जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य श्री "श्रीजी" महाराज

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जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य श्री "श्रीजी" महाराज जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य श्री "श्रीजी" महाराज

महंत श्रीवृन्दावन दास जी के सानिध्य में श्रीअलीमाधुरी कुटी में सम्पन्न हुआ अष्ट दिवसीय श्रीआचार्य जयन्ती उत्सव।नित्यनिकु...
18/04/2026

महंत श्रीवृन्दावन दास जी के सानिध्य में श्रीअलीमाधुरी कुटी में सम्पन्न हुआ अष्ट दिवसीय श्रीआचार्य जयन्ती उत्सव।
नित्यनिकुंज लीलाप्रविष्ट जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य श्री श्रीजी महाराज का 98 वां जयन्ती महोत्सव श्रीअलीमाधुरी कुटी, श्रीधामवृंदावन में श्रीमहावाणी जी के सप्तदिवसीय सामूहिक पाठ, श्रीरासबिहारी सरकार की निकुंज लीला दर्शन एवं संत-वैष्णव सेवा सहित आयोजित हुआ।
11-04-2026 से 17-04-2026 तक प्रातः 9 बजे से 12 बजे तक प्रतिदिन श्रीमहावाणी जी के सामूहिक पाठ हुए तथा सायं 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक श्रीरासबिहारी सरकार की निकुंज लीला दर्शन हुए।
18-04-2026 वैशाख शुक्ल प्रतिपदा संवत् 2083 को दिन में 10 बजे से बधाई गान एवं संत-वैष्णव सेवा भंडारा हुआ।

आचार्यश्री के जयन्ती महोत्सव की मङ्गल बधाई 🙏
18/04/2026

आचार्यश्री के जयन्ती महोत्सव की मङ्गल बधाई 🙏

 #श्रीआचार्य_जयंती प्रथम दिवस                   ।।श्रीसर्वेश्वरो जयति।।           ।।श्रीभगवन्निम्बार्काचार्याय नमः।।    ...
11/04/2026

#श्रीआचार्य_जयंती प्रथम दिवस
।।श्रीसर्वेश्वरो जयति।। ।।श्रीभगवन्निम्बार्काचार्याय नमः।।
*🙏सादर आमंत्रण🙏*
सम्माननीय भक्तवृंद !
*नित्यनिकुंजलीलाप्रविष्ट जगद्गुरु श्रीनिम्बार्कपीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य श्री “श्रीजी” महाराज का 98 वाँ जयन्ती महोत्सव*
11-04-2026 शनिवार से 18-04-2026 शनिवार तक श्रीअलीमाधुरी कुटी, वृन्दावन में,
श्रीमहावाणी जी के सप्ताहिक पाठ, श्रीरासबिहारी सरकार के नित्य रास दर्शन एवं संतों-विद्वद्जनों के उद्बोधनों सहित समारोहपूर्वक आयोजित होगा।

इस मंगलमय महोत्सव में आप सभी संत विद्वद्जन एवं भक्तवृन्द सादर आमन्त्रित हैं पधारकर आयोजन की श्रीवृद्धि करें।

*कार्यक्रम*
*दिनाँक 11-04-2026 से 17-04-2025 तक प्रातः 8 बजे से 12 बजे तक प्रतिदिन*
*श्रीमहावाणीजी समाज*

*दिनाँक 11-04-2026 से 17-04-2026 तक सायं 6 बजे से 9 बजे तक प्रतिदिन*
*श्रीरासबिहारी सरकार के नित्य रास दर्शन*

*दिनाँक 18-04-2026, वैशाख शुक्ल प्रतिपदा संवत् 2083 शनिवार मध्याह्न 11 बजे से*
*आचार्य जयन्ती बधाई-गान तत्पश्चात संत-वैष्णव सेवा-प्रसादी*

कार्यक्रम स्थल श्रीअलीमाधुरी कुटी, रमणरेती, परिक्रमा मार्ग, वृन्दावन, मथुरा

🙏निवेदक🙏
*महन्त वृन्दावनदास शास्त्री*
*श्रीअलीमाधुरी कुटी न्यास, वृन्दावन*

नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सम्वत् २०८३ विक्रमी एवंवासंतिक नवरात्र पर्व की मंगल बधाई!!श्रीसर्वेश्वर श्रीसरसबिहारी जी सरक...
19/03/2026

नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सम्वत् २०८३ विक्रमी एवं
वासंतिक नवरात्र पर्व की मंगल बधाई!!
श्रीसर्वेश्वर श्रीसरसबिहारी जी सरकार के श्रीचरणों में श्रीनिम्बार्क परिषद् की प्रार्थना है
श्रीमन्नृपति विक्रमार्क राज्यात्संवत 2083, रौद्र संवत्सर
समस्त चराचर के लिए मंगलमय हो।
🙏🙏🙏

☀️ श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पंचांग 2083             सन् 2026-27अत्यन्त हर्ष के साथ सूचित किया जा रहा है कि राजस्थान व पश्च...
15/11/2025

☀️ श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पंचांग 2083
सन् 2026-27

अत्यन्त हर्ष के साथ सूचित किया जा रहा है कि राजस्थान व पश्चिमी भारत का एकमात्र सूर्यसिद्धान्तीय जयादित्य पंचांग- 2083 प्रकाशित हो गया है।

पंचांग में सभी आवश्यक विषयों के साथ अनेक धार्मिक व ज्योतिषीय जानकारियों से भरा है। इस पंचांग का सूक्ष्म गणित आचार्य श्री विनय झा जी द्वारा किया गया है। समस्त सनातन धर्मी धर्मशास्त्र अनुमोदित इस जयादित्य पंचांग-2083 के अनुसार व्रत, पर्वों का पालन करें ऐसा नम्र निवेदन है।

☀️ जयादित्य पंचांग 2083 की सहयोग राशि 120/- ₹ प्रति पंचांग है।

पंचांग निम्न दो वेबसाइट से प्राप्त किए जा सकते हैं जिनके लिंक कमेंट में दिए गए हैं :-
◆ SaraswatiPrakashan ◆
◆ AstroBookWorld ◆

अन्य माध्यम से भेजना सम्भव नहीं है अतः निम्न वेबसाइट्स के माध्यम से ही जयादित्य पंचांग प्राप्त करने की कृपा करें।

◆निवेदक:
श्रीनिम्बार्क परिषद् जयपुर

श्रीनिम्बार्क परिषद् जयपुर द्वारा आयोजित श्रीनिम्बार्क जयन्ती महोत्सव दिनाँक 30 अक्टूबर से 10 नवंबर 2025 तक श्रीमाधवबिहा...
11/11/2025

श्रीनिम्बार्क परिषद् जयपुर द्वारा आयोजित श्रीनिम्बार्क जयन्ती महोत्सव दिनाँक 30 अक्टूबर से 10 नवंबर 2025 तक श्रीमाधवबिहारी जी मंदिर, जयपुर में सानंद संपन्न हुआ।
30 अक्टूबर को गोपाष्टमी से आरंभ होकर श्रीसर्वेश्वर प्रभु, श्रीहंस भगवान, श्रीसनकादिक प्राकट्य उत्सव पर मन्दिर श्रीसरसबिहारी जी, कलवाड़ा में विराजमान सूक्ष्म चक्रांकित श्रीशालिग्राम भगवान के दिव्य अभिषेक सहित कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी, 3 नवम्बर तक विभिन्न वैष्णवों के सौजन्य से बधाई गान आयोजित हुए।
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी 4 नवम्बर को महंत श्रीवृन्दावनदास जी महाराज द्वारा संचालित अजयराजपुरा स्थित श्रीराधाकृष्ण धाम नृसिंह कुटी में श्रीनिम्बार्क सहस्रनाम के पाठ और आचार्य प्राकट्य बधाई गान हुआ और सैंकड़ों भक्तों ने पंगत प्रसादी का आनंद लिया।
कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को श्रीआचार्य जयन्ती पर भांकरोटा स्थित आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहन्त स्वामी श्रीपद्मनाभशरणदेवाचार्य जी के स्थान श्रीसर्वेश्वर निम्बार्क सेवाधाम में श्रीनिम्बार्क भगवान का दिव्य महाभिषेक हुआ। बधाई गान, पुष्पमहल में विराजे श्रीप्रिया प्रीतम को छप्पन भोग लगा और सैंकड़ों भक्तों ने पंगत प्रसादी पाई।
मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा से तृतीया, 6 से 8 नवम्बर तक मंदिर श्रीमाधोबिहारी के विशाल और दिव्य प्रांगण में आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहन्त स्वामी श्रीपद्मनाभशरणदेवाचार्य जी ने रासपंचाध्यायी पर अद्भुत प्रवचन किया।
श्रोतागण एकाग्रचित्त होकर सम्पूर्ण समय हर्षित होकर कथा श्रवण करते। सबका कहना था कि ऐसी सरस शैली में ऐसे गूढ़ प्रसङ्ग का आनंद जीवन में प्रथम बार ही प्राप्त हुआ है।

मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी 9 नवंबर को श्रीधाम से पधारे श्रीराधासर्वेश्वर रास मंडल द्वारा श्री भुवनेश्वर वशिष्ठ के निर्देशन में नित्यरास और श्रीनिम्बार्क भगवान के विभिन्न दिव्य चरित्र का दर्शन कराया गया।

नित्य कथा के पश्चात महंत श्रीवृन्दावनदास जी महाराज अपने उद्बोधन में जब नित्यनिकुंज लीला प्रविष्ट श्री श्रीजी महाराज के संस्मरण सुनाते तो उपस्थित भक्तजन भावविभोर हो उठते थे।

मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी 10 नवम्बर 2025 को श्रीनिम्बार्क भगवान का छठी महोत्सव मनाया गया।
सर्वप्रथम श्रीनिम्बार्क उत्सव मंडल द्वारा आचार्य प्राकट्य बधाई गान और समाज गायन हुआ। तत्पश्चात वृन्दावन के स्वामी श्री भुवनेश्वर वशिष्ठ जी की श्रीराधासर्वेश्वर रासमण्डली द्वारा दिव्य रासलीला का दर्शन हुआ।

शुक सम्प्रदाय आचार्य श्रीअलबेली माधुरीशरण जी महाराज, महंत श्रीकल्याणदास जी महाराज जगतपुरा, महंत श्री सर्वेश्वरशरण जी महाराज नायला, महंत श्रीबनवारीशरण जी महाराज जूसरी, महंत श्रीवृन्दावनदास जी महाराज वृन्दावन, आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहन्त श्रीपद्मनाभशरणदेवाचार्य जी महाराज, सरस कुन्ज के बड़े भैया, श्रीलाडली जी का मंदिर जयपुर के महंत श्री संजय गोस्वामी जी एवं श्रीवराह मंदिर जयपुर के महंत श्री पवन कुमार जी शर्मा ने श्रीरासबिहारी सरकार की आरती उतारी।
उपस्थित संतों/विद्वानों ने श्रीनिम्बार्क भगवान, निम्बार्क सम्प्रदाय और उनके सिद्धांतों पर विभिन्न प्रकार से प्रकाश डाला।
समुपस्थित सभी संतों-विद्वानों ने श्रीनिम्बार्क परिषद् द्वारा प्रकाशित श्रीवराह चालीसा तथा आगामी विक्रम् संवत् 2083 के "श्रीसर्वेश्वर-जयादित्य-पञ्चाङ्ग" का विमोचन किया।
सैंकड़ों भक्तजन भाव विभोर होकर अश्रुपात करते हुए इस दिव्य आयोजन का आनंद लाभ ले रहे थे।
इस उत्सव में ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे नित्यनिकुंज लीला प्रविष्ट श्री "श्रीजी" महाराज ही साक्षात विराजमान होकर संपूर्ण आयोजन का संचालन कर रहे थे उन्हीं के सानिध्य में सारा आयोजन हो रहा था।
प्रत्येक वक्ता "जय जय" के संस्मरण सुनाकर भावविह्वल हो रहे थे, और आचार्यश्री में अपनी निष्ठा रखने वाले समस्त वैष्णववृन्द बारंबार जयघोष कर रहे थे।
सम्पूर्ण उत्सव में 7 दिवस तक हजारों भक्तों ने उत्सव के आनंद सहित पंगत प्रसादी पाई।

