25/08/2026
यह चौपाई हमें सिखाती है कि जब हम जीवन की उलझनों और निर्णयों से थक जाएँ, तो हमें अपने प्रभु के शरण जाना चाहिए और ईश्वर के विधान पर विश्वास रखना चाहिए।
हमें प्रभु से यह नहीं कहना चाहिए कि "मुझे धन, पद, सुख या मोक्ष चाहिए।" इसके विपरीत, हमें अपना संपूर्ण दायित्व प्रभु पर छोड़ देना चाहिए। हमें मानना चाहिए कि हम स्वयं इतना सक्षम या बुद्धिमान नहीं है कि यह जान सके कि हमारा वास्तविक कल्याण किस चीज़ में है।
'दास भाव' सनातन भक्ति परंपरा का एक मुख्य स्तंभ है। जब भक्त स्वयं को ईश्वर का 'दास' स्वीकार कर लेता है, तब उसके अंदर का अहंकार समाप्त हो जाता है।
स्वामी का कर्तव्य होता है अपने सेवक की रक्षा करना और उसका ध्यान रखना, और भक्त इसी विश्वास के साथ निश्चिंत हो जाता है। यही दासत्व का भाव हम सभी में होना चाहिए।
जब हम अपनी इच्छाओं को त्यागकर प्रभु की इच्छा में अपनी सहमति मिला देते हैं, तब मन को असीम शांति मिलती है और जीवन का सच्चा मार्ग प्रशस्त होता है।
चौपाई
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा।
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
निज माया बल देखि बिसाला।
हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥
भावार्थ-
हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिए। मैं आपका दास हूँ। अपनी माया का विशाल बल देख दीनदयालु भगवान मन-ही-मन हँसकर बोले -