07/10/2025
“प्रेम”
प्रकृति ने मनुष्य को गढ़ा,और उसकी आत्मा में सबसे पहले
प्रेम का बीज बोय़ा ,पर मनुष्य ने उस बीज को पोषने के लिए
यौवन की सीढ़ियाँ चढ़ीं,
वासना की गलियों से गुज़रा,अधरों की प्यास में भटका,
मगर प्रेम…
हर बार उससे बहुत दूर खड़ा रहा।
लोग समझते रहे—
पहला स्पर्श अधरों का होना चाहिए।
पर मैं जान गया था ,
अधरों का स्पर्श हमेशा सिर्फ़ शरीर जगाता है,
रूह नहीं।
इसलिए मैंने उसे जिया उस पल को कुछ यूँ कि ..मैंने थामा उसके सुर्ख हाथों को,
जहाँ मेहनत की गर्माहट और दुआओं की नमी थी।
मेरे होंठ सबसे पहले उसकी हथेलियों को चुमने के लिये झुके—
क्योंकि वहीं से जाता है उसके दिल तक का रास्ता।
फिर मैंने छुआ उसके गालों को,
ना कि उसकी कमर को—
क्योंकि कमर थामने से बस जिस्म करीब आता है,
गाल थामने से पूरी दुनिया थम जाती है।
मैंने चूमा उसके माथे को ,
ना कि उसकी गर्दन को —
क्योंकि गर्दन को चुमने का मतलब सिर्फ शरीर की प्यास है,
माथे का चुम्बन…
रूह की गवाही ...
और यूँ मैंने प्रेम को पाया,
वासना से परे, आकर्षण से परे,
उस निर्मल जगह पर
जहाँ प्रेम अजन्मे शिशु की धड़कन सा मासूम है।.... ✍️✍️❤️❤️