Shri Jagdish Dham

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Shri Jagdish Dham “श्री जगदीश धाम” एक जन कल्याणकारी न्यास है।

भगवत् स्वरूप के शास्त्रोक्त वर्णन से एक उद्धरण अंश:-पूर्व काल में सह्यपर्वत की ओर गोदावरी के तीर पर कौशिक मुनि रहते थे। ...
07/10/2026

भगवत् स्वरूप के शास्त्रोक्त वर्णन से एक उद्धरण अंश:-

पूर्व काल में सह्यपर्वत की ओर गोदावरी के तीर पर कौशिक मुनि रहते थे। वे बड़े शान्त, सुमति और संसार के रहस्य (वास्तविक स्वरूप) को जानने वाले थे। अपने गुरुदेव का आश्रय पाकर उनके सैंकड़ों शिष्य भी वहीं रहते थे।
एक दिन गुरुदेव की अनुपस्थिति में वे शिष्यगण संसार के स्वरूप का निर्णय करने के लिये आपस में मिल कर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार प्रतिपादन करने लगे।
इतने ही में वहाँ शुङ्ग नाम का एक बुद्धिमान् ब्राह्मण आया। उसने अपने बुद्धिकौशल से उनके कहे हुए सभी मतों को सदोष सिद्ध कर दिया। शास्त्रों पर श्रद्धा न होने के कारण उसकी बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो चुकी थी। तथापि विवाद (शुष्क तर्क) करने में वह बहुत कुशल था। जब शिष्यों ने कहा कि जो बात प्रमाण से सिद्ध हो वही सत्य है तो उस विचार गोष्ठी में वह शुष्क तर्क करनेवाला शुङ्ग केवल तर्कका आश्रय लेकर बोला, "ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो। आप लोगों ने कहा कि जो प्रमाणसे सिद्ध हो वह सत्य है। सो इस प्रकार तो सत्य कभी सिद्ध ही नहीं हो सकता। क्योंकि यदि प्रमाण दोषयुक्त होगा तो उसके द्वारा होने वाला निर्णय अप्रामाणिक होगा। इसलिये सबसे पहले तो प्रमाणोंकी निर्दोषताका निर्णय करना चाहिये। और उस निर्दोषताका निश्चय होगा अन्य प्रमाणों से। फिर उन प्रमाणोंकी निर्दोषता के विषय में भी इसी प्रकार विचार करना होगा। इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित होने के कारण कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण सिद्ध ही नहीं हो सकते। इसलिये यह जो अनेक प्रकार का आभास प्रतीत हो रहा है उसका आश्रय केवल शून्य ही है। वह शून्य भी प्रमाण का विषय न होने के कारण शून्यरूप (अभाव-मात्र) ही है। अतः अन्तिम निर्णय यही है कि यह शून्य भी कुछ नहीं है।"

शुङ्गके ये वचन सुनकर उनमें से कुछ अधम ब्राह्मण उसीके इस आभासमात्र निर्णय को मानकर शून्यवादी हो गये । शून्य में निष्ठा होनेके कारण वे स्वयं भी अत्यन्त शून्यभाव (जडता) को प्राप्त होकर नष्ट ही हो गये। [ अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति उन्हें नहीं हुई ]

किन्तु जो शिष्य विचारशील थे उन्होंने शुङ्ग का कथन कौशिक मुनिके आगे निवेदन किया और उनसे उन्हें उसका समाधान मिल गया।
मनुष्य इस विनाशकारी शुष्क तर्कको त्यागकर सत् (शास्त्रानुसारी) तर्क का आश्रय लेने से तत्काल ही उत्तम फल प्राप्त कर सकता है। इसलिये शास्त्रानुसारी तर्क का आश्रय लेकर उसे साधन में ही लग जाना चाहिये। मनुष्य शास्त्रानुसारी तर्क से उत्पन्न होने वाली श्रद्धा को पाकर इस लोकमें फलका भागी हो सकता है। निराधार तर्कको त्यागकर देखिये, इस जगत का सारा व्यवहार श्रद्धा होने पर ही फलदायक होता है।

विचारपूर्वक निश्चय किये हुए कालमें ही किसान भूमि जोतता है। तथा निराधार शुष्क तर्क को त्यागकर सम्यक् विचार से श्रद्धा के द्वारा ही लोग चाँदी, सोने, रत्न और औषधि आदि का निश्चय करते हैं अतएव शास्त्रानुसारी तर्क और श्रद्धा के द्वारा अपने परम हित का निर्णय कर साधन के लिये प्रयत्न करना चाहिये। तर्क की कोई स्थिति नहीं है, अतः शुङ्ग का अनुसरण करनेवाले पुरुषोंकी तरह अपना पुरुषार्थ न छोड़ बैठे। जो श्रद्धापूर्वक प्रयत्न में लगा रहता है वह कभी असफल नहीं रह सकता। सुदृढ पुरुषार्थ का आश्रय ले लेने पर फिर फल कैसे प्राप्त न होगा।