इस समस्त दिव्य-भव्य आयोजन में श्रीसर्वेश्वर प्रभु की अहैतुकी कृपा और उनकी कृपा के साक्षात मूर्तिमंत स्वरूप श्री "श्रीजी" महाराज का आशीर्वाद ही एकमात्र कारक रहा।
महंत श्रीबनवारीशरण जी महाराज जूसरी, महंत श्रीवृन्दावनदास जी महाराज वृन्दावन, आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहन्त स्वामी श्रीपद्मनाभशरणदेवाचार्य जी महाराज, ये सभी जो स्वयं आचार्यश्री के परम कृपापात्र रहे हैं, इन विभूतियों ने स्वयं सम्पूर्ण आयोजन को अपना निर्देशन संरक्षण प्रदान किया इसीके फलस्वरूप यह महोत्सव ऐसा भव्य स्वरूप प्राप्त कर सका।
श्रीनिम्बार्क परिषद् के अध्यक्ष श्री देवेशचंद्र स्वामी जी के नेतृत्व में समस्त पदाधिकारी/कार्यकर्ता और सदस्यगण, जयपुर के सभी वैष्णववृन्द ने इस आयोजन में जिस प्रकार अपना सहयोग प्रदान किया वह अद्भुत रहा।
प्रत्येक वैष्णव इस प्रकार इस कार्य में जुड़ा जैसे स्वयं आचार्यश्री ने उन्हें प्रत्यक्ष आदेश प्रदान किया हो और उस आदेश की पूर्ति के माध्यम से सभी "अपनी निष्ठा" आचार्यश्री में सिद्ध कर रहे थे।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु हम सभी का कल्याण करें तथा हमारी अगाध निष्ठा हमारी आचार्यपरम्परा और स्वसम्प्रदाय सिद्धान्त में सदा बनी रहे।

https://g.co/kgs/wkHYJP #श्रीरासपंचाध्यायी_प्रवचन  #श्रीनिम्बार्क_जयन्ती #श्रीनिम्बार्क_परिषद्
08/11/2025

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#श्रीरासपंचाध्यायी_प्रवचन #श्रीनिम्बार्क_जयन्ती
#श्रीनिम्बार्क_परिषद्

कार्तिक पूर्णिमा पर हुआ श्रीनिम्बार्क भगवान का प्राकट्य अभिषेक। कल से श्रीमाधोबिहारी मंदिर, जयपुर में रासपंचाध्यायी प्रव...
05/11/2025

कार्तिक पूर्णिमा पर हुआ श्रीनिम्बार्क भगवान का प्राकट्य अभिषेक। कल से श्रीमाधोबिहारी मंदिर, जयपुर में रासपंचाध्यायी प्रवचन और रासलीला।

निम्बार्क परिषद् द्वारा मनाए जा रहे 12 दिवसीय श्रीनिम्बार्क जयंती महोत्सव में शनिवार को भांकरोटा स्थित सर्वेश्वर निम्बार्क सेवाधाम में निम्बार्क भगवान का महाभिषेक हुआ। इस अवसर पर बधाई गान हुआ। पुष्पमहल में विराजे श्रीप्रिया प्रीतम को 56 भोग लगाकर भक्तों ने पंगत प्रसादी पाई।
6 से 8 नवंबर 2025 तक पुलिस लाइन के सामने मंदिर श्रीमाधोबिहारी में आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहंत स्वामी श्रीपद्मनाभशरणदेवाचार्य जी रासपंचाध्यायी कथा का वाचन करेंगे।
9 और 10 नवंबर 2025 को रासलीला सहित छठी महोत्सव के साथ महोत्सव का विश्राम होगा।

 #श्रीनिम्बार्काचार्य_जयन्ती की मङ्गल बधाई!श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय अत्यन्त  प्राचीन अनादि वैदिक सत्सम्प्रदाय है। इस सम्प...
05/11/2025

#श्रीनिम्बार्काचार्य_जयन्ती की मङ्गल बधाई!

