3J अधिकार मंच (जल जमीन जंगल अधिकार मंच ) जैसा के हम सभी जानते है के हम मूल्निवाशियों को कुछ उच्च कही जाने वाली जातीं (ब्राह्मण ,क्षत्रिय औ वैश्यों) ने अपने को श्रेष्ठ दिखाने और अपनी आवश्यकता अनुसार भारत में रह रहे मूल निवाशियों को कई जातिओं और उप्जतिओं में विभाजित किया ....3J अधिकार मंच जैसा के नाम से ही ज्ञात होता है का मुख्या उद्देश्य हमारे समाज को जातिया बंधन से मुक्त कर एक करना और हमारे अधिकार
ों के लिए निरंतर संघर्ष करते रहेनी के लिए प्रेरित करना है ...
कहार समाज का संक्षिप्त अध्ययन
भारत में तो उपनामों का समंदर है। अनगिनत उपनाम जिन्हें लिखते-लिखते शायद सुबह से शाम हो जाए। यदि उपनामों पर शोध करने लगे तो कई ऐसे उपनाम है जो हिंदू समाज के चारों वर्णों में एक जैसे पाए जाते हैं। दरअसल भारतीय उपनाम के पीछे कोई विज्ञान नहीं है यह ऋषिओं के नाम के आधार पर निर्मित हुए हैं। ऋषि-मुनियों के ही नाम 'गोत्र' भी बन गए। कालान्तर में जैसे-जैसे राजा-महापुरुष बढ़े उपनाम भी बढ़ते गए। कहीं-कहीं स्थानों के नाम पर उपनाम देखने को मिलते हैं।
भारत में यदि उपनाम के आधार पर किसी का इतिहास जानने जाएँगे तो हो सकता है कि कोई मुसलमान या दलित हिंदुओं के क्षत्रिय समाज से संबंध रखता हो या वह ब्राह्मणों के कुनबे का हो। लेकिन धार्मिक इतिहास के जानकारों की मानें तो सभी भारतीय किसी ऋषि, मुनि या मनु की संतानें हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ण या रंग का हो।
निषाद(आस्ट्रिक ) निषाद नस्ल के सभी उप जाति है । एक बहुत पुरानी अनार्य जाति जो भारत में आर्य जाति के आने से पहले निवास करती थी । इस जाति के लोग शिकार खेलते, मछलियाँ मारते/पकङते/बेचते थे । विशेष —पुराणों में जिस प्रकार और अनेक अनार्य जातियों की उत्पत्ति के संबन्ध में अनेक प्रकार की कथाएँ लिखी हुई हैं उसी प्रकार इस जाति की उत्पात्ति के संबन्ध में भी एक कथा है । अग्निपुराण मेंलिखा है कि जिस समय राजा वेणु की जाँघ मथी गई थी उस समय उसमें से काले रंग का एक छोटा सा आदमी निकला था । वही आदमी इस वंश का आपुरुष था मूल रुप से महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी उड़ीसा और आंध्र प्रदेश राज्यों के मूल निवासी हैं । महाराष्ट्र में भोइ(मांझी) मूल रुप से मुंबई मै रह्ते थे नासिक,धुलिया, जलगांव, अहमदनगर, पुणे, औरंगाबाद, कोल्हापुर, रत्नागिरी और महाराष्ट्र के शोलापुर जिलों में एँव मध्यप्रदेश के मन्दसौर ,रामपुरा ,आलोट ,फतेहपूर ,ताल , रतलाम ,सैलाना । वर्तमान में, भोई समुदाय के लोग पूरे मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र व राजस्थान में निवास करते है। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, महाराष्ट्र ये में खानाबदोश जनजातियों की सूची में शामिल किये गये ; महाराष्ट्र में भोई समुदाय को कुल 22 उप समूहों मे बाटा गया। 