Waterman Rajendra Singh

Waterman Rajendra Singh A social activist working for water and river issues in India. He is commonly referred to as "Waterman of India".

Rajendra Singh is a highly respected social activist working with water and river issues in India. In 2015, Rajendra Singh has won the Stockholm Water Prize, also known as "the Nobel Prize for Water". In its citation, the judges say: "Today's water problems cannot be solved by science or technology alone. They are human problems of governance, policy, leadership, and social resilience.” … "Rajendr

a Singh's life work has been in building social capacity to solve local water problems through participatory action, empowerment of women, linking indigenous know-how with modern scientific and technical approaches and upending traditional patterns of development and resource use." In 2008, The Guardian, UK named him in its list of “50 people who could save the planet”. In 2005, Rajendra Singh won the India’s most prestigious Jamana Lal Bajaj Award for the Outstanding Contribution in Application of Science and Technology for Rural Development. In 2001, Rajendra Singh won the Asia’s most prestigious Ramon Magsaysay Award for the Community Leadership. “In electing Rajendra Singh to receive the 2001 Ramon Magsaysay Award for Community Leadership, the board of trustees recognizes his leading Rajasthani villagers in the steps of their ancestors to rehabilitate their degraded habitat and bring its dormant rivers back to life.”

In 1998, Rajendra Singh has been christened as the Man of the year by THE WEEK Magazine.

Tarun Bharat Sangh द्वारा   के सहयोग से मरुभूमि जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्र में 'सोहड़ासर तालाब’ के पुनर्जीवन का निर्माण ...
15/05/2026

Tarun Bharat Sangh द्वारा के सहयोग से मरुभूमि जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्र में 'सोहड़ासर तालाब’ के पुनर्जीवन का निर्माण कार्य लगातार जारी है।

इस तालाब से पशुओं के लिए पीने के पानी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित होगी, भूजल स्तर में सुधार होगा (पुनर्भरण), स्थानीय जैव-विविधता को नया जीवन मिलेगा। मरुभूमि में जल का हर कण अमूल्य है, और ऐसे प्रयास हमें याद दिलाते हैं कि परंपरा, श्रमदान और सामुदायिक भागीदारी से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।











*अरावली का संरक्षण भारत के पर्वतों के लिए प्रेरक है।*____न्यायालय ने अपने प्रारंभिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया था कि जि...
14/05/2026

*अरावली का संरक्षण भारत के पर्वतों के लिए प्रेरक है।*
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न्यायालय ने अपने प्रारंभिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया था कि जिन क्षेत्रों को पहले से कानूनी संरक्षण प्राप्त है, उन्हें खनन या अन्य पर्यावरण-क्षतिकारक गतिविधियों के लिए नहीं खोला जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रशासनिक अस्पष्टता या सरकारी लापरवाही को पर्यावरणीय सुरक्षा लागू न करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसी क्रम में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के अंतर्गत एहतियाती सिद्धांत, पारिस्थितिक जोखिम, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत और विशेषज्ञ-सहायता प्राप्त न्यायिक निर्णयों की अवधारणाएँ भी विकसित हुईं।

अरावली संरक्षण को लेकर विभिन्न समितियों और विशेषज्ञ समूहों के बीच लंबे समय से मतभेद बने रहे हैं। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों में असहमति वाले प्रतिवेदन भी शामिल रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अरावली की परिभाषा और उसके संरक्षण की सीमा को लेकर लगातार विवाद बना हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 के अपने निर्णय में “अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तथा दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में उसके समुचित संरक्षण” को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और पर्यावरणीय प्रश्न माना।

न्यायालय ने इस उद्देश्य से गठित समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिसमें अरावली पर्वतमाला की एक परिभाषा निर्धारित की गई थी। बाद में न्यायालय ने यह भी अभिलिखित किया कि यही परिभाषा उस अनुशंसा का मुख्य आधार बनी, जिसके अनुसार नव-निर्धारित अरावली क्षेत्र में नई खनन पट्टियाँ प्रदान न की जाएँ। किंतु इसके बाद 29 दिसंबर 2025 के आदेश में न्यायालय ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि परिभाषाओं का सावधानीपूर्वक परीक्षण न किया जाए, तो वे अस्पष्टता और अनपेक्षित परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं। न्यायालय ने यह माना कि किसी गलत या अधूरी परिभाषा के कारण ऐसे नियामकीय शून्य उत्पन्न हो सकते हैं, जो अरावली की पारिस्थितिक अखंडता को कमजोर कर दें।

