Bharat Ola

Bharat Ola Author Hindi & Rajasthani Language
(1)

22/05/2026

बच्चे में सुधार से ख़ुशी ❤️🙏ujaas special academy, nohar

लो जी ! आपकी सेवा में कवर पेज हाजिर है । कवर पेज को डिजाइन किया है भाई हरदीप सिंह हनुमानगढ़ ने । पुस्तक का कवर पेज बहुत ...
22/05/2026

लो जी ! आपकी सेवा में कवर पेज हाजिर है । कवर पेज को डिजाइन किया है भाई हरदीप सिंह हनुमानगढ़ ने । पुस्तक का कवर पेज बहुत कुछ कह जाता है । शुक्रिया भाई हरदीप सिंह जी ! हरदीप सिंह जी के बारे में जल्दी ही ...

उपखंड अधिकारी राहुल श्रीवास्तव (IAS) ने किया उजास स्पेशल अकादमी की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट का विमोचनसीमित संसाधनों में सं...
19/05/2026

उपखंड अधिकारी राहुल श्रीवास्तव (IAS) ने किया उजास स्पेशल अकादमी की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट का विमोचन
सीमित संसाधनों में संस्थान का कार्य सराहनीय, प्रशासन देगा हरसंभव सहयोग
नोहर, राजस्थानी लोक संस्थान द्वारा संचालित उजास स्पेशल अकादमी में सोमवार को उपखंड अधिकारी राहुल श्रीवास्तव का आगमन हुआ। इस अवसर पर उन्होंने संस्थान की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट वर्ष 2025–2026 का विमोचन किया तथा संस्थान की गतिविधियों की सराहना की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार एवं संस्थान से जुड़े सदस्य उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में उपखंड अधिकारी राहुल श्रीवास्तव ने कहा कि यह उनके लिए अत्यंत सुखद अनुभव है कि सीमित संसाधनों के बावजूद राजस्थानी लोक संस्थान विशेष बच्चों के लिए निरंतर बेहतर कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्था की वास्तविक सफलता बच्चों के चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी और आत्मविश्वास से आंकी जा सकती है तथा उजास स्पेशल अकादमी में विशेष बच्चों के चेहरों पर दिखाई दे रही मुस्कान एक सकारात्मक और प्रेरणादायक संकेत है।
उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग का दायित्व है कि वह विशेष बच्चों के विकास और शिक्षा में सहयोग प्रदान करे। प्रशासन की ओर से संस्थान को हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी संस्थाएं समाज में संवेदनशीलता और समावेशी शिक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। इस अवसर पर उन्होंने विशेष बच्चों द्वारा बनाई गई विभिन्न कलाकृतियों का अवलोकन करते हुए बच्चों के रचनात्मक कौशल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की ।
कार्यक्रम में संस्थान के अध्यक्ष डॉ. भरत ओला ने संस्थान की विभिन्न गतिविधियों, उपलब्धियों तथा भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उजास स्पेशल अकादमी विशेष बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण एवं रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से निरंतर कार्य कर रही है।
संस्थान के कोषाध्यक्ष लक्ष्मी नारायण कस्वां ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि सचिव भागमल सैनी ने कार्यक्रम के अंत में सभी का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर नायब तहसीलदार संजीव सियाग, संस्थान से जुड़े श्योचंद घिटाला ,जगदीश प्रसाद ढाका, डॉ. दिलीप सिंह सिहाग, रामेश्वर लाल सहारण, भंवर सिंह चौधरी, सुरेंद्र सिंह बेनीवाल, शिवराज सिंह बारहठ, राहुल बेनीवाल, राजबाला बेनीवाल, सरोज ओला, विशेष शिक्षक नरेश नुइयां, खुशी शर्मा, नीलम चौधरी, कमलेश, पत्रकार जेके वर्मा, राकेश नागल, महबूब अली सहित बड़ी संख्या में अभिभावक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। इनमें नीरू पंडा, संजीव कुमार सौकरिया, हमीदा बानो, विकास चौधरी, खंडासिंह, दर्शना, इंदू, महेंद्र स्वामी, असलम एवं करण सोनी आदि प्रमुख रूप से शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय राजस्थानी भाषा के स्वर्णिम भविष्य का संकेत- डॉ. भरत सिंह ओला भारत जैसे बहुभाषी और बहुसा...
13/05/2026