13 वीं सदी के दौरान राजा भीमदेव के शासनकाल मे ये राजस्थान से मुंबई चले गए थे महाराष्ट्र में,भोई पालकी या डोली वाहक थे। भोई समुदाय को महाराष्ट्र मे 22 उप समूहो मे बाटा गया है। जो इस प्रकार है जिन्गा भोई, परदेश भोई, राज भोई, कहार भोई, गाडिया भोई, धुरिया कहार भोई, कीरत मछया भोई, हान्जी, जाति, केवट , धीवर , डीन्गर, पालेवर,मच्छिन्द्रा, हावाडी, हलहार , जाधव भोई, कोडी भोई, खरे भोई और देवरा भोई। ये परिजन समूहों में अहिरानी भाषा जबकि दूसरों से मराठी भाषा में बोलते हैं। गुजरात में भोई सात उप समूहों, अर्थात भोईराज धीमान जिन्गा भोई या केवट भोई, मच्छिन्द्रा भोई, पालेशवर भोई, कीरत भोई, कहार भोई, पार्बिशिन भोई और श्रीमाली भोई से मिलकर बनता है। समुदाय पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने मे जुड़े रहे हैं
आर्थीक बनाम आधुनिकता में कहार
आज इस आधुनिकता जे जाति नामक संरचना में जहाँ हमारे बुजुर्ग पूरे के पूरे जातीय संरचना में विश्वास कर रहे थे और उसके बनाए रखने के लिए रस्में और पारंपरिक काय के रूप में बाध के रखने का कम किया गया था वही आज जाति नामक संस्था आज इस आधुनिकता में बदलाव आ रहा है पुराने रस्में और परंपरा आज टूटने हुएँ नजर आती है वही पर कुछ समाज को जीने का अधिकार मिल रहा है
जमाने के साथ लोग बदल गए हैं, जिससे पुरानी परंपराएं बंद होती जा रही हैं। वाहन आदि से सिर्फ फिजूलखर्ची बढ़ रही है।' वह कहते हैं कि ‘पालकी और डोली शुभदायक होते हैं, लेकिन लोग अब दुल्हन को भी ‘मारुति' में विदा कर ले जाने लगे हैं।' पर, इधर जमाना बदला और पुरानी परंपराएं व संसाधन भी बदल गए। इतना ही नहीं, तीन दिन के बजाय अब कुछ घंटे में शादी-विवाह की रश्में भी निपटने लगीं। इस आधुनिकता की दौड़ में जहां लकड़ी से बनाई जाने वाली ‘पालकी' लम्बरदारों (जमींदार) के घरों में पड़ी धूल फांक रही हैं, वहीं दुल्हन की विदाई के लिए बनाई जाने वाली ‘डोली' भी कहीं नजर नहीं आती। और तो और ‘पालकी' व ‘डोली' ढोने वाले कहार (अति पिछड़ी श्रेणी की एक कौम) देवसरन कहार में बेरोजगार होकर अपने घरों में बैठ गए हैं। वजह भी साफ है, शादी-विवाह में ईंधन से चलने वाले वाहनों का प्रयोग होने लगा है। इससे ‘पालकी' और ‘डोली' को ग्रहण सा लग गया है। बांदा जिले में तेन्दुरा गांव का रहने वाला नत्थू कहार बताता है कि ‘दस साल पहले तक उसका कुनबा सहालग (शादी-विवाह का मौका) में ‘पालकी' और ‘डोली' ढोने में खासी रकम कमा लिया करते थे
