Nav-Durga Education Welfare Society

Nav-Durga Education Welfare Society Plant a tree, plant a tree so that next generation can get air for free.

श्रद्धांजलिपूर्व शिक्षक एवं असंख्य जीवनों को प्रेरणा देने वाले स्वर्गीय श्री मास्टर जागेराम जी शर्मा को भावपूर्ण श्रद्धा...
24/07/2026

श्रद्धांजलि

पूर्व शिक्षक एवं असंख्य जीवनों को प्रेरणा देने वाले स्वर्गीय श्री मास्टर जागेराम जी शर्मा को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

"दादा, आप गए नहीं हैं। आप सदैव हमारे साथ हैं। इस युग में भी और अनंत युगों तक आपकी शिक्षाएँ, आपके संस्कार और आपका स्नेह हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते रहेंगे। आपकी अमूल्य विरासत हमेशा हमारे हृदयों में जीवित रहेगी।

ॐ शांति।

21/07/2026



‎और न मुझे श्रम सहन करने की ही आवश्यकता है।।

‎राजा बोले—अरे, तू तो प्रत्यक्ष ही मिथ्यावादी दे रहा है, इस समय भी शिविका मेरे कंधे पर रखी हुई है और बोझा ढोने देहधारियों को श्रम होता ही है।।

‎ब्राह्मण बोले—राजन्! तुम्हें प्रत्यक्ष क्या दिखाई दे रहा है, मुझे पहले यही बताओ। उनके 'बलवान' अथवा 'अबलवान' आदि विशेषणों की बात तो पीछे करना।। "तूने मेरी शिविका का वहन किया है, इस समय भी वह तेरे ही कंधे पर रखी हुई है"—तुम्हारा ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है, अच्छा मेरी बात सुनो—

‎देखो, पृथ्वी पर तो मेरे पैर रखे हैं, पैरों के ऊपर जंघाएँ हैं और जंघाओं के ऊपर दोनों ऊरु तथा ऊरुओं के ऊपर उदर है।। उसके ऊपर वक्षःस्थल, बाँहें और कंधों की स्थिति है तथा कंधों के ऊपर यह शिविका रखी है। इसमें मैं उसके ऊपर कैसे बोझा रहा?।।

‎इस शिविकामें जिसे तुम्हारा कहा जाता है वह शरीर रखा हुआ है। वास्तव में तो "तुम वहाँ (शिविकामें) हो और मैं यहाँ (पृथ्वी पर) हूँ"—ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है।।

‎हे राजन्! मैं, तुम और अन्य भी समस्त जीव पंचभूतों से ही वहन किये जाते हैं। तथा यह भूतवर्ग भी गुणों के प्रवाह में पड़कर ही बहा जा रहा है।।

‎हे पृथ्वीपते! ये सर्वत्र गुण भी कर्मों के वशीभूत हैं और समस्त जीवों में कर्म अविभाज्य ही हैं।।

‎आत्मा तो शुद्ध, अक्षर, शांत, निर्गुण और प्रकृति से परे है तथा समस्त जीवों में वह एक ही ओत-प्रोत है। अतः उसके वृद्धि अथवा क्षय कभी नहीं होते।।

Topic Summary: यदि किसी स्थान पर चोरी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष और तथ्य-आधारित जांच होनी चाहिए। यदि दोषी चोरी में शामिल प...
21/07/2026

Topic Summary:
यदि किसी स्थान पर चोरी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष और तथ्य-आधारित जांच होनी चाहिए। यदि दोषी चोरी में शामिल पाए जाते हैं, तो उन्हें 'चोर' कहा जा सकता है, न कि 'डकैत', यदि घटना डकैती की श्रेणी में नहीं आती। किसी निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र से जुड़े एनजीओ या अन्य संस्था की भूमिका के बारे में भी केवल जांच और प्रमाण के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। जहां तक धन के हिसाब-किताब का प्रश्न है, यदि किसी राशि का स्पष्ट लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है, तो उसके स्रोत और उपयोग की पारदर्शी जांच आवश्यक है। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार पर आरोप लगाना उचित नहीं है।