श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय अत्यन्त प्राचीन अनादि वैदिक सत्सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के आद्याचार्य श्रीसुदर्शनचक्रावतार जगद्गुरु श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य है। इस सम्प्रदाय की परम्परा श्रीहंस भगवान से प्रारम्भ होती है । श्रीहंस भगवान ने प्रकट होकर श्री सनकादि महर्षियों की जिज्ञासा पूर्ति कर उन्हें श्रीगोपाल तापिनी उपनिषद के परम दिव्य पंचपदी विद्यात्मक श्रीगोपाल मन्त्रराज का गूढतम उपदेश तथा अपने निज स्वरुप सूक्ष्म दक्षिणावर्ती चक्राङ्कित शालिग्राम अर्चा विग्रह प्रदान किये जो श्रीसर्वेश्वर के नाम से व्यवहृत हैं। इसी मन्त्र का उपदेश तथा श्रीसर्वेश्वर प्रभु की सेवा श्रीसनकादिकों ने देवर्षिप्रवर श्रीनारदजी को प्रदान की। निखिलभुवनमोहन सर्वनियन्ता श्रीसर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की मंगलमयी पावन आज्ञा शिरोधार्य कर चक्रराज श्रीसुदर्शन ने द्वापरान्त में इस धराधाम पर भारतवर्ष के दक्षिण में महर्षिवर्य श्रीअरूण के पवित्र आश्रम में माता जयन्तीदेवी के उदर से श्रीनियमानन्द के रूप में अवतार धारण किया।
अल्पवय में ही माता जयन्ती तथा पिता महर्षि अरूण के साथ उत्तर भारत में व्रजमण्डल स्थित गिरिराज गोवर्धन की सुरम्य उपत्यका तलहटी में निवास कर श्रुति-स्मृति-सूत्रादि विविध विद्याओं का सांगोपांग विधिवत अध्ययन किया।
पितामह ब्रह्मा जी एक दिवाभोजी यति के रूप में सूर्यास्त के समय आपके आश्रम पर उपस्थित हुए। विविध शास्त्रीय चर्चाओं के अनन्तर जब श्रीनियमानन्द प्रभु ने यति से भगवत प्रसाद लेने का आग्रह किया तो यति ने सूर्यास्त का संकेत करते हुए अपने दिवभोजी होने का संकल्प स्मरण कराया। समागत अतिथि के अभुक्त ही चले जाने से शास्त्र आज्ञा की हानि होते देख श्रीनियमानन्द ने अपने सुदर्शन-चक्र स्वरुप के तेज को समीपस्थ निम्बवृक्ष पर स्थापित कर दिवभोजी यति को सूर्य रूप में दर्शन कराकर भगवदप्रसाद पवाया। यति ने ज्योंही आचमन किया तो भान हुआ की एक प्रहार रात्रि व्यतीत हो चुकी हैं। इस महान विस्मयकारिणी घटना को देखकर ब्रह्माजी ने वास्तविक रूप में प्रकट होकर श्रीनियमानन्द को स्वयं द्वारा परीक्षा लिया जाना बतलाकर निम्ब वृक्ष पर अर्क (सूर्य) के दर्शन कराने के कारण श्रीनिम्बार्क नाम से सम्बोधित किया और भविष्य में इसी नाम से विख्यात होने की घोषणा की। तबसे श्रीनियमानन्द प्रभु का नाम श्रीनिम्बार्क प्रसिद्ध हुआ।
इसी आश्रम में आपको देवर्षिप्रवर श्रीनारदजी से वैष्णवी दीक्षा में वही पंचपदी विद्यात्मक श्रीगोपालमन्त्रराज का पावन उपदेश तथा श्रीसनकादि संसेवित श्रीसर्वेश्वर प्रभु की अनुपम सेवा प्राप्त हुई। श्रीनारद जी ने श्रीनिम्बार्क को श्रीराधाकृष्ण की युगल उपासना एवं स्वाभाविक द्वैताद्वैत सिद्धांत का परिज्ञान कराया और स्वयं-पाकिता एवं अखंड नैष्ठिक ब्रह्मचर्य व्रतादि नियमों का विधिपूर्वक उपदेश किया। यही मंत्रोपदेश-सिद्धांत, श्रीसर्वेश्वर प्रभु की सेवा तथा स्वयं-पाकिता का नियम और नैष्ठिक ब्रह्मचर्य के पालन पूर्वक आचार्य परम्परा के अनुलंघनीय नियम है।
आपने प्रस्थानत्रयी पर भाष्य रचना कर स्वाभाविक द्वैताद्वैत नामक सिद्धान्त का प्रतिष्ठापन किया। भगवान् श्रीराधाकृष्ण की श्रुति-पुराणादि शास्त्रसम्मत रसमयी मधुर युगल उपासना का आपने सूत्रपात कर इसका प्रचुर प्रसार किया। कपालवेध स़िद्धान्तानुसार विद्धा एकादाशी त्याज्य एवं शुद्धा एकादाशी ही ग्राह्य है, भगवद्द्जयन्ती आदि व्रतोपवास के सन्दर्भ में यही आपश्री का अभिमत सुप्रसिद्ध है।