इसी कारण न्यायालय ने यह आवश्यक माना कि समिति की रिपोर्ट लागू करने से पहले निष्पक्ष, स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय प्राप्त की जाए तथा सभी आवश्यक हितधारकों को इस प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाए। न्यायालय के अनुसार यह कदम केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उन महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए अनिवार्य है, जो भविष्य में बड़े पर्यावरणीय और संवैधानिक परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं।

इस संदर्भ में प्रस्तुत सिमुलेशन का उद्देश्य किसी खनन परियोजना, विशेष स्थल या वास्तविक मानचित्र का मूल्यांकन करना नहीं है। यह पर्यावरण प्रभाव आकलन भी नहीं है। इसका उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना है कि विभिन्न कानूनी परिभाषाएँ किस प्रकार भू-भागों को शामिल या बाहर कर सकती हैं, और इस प्रकार वे किस प्रकार भविष्य में उन क्षेत्रों को विघटन, हस्तक्षेप या विनाशकारी प्रक्रियाओं के जोखिम के सामने ला सकती हैं।

यह सिमुलेशन किसी भू-भाग को हानि पहुँचाने की संवैधानिक वैधता का निर्णय नहीं करता, बल्कि यह दिखाता है कि कानूनी परिभाषाएँ स्वयं किस प्रकार किसी क्षेत्र को संभावित खतरे के दायरे में ला सकती हैं। यही कारण है कि यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या किसी भू-भाग को पारिस्थितिक दृष्टि से “त्याज्य” माना जा सकता है। यह प्रश्न केवल पर्यावरणीय नीति का नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 48A, एहतियाती सिद्धांत, अंतरपीढ़ी समानता और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत से जुड़ा हुआ संवैधानिक प्रश्न है।

अरावली का प्रश्न केवल पहाड़ों या खनिजों का प्रश्न नहीं है। यह उस मूल दृष्टिकोण का प्रश्न है, जिसके आधार पर समाज यह तय करता है कि प्रकृति को केवल संसाधन मानकर उपयोग किया जाएगा या उसे जीवन, संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों के रूप में भी देखा जाएगा।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला को उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिक जीवनरेखा माना है। न्यायालय के अनुसार अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि वह प्राकृतिक अवरोध है जो उत्तर-पश्चिम के शुष्क मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच संतुलन बनाए रखता है। इसे “उत्तर-पश्चिम भारत के हरित फेफड़े” के रूप में भी देखा गया है, जिसने सदियों से विविध पारिस्थितिक तंत्रों को संरक्षित रखा है और अनेक समुदायों की आजीविका का आधार बना हुआ है।

अरावली की प्राचीन भू - वैज्ञानिक संरचना इसे खनिज संपदा से समृद्ध बनाती है, किंतु यही विशेषता लंबे समय से इसे अनियंत्रित शोषण के खतरे के सामने भी खड़ा करती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में यह उल्लेख किया है कि अनियंत्रित शहरीकरण, निरंतर वनों की कटाई और संसाधनों के अत्यधिक शोषण ने इस स्वभावतः नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर दबाव डाला है। यही कारण है कि, वर्ष 1991 से न्यायालय अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों और पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़े मामलों पर लगातार विचार करता रहा है।
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*लेखक - जलपुरुष राजेंद्र सिंह*
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*दिनांक - 14 मई 2026*
More Information call- 9009739338 (PARAS)

जयपुर ग्रामीण क्षेत्र में  #वर्षाजलसंचयन हेतु “ किरण फार्म पोंड“ का निर्माण कार्य पूर्णता की ओर है। खारे पानी से ग्रस्त ...
10/05/2026

