13/06/2026
*🙏🌹ॐ सुप्रभात🌹🙏*
*🌻 निंदा रस से बचिये !!🌻*
बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में राजा रघुवीर का शासन था। *वे पराक्रमी और न्यायप्रिय तो थे, परंतु कभी-कभी क्रोध में आकर बिना सोचे-समझे निर्णय कर बैठते थे।* एक दिन प्रातःकाल राजा रघुवीर महल के घोड़ों के तबेले का निरीक्षण करने पहुँचे। उसी समय वहाँ एक साधु भिक्षा माँगने आ गया। सुबह-सुबह साधु को भिक्षा माँगते देखकर राजा को क्रोध आ गया। *उन्होंने साधु की निंदा करते हुए बिना सोचे-समझे तबेले से घोड़े की लीद उठाई और उसे साधु के भिक्षापात्र में डाल दी।* साधु अत्यंत शांत और धैर्यवान स्वभाव का था। उसने बिना कुछ कहे वही भिक्षा स्वीकार की और वहाँ से चला गया। अपनी कुटिया पर पहुँचकर उसने वह लीद बाहर एक कोने में डाल दी।
कुछ समय बाद राजा रघुवीर शिकार के लिए जंगल की ओर गए। जंगल में घूमते-घूमते वे उसी साधु की कुटिया के पास पहुँच गए। उन्होंने देखा कि कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का बहुत बड़ा ढेर लगा हुआ है।राजा आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने सोचा- यहाँ न तो कोई तबेला है और न ही आस-पास कोई घोड़ा दिखाई दे रहा है,फिर इतनी सारी लीद यहाँ कैसे आ गई?वे कुटिया के भीतर गए और साधु से बोले- *महाराज !! यहाँ न कोई घोड़ा है और न तबेला,फिर यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहाँ से आयी?* साधु मुस्कराए और शांत स्वर में बोले- *राजन् !! यह लीद मुझे एक राजा ने भिक्षा में दी थी। समय आने पर यह सब उसी को ही खाना पड़ेगा।*
यह सुनते ही राजा रघुवीर को अपनी गलती याद आ गई। वे तुरंत साधु के चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे।राजा ने विनम्रता से पूछा- *महाराज !! मैंने तो आपको थोड़ी सी लीद दी थी,पर यहाँ तो इतना बड़ा ढेर हो गया है?*
साधु बोले- *राजन् !! मनुष्य जो कुछ भी किसी को देता है,वह समय के साथ बढ़ता जाता है और अंततः उसी के पास लौटकर आता है। यह उसी कर्म का परिणाम है।*
यह सुनकर राजा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने साधु से विनती की-
महाराज !! मुझे क्षमा कर दीजिए। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं अपने इस पाप का प्रायश्चित कर सकूँ।राजा की पश्चाताप भरी अवस्था देखकर साधु बोले- *राजन् !! एक उपाय है। आपको ऐसा कार्य करना होगा जो देखने में गलत लगे,पर वास्तव में गलत न हो। जब लोग आपको ऐसा करते देखेंगे,तो वे आपकी निंदा करेंगे। जितने लोग आपकी निंदा करेंगे,आपका पाप उतना ही हल्का होता जाएगा,क्योंकि आपकी निंदा करने वाले आपके पाप का भाग अपने ऊपर ले लेंगे।* अगले दिन राजा रघुवीर ने साधु की बात मान ली। वे सुबह-सुबह हाथ में शराब की बोतल लेकर नगर के चौराहे पर बैठ गए और शराबी होने का अभिनय करने लगे।राजा को इस अवस्था में देखकर नगर के लोग आपस में बातें करने लगे-
*कैसा राजा है !!*
*यह तो राज्य की मर्यादा का अपमान है!*
*राजा होकर ऐसा आचरण करना शोभा नहीं देता!*
पूरा दिन लोग उनकी निंदा करते रहे और राजा चुपचाप यह सब सहते रहे।संध्या को राजा फिर साधु की कुटिया पर पहुँचे। *उन्होंने देखा कि जहाँ पहले लीद का बड़ा ढेर था,वहाँ अब केवल एक मुट्ठी लीद ही बची हुई थी।*
राजा आश्चर्य से बोले-
*महाराज !! इतना बड़ा ढेर कहाँ चला गया?*
साधु बोले- *राजन्! जिन-जिन लोगों ने आज आपकी अनुचित निंदा की है,आपके पाप का भाग उनमें बाँट गया है। इसलिए ढेर छोटा हो गया।*
राजा ने फिर पूछा- *महाराज !! फिर यह मुट्ठी भर क्यों बची है?*
साधु ने गंभीर स्वर में कहा-
*राजन् !! यह तुम्हारा अपना कर्म है। जितना तुमने मुझे भिक्षा में दिया था,उसका फल तुम्हें स्वयं ही भोगना पड़ेगा।*
यह सुनकर राजा रघुवीर को कर्म का गूढ़ सत्य समझ आ गया।
*शिक्षा- मनुष्य जैसा कर्म करता है,वैसा ही फल उसे अवश्य मिलता है। चाहे कितना भी दान-पुण्य कर लें,पर अपने कर्मों का मूल फल भोगना ही पड़ता है। इसलिए किसी की निंदा करने से बचना चाहिए और सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए।*
*🌻अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।🌻*
*हम बदलेंगे,युग बदलेगा।*
*हम सुधरेंगे,युग सुधरेगा।।*
*आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।*