27/04/2026
2002 से 22 साल की उम्र से लेखन साहित्य से जुड़कर 25 की उम्र में प्रमुख आदिवासी महिला साहित्यकार लेखक का पुरस्कार एवं साल दर साल अपनी उपलब्धियों को प्राप्त करते रहना भले ही आसान लगता हो पर मुश्किलों का दौर तो कामयाबी के साथ साथ चलती है।
राजनीति मेरे लिए जटिल विषयों में से एक था और हमेशा इसको परे रखती और राजनीति के लिए खुद को दुर्लभ भी बना रखा था पर उस वक्त लगभग 28 वर्ष की उम्र में अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति न होते भी आंच को झेलना पड़ा था।। तब ही समझ आया था बाहरी दुनिया में राजनीति महिलाओं के लिए भी अछूती नहीं है जहां महिलाएं पुरुषों के साथ कदमताल कर रही हो।
बस उनके साथ राजनीति का pattern अलग होता है।
फिर बंगाल में सत्ता बदलते ही पुराने अध्याय करीब करीब बंद होने लगे। लोगों को समय के साथ बदलते देख खुद को भी ढालने की कोशिश में राजनीति की लहर की चपेट में सब झुलस गया।
इस बार प्रत्यक्ष रूप से काफी वीभत्स रूप से राजनीति कर रहे सत्ताधारी हावी हुए जिनसे मेरा दूर दूर तक कोई आपसी मतभेद, वैचारिक कड़वाहट या राजनीतिक पंगे नहीं थे।
कारण मै एक महिला हु, कमजोर और पिछड़े वर्ग से हु,
जाति, वर्ण, विचार से अलग हु।
आज भी राजनीति होती रहती है, कभी शोषण के रूप में, पीछे धकेलने की साजिश में , जलाने - भुनाने का अथक प्रयास, रौंदने की ललक, अपमान अवहेलना का लगातार शिकार होना एक जीवन शैली सा है ।
सत्ता आएंगी और जाएगी पर इंसानी फितरत समझना मुश्किल होता है, बिना हथियार के एक जंग लड़ना काफी कठिन है। समाज व्यवस्था, जातिगत भेदभाव, लैंगिक हिंसा, प्रतिस्पर्धा और गंदी राजनीति के इस दौर में आप चक्रव्यूह के अंदर हो जिसको भेदना लोहे के चने चबाना जैसा है ।।