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय राजस्थानी भाषा के स्वर्णिम भविष्य का संकेत
- डॉ. भरत सिंह ओला
भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि वह व्यक्ति की पहचान , संस्कृति , चेतना और अस्तित्व का आधार है । किसी भी समाज की आत्मा उसकी मातृभाषा में बसती है । जब कोई बालक अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करता है तब वह केवल अक्षरज्ञान ही नहीं प्राप्त करता बल्कि अपनी संस्कृति , परंपरा और सामाजिक चेतना से भी जुड़ता है । यही कारण है कि विश्वभर में मातृभाषा आधारित शिक्षा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।
आज राजस्थानी भाषा के संदर्भ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया ऐतिहासिक निर्णय केवल एक न्यायिक आदेश नहीं बल्कि करोड़ों राजस्थानी भाषियों की अस्मिता , अधिकार और भविष्य की विजय का संकेत है । यह निर्णय राजस्थानी भाषा आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा ।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट कहा है कि भाषा व्यक्ति के अस्तित्व संबंधी अधिकार का विषय है और शिक्षा तभी सार्थक हो सकती है जब वह उस भाषा में दी जाए , जिसे बालक सहज रूप से समझ सके । न्यायालय ने यह भी माना कि मातृभाषा में शिक्षा देना केवल नीतिगत विषय नहीं बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है ।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में राजस्थानी भाषा को स्थानीय / क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने तथा राजस्थान सरकार को राजस्थानी भाषा में शिक्षा संबंधी समग्र नीति बनाने का निर्देश दिया है । न्यायालय ने यह भी कहा कि राजस्थानी भाषा को चरणबद्ध तरीके से विद्यालयों में विषय के रूप में लागू किया जाए।
यह निर्णय उन लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को नई दिशा देगा जो वर्षों से अपनी मातृभाषा में शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित रहे हैं । विडंबना यह रही कि राजस्थान की आत्मा कही जाने वाली राजस्थानी भाषा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती रही है , साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त रही है , देश - विदेश में शोध का विषय रही है लेकिन विद्यालयी शिक्षा में उसे वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह स्वाभाविक अधिकारी थी । सुप्रीम कोर्ट ने इसी विसंगति पर कठोर टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की निष्क्रियता को संकीर्ण और टालमटोल वाला दृष्टिकोण कहा है।
वास्तव में यह निर्णय केवल राजस्थानी भाषा तक सीमित नहीं है बल्कि भारत की सभी मातृभाषाओं और लोकभाषाओं के संरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त करता है । न्यायालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा संविधान के अनुच्छेद 19(1) (a), 21A और 350A का उल्लेख करते हुए कहा कि बालक को अपनी मातृभाषा में शिक्षा मिलना उसके बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक है ।
आज पूरी दुनिया यह स्वीकार कर चुकी है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चे की समझ , रचनात्मकता और आत्मविश्वास का विकास अधिक प्रभावी रूप से होता है । संयुक्त राष्ट्र संघ , यूनेस्को और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी मातृभाषा आधारित शिक्षा को मानव अधिकारों से जोड़ा है । ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक चेतना को और अधिक मजबूत करने वाला है ।
राजस्थानी भाषा केवल एक बोली नहीं बल्कि हजारों वर्षों की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की संवाहक है । वीरता , लोकसंस्कृति , भक्ति , लोकगीत , लोकनाट्य , लोकदेवताओं और जनजीवन का विराट साहित्य राजस्थानी भाषा में उपलब्ध है । पृथ्वीराज रासो से लेकर विजयदान देथा , कन्हैयालाल सेठिया , सीताराम लालस और आधुनिक रचनाकारों तक राजस्थानी साहित्य ने भारतीय साहित्य को गौरवान्वित किया है । ऐसी भाषा को शिक्षा और प्रशासन में उसका उचित स्थान मिलना समय की मांग थी ।
यह भी उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति सहित अनेक सामाजिक , साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों ने दशकों तक शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संघर्ष किया । यह निर्णय उन सभी साहित्यकारों , शिक्षकों , विद्यार्थियों , सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के संघर्ष का सम्मान है , जिन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए अपना जीवन समर्पित किया । साथ ही माननीय सुप्रीम कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर करने वाले जलते दीप के संपादक पदम मेहता , प्रों कल्याण सिंह शेखावत , अधिवक्ता मनीष सिंघवी सहित उन तमाम महानुभावों का हृदय से आभार जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े रहे ।
अब आवश्यकता इस बात की है कि राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से लागू करे । केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी । विद्यालयों में राजस्थानी विषय लागू करना , शिक्षकों की भर्ती करना , पाठ्यपुस्तकें तैयार करना , प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना तथा प्रशासनिक स्तर पर ठोस नीति बनाना समय की आवश्यकता है । यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो आने वाले दिनों में राजस्थानी भाषा शिक्षा , रोजगार और शोध के नए आयाम स्थापित कर सकती है ।
यह निर्णय राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को भी नई शक्ति प्रदान करेगा । जब स्वयं सर्वोच्च न्यायालय राजस्थानी भाषा के शैक्षणिक और संवैधानिक महत्व को स्वीकार कर चुका है , तब केंद्र सरकार को भी अब इस विषय में सकारात्मक पहल करनी चाहिए ।
राजस्थानी भाषा का भविष्य अब पहले से अधिक उज्ज्वल दिखाई देता है । यह केवल भाषा की जीत नहीं बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा , लोकचेतना और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की जीत है । मातृभाषा में शिक्षा से आत्मगौरव बढ़ेगा , शिक्षा अधिक प्रभावी बनेगी और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी ।
आज आवश्यकता है कि हम सब मिलकर इस ऐतिहासिक अवसर को जनआंदोलन में परिवर्तित करें । समाज , सरकार , साहित्यकार , शिक्षक और युवा वर्ग यदि एकजुट होकर आगे बढ़ें , तो वह दिन दूर नहीं जब राजस्थानी भाषा न केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पूर्ण सम्मान प्राप्त करेगी बल्कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भी अपना गौरवपूर्ण स्थान हासिल करेगी ।
माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय राजस्थानी भाषा के स्वर्णिम भविष्य का संकेत है । यह संघर्ष की मंजिल नहीं बल्कि एक नए युग की शुरुआत है । सरकार को चाहिए कि वह जितनी जल्दी हो सके पाठ्यक्रम निर्धारण समितियों का गठन करें और विद्यालय में इसे तुरन्त लागू करें ।
37 सेक्टर 5 , नोहर ( राज )

