12/07/2026
क्या आर्यभट्ट, भास्कर-I, ब्रह्मगुप्त और लल्ल वास्तव में ऐतिहासिक व्यक्ति थे?
इस पोस्ट का उद्देश्य आर्यभट्ट, भास्कर-I, ब्रह्मगुप्त और लल्ल का खंडन करना नहीं है। उद्देश्य केवल इतना है कि इनके जीवन से जुड़े समकालीन ऐतिहासिक प्रमाणों पर शोध के दृष्टिकोण से चर्चा की जाए।
भारतीय गणित के इतिहास में आर्यभट्ट, भास्कर-I, ब्रह्मगुप्त और लल्ल का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। लेकिन इतिहास में सम्मान से अधिक महत्व प्रमाणों का होता है।
क्या ये चारों वास्तव में ऐतिहासिक व्यक्ति थे?
क्या इनके नाम से उपलब्ध ग्रंथ वास्तव में इन्होंने ही लिखे थे?
या फिर पहले से मौजूद गणित और खगोल विज्ञान की परंपराओं को बाद के समय में इनके नाम से संकलित कर प्रचारित किया गया?
इन प्रश्नों पर भावनाओं से नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर विचार होना चाहिए।
अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आर्यभट्ट की मूल हस्तलिखित पांडुलिपि आज तक नहीं मिली है।
भास्कर-I की मूल हस्तलिखित पांडुलिपि भी उपलब्ध नहीं है।
ब्रह्मगुप्त की मूल हस्तलिखित पांडुलिपि भी नहीं मिली है।
लल्ल की मूल हस्तलिखित पांडुलिपि भी उपलब्ध नहीं है।
आज जो ग्रंथ हमारे पास हैं, वे मध्यकाल में तैयार की गई विभिन्न प्रतियों के आधार पर तैयार किए गए आलोचनात्मक (Critical) संस्करण हैं।
1976 में प्रकाशित आर्यभटीय का Critical Edition भी किसी एक मूल पांडुलिपि पर आधारित नहीं था। इसे कई अलग-अलग पांडुलिपियों की तुलना करके तैयार किया गया।
आज उपलब्ध पांडुलिपियाँ देवनागरी, मलयालम, ग्रंथ, शारदा, तेलुगु आदि लिपियों में मिलती हैं। लेकिन ये लेखक की मूल पांडुलिपियाँ नहीं हैं, बल्कि बाद के समय की नकलें हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इन चारों गणितज्ञों के जीवन की पुष्टि करने वाले समकालीन शिलालेख, राजकीय अभिलेख या विदेशी यात्रियों के स्पष्ट उल्लेख अभी तक बहुत सीमित हैं।
अब इसकी तुलना बौद्ध इतिहास से कीजिए।
आचार्य नागार्जुन के संबंध में महायान बौद्ध ग्रंथों की परंपरा, चीनी और तिब्बती अनुवाद, बौद्ध जीवनियाँ तथा बाद के बौद्ध आचार्यों के उल्लेख एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
अश्वघोष के संबंध में भी बुद्धचरित, चीनी अनुवादों की परंपरा और बौद्ध साहित्य के अनेक स्वतंत्र स्रोत उपलब्ध हैं।
अर्थात नागार्जुन और अश्वघोष के मामले में केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि अनेक स्वतंत्र ऐतिहासिक परंपराएँ उनके अस्तित्व को मजबूत करती हैं।
लेकिन आर्यभट्ट, भास्कर-I, ब्रह्मगुप्त और लल्ल के मामले में उपलब्ध प्रमाण मुख्य रूप से ग्रंथ परंपरा और बाद की टीकाओं पर आधारित हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात पर ध्यान देना चाहिए।
इतिहास यह संकेत देता है कि आर्यभट्ट से पहले भी भारत में गणित, कालगणना और खगोलीय अध्ययन की परंपरा मौजूद थी। बौद्ध, जैन तथा अन्य प्राचीन भारतीय परंपराओं में संख्या पद्धति, कालगणना, ज्यामिति और खगोलीय अवलोकन के प्रमाण मिलते हैं। अर्थात गणित और खगोल विज्ञान की शुरुआत केवल आर्यभट्ट से नहीं हुई।
इसलिए असली प्रश्न यह नहीं है कि "क्या आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान की खोज की?"
बल्कि प्रश्न यह है कि आर्यभट्ट से पहले गणित और खगोल विज्ञान की परंपरा क्या थी?
उस ज्ञान को किन लोगों ने विकसित किया?
क्या आर्यभट्ट ने उस परंपरा को आगे बढ़ाकर नए सिद्धांत प्रस्तुत किए?
या पहले से मौजूद ज्ञान को एक व्यवस्थित ग्रंथ का रूप दिया?
या फिर बाद के समय में उस प्राचीन ज्ञान परंपरा को इनके नाम से संकलित करके प्रचारित किया गया?
इन प्रश्नों का निश्चित उत्तर वर्तमान उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर देना संभव नहीं है।
इसी तरह वर्तमान प्रमाणों के आधार पर इन्हें काल्पनिक व्यक्ति घोषित करना भी संभव नहीं है।
इतिहास में किसी व्यक्ति को वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति सिद्ध करना हो, किसी ग्रंथ को मूल रचना सिद्ध करना हो या बाद का संकलन सिद्ध करना हो — तीनों ही स्थितियों में प्रमाण आवश्यक होते हैं।
इसलिए इस विषय पर और गहन शोध की आवश्यकता है।
यदि आपके पास आर्यभट्ट, भास्कर-I, ब्रह्मगुप्त और लल्ल से संबंधित समकालीन शिलालेख, विदेशी यात्रियों के उल्लेख, राजकीय अभिलेख, मूल पांडुलिपियाँ या अन्य प्राथमिक ऐतिहासिक प्रमाण हों, तो कृपया साझा करें।
आइए इतिहास को आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर मिलकर समझने का प्रयास करें।
✍️ Bandapalli Shiva Reddy