29/09/2026
प्रोफेसर खलील अहमद राईनी जी — की जयंती पर खिराज-ए-अकीदत
पसमांदा समाज के हक, सम्मान और सामाजिक बराबरी की लड़ाई को अपनी जिंदगी समर्पित करने वाले प्रोफेसर खलील अहमद राईनी की जयंती पर उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश करते हैं। उनका जीवन संघर्ष, प्रतिबद्धता और त्याग की ऐसी मिसाल है, जिसे पसमांदा तहरीक के इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए।
बताया जाता है कि प्रोफेसर खलील अहमद राईनी को पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर का साथ न छोड़ने के कारण धमकियां दी गई थीं। इसके कुछ ही समय बाद 30 सितम्बर 1999 को जब वह घर से निकले, तो फिर वापस नहीं लौटे। उनका लापता होना उनके परिवार और साथियों के लिए गहरा सदमा था, लेकिन उनके संघर्ष और विचारों की याद पसमांदा आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच बनी रही।
खलील अहमद राईनी ने सामाजिक न्याय और पसमांदा समाज की आवाज को मजबूत करने के लिए जिस प्रतिबद्धता के साथ काम किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय है। उनके समर्थकों और साथियों की स्मृतियों में उनका योगदान उस दौर से जुड़ा हुआ है, जब पसमांदा समाज के अधिकारों और राजनीतिक-सामाजिक हिस्सेदारी की बात को मजबूती से सामने लाने की जरूरत थी।
यह कहना उनके समर्थकों की श्रद्धांजलि का हिस्सा है कि उन्होंने अपने जीवन का बलिदान देकर ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ और पसमांदा तहरीक के संघर्ष को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाई। उनके संघर्ष की स्मृति आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो सामाजिक बराबरी, सम्मान और हिस्सेदारी की बात करते हैं।
किसी भी आंदोलन का इतिहास केवल बड़े नामों से नहीं बनता। उसके पीछे ऐसे अनगिनत कार्यकर्ताओं और संघर्षशील लोगों का योगदान होता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने सिद्धांतों और उद्देश्य का साथ नहीं छोड़ा। प्रोफेसर खलील अहमद राईनी का नाम भी ऐसे ही संघर्षशील लोगों में सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए।
आज उनकी जयंती पर आवश्यकता है कि उनके जीवन, संघर्ष और योगदान को दस्तावेजों, स्मृतियों और प्रमाणिक इतिहास के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए, ताकि पसमांदा तहरीक के लिए संघर्ष करने वाले लोगों का योगदान इतिहास के पन्नों में दर्ज रहे।
प्रोफेसर खलील अहमद राईनी को विनम्र श्रद्धांजलि।
उनकी स्मृति और संघर्ष को सलाम।
खिराज-ए-अकीदत।