जयपुर ग्रामीण क्षेत्र में #वर्षाजलसंचयन हेतु “ किरण फार्म पोंड“ का निर्माण कार्य पूर्णता की ओर है। खारे पानी से ग्रस्त इस इलाके में फार्म पोंड के निर्माण कार्य से लगातार किसानों का जीवन समृद्ध हो रहा है। इसमें सामुदायिक सहभागिता भी लगातार बढ़ रही है। फार्म पोंड के माध्यम से लाभार्थी अपनी अजीविका के लिए आत्मनिर्भर बन रहा है।

यह कार्य Tarun Bharat Sangh द्वारा for Collective Action के सहयोग से अभी किया जा रहा है।

  and   Governance and Well-being विषय पर 7–8 मई को जयपुर में महिला सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य जमीनी आ...
09/05/2026

and Governance and Well-being विषय पर 7–8 मई को जयपुर में महिला सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य जमीनी आवाज़ों को नीति-निर्माण तक पहुँचाना, महिलाओं के जीवन-संघर्षों को केंद्र में लाना तथा जलवायु परिवर्तन, जल न्याय और महिलाओं के नेतृत्व से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करना था।
सम्मेलन में देशभर से आई महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि आज का संघर्ष केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अस्मिता, अस्तित्व और जीवन बचाने का संघर्ष बन चुका है। उन्होंने कहा कि रोटी, कपड़ा और मकान से आगे बढ़कर अब जीवन को सुरक्षित और जीवंत बनाए रखना सबसे बड़ा मुद्दा है।
सम्मेलन में यह चिंता व्यक्त की गई कि जलवायु परिवर्तन के कारण स्वच्छ जल, आजीविका और स्वास्थ्य से जुड़े संकट लगातार गहराते जा रहे हैं। महिलाओं ने बताया कि जलवायु परिवर्तन ने समाज के बड़े हिस्से को लाचार, बेरोज़गार और बीमार बना दिया है। जीवन, जीविका और ज़मीर से जुड़े सवालों को आज औद्योगिक और व्यापारिक शक्तियों के दबाव में अनदेखा किया जा रहा है।
प्रतिभागियों ने कहा कि जमीनी समुदायों की आवाज़ें लगातार कमजोर की जा रही हैं, जबकि आर्थिक और व्यापारिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आम लोगों की समस्याएँ नीति-निर्माण की प्रक्रिया में पर्याप्त स्थान नहीं पा रही हैं।
सम्मेलन में भारत के संविधान में निहित समता, न्याय और समान अवसरों की भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। महिलाओं ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की बड़ी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, जिन्हें तोड़ना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।
देशभर से आई महिलाओं और साथियों ने संगठित होकर यह संकल्प लिया कि वे जल, जंगल, ज़मीन और जीवन के सवालों पर सामूहिक संघर्ष को आगे बढ़ाएँगी तथा समाज में चेतना निर्माण का कार्य करेंगी।
सम्मेलन में जल न्याय और लैंगिक न्याय को परस्पर जुड़ा हुआ विषय बताते हुए कहा गया कि बाढ़, सूखा और जल संकट जैसी चुनौतियों का समाधान महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं है। आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने पर भी विशेष बल दिया गया।
प्रतिभागियों ने कहा कि जल अब केवल महिलाओं का विषय नहीं रहा, बल्कि जलवायु परिवर्तन ने इसे पूरे समाज का साझा प्रश्न बना दिया है। नदियों, झरनों, पहाड़ों और जल स्रोतों को केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि संरक्षण, सम्मान और पुनर्जीवन का विषय मानने की आवश्यकता है।
सम्मेलन में वर्षा जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय जल-संस्कृति के पुनर्जीवन पर विस्तार से चर्चा हुई। यह निर्णय लिया गया कि बालवाड़ियों, स्कूलों और समुदायों में शुद्ध जल उपलब्ध कराने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएँगे।
महिलाओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि जल संरक्षण, परिवार और समुदाय के जीवन को संभालने में उनकी भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने प्रकृति, संस्कृति और श्रम के प्रति महिलाओं की समझ को समाज की बड़ी शक्ति बताया।
सम्मेलन में महिलाओं के सकारात्मक कार्यों और संघर्षों का दस्तावेजीकरण करने तथा उन्हें व्यापक स्तर पर साझा करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए एक कार्यसमूह का गठन किया गया, जिसकी संयोजक इंदिरा खुराना को बनाया गया। यह समूह जमीनी स्तर पर कार्य कर रही महिलाओं की पहचान कर उनके अनुभवों और प्रयासों को समाज के सामने लाएगा।
यह भी तय किया गया कि महिलाओं की कहानियों, संघर्षों और सफल पहलों को देशभर में साझा करने के लिए यात्राएँ और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। सम्मेलन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने हेतु विभिन्न राज्यों में कार्य करने वाली टीमों का गठन भी किया गया।
सम्मेलन का समापन “नीर, नारी, नदी और नारायणी” के संकल्प के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने विश्वास व्यक्त किया कि जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का समाधान सामूहिक चेतना, महिला नेतृत्व और जमीनी संघर्षों के माध्यम से ही संभव है।

