16/02/2025
नमस्कार कैथवली और जय हनुमान
जैसे जैसे मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का दिन नज़दीक आ रहा वैसे वैसे मौसम में गर्मी के साथ साथ माहौल भी गरमाया हुआ है ।
ये हिंदू समाज मंदिर के नाम पर कट मीट मारेगा । मैं सोच रहा था अभी हमारा गाव ५० साल पीछे है लेकिन नहीं हम सब अभी १०० साल पीछे है । हम आज़ाद नहीं हुए है है अभी भी । अभी भी हम ग़ुलाम है अपनी नाकारापन, पिछड़ी सोच और चंद लालच के चक्कर में । कोई मंदिर का काम नहीं कर सकता यहां तो कोई हिंदू मुस्लिम नहीं है तो गंदी राजनीति को साइड रख के काम क्यों नहीं कर सकता हम
आओ तुम्हें समझता हूँ तुम्हारा हमारा हम सब का वजूद क्या है । और पैदा ही क्यों हुए थे तुम ? कभी सवाल पूछा है ख़ुद से नहीं पूछा तो ख़ुद से पूछो ।
तीन तत्वों को नित्य कहा गया है- ईश्वर , आत्मा (पुरुष) तथा प्रकृति । ईश्वर नियामक है- आत्मा तथा प्रकृति के संयोग से सृष्टि होती है | पुरुष की चेतना के कारण चित, इन्द्रिय आदि चेतन्वत समस्त कार्यो का संबपादन करने लगते है । जब मृत्यु के समय आत्मा चेतना का साथ शरीर से छूट जाता है तो वह शरीर जो समस्त क्रिया कलाप का आधार था , निष्क्रिय होकर नष्ट हो जाता है । फ़र्क़ नहीं पड़ता की आप ४ फूटिये हो या ६futiye, गंजेड़ी हो या सात्विक , गुंडा हो या साधु । शरीर, मन , बुद्धि, अहंकार, इन्द्रिय आदि सब उसी चेतना से चेतन है और सब में एक जैसा है ।
आज के वैज्ञानिक युग में मानव आत्मत्व तथा ईश्वर दोनों ही तत्वों को नकार रहा है । वह स्वयंभू होकर अपने हाथ में सब कुछ कर लेना चाहता है । केवल उसी की सत्ता स्थापित हो जाए- इसके लिए अहनिश्र प्रयतनशील है । यही महती प्रभुतत्वाकांक्षा उसे चैन से रहने नहीं देती । अपनी यथार्थ सत्ता को पहचानने में बाधक बन गई है । इसी कारण अपने बनाये जाल में स्वयं ही आबद्ध होकर वह अधिकाधिक लिपटता जाता है । जब वह स्वयं को सबकुछ करने में असमर्थ पाता है तो तनाव, चिंता, निराशा, कुंठा, अवसाद जैसे मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है । जिससे शारीरिक व्याधियों से भी पीड़ित होकर शेष जीवन को दूभर बना लेता है । इसी रोग से ग्रस्त होकर दूसरो के हक का म|रना , अपने मुंह मिया मिथू करना और अपने से कमजोर बड़े बुजुर्गों पर अपनी मर्दांगनी दिखता है । यही उसकी नासमझी न्ही तो क्या है ?