राजस्थानी लोक संस्थान द्वारा संचालित उजास स्पेशल अकादमी के विद्यार्थियों संचित , गौतम एवं रक्षा ने अपने विशेष शिक्षक श्र...
11/05/2026

राजस्थानी लोक संस्थान द्वारा संचालित उजास स्पेशल अकादमी के विद्यार्थियों संचित , गौतम एवं रक्षा ने अपने विशेष शिक्षक श्री नरेश नुइयां के मार्गदर्शन में यह आकर्षक एवं उपयोगी पेन स्टैंड अभी -अभी तैयार किया है । रंगीन कागज़ एवं पुनः उपयोग योग्य सामग्री से निर्मित यह रचनात्मक मॉडल विद्यार्थियों की कलात्मक अभिव्यक्ति, हस्तकौशल तथा आत्मविश्वास का सुंदर उदाहरण है । इस प्रकार की गतिविधियां विशेष बच्चों में सृजनात्मकता, एकाग्रता एवं स्वावलंबन की भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं ।
आपकी प्रतिक्रिया हमारा मार्गदर्शन करेगी -

05/05/2026

बच्चोंके साथ ख़ुशी के पल ❤️

क्या मंदिर में प्रवेश से दलित इस लड़ाई को जीत पाएंगे ?- डा. भरत सिंह ओला हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के 4 आरपीएम गांव म...
03/05/2026