 ंकट से जूझ रहे करौली क्षेत्र में राहल वाली पोखर और ढाबाडे की पोखर का शुभ मुहूर्त ग्रामीणों और तभासं कार्यकर्ताओं द्वारा...
09/05/2026

ंकट से जूझ रहे करौली क्षेत्र में राहल वाली पोखर और ढाबाडे की पोखर का शुभ मुहूर्त ग्रामीणों और तभासं कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया।

इन पोखरों का निर्माण वर्षा जल संचयन हेतु Tarun Bharat Sangh द्वारा HCLFoundation के सहयोग से किया जा रहा है।

जल संरक्षण की दिशा में हमारे प्रयास सामुदायिक प्रयास लगातार जारी है।

नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन प्रबंधन हेतु कानून की जरूरत हैप्रकाशनार्थ - जलपुरुष राजेन्द्र सिंहदिनांक- 6 मई 2026जब भी ...
06/05/2026

नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन प्रबंधन हेतु कानून की जरूरत है
प्रकाशनार्थ - जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
दिनांक- 6 मई 2026

जब भी जीवन की जटिलताऐं बढ़ती है, तब-तब प्रकृति और मानवता पर संकट आता है। अब मानवीय जीवन जटिलतम्, कृत्रिम बृद्धिमत्ता से बन रहा है। इसीलिए नदी-पहाड़, प्रकृति-धरती से हमारे रिस्ते टूटते जा रहे है, नदियां बीमार हो रही है। ये मानवीय जीवन के साथ-साथ प्रकृति को भी बीमार बना रही है। इनकी चिकित्सा का कोई कानून उपलब्ध नहीं है। इसलिए अब नदियों की चिकित्सा एवं पुनर्जनन हेतु नदी संरक्षण व नदी पुनर्जनन कानून चाहिए।
नदियों का प्रदूषण भ्रष्टाचार के कारण है। केवल यही सत्य नहीं है। हां, भ्रष्टाचार में नदियां नाले बनती है। सदाचार नालों को नदियां बनाता है। यही किसी भी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य की पहचान कराता है। अभी भारत की नदियां गंदे नाले बन रही है। गंदे नालों को नदियां बनाने वाला कानून चाहिए।
दुनिया की सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे जीवन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और प्रकृति के संतुलन की आधारशिला हैं। इसके बावजूद आज की वास्तविकता यह है कि देश की अधिकांश नदियाँ अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक शोषण के कारण अपनी पहचान खोती जा रही हैं। जो नदियाँ कभी जीवनदायिनी थीं, वे आज कहीं सूख रही हैं तो कहीं बाढ़ के रूप में विनाश का कारण बन रही हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि हमारे भविष्य के अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। नदिया मरती है तो सभ्यता नष्ट हो जाती है।
आज भारत तेजी से जल संकट की स्थिति में है। जल का अभाव और बाढ़-सुखाड़ की ओर बढ़ रहा है। अनियंत्रित शहरीकरण, बढ़ती औद्योगिक गतिविधियाँ, जल स्रोतों पर अतिक्रमण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का असंतुलन सभी कारण मिलकर जल संकट को और अधिक गहरा कर रहे हैं। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में किए गए हस्तक्षेप ने जल चक्र को बाधित कर दिया है, जिससे बाढ़ और सूखे का चक्र और अधिक तीव्र एवं अनियमित हो गया है।