भगवद गीता – अध्याय 2, श्लोक 62 एवं 63
इन श्लोकों में बताया गया है कि कैसे इच्छाएँ मनुष्य के विनाश का कारण बनती हैं। यहां इसका विस्तार से वर्णन किया गया है:
भगवद गीता – अध्याय 2, श्लोक 62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ २.६२॥
अर्थ:
जब कोई व्यक्ति इंद्रियों के विषयों (भौतिक सुखों) का चिंतन करता रहता है, तो उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छा (काम) जन्म लेती है और इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।
व्याख्या:• जब हम बार-बार इंद्रिय सुखों (वस्तुएँ, लोभौतिक वस्तुएँ) के बारे में सोचते हैं, तो उनमें आसक्ति हो जाती है।
• यह आसक्ति इच्छा (काम) में बदल जाती है, जिससे व्यक्ति उन्हें पाने की लालसा करने लगता है।
• यदि यह इच्छा पूरी नहीं होती, तो क्रोध (क्रोध) उत्पन्न होता है।
भगवद गीता – अध्याय 2, श्लोक 63
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ २.६३॥
अर्थ:
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है। मोह से स्मृति का नाश होता है। जब स्मृति नष्ट हो जाती है, तो बुद्धि का विनाश होता है, और जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो मनुष्य का पतन हो जाता है।
व्याख्या:
• क्रोध (Krodha) बुद्धि को भ्रमित कर देता है और मोह (Sammoha) उत्पन्न करता है, जिससे व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है।
• मोह के कारण व्यक्ति अपनी स्मृति (Smriti Vibhrama) खो देता है और अपने मूलभूत जीवन मूल्यों एवं पूर्व में सीखे गए सबक भूल जाता है।
• जब स्मृति का नाश हो जाता है, तो बुद्धि (Buddhi) का नाश हो जाता है, जिससे व्यक्ति गलत निर्णय लेने लगता है।
• जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो व्यक्ति का आत्मिक, नैतिक और भौतिक रूप से पतन (Pranashyati) हो जाता है।
इन दोनों श्लोकों का सारांश:
1. बार-बार भौतिक सुखों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है।
2. आसक्ति से इच्छा (काम) उत्पन्न होती है
3.इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।
4. क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, जिससे व्यक्ति सही और गलत में अंतर नहीं कर पाता।
5. मोह के कारण स्मृति और विवेक का नाश हो जाता है, जिससे व्यक्ति का पतन हो जाता है।
इन श्लोकों में यह बताया गया है कि कैसे अनियंत्रित इच्छाएँ और भावनाएँ मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण विरक्ति (detachment) और आत्म-नियंत्रण (self-control) अपनाने की सलाह देतेहैं ताकि इस पतन के चक्र से बचा |
यहाँ कृष्ण इमोशनल स्पाइरल की बात कर रहे जिससे रिलेटेड कुछ पिक्चर्स मैं पोस्ट के साथ एड कर रहा हूँ ताकि पोस्ट का मतलब समझ आए आप सबको । खैर फ़र्ज़ी १० के सर्टिकफ़िकेट बनवा कर नौकरी पकड़ने वाले लोगो के समझ से परे की बात है तो पिछले कुछ दिनों में जो हुआ उससे एक्सपीरियंस लेते हुए unse कोई उम्मीद भी न्ही है क्यों की किसी सज्जन पुरुष ने मुझसे कहा था कभी
“you can only change yourself not others ! So don’t make any permanent stupidity when you are temporary emotional damaged. “
मानव को इन कष्टों से मुक्ति के लिए निज स्वरूप को जानने की अवश्यकता है । जीवन जीने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सत्ता में विश्वास तथा मानवोचित आचरण की नितांत आवश्यकता है । इसके लिए मानवीय चेतना के विकास की आवश्यकता होगी । आईसीयू में भर्ती होके केवल ये शरीर ठीक हो पाएगा कितना होगा परमेश्वर जाने ।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, “तुम पैदा ही क्यों हुए?” इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग परंपराओं और दर्शनशास्त्रों में भिन्न हो सकता है। लेकिन कुछ मुख्य आध्यात्मिक उत्तर इस प्रकार हैं:
