03/05/2026
स्वतंत्र पत्रकारिता के समाप्त होने के मायने
- डॉ. भरत सिंह ओला
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 ने जिस वास्तविकता को उजागर किया है, वह बेहद चिंता जनक है । यह केवल एक रिपोर्ट नहीं है बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य का आईना है । दुनिया के 52% से अधिक देशों में प्रेस बेहद बुरी स्थिति में है । दुखद बात यह है कि यह पिछले 25 वर्षों का सबसे निचला स्तर है । उत्तर कोरिया, चीन और अफगानिस्तान जैसे देशों में जहां खुले तौर पर दमनकारी नीति अपनाई जाती रही है, वहीं लोकतांत्रिक देशों में भी मीडिया पर नियंत्रण के अधिक सूक्ष्म और संरचनात्मक तरीके विकसित हो चुके हैं ।
इस वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत का 157वां स्थान चिंता को और गहरा करता है । भारत की पत्रकारिता पर अगर एक विस्तृत दृष्टि डालेंगे तो समझेंगे कि हम कहां से कहां पहुंच गए । दरअसल भारतीय पत्रकारिता के ऐतिहासिक विकास को समझे बिना इसे ठीक से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए हमें भारतीय पत्रकारिता के तीन स्तरों को देखना होगा । पहली - औपनिवेशिक काल की पत्रकारिता, दूसरी - स्वतंत्रता के बाद 2014 तक की पत्रकारिता और तीसरी - 2014 के बाद की पत्रकारिता , तो एक स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है ।
स्वतंत्रता से पहले भारतीय पत्रकारिता मूलतः एक मिशन थी। बाल गंगाधर तिलक का ‘केसरी’ हो या महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ या इसी तरह के दूसरे समाचार पत्र । ये केवल समाचार पत्र नहीं थे बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के औजार थे । उस दौर की पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के साथ सामंजस्य नहीं बल्कि उसका प्रतिरोध था । अंग्रेजी शासन के कठोर दमन , प्रेस एक्ट और सेंसरशिप के बावजूद पत्रकारों ने जोखिम उठाकर जनता तक सच पहुंचाया । उस समय पत्रकारिता का चरित्र संघर्षशील , वैचारिक और जनपक्षीय था ।
स्वतंत्रता के बाद 2014 तक का दौर अपेक्षाकृत संस्थागत स्वतंत्रता का काल माना जा सकता है हालांकि इसमें भी अपवाद रहे , जैसे आपातकाल (1975–77), जब प्रेस पर सीधा सेंसर लगा। फिर भी, इस लंबे दौर में मीडिया ने सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा बनाए रखी । रामनाथ गोयनका जैसे मीडिया स्वामी और कुलदीप नैयर जैसे पत्रकारों के साथ साथ अनेक पत्रकार सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते थे। इस दौर में खोजी पत्रकारिता , संपादकीय स्वतंत्रता और विविध विचारों का स्थान बना रहा । मीडिया में कॉर्पोरेट प्रभाव धीरे धीरे बढ़ा लेकिन फिर भी संपादकीय स्वायत्तता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी ।
2014 के बाद का दौर एक नए प्रकार के मीडिया ढांचे को प्रस्तुत करता है , जिसमें प्रत्यक्ष सेंसरशिप कम दिखाई देती है लेकिन नियंत्रण अधिक गहरा और बहुआयामी है । आर्थिक दबाव , सरकारी विज्ञापन , कानूनी प्रावधान और जांच एजेंसियों की सक्रियता , ये सभी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं , जहां मीडिया संस्थान स्वयं ही सीमाएं तय करने लगते हैं । इन वर्षों में कॉर्पोरेट स्वामित्व और सत्ता के बीच निकटता ने संपादकीय स्वतंत्रता को और सीमित किया है । परिणामस्वरूप मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जब सत्ता समर्थक नैरेटिव को प्राथमिकता देने लगता है , तब आलोचनात्मक पत्रकारिता हाशिए पर चली जाती है । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह परिवर्तन सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है , जहां बहस का स्तर तथ्यात्मक संवाद से हटकर आक्रामक विमर्श और ध्रुवीकरण में तब्दील हो जाता है । इस परिदृश्य में कई स्वतंत्र पत्रकारों ने मुख्यधारा से दूरी बनाई । रवीश कुमार का इस्तीफा , बॉबी घोष के पद छोड़ना , नेहा दीक्षित , प्रिय प्रसून बाजपेई ,अभिसार शर्मा जैसे अनेक पत्रकारों का स्वतंत्र पत्रकारिता की ओर रुख करना , केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि व्यापक संरचनात्मक दबावों के संकेत हैं ।
इसके साथ साथ दमन के प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने आए हैं । आसिफ सुल्तान और इरफान मेहराज जैसे पत्रकारों की गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का उपयोग पत्रकारिता पर भी लागू हो सकता है । पत्रकारों की हत्याएं , उन पर हमले , धमकियां और कानूनी कार्रवाई का बढ़ता ग्राफ इस बात की पुष्टि करता है कि पत्रकारिता का पेशा अब अधिक जोखिमपूर्ण हो गया है ।
यदि इन तीनों चरणों की तुलना की जाए , तो एक स्पष्ट परिवर्तन सामने आता है । औपनिवेशिक काल में पत्रकारिता सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम थी , जो स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक लोकतांत्रिक संतुलन का साधन बनी रही लेकिन हाल के वर्षों में वह धीरे धीरे सत्ता और संरचनात्मक दबावों के प्रभाव में आती दिखाई देने लगी है ।
यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक है । आने वाले दिनों में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे । इससे सूचना का एकाधिकार सीमित होने लगेगा , जिससे नागरिकों तक केवल चयनित जानकारी पहुंचेगी । विपक्ष और असहमति की आवाज कमजोर होगी , जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ेगा । जब मीडिया सवाल पूछना बंद कर देगा , तो शासन की जवाबदेही भी कम हो जाएगी और संस्थाएं धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगेंगी । सबसे बड़ा खतरा यह है कि मीडिया जनमत का निर्माण करने के बजाय उसका प्रबंधन करने लगेगा । प्रेस की स्वतंत्रता का संकट केवल मीडिया का संकट नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र के भविष्य का संकट है । यदि यह प्रवृत्ति जारी रही , तो लोकतंत्र का स्वरूप धीरे धीरे बदलने लगेगा , जहां चुनाव तो होंगे लेकिन नागरिकों के पास निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय जानकारी नहीं होगी ।
स्वतंत्र पत्रकारिता का समाप्त होना सिर्फ किसी समूह का समाप्त होना नहीं है बल्कि उन जीवंत लोगों का समाप्त होना है , जिसकी बदौलत लोकतांत्रिक भारत अपने होने के सबूत के साथ मजबूती से खड़ा है । यह उन जीवंत आदर्शों का समाप्त होना है , जिनको हमारे बुजुर्गों ने बड़ी मेहनत से हमारे सामने प्रस्तुत किए थे । आज आवश्यकता केवल इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करने की नहीं है बल्कि उस मूल भावना को पुनर्जीवित करने की है , जिसने भारतीय पत्रकारिता को जन्म दिया था । सत्ता से सवाल पूछने की निर्भीकता और जनता के प्रति जवाबदेही ही सच्ची पत्रकारिता है । यही वह आधार है , जिस पर एक सशक्त और जीवंत लोकतंत्र खड़ा रह सकता है ।
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