चलो रे डोली उठाओं कहार पिया मिलन की ऋतु आयी। अब ये गाने और डोली, सिनेमा और किताबों में ही दिखाई पड़ती हैं। पालकी' न 'कहार', दूल्हन कैसे हो 'डोली' में सवार? फिल्मी गीत ‘पालकी में होके सवार चली रे, मैं तो अपने साजन के द्वार चली रे' और ‘चलो डोली उठाओ कहार, पिया मिलन की रुत आई' पहले जरूर प्रासंगिक थे तेजी से बदलते जमाने ने जहां हमारी संस्कृति पर कुठाराघात किया है वही प्राचीन परम्परा को किस्से कहानियां और इतिहास के पन्नो पर पहंचा दिया हैं। इसी में से एक हैं डोली और कहार। तीन दषक पूर्व तक वैवाहिक जीवन में प्रवेष करने के लिए दूल्हे डोली में सवार होकर जाते थे और शादी की रस्म पूरी होने के बाद दूल्हन उसी डोली में बिदा होकर ससुराल आती थी।
आधुनिकता के बदलते दौर में दूल्हे के जोड़े जामे की जगह सूट और शेरवानी ने ले लिया और डोली की जगह लग्जरी गाडि़यों ने ले लिया है। ऐसी स्थिति में अब डोलियां इतिहास के पन्नो पर पहुंच गयी और कहार रोजी रोटी की जुगाड़ में महानगरों का रास्ता पकड़ लिया हैं।आज इस आधुनिक में कहार समाज का स्वरूप में भारी परिवर्तन देखने को मिल रहा है जहाँ पर बड़े लोग या संवर्ण परिवार के शादी विवाह के दूल्हे और दुल्हन को पालकी में लाने और ले जाने का काम सीमित था
संजय कहार से बातचीत करने पर पता चला की जब हमारा पारंपरिक व्यवसाय के रूप में डोली को धोने तक सीमित था उसके एवज में कुछ पैसा मिल जाता था लेकिन उस पालकी (डोली ) को ढोने के बाद कई दिन तक कंधे को गरम पानी से धोना पड़ता था और ज्यादा दर्द होने पर दवा लेना पड़ता था आज महानगरों में काम करने का आसानी से परिवार को सँभाल लिया और आज हमारे भी बच्चे शिक्षित हो रहे है उस पारंपरिक कार्य ने तो जीने का अधिकार ही छीन लिया था आज इस आधुनिक में आज बराबरी के हमारे बच्चे भी महसूस करने लगे है
' दलित समाज के चिंतक संत सत्बोध दाता साईं का विचार उनसे उलट है। वह कहते हैं कि ‘पालकी और डोली की सवारी दलित समाज के दूल्हा और दुल्हन को वर्जित थी, ग्रामीण क्षेत्र में इस समाज के दूल्हे की निकासी ‘पैदल' होती थी और दुल्हन की विदाई ‘सग्गर' से की जाने की परंपरा रही है, कम से कम आधुनिकता ने दलित समाज को बराबरी का दर्जा तो दिया है।'लेखक
बलराम बिंद
शोधार्थी – (बलराम बिंद (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा
"एक प्रयास हमारे समाज में व्याप्त कुरीतियों ,पिछड़ेपन के कारन और निवारण हेतु ! "
ये सत्य है की हमारा समाज सदियों से गुलामो ,और दासों की तरह जीवन याप करता आया है ! जिसे सिर्फ खुद की रोजमर्रा की ही जरूरतों को पूरा कर पाने जितने ज्ञान के दाएरे में सिमटा कर रखा गया है हम हमेसा परस्वार्थ में ही जिए है और हमेसा हमें परस्वार्थ और सेवा भाव ही सिखाया गया है ! और सेवा भाव ही हमारा धर्म बनाया गया है क्या वास्तव में हम केवल दासीनता और एक सेवक की भाती ही जीने के लिए पैदा हुए है क्या यही इश्वर का न्याय है जो अपने बच्चों में उंच नीच का फर्क रखे ! इस पर चिंतन करना जरुरी है !