Nav-Durga Education Welfare Society
राम मंदिर की चोरी पर मेरी निजी टिप्पणी:

हाँ, यदि चोरी हुई थी और जाँच में चोरी सिद्ध होती है, तो चोर थे, डकैत नहीं। डकैती नहीं हुई थी। गलती चाहे किसी निजी कॉर्पोरेट सेक्टर आधारित NGO की रही हो या किसी और की, उसका सच जाँच से ही सामने आना चाहिए।

जहाँ तक उस राशि का सवाल है जिसका हिसाब-किताब नहीं दिया गया, वह कहाँ से आई, कैसे आई, और किसके पास गई—यह मेरे लिए अब भी एक प्रश्न है। शायद यही पूरा आर्थिक ढाँचा समझने का उद्देश्य भी रहा हो कि हर स्तर पर व्यवस्था को समझा जाए और बैंकिंग तथा अर्थव्यवस्था को अधिक पारदर्शी और उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाया जाए।

और देखो, जवाब देने वाला भी सामने आ गया। अगर पाँच साल काम करने वाला अपना हिसाब बता सकता है, तो बाकी लोग भी बता सकते हैं। राम की मुद्रा थी, राम ने रख ली—यह मेरी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, कोई तथ्यात्मक दावा नहीं। आगे क्या होगा, यह समय और सत्य तय करेंगे।

अयोध्या, तुम्हारा महत्व किसी एक व्यक्ति या संस्था से कहीं बड़ा है।

17/07/2026

आपके अनुभव और इस समाचार को जोड़ते हुए यह एक विचारोत्तेजक हिंदी लघु लेख/कहानी है:

आज का दिन – एक किसान, एक उद्यमी और एक सवाल

आज सुबह जब मैंने अखबार खोला, तो पहली खबर ने मन को झकझोर दिया। शीर्षक था—"कैंसर की घर-घर दस्तक, प्रदेश में सालाना 40-45 हजार नए मरीज।" यह सिर्फ एक खबर नहीं थी, बल्कि हमारे समाज, हमारी खेती और हमारी जीवनशैली पर एक गंभीर प्रश्न था।

मैं एक उद्यमी हूँ और साथ ही एक सामान्य नागरिक भी। मेरा सपना केवल व्यापार करना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। मेरा विश्वास है कि मानव जीवन को फिर से प्रकृति की मूल खाद्य श्रृंखला से जोड़ना ही स्वस्थ समाज का आधार है।

कुछ दिन पहले मुझे ICAR के प्रशिक्षण में भाग लेने का अवसर मिला। वहाँ बार-बार कहा गया कि रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करें और जैविक खेती को बढ़ावा दें। यह बात सुनकर अच्छा लगा, क्योंकि स्वस्थ भोजन ही स्वस्थ जीवन की पहली शर्त है।

लेकिन प्रशिक्षण के दौरान जब हम फील्ड विजिट पर गए, तो मैंने एक कृषि दुकान के सामने यूरिया के नए-नए बोरे लगे हुए देखे। ऐसा लगा जैसे अभी-अभी उनकी सप्लाई आई हो। उस दृश्य ने मेरे मन में एक सवाल पैदा किया—यदि हम सच में रासायनिक खाद का उपयोग कम करना चाहते हैं, तो उसकी उपलब्धता और बिक्री पहले जैसी ही क्यों जारी है?

आज की कैंसर संबंधी खबर ने उसी सवाल को और गहरा कर दिया। यदि बढ़ती बीमारियों का एक कारण हमारी बदलती जीवनशैली और भोजन की गुणवत्ता है, तो क्या केवल प्रशिक्षण और भाषण पर्याप्त हैं? क्या किसानों को व्यावहारिक विकल्प, उचित बाज़ार और सरकारी सहयोग दिए बिना जैविक खेती को सफल बनाया जा सकता है?