सम्प्रदाय के आद्य-प्रवर्तक आप ही लोक विश्रुत हैं। आपका प्रमुख केन्द्र व्रज में श्रीगोवर्धन के समीप निम्बग्राम रहा है।
श्रीनिम्बार्काचार्य ने समस्त वैष्णव आचार्यों एव श्रीशंकराचार्य से पूर्व धर्म की लडखडाती ध्वजा को संभाल कर और ईश्वर भक्ति जो कर्मकाण्ड में ही उलझा दी गई थी को "उपासनीयं नितरां जनैः" के घोष द्वारा सर्वजन के अधिकार की घोषित कर प्रत्येक जीव को - "ज्ञानस्वरूपञ्च हरेरधीनं" बताकर प्रत्येक मानव को ज्ञान का अधिकारी और श्रीहरि के आधीन घोषित किया।
श्रीनिम्बार्काचार्य ने द्वैत और अद्वैत के खण्डन मण्डन की प्रवृत्तियों के प्रारम्भ से बहुत पूर्व वेदान्त में स्वाभाविक रूप से प्राप्त द्वैताद्वैत सिद्धांत को ही परिपुष्ट किया। ब्रह्म के सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सभी स्वरुप स्वाभाविक हैं। इनमें किसी एक के निषेध का अर्थ होता हैं ब्रह्म की सर्वसमर्थता, सर्वशक्तिमत्ता में अविश्वास करना। अखिल ब्रह्माण्ड में जो हैं सब ब्रह्ममय ही हैं, ---"सर्वं हि विज्ञानमतो यथार्थकंश्रुतिस्मृतिभ्यो निखिलस्य वस्तुनः। ब्रह्मात्मकत्वादिति वेदविन्मतं त्रिरुपताअपि श्रुतिसुत्रसाधिता।।
श्रीनिम्बार्क के विचार में जगत भ्रम या मिथ्या नहीं, अपितु ब्रह्म का स्वाभाविक परिणाम है। श्रुति और स्मृति वचनों से इसकी सिद्धि होती हैं।
स्वाभाविक भेदाभेद–श्रीनिम्बार्काचार्य चरण ने ब्रह्म ज्ञान का कारण एकमात्र शास्त्र को माना है। सम्पूर्ण धर्मों का मूल वेद है। वेद विपरीत स्मृतियाँ अमान्य हैं। जहाँ श्रुति में परस्पर द्वैध (भिन्न रूपत्व) भी आता हो वहाँ श्रुति रूप होने से दोनों ही धर्म हैं। किसी एक को उपादेय तथा अन्य को हेय नहीं कहा जा सकता। तुल्य बल होने से सभी श्रुतियाँ प्रधान हैं। किसी के प्रधान व किसी के गौण भाव की कल्पना करना उचित नहीं है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भिन्न रूप श्रुतियों का भी समन्वय करके निम्बार्क दर्शन ने स्वाभाविक भेदाभेद सम्बन्ध को स्वीकृत किया है। इसमें समन्वयात्मक दृष्टि होने से भिन्न रूप श्रुति का भी परस्पर कोई विरोध नहीं होता। अतएव निम्बार्क दर्शन को ‘अविरोध मत’ के नाम से भी अभिहित करते हैं।
श्रुतियों में कुछ भेद का बोध कराती हैं तो कुछ अभेद का निर्देश देती हैं।
यथा- ‘पराऽय शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविक ज्ञान
बल-क्रिया च’ (श्वे० ६/८)
‘सर्वांल्लोकानीशते ईशनीभिः’ (श्वे० ३/१)
‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति,
यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति’ (तै० ३/१/१) ।
‘नित्यो नित्यानां चेतश्नचेतनानामेको बहूनां यो विदधाति
कामान् (कठ० ५/१३) अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।’
(गीता १०/८) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म और जगत के भेद का प्रतिपादन
करती हैं।
‘सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छा० ६/२/
१) आत्मा वा इदमेकमासीत्’ (तै०२/१) तत्त्वमसि’ (छा./१४/
३) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृ० २/५/१६) सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छा.
३/१४/१) मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि गणा इव’ (गी, ७/७/)
इत्यादि अभेद का बोध कराती हैं।

