01/02/2026
संत रविदास: जातिप्रथा के विरूद्ध सदियों पहले आवाज़ उठाने वाले संत, जिन्होंने समाज को दिया एकजुट होने का संदेश
संत रविदास का नाम भारत के उन महान संतों में गिना जाता है, जिन्होंने पूरा जीवन समाज सुधार के कार्य करते हुए व्यतीत किया।
वो ईश्वर(शांति) को पाने का एक ही मार्ग जानते थे और वो है- ‘भक्ति’(मानवता की स्थापना का प्रयास)। उनका एक मुहावरा आज भी बहुत प्रसिद्ध है, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। अर्थात जब आप स्वयं मन से निर्मल साफ हो जाएंगे तो किसी गंगा या आडंबर की जरूरत नहीं पड़ेगी।।
🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥भक्ति से ईश्वर पाने का आशय मानवता की स्थापना के बाद ही संसार में शांति संभव है।।
जिसे पाखंडियों ने अलौकिकता से जोड़ दिया और हमारे लोग भी इसी भ्रम में है।।
नई दिल्ली। जातिप्रथा की वजह से होने वाले सामाजिक भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है। आज़ादी के बाद संविधान के जरिए इसके उन्मूलन के प्रयास शुरू हुए जो कुछ हद तक दलितों और हाशिए पर रह रहे समुदायों को समान अधिकार के लिए जागरूक करने में कामयाब रहे हैं। हालांकि, देश में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने सदियों पहले ही जाति की इस कुप्रथा के विरूद्ध समाज में जागरूकता फैलाने का काम शुरू कर दिया था। संत रविदास उन्हीं में से एक हैं जिनकी जयंती आज देशभर में मनाई जा रही है।
1377 ई. में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्मे संत रविदास को रैदास, रोहिदास और रूहिदास के नाम से भी जाना जाता है। रविदास का जन्म जिस जाति में हुआ उसका पारंपरिक व्यवसाय जूते बनाने का काम था, जो उस काल में निम्न जाति का माना जाता था। उनके पिताजी भी यही पारंपरिक काम करते थे।
समाज से जाति विभेद को दूर करने में संत रविदास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वह एक भक्तिकालीन संत और महान समाज सुधारक थे। एक निम्न जाति माने जाने वाले गरीब परिवार में जन्म लेने के बावजूद, संत रविदास ने अपना जीवन मानव अधिकारों और समानता के उपदेश के लिए समर्पित कर दिया। संत रविदास का नाम भारत के उन महान संतों में गिना जाता है, जिन्होंने पूरा जीवन समाज सुधार के कार्य करते हुए व्यतीत किया।
संत रविदास एक समाज सुधारक संत के साथ ही बहुत प्रसिद्ध कवि भी थे। उनकी कुछ कविताएँ सिख समुदाय के सबसे पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब जी का हिस्सा हैं। रविदास ब्राह्मणवादी मनुवादी विचारधारा के खिलाफ खड़े हुए क्रांतिकारी संत थे जिसे पाखंडियों ने भक्ति आंदोलन के चोले में लपेटने का षडयंत्र किया । 15वीं शताब्दी में रविदास जी द्वारा चलाया गया मानवता की स्थापना का आंदोलन, उस समय का भक्ति के चोले में मनुवाद की जड़े जो कमजोर हो रही थी को मजबूत करने के प्रयास के विरुद्ध, एक बड़ा विचारधारात्मक क्रांतिकारी आंदोलन था।
समाज के लिए गुरु रविदास का योगदान
संत रविदास जी वह संत थे, जिन्होंने लोगों को प्रेम और सौहार्द का पाठ पढ़ाया। रविदास जी ने अपना संपूर्ण जीवन समाज से जाति भेदभाव को दूर करने और समाज सुधार व समाज कल्याण कार्यों में समर्पित कर दिया। वैचारिक आंदोलन के माध्यम से संत रविदास ने मानव अधिकारों और समानता के महत्व के बारे में और बावनवाद की कुरूपता के विषय में शिक्षा दी और उपदेश दिया। उनकी शिक्षाओं ने लोगों के दृष्टिकोण को बदल दिया और उन्हें जीवन में सही रास्ते पर लाया। संत रविदास जाति का भेदभाव मिटाकर लोगों को एकजुट करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। रविदास जी की शिक्षाएं लोगों को बहुत प्रभावित करती हैं और वे जाति, पंथ या लिंग की परवाह किए बगैर सभी लोगों की समानता में विश्वास करते हैं।
मानवता की स्थापना और मनुवाद के खात्मे के लिए गुरु रविदास का जीवन समर्पित रहा। उनके कई गीत और दोहे सहिष्णुता और एकता के क्रांतिकारी संदेश थे। मानवता को मानने वाले करोड़ों लोगों के साथ ही सिख संप्रदाय के अनुयायी भी गुरु रविदास की विचारधारा के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। रविदास जी की 41 कविताओं को सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने आदिग्रंथ या गुरुग्रंथ साहिब में शामिल कराया था।
संत रविदास ने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया और अपने शिष्यों को उच्चतम शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया। अपने शिष्यों को शिक्षित कर उन्हें समाज की सेवा में समर्थ बनाने के लिए प्रेरित किया।
रविदास जयंती और उसका इतिहास