मैं किसी के प्रयासों की आलोचना नहीं कर रहा, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक और उद्यमी के रूप में यह कहना चाहता हूँ कि नीति और व्यवहार में समानता होनी चाहिए। यदि हम सचमुच आने वाली पीढ़ियों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाना चाहते हैं, तो हमें केवल जागरूकता नहीं, बल्कि ज़मीन पर ठोस बदलाव लाने होंगे।

मेरा मानना है कि स्वस्थ खेत ही स्वस्थ भोजन देंगे, स्वस्थ भोजन ही स्वस्थ परिवार बनाएगा, और स्वस्थ परिवार ही एक समृद्ध राष्ट्र की नींव रखेगा। यही आज की खबर का सबसे बड़ा संदेश है, और यही मेरे जीवन और उद्यमिता का उद्देश्य भी है।

"चेतक की वीरता" ‎रण बीच चौकड़ी भर-भर कर,‎चेतक बन गया निराला था।‎राणा प्रताप के घोड़े से,‎पड़ गया हवा का पाला था।‎गिरता न...
17/06/2026

"चेतक की वीरता"
‎रण बीच चौकड़ी भर-भर कर,
‎चेतक बन गया निराला था।
‎राणा प्रताप के घोड़े से,
‎पड़ गया हवा का पाला था।
‎गिरता न कभी चेतक तन पर,
‎राणा प्रताप का कोड़ा था।
‎वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर,
‎या आसमान का घोड़ा था।
‎जो तनिक हवा से बाग हिली,
‎लेकर सवार उड़ जाता था।
‎राणा की पुतली फिरी नहीं,
‎तब तक चेतक मुड़ जाता था।
‎कौशल दिखलाया चालों में,
‎उड़ गया भयानक भालों में।
‎निर्भीक गया वह ढालों में,
‎सरपट दौड़ा करबालों में।
‎है यहाँ हवा था, अब न वहाँ,
‎वह रहा वहाँ, अब रहा यहाँ।
‎थी जगह न कोई जहाँ नहीं,
‎किस अरि-मस्तक पर कहाँ नहीं।
‎बढ़ते नद-सा वह लहर गया,
‎वह गया गया, फिर ठहर गया।
‎विकल वितुण्डों के बल पर,
‎वह टूट पड़ा अरि-दल पर।

‎मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाले, अदम्य साहस, शौर्य और स्वाभिमान के अमर प्रतीक महाराणा प्रताप और उनके निष्ठावान अश्व चेतक की वीरता को कोटि-कोटि नमन। आपको और आपके परिवार को महाराणा प्रताप जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ!

31/05/2026

Subject: Complaint Regarding Unauthorized Restaurant Operations Near Public and Religious Areas

To Whom It May Concern,

We, the concerned residents of the town, wish to bring to your attention the operation of a non-vegetarian restaurant that we believe may not have the required legal permissions and is causing concern among local residents.

The establishment is located near Omkarmaheswary Marg, an area that is regularly visited by temple devotees, school students, families, and members of the local community. Many residents feel that the restaurant's location is inappropriate due to its proximity to religious and educational institutions and the high volume of daily public visitors.

We respectfully request that the relevant authorities investigate whether the establishment is operating in compliance with all applicable laws, licenses, zoning regulations, health standards, and municipal requirements.

If the operation is found to be non-compliant, we request appropriate action in accordance with the law. We further request that businesses of this nature be located only in designated commercial zones that are suitably separated from religious places, schools, and other sensitive public areas, in line with local regulations and community planning requirements.

Our intention is to maintain the cultural, religious, educational, and social environment of the area while ensuring that all businesses operate legally and responsibly.

We kindly request that this matter be reviewed and addressed at the earliest opportunity.