इस प्रकार भेद और अभेद दोनों विरुद्ध पदार्थों का निर्देश करने वाली श्रुतियों में से किसी एक प्रकार की श्रुति को उपादेय अथवा प्रधान कहें तो दूसरी को हेय या गौण कहना पड़ेगा। इससे शास्त्र की हानि होती है। क्योंकि वेद सर्वांशतया प्रमाण है। श्रुति स्मृतियों का निर्णय है। अतः तुल्य होने से भेद और अभेद दोनों को ही प्रधान मानना होगा, व्यावहारिक दृष्टि से यह सम्भव नहीं। भेद अभेद नहीं हो सकता और अभेद को भेद नहीं कह सकते। ऐसी स्थिति में कोई ऐसा मार्ग निकालना होगा कि दोनों में विरोध न हो तथा समन्वय हो जावे।

श्रीनिम्बार्काचार्यपाद ने उक्त समस्या का समाधान करके ऐसे ही अविरोधी समन्वयात्मक मार्ग का उपदेश किया है।
आपश्री का कहना है–
‘ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है। उपादान अपने कार्य से अभिन्न होता है। स्वयं मिट्टी ही घड़ा बन जाती है। उसके बिना घडे की कोई सत्ता नहीं। कार्य अपने कारण में अति सूक्ष्म रूप से रहते हैं। उस समय नाम रूप का विभाग न होने के कारण कार्य का पृथक् रूप से ग्रहण नहीं होता पर अपने कारण में उसकी सत्ता अवश्य रहती है। इस प्रकार कार्य व कारण की ऐक्यावस्था को ही अभेद कहते हैं।’
‘सदेव सौम्येदमग्र आसीत् ०’ इत्यादि श्रुतियों का यह ही अभिप्राय है। इसी से सत् ख्याति की उपपत्ति होती है। सद्रूप होने से यह अभेद सवाभाविक है।
दृश्यमान जगत् ब्रह्म का ही परिणाम है। वह दूध से दही जैसा नहीं है। दूध, दही बनकर अपने दुग्धत्व (दूधपने) को जिस प्रकार समाप्त कर देता है, वैसे ब्रह्म जगत् के रूप में परिणत होकर अपने स्वरूप को समाप्त नहीं करता, अपितु मकड़ी के जाले के समान अपनी शक्ति का विक्षेप करके जगत् की सृष्टि करता है। यह ही शक्ति-विक्षेप लक्षण परिणाम है।
यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः।
स्वभावतो देव एकः । समावृणोति स नो दधातु ब्रह्माव्ययम्।।
(श्वे० ६/१०)
‘यदिदं किञ्च तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्
(तै. २/६)
इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं।
ब्रह्म ही प्राणियों को अपने-अपने किये कर्मों का फल भुगताता है, अतः जगत् का निमित्त कारण होने से ब्रह्म और जगत् का भेद भी सिद्ध होता है, जो कि अभेद के समान स्वाभाविक ही है।

इसी समन्वयात्मक दार्शनिक प्रणाली को स्वाभाविक भेदाभेद अथवा स्वाभाविक द्वैताद्वैत शब्द से अभिहित करते हैं, जिसका उपदेश श्रीनिम्बार्काचार्य चरण ने किया है।