नदी पुनर्जनन का अर्थ केवल नदियों की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी पारिस्थितिकी, जैविक और जलवैज्ञानिक अखंडता को पुनः स्थापित करने की एक व्यापक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नदियाँ अपने प्राकृतिक मार्ग में स्वतंत्र रूप से बह सकें, जल निकायों पर किसी प्रकार का अतिक्रमण न हो, जल का उपयोग संतुलित और सतत रूप में हो तथा प्रदूषण पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाए। नदी को एक जीवित तंत्र के रूप में समझना और उसी दृष्टि से उसका संरक्षण करना समय की मांग है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण संरक्षण का दायित्व सौंपता है। यह केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक कर्तव्य भी है कि हम अपने जल स्रोतों की रक्षा करें। इसी प्रकार स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, ग्राम पंचायतों और नगर निकायों को भी यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे अपने क्षेत्र के जल स्रोतों का संरक्षण करें और जल सुरक्षा सुनिश्चित करें। जब तक इन संस्थाओं और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी नहीं होगी, तब तक कोई भी नीति या कानून प्रभावी नहीं हो सकता।
स्थानीय स्तर पर “नदी पंचायत” या “क्षेत्र सभा” जैसी व्यवस्थाएँ इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इनके माध्यम से स्थानीय लोग न केवल जल उपयोग की निगरानी कर सकते हैं, बल्कि जल निकायों का सामाजिक लेखा-जोखा भी रख सकते हैं। वे अतिक्रमण और प्रदूषण को रोकने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं और जल संरक्षण को एक जन आंदोलन का रूप दे सकते हैं। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है।
नदियों और जल निकायों की रक्षा के लिए कठोर नियमों की आवश्यकता है। जल स्रोतों में किसी भी प्रकार का निर्माण, उद्योग, खनन या कचरा डालना पूर्णतः प्रतिबंधित होना चाहिए। प्रदूषण फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जल का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि वह प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक न हो। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन और वृक्षारोपण जैसे उपायों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
जल सुरक्षा का वास्तविक अर्थ यह है कि आज के विकास के कारण आने वाली पीढ़ियों के जल अधिकार प्रभावित न हों। वर्तमान में हम जल स्रोतों का अंधाधुंध उपयोग कर रहे। पेयजल का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है, कृषि और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट आई है। इसलिए जल संरक्षण केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नदी पुनर्जनन को केवल एक सरकारी योजना या कानून तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में अपनाया जाए। सरकार नीति और कानून बनाए। स्थानीय संस्थाएँ उसे लागू करें और नागरिक जागरूक होकर उसमें भागीदारी करें, तभी इस संकट का समाधान संभव है। नदियों को बचाना वास्तव में जीवन को बचाना है, और यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
नोट- मैप फोटो गूगल द्वारा ली गई है

जल आंकाक्षी क्षेत्र धौलपुर में जल संरक्षण कार्य लगातार जारी है। अभी Tarun Bharat Sangh द्वारा LIC Housing Finance Limite...
06/05/2026

जल आंकाक्षी क्षेत्र धौलपुर में जल संरक्षण कार्य लगातार जारी है। अभी Tarun Bharat Sangh द्वारा LIC Housing Finance Limited के सहयोग से "घाट के तालाब" का निर्माण कार्य चल रहा है।

इस #तालाब के बन जाने से आस-पास की जैवविविधता संपन्न होगी और भूजल पुनर्भरण भी बड़ी मात्रा में होगा।