क्या मंदिर में प्रवेश से दलित इस लड़ाई को जीत पाएंगे ?
- डा. भरत सिंह ओला
हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के 4 आरपीएम गांव में मंदिर निर्माण को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर उस कड़वे सच को सामने ला खड़ा किया है , जिसे हम बार बार नजरअंदाज करने की कोशिश करते रहे हैं । यह सिर्फ एक गांव का मामला नहीं है बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का आईना है , जो संविधान के 79 वर्ष बाद भी बराबरी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है ।
दलित ग्रामवासियों का आरोप है कि मंदिर निर्माण में उनसे आर्थिक सहयोग भी नहीं लिया गया और अब उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है । यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है । क्या धर्म केवल कुछ लोगों की निजी जागीर है ? क्या ईश्वर भी जाति देखकर अपने द्वार खोलता है ? या फिर यह पूरा खेल उस सामाजिक वर्चस्व का है , जो धर्म के नाम पर कायम रखा गया है ? यह स्थिति तो तब है जब देश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में पहचान रखता है । कुछ अतिवादी इसे हिंदू राष्ट्र बनाने पर तुले हैं । सोचिए ! जिस दिन यह देश हिंदू राष्ट्र होगा , दलितों की क्या स्थिति होगी ?
इस मामले की सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि इस भेदभाव का नेतृत्व वही लोग कर रहे हैं , जिन्हें स्वयं सदियों तक तथाकथित ऊंची जातियों द्वारा अपमान और छुआछूत का सामना करना पड़ा था । यानी शोषण की पीड़ा झेलने वाले लोग , अवसर मिलते ही उसी शोषण की परंपरा को आगे बढ़ाने लगे हैं । यह केवल सामाजिक विडंबना नहीं बल्कि चेतना के अभाव का प्रमाण है ।
डॉ.भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि शिक्षा वह शेरनी का दूध है , जो पियेगा वह दहाड़ेगा। यह सही है कि यह दहाड़ बाबा साहब की बदौलत गूंजी है । इस दहाड़ को केवल आवाज नहीं समझ जाना चाहिए बल्कि आत्मसम्मान , विवेक और प्रतिरोध की ताकत समझी जानी चाहिए लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इस दहाड़ में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का स्वर भी मिला हुआ है ? मैं कहूंगा कि शायद नहीं । आज सवाल यह नहीं है कि दलितों को मंदिर में प्रवेश क्यों नहीं दिया जा रहा बल्कि यह है कि क्या उन्हें ऐसे मंदिरों में जाने की आवश्यकता भी है ? इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रवेश केवल प्रतीकात्मक जीत देते हैं लेकिन मानसिकता नहीं बदलते । बिहार की वह घटना भुलाए नहीं भूलती , जब पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के मंदिर प्रवेश के बाद मंदिर को शुद्ध करने के लिए दूध से धोया गया । यह घटना बताती है कि समस्या मंदिर के दरवाजे की नहीं है बल्कि दिमाग के दरवाजे की है , जो अब तक बंद हैं ।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि प्रतिरोध का रास्ता केवल दरवाजे खटखटाने से नहीं निकलता । मैं अपने दलित भाइयों से कहना चाहूंगा कि यदि कोई आपको अपने मंदिर में नहीं चाहता , तो वहां जाने की जिद आपके आत्मसम्मान को कम करती है , बढ़ाती नहीं है । असली प्रतिरोध यह होगा कि आप उस व्यवस्था को ही चुनौती दें , जो आपको अपमानित करती है ।
आज जरूरत मंदिरों की नहीं है बल्कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की है । जरूरत घंटा बजाने की नहीं है बल्कि कलम चलाने की है । जरूरत प्रसाद लेने की नहीं है बल्कि ज्ञान अर्जित करने की है । यदि कुछ लोग आपको चंदा देने के लायक नहीं समझते , तो यह आपका अपमान नहीं है बल्कि उस संकुचित और सड़ी गली मानसिकता का है । उस घटिया दृष्टिकोण का है , जो इंसान को ऊंची नीची जाति के भेदभाव से देखता है । इसका जवाब तथाकथित श्रेष्ठीजनों को मंदिर में चंदा देकर या मंदिर में जाकर नहीं दिया जाना चाहिए बल्कि एक पुस्तकालय बनाकर दिया जाना चाहिए । उन संकीर्ण मानसिकता के लोगों को मंदिर बनने दीजिए । आप तो अपने गांव में लाइब्रेरी का निर्माण कीजिए । जहां दलित समाज के बच्चे पढ़ें , सोचें , सवाल करें और आगे बढ़ें । यह कदम किसी भी मंदिर से बड़ा परिवर्तनकारी केंद्र होगा । वहां से निकलने वाली चेतना ही असली प्रसाद होगी , जो पीढ़ियों को मुक्त करेगी ।
सोचो इस मंदिर से किसका पेट भरेगा ? उस व्यक्ति का जिसने सदियों से तुम्हारा शोषण किया और आगे भी तुम्हारा शोषण करेगा । दलित समाज को यह समझना होगा कि समानता भीख में नहीं मिलती , उसे अर्जित करनी पड़ती है । और यह अर्जन पूजा पाठ से नहीं बल्कि शिक्षा , संगठन और संघर्ष से प्राप्त होता है ।
मैं सभी लोगों से कहना चाहूंगा कि यह घटना केवल निंदा की मांग नहीं करती बल्कि आत्ममंथन की मांग करती है । खासकर उन लोगों से भी जो आज भी धर्म के नाम पर भेदभाव को उचित ठहराते हैं । दलित समाज को भी यह समझाना पड़ेगा कि अपने सम्मान की लड़ाई मंदिरों के दरवाजों पर नहीं बल्कि ज्ञान के द्वार खोलकर जीती जाती है ।
37 , सेक्टर 5 . नोहर ( राज. )

