27/05/2026
प्रकाश है वीतरागता
इन सारी स्थितियों को ध्यान में रखकर ही यह प्रश्न पूछा गया कि प्रकाश कौन करेगा? इसका बहुत संक्षिप्त और केवल एक वाक्य में उत्तर दिया गया कि प्रकाश करेगा वीतराग। जहां-जहां वीतरागता है, वहां-वहां प्रकाश है और जहां-जहां राग-द्वेष की प्रबलता है, वहां-वहां अंधकार है। वीतराग बनने की साधना बहुत कठिन है। साधु संतों के लिए भी कठिन है तो गृहस्थों के लिए तो और भी कठिन है ।प्रकाश कहां से आए? इसके लिए एक बीच का रास्ता निकाला गया। एक झटके में आदमी वीतराग नहीं बन सकता, उसकी बहुत लंबी प्रक्रिया है। घोर अवीतराग रहना भी दुःख का कारण है। मध्यवर्ती रास्ता यह है कि राग-द्वेष को शांत रखें, कषाय को उपशांत रखें। अगर ऐसा संभव हो जाए तो फिर आदमी सुख से जी सकता है। राग-द्वेष और मोह क्षीण नहीं हुआ है, किंतु तीव्र भी नहीं है, यह बीच का रास्ता है। जिसका राग-द्वेष तीव्र नहीं है वह भी एक प्रकार से वीतरागकल्प हो जाता है, वह दुःखी नहीं बनता।
तेरापंथ धर्मसंघ में पांचवें आचार्य हुए हैं मघवागणि। उनके लिए 'वीतरागकल्प' शब्द का प्रयोग होता है। वे वीतराग तो नहीं थे, वीतरागतुल्य थे। वे अपने जीवन मैं कभी दुखी नहीं बने ।
आचार्य महाप्रज्ञ