1. कर्म और पुनर्जन्म (Hinduism, Buddhism, Jainism)
• तुम्हारा जन्म तुम्हारे पिछले जन्मों के कर्मों का परिणाम है।
• तुम्हें अपने अधूरे कर्मों को पूरा करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह जीवन मिला है।
• यह संसार एक विद्यालय है, जहाँ आत्मा को सीखना और अपने दोषों को सुधारना है।
2. मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार (Vedanta, Upanishads)
• आत्मा परमात्मा (ब्रह्म) का ही अंश है, लेकिन अज्ञान के कारण यह संसार में बंधी हुई है।
• जीवन का उद्देश्य माया (भ्रम) से मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करना है।
• जब तुम स्वयं को “शरीर” या “मन” से अलग आत्मा के रूप में पहचानोगे, तो मोक्ष की ओर बढ़ोगे।
3. सेवा और प्रेम (Bhakti Yoga, Sufism, Christianity)
• तुम्हारा जन्म ईश्वर की सेवा और प्रेम के लिए हुआ है।
• भगवान ने तुम्हें भेजा ताकि तुम उनके भक्त बनो और संसार में प्रेम, करुणा और अच्छाई फैलाओ।
• जैसे श्रीकृष्ण ने कहा: “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” – सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आओ।
4. अनुभव और विस्तार (Modern Spirituality, New Age Thinking)
• आत्मा नए अनुभवों को प्राप्त करने के लिए जन्म लेती है।
• तुम अपनी आत्मा की यात्रा का हिस्सा हो, जिसमें सीखना, अनुभव करना और बढ़ना शामिल है।
• यह जीवन खुद को खोजने, अपने डर से लड़ने और अपने सत्य को पहचानने का अवसर है।
5. कोई उद्देश्य नहीं – बस अस्तित्व ही सब कुछ है (Advaita, Zen Buddhism)
• कोई पूर्व-निर्धारित उद्देश्य नहीं है।
• तुम हो, इसलिए हो। बस इस क्षण में जीना ही जीवन का सार है।
• “तत्त्वमसि” – तुम स्वयं ब्रह्म हो, तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं, कुछ बनने की जरूरत नहीं।
निष्कर्ष
तुम्हारा जन्म संयोग नहीं, बल्कि एक यात्रा है – कुछ सीखने, अनुभव करने और आत्मा के स्तर पर आगे बढ़ने के लिए।
अब सवाल यह है – तुम अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहते हो?
ट्रस्ट को कोई क्रेडिट गेम न्ही चाहिए इसलिए नाम भी उजागर न्ही किया है । trust एक शुरुवात थी की सब भाई मिलकर चीज़ो को आगे तक लेकर जाये लेकिन जब तुम्हे मंजूर न्ही तो तुम ही करो । हदसबादी में सबसे पैसा इक्कठा करना तुम्हारा डर दिखा रहा है ट्रस्ट को चंदे के पैसे का लालच नहीं है ट्रस्ट के लोग खुद काम करेंगे खुद पैसा बनाएंगे और समाज कल्याण में लगाएंगे ये एक सोच है जो तुमने अपना समय केवल दिखावा के लिए किया जिसका कोई लाभ गाव के लोगो को नहीं मिला उल्टा नुक्सान अलग हुआ लेकिन कमजोर या बुजदिल समझ के बेवक़ूफ़ मत बनाओ।
गाव की शांति बनाये रखने के लिए ट्रस्ट अपना हाथ मंदिर के काम से खीच सकता है और ट्रस्ट अपना समय और पैसा बृद्ध आश्रम बनवाने में शिफ्ट कर सकता है बसरते डिसिशन जानता का हो ना की चंद लोगो के सुझाव का .