्नति ही सब कुछ है । इसे जानने के लिए आप जितना गहरा गहन अध्ययन करते जाओगे, उतना ही ज्ञान की सूक्ष्मता की ओर आपको चले जाओगे। इसका एकमात्र उपाय है ओम की उपासना ही सबकुछ है। ओम अक्षर अनंत है, परमात्मा का द्योतक है । ऐसा अक्षर है जो ईश्वर के समग्र शक्तियों को व्यक्त करता है और इसके उच्चारण से हमारा आत्म बल बढ़ता है।
भौतिक जगत तो हम अपने आंखों से देखते हैं और इंद्रियों से उसका छूकर अनुभव करते हैं किंतु हम अपनी आंखों को नहीं देख पाते हमें अपनी आंखों को देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है। इसी तरह यदि हम अपने आप को जांचना चाहते हैं परीक्षा लेना चाहते हैं । तो इसके लिए ज्ञान और प्रकाश की आवश्यकता है होती है ।यह केवल ईश्वर से ही प्राप्त होती है। बिना प्रकाश के हमारी आंखों की ज्योति भी काम नहीं कर सकती । जिस महान निराकार शक्ति ने इस नियम बध्द सृष्टी का सृजन किया है और हमे उसकी महिमा देखने और समझने का सौभाग्य मिला है। हमे भी उसी को समर्पित करना चाहिये । हमे भी उसी की उपासना करनी होगी जो सर्वशक्तिमान है सर्वव्यापी सर्वप्रकाशक, और सर्वांतर्यामी, अनादि है, अनंत है, अजन्मा है । हमे उसी की प्रसंशा ,भक्ति और उपासना करनी चाहिए। जो जो इस मार्ग को अपनाते रहे है वे परम पद पाने मे सफल हुए है।नचिकेता तू भी उसीतरह ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने मे सफल होगा।
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कथा नचिकेता--
द्वितीय अध्याय श्लोक १६
*ओम अक्षर परम परम ब्रह्मा अक्षर है*
यमाचार्य नचिकेता से कहते हैं सब चारों वेदों में और पुराणों मे ओम शब्द की चर्चा है यही ओम शब्द ही सब कुछ है! यह ओम यह ओम तीन अक्षरों से बना हुआ है अब उ और म से बना हुआ है अ से अभिप्राय परमात्मा की व्यापकता उ से अभिप्राय परम परमात्मा की व्यापकता और म से अभिप्राय प्रकृति को गति देने का ज्ञान इस प्रकार ओम की महिमा ही सब कुछ है उसी से ईश्वर की प्राप्ति होती है । आगे वह नचिकेता से कहते हैं-----
एतध्द्येवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम्।
एतध्द्येवाक्षरं (यह दो अक्षर का ओम सच में अविनाशी है ।ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम्। (यह ब्रह्म होने के कारण सर्व व्यापक है और परम श्रेष्ठ अक्षर है)
एतध्द्येवाक्षरं ज्ञात्वा यदि इच्छिति तस्य तत् (यह हिंदू अक्षरों का इन दो अक्षरों का ज्ञान होने पर मनुष्य जो कुछ इच्छा करता है जो कुछ मनोरथ करता है वह सारे पूर्ण होते हैं )
भावार्थ: यमाचार्य नचिकेता से कहते हैं, ओम अक्षर सबसे महान और ब्रह्म शब्द है! इसको जानना ही परमात्मा को जानना है ओम की महिमा परमात्मा की महिमा है! ओम का गुणगान परमात्मा का गुणगान है! ओम आदि शब्द है अनादि शब्द है। हमारे लगभग सभी आध्यात्मिक ग्रंथों में ओम की चर्चा है ओम से शास्त्र आरंभ होते हैं ओम प्रकृति की पहली ध्वनि है! जो व्यक्ति इस ओम शब्द को जान जाता है समझो उसकी समस्त इच्छाएं और मनोकामनाएं पूरी होने को है इस ओम अक्षर को आत्मा के भीतर गहराई से गूंजायमान करने की आवश्यकता है!
एक अत्यंत लोकप्रिय भजन है *ओम जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करें। ओम जय जगदीश हरे।।*
यह सर्वोत्तम भजन है इस भजन में ईश्वर के सारे गुणों का विस्तार से वर्णन है! इसी के साथ यह संसार यह जगत कैसा है इसकी सारी विवेचना इस भजन में जितने अच्छी तरह से की गई है उतनी विवेचना कहीं नहीं है!
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी
है यही अनादि नाद, निर्विकल्प निर्विवाद
भूलते ना पूज्य पाद वीतराग योगी।।
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी ।।१
वेद को प्रमाण मान अर्थ वेद का बखान,
गा रहे गुणी सूजान साधूस्वर्ग होगी ।।
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी
शंकरादि नित्य नाम जो जपे बिसार काम
तो बने विवेक धाम मुक्ति क्यों न होगी ।।
ओम अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी।।
जब आप किसी शब्द का अत्यंत अच्छे भाव से स्मरण करते हैं! तो उसके सारे अर्थ आपका हृदय में समाहित हो जाते हैं! और यह अर्थ पूर्ण भाव ईश्वर के पास जाते हैं! यही से आपके भीतर आपके भीतर संवेदना जागती है! उदारता आने लगती है आप अपने अस्तित्व को भूलकर परमात्मा के अस्तित्व को मानने लग जाता हैं! तो आपका स्मरण या भजन सार्थक होता है। ओम प्रभु का सर्वश्रेष्ठ नाम है। ओम के ज्ञान से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं! ओम के गुनगुनाने से आचरण विशुद्धता आती है! ओम से ज्ञानवर्धन होता है ज्ञानवर्धन होने से आप अनुचित कार्य नहीं करते पापमय कार्य नहीं करते हैं और पापमय कार्यो से दूर होने से आपकी आत्मा बलवान होती है प्रसन्न होती है ! और यही से सुख की प्राप्ति आरंभ होती है! ओम शब्द का उच्चारण करने से अंधकार दूर होता है और मानसिक प्रकाश आरंभ होता है इसलिए ओम का गुणगान ईश्वर का गुणगान माना जाता है ईश्वर का गुणगान अर्थात ईश्वर की हम आभारी है उन्होंने उसने हमें जन्म देकर यह संसार देखने का अवसर ही नहीं हमें समस्त प्रकार के भोग करने की स्वतंत्रता दी! इस संसार में जो कुछ भी है सब जीव जगत के साथ-साथ मानव जाति के लिए ही है! क्योंकि मनुष्य समस्त जानवर में सर्वशक्तिमान है इसलिए इस संसार में सबसे अधिक आनंद लेने का अवसर मानव जाति को मिलता है!