Sincerely,

Concerned Residents
DIPR, Department of Information & Public Relations, Rajasthan
Rajasthan Sampark
Rajasthan Patrika
Bhajanlal Sharma
Bharatiya Janata Party (BJP)
Nav-Durga Education Welfare Society

31/05/2026

मैं आज अपने हृदय के भाव यहाँ प्रकट कर रहा हूँ।

कहा जाता है कि सबसे बड़ा शत्रु भी एक हिंदू हो सकता है और सबसे बड़ा प्रेमी भी एक हिंदू हो सकता है। किंतु वास्तविक प्रश्न यह है कि — कौन हिंदू और कैसा हिंदू?

जब हम जाति-पाति की बात करते हैं, तो लोग हमें घमंडी, अभिमानी या विभाजनकारी समझने लगते हैं। परंतु जब हम धर्म और अधर्म की बात करते हैं, तब हमें उसी मूल की ओर लौटना पड़ता है, जहाँ से हमारा जन्म हुआ है, जहाँ हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा और हमारे संस्कारों की जड़ें हैं।

इस बात को केवल शब्दों तक सीमित मत रखिए। इसे समझिए, आत्मसात कीजिए और फिर माँ भवानी का स्मरण करके अपने जीवन के संघर्षों में आगे बढ़िए।

याद रखिए, आप अकेले नहीं हैं। आप एक नहीं, अनंत हैं। आपके भीतर असीम शक्ति, साहस और संभावनाएँ विद्यमान हैं। प्रत्येक दिन, प्रत्येक प्रहर, माँ की कृपा और निगरानी आपके साथ है।

Narendra Modi
Nav-Durga Education Welfare Society
Saraswati Bal Mandir Narnaul
Rk Sharma Sharma
Ramakant Sharma
Ravindra Singh Bhati

आइए, माँ भवानी का नाम लेकर धर्म, कर्तव्य और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ें।

जय माँ भवानी!

प्रिय महोदय,मैं आप सभी समाज कल्याण के लिए कार्य करने वाले नेताओं और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करने वाले लोगों...
07/05/2026

प्रिय महोदय,

मैं आप सभी समाज कल्याण के लिए कार्य करने वाले नेताओं और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करने वाले लोगों के सामने एक सामाजिक संदेश प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

यदि कभी मुझे ऐसा मंच मिला जहाँ मैं अपने देश की वास्तविक समस्याओं को खुलकर व्यक्त कर सकूँ,
तो मैं अपनी पहली आवाज़ इसी संदेश से शुरू करना चाहूँगा।

और यदि मुझे वह अवसर कभी न मिले,
तो आप सभी से निवेदन है कि कृपया इस संदेश को यहीं से आगे बढ़ाइए।

क्योंकि इस कहानी का उद्देश्य प्रसिद्धि, राजनीति या शक्ति प्राप्त करना नहीं है।

इसका उद्देश्य केवल मानवता, संतुलन, शिक्षा, पहचान और आने वाली पीढ़ियों की सोच को सुरक्षित रखना है।

शीर्षक :

“मानव सोच बनाम प्रोग्राम की गई सोच”

(इंसानियत, समाज और आने वाली पीढ़ी की एक कहानी)

एक लेखक की सोच — इंसान, समाज और आने वाली पीढ़ी

लेखक कहता है कि आज दुनिया में सबसे बड़ा संघर्ष इंसान बनाम इंसान का नहीं है।
सबसे बड़ा संघर्ष है — “मानव सोच” और “प्रोग्राम की गई सोच” के बीच।

पहले इंसान अपनी जिंदगी परिवार, अनुभव, शिक्षा और संस्कारों से समझता था।
आज बहुत लोग अपनी पहचान सोशल मीडिया, ट्रेंड, डर, गुस्सा, तुलना और बाहरी प्रभाव से बनाने लगे हैं।

