11/05/2026
सोना न खरीदें' वाले बयान पर छिड़ी बहस: क्या संकट में है स्वर्णकारों का भविष्य?
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया संबोधन में देशवासियों से सोने में निवेश कम करने की अपील ने ज्वेलरी मार्केट और स्वर्णकार समाज के बीच एक नई चिंता को जन्म दे दिया है। जहां सरकार का उद्देश्य देश के 'डेड एसेट' (निष्क्रिय संपत्ति) को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाना है, वहीं इस बयान ने लाखों स्वर्णकारों और उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का सवाल खड़ा कर दिया है।
स्वर्णकारों की चिंता: 'हमारा हुनर और पेट दोनों खतरे में'
देशभर के सर्राफा बाजारों में इस बयान के बाद हलचल तेज है। स्वर्णकारों का तर्क है कि उनका पूरा अस्तित्व और परिवार का पालन-पोषण सोने की खरीद-बिक्री पर टिका है।
पुश्तैनी हुनर पर वार: छोटे स्वर्णकारों का कहना है कि वे केवल व्यापारी नहीं, बल्कि कलाकार हैं। अगर जनता सोना खरीदना बंद कर देगी, तो सदियों पुराना यह हस्तशिल्प खत्म हो जाएगा।
आजीविका का संकट: भारत में लाखों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ज्वेलरी उद्योग से जुड़े हैं। ग्राहकों की कमी का सीधा असर कारीगरों की दिहाड़ी और छोटे दुकानदारों के मुनाफे पर पड़ेगा।
शिक्षा और भविष्य: कई कारीगरों ने सवाल उठाया है कि अगर उनकी आय का एकमात्र स्रोत (सोना) प्रभावित होता है, तो वे अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च कैसे उठाएंगे?
आर्थिक तर्क बनाम सामाजिक वास्तविकता
सरकार का मानना है कि भारत हर साल भारी मात्रा में सोना आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यदि यह पैसा बैंकों या अन्य वित्तीय योजनाओं में लगे, तो देश का विकास तेज होगा।
"सोना तिजोरी में बंद रहने के बजाय अगर बाजार में सर्कुलेट हो, तो वह अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर है।" — आर्थिक विशेषज्ञ
लेकिन, स्वर्णकार समाज का कहना है:
"हम सरकार के विजन का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन हमारे पुनर्वास का क्या? क्या सरकार के पास उन करोड़ों लोगों के लिए कोई वैकल्पिक योजना है जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस व्यवसाय से जुड़े हैं?"
स्वर्णकार सोनार संघ चम्पारण