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OMS Foundation social works

27/05/2026

अनीशा रोते हुए बोली, “मेरे पास घर जाने के लिए पैसे नहीं हैं… और अब मेरा अपना कोई भी नहीं बचा।” बूढ़ी महिला ने उसके सिर पर हाथ फेरा और पास की दुकान से उसे गर्म चाय और रोटी लाकर दी। उस अपनापन ने अनीशा के टूटे मन को थोड़ा सहारा दिया। महिला उसे अपने छोटे से घर ले गई, जहाँ पहली बार अनीशा ने खुद को सुरक्षित महसूस किया। रात को सोते समय उसने मन ही मन ठान लिया—वह हार नहीं मानेगी। चाहे जिंदगी कितनी भी कठिन क्यों न हो, वह पढ़ेगी, आगे बढ़ेगी और एक दिन अपने जैसे बेसहारा बच्चों का सहारा बनेगी।

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