01/08/2026
*आप सभी को परिवार सहित श्री गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई*!
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*गुरु शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाने वाले परम तत्व का नाम है*!
*असतो मां सदगमय, तमसो मां ज्योतिर्मयमृत्योर्मा मृतं गमय*!
*अज्ञान के पांच केंद्र हैं* :- *अविद्या, अस्मिता, राग , द्वेष और अभिनिवेश! गुरु इन पांचो से परे होते हैं। वह अपने शिष्य को असत से सत की और ले जाते हैं और मृत्यु से अमृत की और! भगवान के चरणों में अनुराग के द्वारा गुरु शिष्य को संसार से ऐसा वैराग्य करा देते है, जिसके बाद शिष्य के जीवन से असद वृति का समूल नाश हो जाता है*!
*गुरु वह शिव होते हैं, जो जिव्हा और हृदय में राम नाम को रखकर विष पीकर भी अमृतमय रहते हैं। वह उसी राम नाम के अमृत को शांति से शिष्य के हृदय में स्थापित करके उसे भी अमृतमय बना देते हैं! गुरूदेव की इसी महती कृपा के फलस्वरूप शिष्य शुद्ध, बुद्ध और मुक्त हो जाता है*!
*हमारे धर्मग्रंथों में दो गुरुओं की बहुत चर्चा है - देवताओं के गुरु बृहस्पति और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य। दैत्य गुरु शुक्राचार्य जो मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता हैं, जो बृहस्पति के पास नहीं है, फिर भी बृहस्पति को जो सम्मान प्राप्त है वह शुक्राचार्य को नहीं। जो गुरु दुर्गुण, दुर्विचारों को पुनर्जीवित करे, उसे सम्मान नहीं मिलता*!
*बृहस्पति भले ही तन को तो मृत से अमृत नहीं कर पाते, पर जीवन को अमृतमय बना सकते हैं*!
*जब भरत जी चित्रकूट में भगवान राम के दर्शनार्थ जा रहे थे तो देवराज इंद्र को संदेह हुआ कि भरत की बात मानकर श्रीराम अयोध्या लौट जाएंगे और रावण को मारने का कार्य अधूरा रह जाएगा, तब हमारे स्वर्ग भोगों का क्या होगा*?
*फिर देवराज गुरु बृहस्पति के पास गए तो उन्होंने इंद्र को कहा कि तुम्हारे मन में यह बात आई कैसे? तो उन्होंने इंद्र को राम सेवक बनने की शिक्षा दी*!
*गुरु द्वारा बोले गए वचन, उनके चरणों का स्पर्श, कृपा दृष्टि, सबकुछ कृपापूर्ण है! यह उसी को समझ आ सकता है जिसने उस कृपा का अनुभव किया हो. शिष्य उद्यमी हो, उसमें भक्तिभाव हो, गुरु के प्रति प्रेम और विश्वास हो तो उसे गुरु से हर आवश्यक वस्तु मिल जाएगी। गुरु कल्पवृक्ष के समान हैं! वह शिष्य की कमियों को विजित करना सिखाते हैं, ताकि उसे अभीप्सित लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।*
*शुभ गुरुपूर्णिमा*