03/05/2026

स्वतंत्र पत्रकारिता के समाप्त होने के मायने
- डॉ. भरत सिंह ओला
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 ने जिस वास्तविकता को उजागर किया है, वह बेहद चिंता जनक है । यह केवल एक रिपोर्ट नहीं है बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य का आईना है । दुनिया के 52% से अधिक देशों में प्रेस बेहद बुरी स्थिति में है । दुखद बात यह है कि यह पिछले 25 वर्षों का सबसे निचला स्तर है । उत्तर कोरिया, चीन और अफगानिस्तान जैसे देशों में जहां खुले तौर पर दमनकारी नीति अपनाई जाती रही है, वहीं लोकतांत्रिक देशों में भी मीडिया पर नियंत्रण के अधिक सूक्ष्म और संरचनात्मक तरीके विकसित हो चुके हैं ।
इस वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत का 157वां स्थान चिंता को और गहरा करता है । भारत की पत्रकारिता पर अगर एक विस्तृत दृष्टि डालेंगे तो समझेंगे कि हम कहां से कहां पहुंच गए । दरअसल भारतीय पत्रकारिता के ऐतिहासिक विकास को समझे बिना इसे ठीक से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए हमें भारतीय पत्रकारिता के तीन स्तरों को देखना होगा । पहली - औपनिवेशिक काल की पत्रकारिता, दूसरी - स्वतंत्रता के बाद 2014 तक की पत्रकारिता और तीसरी - 2014 के बाद की पत्रकारिता , तो एक स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है ।
स्वतंत्रता से पहले भारतीय पत्रकारिता मूलतः एक मिशन थी। बाल गंगाधर तिलक का ‘केसरी’ हो या महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ या इसी तरह के दूसरे समाचार पत्र । ये केवल समाचार पत्र नहीं थे बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के औजार थे । उस दौर की पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के साथ सामंजस्य नहीं बल्कि उसका प्रतिरोध था । अंग्रेजी शासन के कठोर दमन , प्रेस एक्ट और सेंसरशिप के बावजूद पत्रकारों ने जोखिम उठाकर जनता तक सच पहुंचाया । उस समय पत्रकारिता का चरित्र संघर्षशील , वैचारिक और जनपक्षीय था ।
स्वतंत्रता के बाद 2014 तक का दौर अपेक्षाकृत संस्थागत स्वतंत्रता का काल माना जा सकता है हालांकि इसमें भी अपवाद रहे , जैसे आपातकाल (1975–77), जब प्रेस पर सीधा सेंसर लगा। फिर भी, इस लंबे दौर में मीडिया ने सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा बनाए रखी । रामनाथ गोयनका जैसे मीडिया स्वामी और कुलदीप नैयर जैसे पत्रकारों के साथ साथ अनेक पत्रकार सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते थे। इस दौर में खोजी पत्रकारिता , संपादकीय स्वतंत्रता और विविध विचारों का स्थान बना रहा । मीडिया में कॉर्पोरेट प्रभाव धीरे धीरे बढ़ा लेकिन फिर भी संपादकीय स्वायत्तता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी ।
2014 के बाद का दौर एक नए प्रकार के मीडिया ढांचे को प्रस्तुत करता है , जिसमें प्रत्यक्ष सेंसरशिप कम दिखाई देती है लेकिन नियंत्रण अधिक गहरा और बहुआयामी है । आर्थिक दबाव , सरकारी विज्ञापन , कानूनी प्रावधान और जांच एजेंसियों की सक्रियता , ये सभी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं , जहां मीडिया संस्थान स्वयं ही सीमाएं तय करने लगते हैं । इन वर्षों में कॉर्पोरेट स्वामित्व और सत्ता के बीच निकटता ने संपादकीय स्वतंत्रता को और सीमित किया है । परिणामस्वरूप मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जब सत्ता समर्थक नैरेटिव को प्राथमिकता देने लगता है , तब आलोचनात्मक पत्रकारिता हाशिए पर चली जाती है । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह परिवर्तन सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है , जहां बहस का स्तर तथ्यात्मक संवाद से हटकर आक्रामक विमर्श और ध्रुवीकरण में तब्दील हो जाता है । इस परिदृश्य में कई स्वतंत्र पत्रकारों ने मुख्यधारा से दूरी बनाई । रवीश कुमार का इस्तीफा , बॉबी घोष के पद छोड़ना , नेहा दीक्षित , प्रिय प्रसून बाजपेई ,अभिसार शर्मा जैसे अनेक पत्रकारों का स्वतंत्र पत्रकारिता की ओर रुख करना , केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि व्यापक संरचनात्मक दबावों के संकेत हैं ।