क्युकी जो चंद लोग सुझाव लेकर aarhe hai हमे रोकने के लिए उन्हें इतना समझ होना चाहिए की एक बार मंदिर की taraf देख के पूछे की जो १० लाख १० लाख का माला जपा जा रहा है की मैंने लगाया मैंने लगाया उतने का काम हुआ भी है अभी तक ?? �आज तक जब मंदिर का काम शुरू न्ही हुआ था और जब शुरू किया तो अड़ंगा लगाना और पोल्टिक्स लेकर आगये । इंडिविजुअल मेरे परिवार का क्या कंट्रीब्यूशिन है वो जो ऑनलाइन है वो तो रिकॉर्डेड है जो कैश घर से भाई बन कर ले गए थे उसको मैं दान समझ कर तुम्हें कर दिया और उसका जिकर भी कभी किसी के सामने नहीं किया ना करूँगा । ५ लाख का ५०lakh बनाने का औक़ात और प्रतिभा पर भरोसा है मुझे ख़ुद पर । लेकिन जो १० लाख तुमने लगाए उसका कोई हिसाब है या बस मुँह से बोल देना है , और मंदिर केवल तुम बनवा रहे हो तो थोड़ा ठंडे दिमाग से लोग सोचे कि जब पेंट कोई और करा रहा है ..ग्रिल कोई और लगवा रहा है, टाइल्स कोई और लगवा रहा है, मूर्ति और प्राणप्रतिष्ठा कोई और देख रहा है ..निर्माण में भी सीमेंट, छड, बालू आधा पैसे से आया आधा लोगो ने मंदिर के नाम पर दिया ,ऊपर से मिस्त्री बोल रहा वो अपना मजदूर नहीं ले रहा..तो 10 लाख लग रहा है भाईसाहब? कहा बोल रहे हो सब सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड है तो कहो तो पब्लिक करवा दु । पुलिस थाने में भी यही रट लगाये थे ना ?��
लेकिन फिर भी आप बड़े बुजुर्गों के विचार को ध्यान में रखते हुए ट्रस्ट एक फैसला करता है और अपना योगदान मंदिर के काम से बंद करने के लिए रेडी है क्युकी वही पैसे बृद्ध आश्रम में लगायेगा ट्रस्ट | मंदिर एक आस्था है लेकिन लोगो की ज़रूरत कुछ और है । लेकिन ट्रस्ट रुकेगा न्ही । मुझे मेरा काम करना है तो मैं करूँगा । तुम्हारी जो इमेज है समाज में वैसा इमेज लेकर तो nahi मरना पसंद करूँगा मैं एटलीस्ट । ये नई पीढ़ी बातों के साथ साथ लातो के देवता को भी मानना जानती है । बसरते डिसिशन गांव के लोगो का हो । क्युकी ये मंदिर या ग्रामसमाज का कोई भी काम किसी एक व्यक्ति या परिवार
की जागीर न्ही हो सकता और हमारे पुराने पंच प्रमुख पंचायत के अपनी बेसिक बुद्धि भी लगाने के काबिल न्ही है जो सो कॉल्ड प्रतिनिधि को बैठा कर ये सवाल जबाब कर सके की ये ट्रस्ट के लोग कहाँ ग़लत है जिसका हिस्सा हमने इनको भी समझा था ।
या तो पेपर पर ग़लत साबित करो या फिर शांत बैठो गीदड़ धमकी से न्ही डरता । जिस तरीक़े से आओगे सम्भाल लिए जाओगे । तुम पीठ पीछे कायराना हरकत करोगे मैं सबके सामने तुम्हें खुल के आने को बोलूँगा बाक़ी डिसाइड करने दो गाव की जानता को ।
आप सभी से अनुरोध है पोल में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले । चुकी ये फेसबुक ग्लोबल लेवल पर पोस्ट दिखता है तो केवल कैथवाली के लोगो और उनके रिस्तेदारो का वोट काउंट किया जाएगा
📢 पोल प्रश्न:
“क्या मंदिर के काम से Jai Hanuman Trust को अपना योगदान हटा लेना चाहिए और ट्रस्ट का हिस्सा वृद्धाश्रम को देना चाहिए?”
🗳️ विकल्प:
1️⃣ हां, योगदान वृद्धाश्रम को जाना चाहिए।
2️⃣ नहीं, मंदिर के कार्य में ही लगा रहना चाहिए।
3️⃣ दोनों कार्यों में संतुलित रूप से योगदान देना चाहिए। पहले एक ख़त्म हो फिर दूसरा शुरू होम चाहिए ।
📢 दूसरा पोल प्रश्न:
“जब बजट गलत तरीके से बताया जाए और जितने का काम न हो, तब हिसाब मांगना गलत है?”
🗳️ विकल्प:
1️⃣ नहीं, पारदर्शिता ज़रूरी है, हिसाब मांगना सही है।
2️⃣ हां, बिना सवाल किए देना चाहिए।
3️⃣ यह स्थिति पर निर्भर करता है।
📢 तीसरा पोल प्रश्न:
“अगर 5 लाख रुपये तक कैश दिए गए हों, तो उसकी रसीद मांगना गलत है?”
🗳️ विकल्प:
1️⃣ नहीं, रसीद मांगना पूरी तरह सही है।
2️⃣ हां, भरोसे के आधार पर रसीद की ज़रूरत नहीं।
3️⃣ यह देने वाले और लेने वाले की आपसी सहमति पर निर्भर करता है।jab वो दोनों भाई हो ।
➡️ अपने विचार कमेंट में साझा करें!
आप इसे फेसबुक पर पोस्ट कर सकते हैं और चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।
धन्यवाद,
दुबारा मुलाक़ात होगी
जय हनुमान ट्रस्ट का एक सदस्य