04/05/2026

देशज ज्ञान से वर्षा पूर्वानुमान #अरवरी_संसद द्वारा लागू -जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
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प्राचीन भारत में अध्ययन किया जाने वाला एक अन्य महŸवपूर्ण विषय इसके लिए जिम्मेदार कारकों और जलवायु का अध्ययन करके वर्षा की भविष्यवाणी करना था। इस तरह के पूर्वानुमान अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह से लगाए गए थे। ऐसी गतिविधियों को शुरू करने का मूल कारण निस्संदेह वर्षा पर खेती की अत्यधिक निर्भरता थी। उम्मीद थी किए बेहतर पूर्वानुमान उस मौसम में बीज बोने के लिए बेहतर विकल्प पेश कर सकता है। यह उम्मीद की गई थी कि यह सब गलत विकल्पों से होने वाली क्षति को कम कर सकता है। अकाल और बेहतर बारिश दोनों की भविष्यवाणी पूरे भारत में देशज ज्ञान द्वारा की जाती थी। हमारी अरवरी संसद के भी ज्ञान के निर्णयों की ही अनुपालना की जा रही है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्षा पूर्वानुमान के अधिक उदाहरण मिलते हैं। आगामी सीज़न में बारिश का पूर्वानुमान सूर्य, शुक्र और बृहस्पति जैसे ग्रहों की स्थिति से लगाया जाना चाहिए, साथ ही बादलों के बीजारोपण और सूर्य पर होने वाले विपथन और उनके सूर्य के प्रकाश पर पड़ने वाले अंतर से भी अनुमान लगाया जाना चाहिए और तदनुसार बुआई की जा सकती है।
बृहत्संहिता अध्याय 2 कहता हैः एक खगोलशास्त्री जो भविष्यवाणियों ;अंकगणित और शास्त्रों के ग्रंथों द्वारा गठित खगोल विज्ञान में अच्छी तरह से पारंगत है, उसे विजयी होने की इच्छा रखने वाले राजा द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए और उसे दरबार में बनाए रखने के योग्य माना जाना चाहिए।
वराह मिहिर आगे यह भी कहते हैं कि, दिन और रात के लिए आसमान का निरीक्षण करना, बारिश की भविष्यवाणी के लिए प्रासंगिक जानकारी एकत्र करना जैसे कार्यों की पूरी सूची किसी भी समय एक व्यक्ति द्वारा संभव नहीं है। इसलिए राजा को चार दिशाओं के लिए, चार अलग-अलग दैवज्ञ नियुक्त करने चाहिए। एक पूर्व और दक्षिण.पूर्व के लिए, दूसरा दक्षिण और दक्षिण.पश्चिम के लिए, तीसरा पश्चिम और उत्तर.पूर्व के लिए और चौथा उत्तर और उत्तर-पश्चिम के लिए। प्राचीन भारतीय राजाओं के सभी दरबारों में ऐसे व्यक्ति हुआ करते थे। अरवरी संसद में भी ऐसे व्यक्ति सदस्य बनाऐ है। ये ज्योतिष तथा पुतू काल जीवप क्रियाओं एवं हवा के जानकर जैसे जेष्ठ अमावस्या के दिन गांव के गुणी हवा एवं नीम के पत्तों का संयोग देखते है।
जलविज्ञान विज्ञान की प्राप्ति के बाद, जो प्राचीन भारतीय जलविज्ञान में पहला कदम था, जो 17वीं शताब्दी में सामने आया। और वह है राई की माप। वह इस बारे में भी मार्गदर्शन करते हैं कि कुआं कैसे बनाया जाए, कुएं के चारों ओर कौन से पौधे लगाए जाने चाहिए आदि। दुःख की बात है कि आधुनिक ज्ञान के संसाधन भारत के इस ज्ञान को स्वीकार नहीं करते हैं। उन्हें इसका जिक्र करना चाहिए।