इसके साथ साथ दमन के प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने आए हैं । आसिफ सुल्तान और इरफान मेहराज जैसे पत्रकारों की गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का उपयोग पत्रकारिता पर भी लागू हो सकता है । पत्रकारों की हत्याएं , उन पर हमले , धमकियां और कानूनी कार्रवाई का बढ़ता ग्राफ इस बात की पुष्टि करता है कि पत्रकारिता का पेशा अब अधिक जोखिमपूर्ण हो गया है ।
यदि इन तीनों चरणों की तुलना की जाए , तो एक स्पष्ट परिवर्तन सामने आता है । औपनिवेशिक काल में पत्रकारिता सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम थी , जो स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक लोकतांत्रिक संतुलन का साधन बनी रही लेकिन हाल के वर्षों में वह धीरे धीरे सत्ता और संरचनात्मक दबावों के प्रभाव में आती दिखाई देने लगी है ।
यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक है । आने वाले दिनों में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे । इससे सूचना का एकाधिकार सीमित होने लगेगा , जिससे नागरिकों तक केवल चयनित जानकारी पहुंचेगी । विपक्ष और असहमति की आवाज कमजोर होगी , जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ेगा । जब मीडिया सवाल पूछना बंद कर देगा , तो शासन की जवाबदेही भी कम हो जाएगी और संस्थाएं धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगेंगी । सबसे बड़ा खतरा यह है कि मीडिया जनमत का निर्माण करने के बजाय उसका प्रबंधन करने लगेगा । प्रेस की स्वतंत्रता का संकट केवल मीडिया का संकट नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र के भविष्य का संकट है । यदि यह प्रवृत्ति जारी रही , तो लोकतंत्र का स्वरूप धीरे धीरे बदलने लगेगा , जहां चुनाव तो होंगे लेकिन नागरिकों के पास निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय जानकारी नहीं होगी ।
स्वतंत्र पत्रकारिता का समाप्त होना सिर्फ किसी समूह का समाप्त होना नहीं है बल्कि उन जीवंत लोगों का समाप्त होना है , जिसकी बदौलत लोकतांत्रिक भारत अपने होने के सबूत के साथ मजबूती से खड़ा है । यह उन जीवंत आदर्शों का समाप्त होना है , जिनको हमारे बुजुर्गों ने बड़ी मेहनत से हमारे सामने प्रस्तुत किए थे । आज आवश्यकता केवल इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करने की नहीं है बल्कि उस मूल भावना को पुनर्जीवित करने की है , जिसने भारतीय पत्रकारिता को जन्म दिया था । सत्ता से सवाल पूछने की निर्भीकता और जनता के प्रति जवाबदेही ही सच्ची पत्रकारिता है । यही वह आधार है , जिस पर एक सशक्त और जीवंत लोकतंत्र खड़ा रह सकता है ।
37, सेक्टर - 5 , नोहर , हनुमानगढ़ ( राज. ) 335523

02/05/2026
01/05/2026

“उजास स्पेशल आकादमी: मैडम ने बच्चों को खुद खिलाया खाना “

28/04/2026

पढ़ाई के साथ हुनर भी! दीयों से सीख रहे हैं रोजगार ujaas special academy, nohar

Address

Bhirani
Bhadra
335503

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Bharat Ola posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share