 #श्रीनिम्बार्क_जयन्ती_जयपुरसम्माननीय भक्तवृन्द !श्रीसुदर्शनचक्रावतार स्वाभाविक द्वैताद्वैत सिद्धान्त प्रवर्तक जगदगुरु श...
27/10/2025

#श्रीनिम्बार्क_जयन्ती_जयपुर

सम्माननीय भक्तवृन्द !
श्रीसुदर्शनचक्रावतार स्वाभाविक द्वैताद्वैत सिद्धान्त प्रवर्तक जगदगुरु श्रीनिम्बार्क भगवान् का जयन्ती उत्सव कार्तिक शुक्ल नवमी संवत् 2082, गुरुवार 30/10/2025 से मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी संवत् 2082, सोमवार 10/11/2025 तक श्रीनिम्बार्क परिषद् द्वारा श्रीमाधोबिहारी जी का मंदिर, जयपुर में समारोह पूर्वक आयोजित हो रहा है।
जिसमें भारतवर्ष से पधारे संतो-महन्तों-विद्वतजनों के सान्निध्य में श्रीनिम्बार्क भगवान् का अभिषेक, बधाई गान, श्रीरासपंचाध्यायी प्रवचन, श्रीनिम्बार्क चरित्र लीला, निकुञ्ज लीला दर्शन, श्रीवराह चालीसा एवं श्रीसर्वेश्वर-जयादित्य-पञ्चाङ्गम् का विमोचन एवं संत-विद्वत समागम आदि विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न होंगे। इस अनुपम महोत्सव में आप सपरिवार सादर आमंत्रित हैं, पधार कर भक्ति-ज्ञान-आनन्द की दिव्य त्रिवेणी में स्नान कर स्वयं को कृतार्थ करें तथा आयोजन की श्रीवृद्धि करें।

निवेदकः
श्रीनिम्बार्क परिषद्
श्रीसर्वेश्वर निम्बार्क सेवा धाम
श्रीराधाकृष्ण धाम श्रीनृसिंह कुटी न्यास

दीपावली 20 अक्टूबर 2025, सोमवार को है।🌹 दीपावली लक्ष्मीपूजन के मुहूर्त्त 🌹दीपावली में लक्ष्मी पूजा के 3 काल सबसे ज्यादा ...
19/10/2025

दीपावली 20 अक्टूबर 2025, सोमवार को है।
🌹 दीपावली लक्ष्मीपूजन के मुहूर्त्त 🌹

दीपावली में लक्ष्मी पूजा के 3 काल सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं – प्रदोषकाल, वृष लग्न और सिंह लग्न। सूर्यास्त के 72 मिनट बाद तक प्रदोषकाल होता है, और इसके ठीक बाद वृष लग्न होता है और ढलती रात में सिंह लग्न आता है। प्रदोषकाल और वृष लग्न में पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त होता है।

*20 अक्टूबर को दीपावली के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त*

◆ *प्रदोष काल मुहूर्त्त–*
शाम 05:49 से 08:13 तक

🌺 *राजमुहूर्त्त* 🌺
*शाम 07:20 से 08:13 तक*
(इस समय प्रदोषकाल और वृष लग्न दोनों रहेंगे, अतः यह सबसे सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त होगा)

◆ *शाम के समय स्थिर लग्न वृष –*
शाम 07:20 से 09:16 तक

*शाम के समय स्थिर लग्न वृष*
शाम 07:20 से 09:16 तक

*मध्यरात्रि के समय स्थिर लग्न सिंह
*अर्धरात्रि 01:50 से 04:07 तक

◆ *रात्रि में लक्ष्मीपूजा के सारे श्रेष्ठ मुहूर्त्त*

*मध्यरात्रि के समय स्थिर लग्न सिंह*
अर्धरात्रि 01:50 से 04:07 तक

*निशीथ मुहूर्त्त*
रात 11:46 से 00:37 तक

21 अक्टूबर को दीपावली मनाकर पाप के भागी न बनें
21 अक्टूबर को 1 मिनट का भी मुहूर्त्त नहीं

🌷 *श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पञ्चाङ्ग* 🌷

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