पुरुषार्थ से ही कृषक अनाज, व्यापारी धन, राजा लोग राजवैभव, ब्राह्मण लोग सम्पूर्ण सुख की आश्रयभूता विद्या, शूद्र आजीविका, देवता अमृत और तपस्वी उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। तथा और सबको भी पुरुषार्थरूप कम के द्वारा ही अपने अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

आप विचारकर वतलाइये कि शुष्कतक करनेवाले श्रद्धाहीन पुरुषने क्या कभी किसी प्रकार कोई फल प्राप्त किया है।

[ दैवयोगसे] कभी फल न मिलने के कारण यदि किसीका सर्वत्र ही विश्वास न रहे तो उस अभागे पुरुषको अपना ही शत्रु समझना चाहिये

अतएव पुरुषार्थ का आश्रय लेकर जो श्रद्धा और सत्तर्कसे पोषित, श्रेयःप्रातिका सबसे मुख्य साधन हो उसका आश्रय ले। जो साधन देखने में आते हैं उनमें कई प्रकार की विलक्षणता है। उनमें से जिसके द्वारा अपने लक्ष्य की प्राप्ति सुलभ जान पड़े उसे ही अपना मुख्य साधन समझे। शास्त्रानुसारी तर्क और अनुभव के द्वारा उसका निश्चय कर के तुरन्त आरम्भ कर दे।

श्रेय उसी को समझना चाहिये जिसकी प्राप्ति होनेपर फिर किसी प्रकार का, शोक न रहे। यदि सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करें तो इस संसार में सभी ओर शोक दिखायी देता है। और जो शोक से मिला हुआ है वह किसी प्रकार भी श्रेय नहीं हो सकता।

धन, पुत्र, स्त्री, राज्य, कोश, बल, कीर्ति, विद्या, बुद्धि, रूप, शरीर और सुन्दरता - ये सभी अस्थिर होनेके कारण कालरूपी सर्पके मुखमें स्थित हैं तथा शोकरूप अंकुरके अत्यन्त शक्तिशाली बीजरूपसे विद्य-मान हैं। इनमें आत्यन्तिक श्रेयकी साधनता कैसे मानी जा सकती है ?

अतः जो परम श्रेय है उसका मुख्य साधन तो यही है - लोक में जो धनादि विषय में उपादेयता का भ्रम है वह मोह से ही हुआ है और मोह में डालने वाले हैं महेश्वर, जो सम्पूर्ण जगत्‌की रचना करने वाले हैं। इसीसे सब लोग मोहमें पड़े हुए हैं। एक तुच्छ ऐन्द्रजालिक भी अपनी आंशिक विद्याके बल से किन्हीं-किन्हीं लोगों को मोह में डाल देता है, किन्तु सबको नहीं, क्योंकि उसकी विद्या सीमित है। तथापि जब साधारण लोग इस सीमित विद्या वाले मायावी की माया का भी पार नहीं पा सकते तो महामायावी महेश्वरका पार पानेमें कौन समर्थ हो सकता है। जो विरोधी विद्या के द्वारा इस लोक में मायावी की तुच्छ माया को रोकने की युक्ति जान लेता है वह उसके जाल से निकल कर स्वस्थ (मायाजनित सर्पादिके भयसे रहित) रह सकता है और उसे अविनाशी (मायाजनित सर्पादिके भयसे नष्ट न होनेवाला) सुख प्राप्त होता है। किन्तु ऐसी विद्या भी उस ऐन्द्रजालिक का आश्रय लिये बिना और [ धनादि देकर] उसे किसी भी प्रकार प्रसन्न किये बिना प्राप्त नहीं हो सकती। अतः उन महामायी मद्देश्वरको बिना प्रसन्न किये इस महामोह से कोई कैसे पार पा सकता है। इसलिये सब प्रकार उनका ही आश्रय लेना चाहिये। जो उन्हें अच्छी तरह प्रसन्न कर लेता है वह उनकी कृपासे महा-विद्या (अद्वितीय शिवात्मज्ञान) को प्राप्त कर निश्चय ही उस मोह‌ को पार कर लेता है। श्रेयःसाधन के लिये प्राणायामादि और भी कई प्रकारके योग शास्त्रों में बतलाये गये हैं, परन्तु श्रीमहेश्वर की कृपा के बिना वे फल की प्राप्ति कराने वाले नहीं होते। इसलिये सबसे पहले विश्व के आदि कारण श्रीमहेश्वर की भक्ति-पूर्वक आराधना करनी चाहिये। वे शीघ्र ही मोह‌ की निवृत्ति करनेवाले योगोंको सफल कर देते हैं। यह सारा जगत् प्रत्यक्ष ही किसी का कार्य जान पड़ता है। यद्यपि किसी ने इसकी उत्पत्ति देखी नहीं है।
इस प्रकार अनेकों शास्त्र-वाक्यों से परिपुष्ट तर्क के द्वारा ये कार्य ही हैं-ऐसा निश्चय करे। तथा इसका कर्ता अन्य सब कर्ताओं से विलक्षण है।

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