इसीलिए लेखक ने जीवन को चार हिस्सों में समझाने की कोशिश की।

पहला चरण — मानव जीवन
जहाँ इंसान के अंदर शांति, संतुलन, जिम्मेदारी और सकारात्मक सोच होती है।
ऐसे लोग समाज को जोड़ते हैं, तोड़ते नहीं।

दूसरा चरण — प्राकृतिक जीवन
जहाँ इंसान साधारण जीवन जीता है।
अपने परिवार, काम और जीवन में संतुलन रखता है।
किसी को नुकसान पहुँचाए बिना अपना जीवन जीता है।

तीसरा चरण — भटका हुआ जीवन
यहाँ इंसान धीरे-धीरे निराशा, गुस्सा, शराब, गलत संगति और दबाव में बदलने लगता है।
यह बदलाव अचानक नहीं आता।
इसके पीछे असफलता, तुलना, भविष्य का डर और समाज की उम्मीदें होती हैं।

चौथा चरण — नियंत्रित और विनाशकारी सोच
यहाँ इंसान अपने असली मानव संतुलन से दूर होने लगता है।
नशा, हिंसा, नकली शक्ति, दिखावा, डिजिटल प्रभाव और बिना सोच के ट्रेंड उसका रास्ता तय करने लगते हैं।

लेखक स्पष्ट करता है कि “बुराई” किसी इंसान की पहचान नहीं है।
बुराई एक सोच है।

दो सोच हमेशा मौजूद रहती हैं —

पहली : मानव सोच
जहाँ भावना, समझ, धैर्य, जिम्मेदारी और इंसानियत बची रहती है।

दूसरी : IT सोच
जहाँ इंसान धीरे-धीरे सिस्टम, ट्रेंड, एल्गोरिदम, भीड़ और बाहरी नियंत्रण के हिसाब से सोचने लगता है।
वह खुद फैसला कम करता है, प्रभाव में ज्यादा जीता है।

लेखक के अनुसार आने वाली पीढ़ी का सबसे बड़ा खतरा यही है —
अगर इंसान अपनी सोच खो देगा, तो उसकी पहचान भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।

आज समाज धर्म और संस्कृति की रक्षा की बात करता है,
लेकिन शिक्षा, मानसिक संतुलन और युवाओं की दिशा पर उतना ध्यान नहीं देता।

100 बच्चों में से बहुत कम अपने सपनों तक पहुँचते हैं।
कुछ नौकरी पाते हैं।
कुछ खुद का रास्ता बना लेते हैं।
लेकिन बहुत सारे युवा बीच रास्ते में ही टूटने लगते हैं।

समस्या यह नहीं कि वे कमजोर हैं।
समस्या यह है कि उन्हें सिर्फ प्रतियोगिता सिखाई गई, जीवन नहीं।

लेखक कहता है कि असली विकास केवल तकनीक, पैसा और बड़ी इमारतें नहीं हैं।
असली विकास तब होगा जब इंसान अपनी मानव सोच को बचाकर आगे बढ़ेगा।

हर इंसान की जिंदगी भगवान का दिया हुआ अधिकार है।
किसी को हक नहीं कि वह किसी की पहचान छीन ले या उसे अपनी सोच से नियंत्रित करे।

समाधान बहुत स्पष्ट है —

बचपन से शिक्षा को केवल नौकरी नहीं, जीवन से जोड़ो।
युवाओं को दिशा दो, केवल दबाव नहीं।
जिम्मेदारी योग्य लोगों को दो, केवल आदेश मानने वालों को नहीं।
समाज को तुलना से नहीं, संतुलन से चलाओ।

और अगर इंसान अपने गुस्से, दर्द और निराशा को काम, अनुशासन और उद्देश्य में बदल दे —
तो वही पीढ़ी समाज को फिर से मानवता की तरफ ले जा सकती है।

22/04/2026
04/04/2026

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Bagar
333023

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