06/08/2025
*"आदिवासी एकता का संदेश दिलों तक पहुंचाएं, उपजातीय भेदभाव की दीवारें मिलकर गिराएं!"*- *एड. सुनील कुमार आदिवासी*
यह कोई नारा भर नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक सुधार की पुकार है, जिसे वर्षों से *राष्ट्रीय आदिवासी जनक्रांति संघ के प्रमुख एडवोकेट सुनील कुमार आदिवासी* समाज के सामने मजबूती से रखते आ रहे हैं। उनका स्पष्ट और दूरदर्शी विचार है – *“नाम के साथ उपजाति नहीं, सिर्फ ‘आदिवासी’ लिखें।”* यह सोच एक छोटी सी शुरुआत लग सकती है, लेकिन समाज में बड़ी एकता का मजबूत आधार बन सकती है, क्योंकि जब हम उपजातीय पहचान को प्राथमिकता देते हैं, तो हम खुद को बाँटते हैं, और आपसी शक, भेद और द्वेष को जन्म देते हैं — जिसका सीधा फायदा सत्ता में बैठे वे लोग उठाते हैं जो आदिवासी समाज को कभी संगठित नहीं देखना चाहते।
आज कई मंचों पर *"एक तीर एक कमान, आदिवासी एक समान"* का नारा जोरशोर से लगाया जाता है, लेकिन जब खुद को 'आदिवासी' कहने या लिखने की बात आती है, तो वही लोग झिझकते हैं। सवाल उठता है – अगर हम वाकई आदिवासी एकता के पक्षधर हैं, तो नाम के साथ ‘आदिवासी’ लिखने में गर्व क्यों नहीं ? नारे लगाने से क्रांति नहीं आती, क्रांति आती है जब विचार आचरण में उतरे। *यही सोच एड. सुनील कुमार आदिवासी जी को विशिष्ट बनाती है* — क्योंकि वे सिर्फ मंचीय भाषण नहीं देते, बल्कि वैचारिक दिशा प्रदान करते हैं।
उनकी यह पहल सिर्फ पहचान बदलने की नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज को उपजातीय जंजीरों से मुक्त कर एक साझा, संगठित और स्वाभिमानी पहचान की ओर ले जाने का रास्ता है। यह सोच युवाओं के सामने आत्ममंथन का सवाल रखती है — कि क्या वे दिखावे के उत्सवों तक सीमित रहेंगे या आने वाले सामाजिक बदलाव की अगुवाई करेंगे ?
यह विचार आज की उस पीढ़ी के लिए है जो कुछ करना तो चाहती है, लेकिन दिशा नहीं जानती।
*आगामी 9 अगस्त, विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर हम सबको यह विचार आत्मसात कर एक दृढ़ संकल्प लेना चाहिए कि हम अब से अपने नाम के साथ किसी उपजाति का उल्लेख नहीं करेंगे, सिर्फ 'आदिवासी' लिखेंगे।*
यह न केवल हमारे भीतर एकता का भाव पैदा करेगा, बल्कि आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर हमारी स्पष्ट और सशक्त उपस्थिति भी तय करेगा। खासकर जब हाल ही में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा समाज के वर्गीकरण से जुड़े जो निर्णय सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए भी यह आवश्यक हो गया है कि हम अपनी पहचान को उपजातीय खांचों से निकालकर समग्र ‘आदिवासी’ रूप में प्रस्तुत करें।
*'आदिवासी' शब्द सिर्फ एक जातीय टैग नहीं, बल्कि यह इतिहास, संघर्ष, हक, अस्तित्व और आत्मसम्मान का प्रतीक है।*
जब हम इसे अपने नाम से जोड़ते हैं, तो हम अकेले नहीं बोलते — तब पूरी आदिवासी चेतना बोलती है। यह सिर्फ एक पहल नहीं, एक वैचारिक क्रांति है, जो आने वाले समय में आदिवासी समाज को नई दिशा और नई पहचान देने जा रही है।
एड. सुनील कुमार आदिवासी की यह सोच आने वाले समय में सामाजिक समरसता, राजनीतिक सजगता और आत्मसम्मान आधारित नेतृत्व निर्माण की बुनियाद रखेगी।
यह विचार जितना सरल है, उतना ही शक्तिशाली भी। यही वह बीज है, जिससे भविष्य की सामाजिक क्रांति का वृक्ष उगेगा।
*हर युवा आदिवासी को यह कदम उठाना आसान नहीं होता, लेकिन नामुमकिन भी नहीं है।*
वे कहते हैं — एक बार इस जनपक्षधर पहल का हिस्सा बनकर देखो, तो खुद में आत्मसम्मान, पहचान और ज़िम्मेदारी की भावना जाग उठती है। जब आप अपने जल, जंगल, ज़मीन और हक़ की लड़ाई का हिस्सा बनते हैं, तो सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक बदलाव का चेहरा बन जाते हैं। यही वह क्षण होता है, जब युवा अपनी असल ताकत को पहचानता है — और उस ताकत का सही उपयोग करने का जुनून उसे एक आदर्श समाज का निर्माता बना देता है।
#विश्व_आदिवासी_दिवस
Adv Suneel Kumar Adiwasi