प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा के दिन रविदास जी के सम्मान में इनके जन्मदिन को गुरु रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु रविदास जयंती भारत के उत्तरी भाग में मनाए जाने वाले सबसे प्रतीक्षित त्योहारों में से एक है।
हालांकि, संत रविदास जी की जन्मतिथि को लेकर कई मत हैं। लेकिन रविदास जी की जन्म की तिथि को एक दोहा प्रचलित है, जिसके अनुसार― ‘चौदस सो तैंसीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री गुरु रविदास’। इसका अर्थ है कि गुरु रविदास का जन्म माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन संवत 1433 को हुआ था। इस वर्ष रविदास जयंती आज माघ पूर्णिमा के दिन 1 फरवरी 2026 को मनाई जा रही है।
संत रविदास के कुछ दोहे जो समानता और मेलजोल का पाठ सिखाते हैं
मन चंगा तो कठौती में गंगा
इस दोहे का अर्थ है कि अगर आपका मन साफ है और आप किसी के बारे में गलत नहीं सोचते, तो आपके मन में ईश्वर (शांति)का वास होता है। ऐसे में आपको गंगा या फिर किसी और पवित्र स्थान में जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मन पवित्र होने पर ईश्वर(शांति और संतोष) आपके साथ सदा होता है।
तुलसी ने वर्णव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कहा,,
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहिं भय सोक न रोग।।
राम के राज्य में प्रत्येक व्यक्ति वर्णाश्रम के अनुकूल आचरण करता है, धर्म में तत्पर होकर वेद विहित मार्ग पर चलता है, और सुख पाता है। उनके जीवन में किसी प्रकार का भय, शोक, रोग नहीं है।
इसके विरुद्ध संत रैदास ने कहा
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात
इस दोहे में संत रविदास जाति से समाज को होने वाली हानि के बारे में बात करते हैं। इस दोहे का अर्थ है कि जिस तरह केले के तने को छिलते रहने से उसके नीचे से पत्ते ही पत्ते निकलते रहते हैं और अंत में पूरा पेड़ ही खत्म हो जाता है। कुछ इसी तरह लोगों को भी जातियों में बांट दिया गया है। अंत में लोग मर जाते हैं, खत्म हो जाते हैं लेकिन उनकी जातियां खत्म नहीं होती।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं, हिंदूअन तुरकन माहि।
इस दोहे के माध्यम से रविदास जी कहते हैं कि जिस तरह सोना जब कंगन बन जाता है, तो दोनों में अंतर नहीं रहता। उसी तरह हिंदू और मुस्लिम में भी कोई अंतर नहीं है।
गीता के श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि.
इस श्लोक का मतलब है कि:
तुम्हें अपने कर्म करने का अधिकार है, लेकिन तुम अपने कर्मों का फल पाने के अधिकारी नहीं हो.
के विरुद्ध संत रैदास कहते हैं,,
करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास
इस दोहे में कर्मों का महत्व बताते हुए संत रविदास जी कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा अपने कर्मों पर भरोसा रखना चाहिए। इन कर्मों के अनुसार मिलने वाले फल की आशा उसे कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
तुलसी की चौपाई
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।
पनारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥3॥
भावार्थ
तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥3॥
के विरुद्ध संत रैदास ने कहा
दास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच
इस दोहे का अर्थ है कि किसी घर विशेष में जन्म लेने से कोई व्यक्ति नीच नहीं बन जाता है बल्कि इंसान के कर्म ही इस बात का निश्चय करते हैं कि वो असल में क्या है? बुरे कर्म करने वाला व्यक्ति नीच होता है।
तुलसी की चौपाई
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥1॥
भावार्थ
शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुण गणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है॥1॥
संत रैदास जी ने कहा
रैदास ब्राह्मण मति पूजिए, जए होवै गुन हीन। पूजिहिं चरन चंडाल के, जउ होवै गुन प्रवीन॥
रैदास कहते हैं कि उस ब्राह्मण को नहीं पूजना चाहिए जो गुणहीन हो। गुणहीन ब्राह्मण की अपेक्षा गुणवान चांडाल के चरण पूजना श्रेयस्कर है।
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा, वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा
मेलजोल का संदेश देते हुए संत रविदास जी कहते हैं कि राम, कृष्ण, हरि, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही है। अर्थात सब के सब आपको पाखंड और अलौकिक जीवन में धकेलते हैं ,मानव मानव में भेद करते हैं ताकि एक सुविधाभोगी चालाक वर्ग हमेशा बिना श्रम किए बैठे बैठे खा सके,,,,,,जब तक आप ये नहीं समझेंगे तब तक आप वेद, कुरान, पुराण के षडयंत्र को नहीं समझ पायेंगे।।