कहते है की हम महान श्री निषाद राज गुह जी जो बडे ,दयालु और गुणी राजा थे उनके वंसज है ! जो भगवान श्री राम के परम मित्रों में से एक थे ! सोचने योग्य बात है कि क्या यह वास्तव में संभव है कि जो वंस कभी राज करता था आज वो इतनी बुरी स्थिति में है जिसे आज के सभ्य समाज में कही कोई स्थान प्राप्त नहीं है और उसकी दसा बड़ी ही दयनीय है ! जहा बहुत ही कम या न क बराबर ही शिक्षा ,रोजगार और आगे बढ़ने लायक योग्यता है ! बाकी सभी का इतिहास समझने के बाद एस लगता है जैसे हमारे साथ बहुत बड़ा षड़यंत्र हुआ है ,या जो हमारे परम मित्र बनते थे उन्होने छाल करके हमें अज्ञानता और अंधकार की तरफ धकेल दिया है
विचार करने योग्य है आखिर क्यों ? कैसे ? और किसने ?
***आइये आज हमारे पिछड़ने, अज्ञानता और समाजिक स्थिति पर एक नजर डालें !***
1 .सबसे पहले जिस बात ने सबसे जादा हैरत मैं डाला वो था ,कि किसी -किसी गाँव ,या कस्बे में हमारे समाज की कुल आबादी 80 % होने के बावजूद भी वाहा का नेतृत्व प्रधान, या कोई अन्य महत्वपूर्ण पद ) कोई गैर समाज का व्यक्ति ब्राह्मण,क्षत्रिय ,या बनिया (ही कर रहा होता है !
2 .अक्शर देखने में आता है के हमारे समाज के लोग चाहते तो है की वो एक जुट हो जाए ,परन्तु हम अपने लोगों में से ही किसी को नेतृत्व के काबिल नहीं मानते ! और अपना नेतृत्व किसी गैर समाज को दे देते है !
3 .हमारे सारे समाज में शिक्षा और संस्कार की घोर कमी है ,हमारे पुरुष बेरोजगारी के चलते कही ताश खेल रहे होते है ,तो बच्चे फ़िल्मी कलाकारों की फोटो और उनकी चर्चा में मस्त होते है , और महिलाये किसी के खेतों में मजदूरी कर रही होती है !
4 .शाम ढलते ही 60 % से 70 % लोग कोई शराब तो कोई गंजा और अफीम के नशे में लिप्त रहते है ,और उनकी आपस की चर्चा भी सिर्फ एक दुसरे की बुरियों तक ही सीमित होती है ! उनकी सोंच शिक्षा , आर्थिक मजबूती और राजनीती के लिए न के बराबर होती है ! और इसका फायदा गैर समाज के लोग उठाते है जो हमें तोडने और कमजोर करने का काम करते है !
5 . जो लोग गाँव देहात को छोड़ कर शहर या कस्बों में चले गए है वहा पर भी वे शिक्षा और योग्यता की कमी के कारन लगभग हर घर की महिलाये किसी दुसरे क यहाँ बर्तन धोने ,चुल्हा चौके का काम ,या सब्जी बेचने पर मजबूर है ! और उनके पुरुष रोजगार न उपलब्ध होने की स्थिति में किसी दुकान में टी. .बी देख कर समय बिताते है तो कोई जुवा खेलता है , और हताशा में शाम ढलते ही नसे में धुत होकर लड़ाई झगडे में संलिप्त हो मान मर्यादा गंवाता है ,और उनके बच्चे गलियों में घूम कर इधर उधर बुरी सांगत में अपना भविष्य बर्बाद करते है या बाल मजदूरी करते है !
6 . हमारे समाज की लडकिया मज़बूरी वस दूसरों के घरों में कार्य करती है और आये दिन उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ और उंच नीच की घटनाये होती है और हम शिक्षा ,धन और एकजुटता के आभाव में समाज के डर से और जग हँसी होगी सोंच कर उन घटनाओं को दबाने और उनपर पर्दा डालने का काम करते है और अपनी बेटी और किस्मत को दोष देकर कोसते हुए अपना पल्ला झाड़ लेते है और हमारी इस लाचारी कमजोरी उन दरिंदों को और बल देती है और उनका मनोबल बढ़ता है ऐसी घटनाएं आये दिन होती है ।