पाराशर का कहना है कि, जल स्वयं जीवन का मूल संसाधन है और इसलिए इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। वह एक वैज्ञानिक की महŸवाकांक्षा को भी व्यक्त करता है, यदि वह कहता है कि जब हम चाहें तो बारिश हो सकती है और जब हम नहीं चाहते तो नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में इसका मतलब यह है कि वे बाढ़ या अकाल से होने वाली सभी प्रकार की हानि और क्षति से बचना चाहते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि इस उद्देश्य से उन्होंने वर्षा की संपूर्ण प्रक्रियाए उसके उत्पादन, उसे प्रभावित करने वाले कारकों आदि का विस्तार से अध्ययन किया था। वे वर्षा की अच्छी भविष्यवाणी चाहते थे, ताकि इससे नौवहन कृषि और सैन्य गतिविधियों में मदद मिल सके।
परिणामस्वरूप हम इन विषयों का वेदों एवं परवर्ती ग्रंथों में विस्तार से विश्लेषण देख सकते हैं और छांदोग्य उपनिषद और पुराणों में भी इनका विस्तार से वर्णन है। यजुर्वेद का कहना है किए जल विज्ञान के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन और अनुसंधान करने वाले व्यक्तियों को उचित रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए।
(यजुर्वेद 16/38ः हम उन सभी शोधकर्ताओं को सलाम करें जो कुओं, जल निकायों अकाल और सूखेए बीज.युक्त बादलों तथा बारिश को प्रेरित करने और रोकने की तकनीक आदि के बारे में अध्ययन करते हैं।) स्मृति काल में जलविज्ञान ने बड़े उत्साह के साथ प्रगति की। स्मृतियों के विभिन्न लेखक ऋषियों. नारद, कश्यप, गर्ग, वशिष्ठ, पराशर, द्रुहिन, वज्र, वत्स्य तथा देवल ने अपने लेखन और संस्करणों के माध्यम से इस आगमन में महŸवपूर्ण योगदान दिया।
दुर्भाग्य से इनमें से कोई भी लेख विद्यमान नहीं है। वराह मिहिर कृत बृहत्संहिता तथा उत्पल भट्ट कृत बृहत्संहिता में इन लेखों के अनेक उदाहरण हैं, जिनसे हमें इन लेखों की जानकारी मिलती है। और ये ऋषि होमर के काल से भी पहले के थे। इसलिए ग्रंथों में वास्तव में उनका उल्लेख करने की आवश्यकता है। इनमें से गर्ग ऋषि के वंश ने अपनी कई पीढ़ियाँ इस विज्ञान को समर्पित कर दी थीं। उन्होंने जलाशयों, बांधों, नहरों आदि जैसे विषयों पर भी शोध किया था। नेपाल के एक संग्रहालय में प्रासंगिक खंड के केवल कुछ पृष्ठ ही मौजूद हैं। पुराणों के काल में भी इस विद्या ने बेहतर प्रगति की थी। जैसा कि ब्रह्मवैवर्त पुराण के कई संदर्भों से देखा जा सकता है।
हमारे पूर्वानुमान प्राकृतिक और समय सिद्ध अनुभव आधारित है। ये जब तक हमारा जीवन प्राकृतिक और सांस्कृतिक था, तभी तक हमारे पूर्वानुमान व्यावहारिक और सफल, समय सिद्ध सत्य व प्रमाणित परिणाम मिलते थे। अभी भी हमने जो तरीके पूर्वानुभव के लिए उपयोग में लेने शुरू किए है, वे उतने सटीक कब होंगे; यह आज का सबसे बड़ा सवाल है। इस सवाल का जबाव कृत्रिम बृद्धिमत्ता देती है लेकिन कारगर नहीं है। हां, हम अपनी प्राकृतिक-सांस्कृतिक समझ से पंचमहाभूतों से निर्मित स्वयं के शरीर और सृष्टि, पृथ्वी, नदी का योग करें, यही योग सनातन है। इसी से हम विद्या और विज्ञान साथ.साथ आकर शांति-समृद्धि के रास्ते पर चला सकते है।
हमने गांव को नदी बेसिन के साथ जोड़कर पूर्ण छोटी नदी को एक प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक इकाई मानकर मजबूत लोकतांत्रिक सामुदायिक विकेन्द्रित मजबूत व्यवस्था बनाई है। इसी ने वर्षा चक्र के पूर्वानुमान द्वारा फसल चक्र तय किया जाता है। वर्षा चक्र के साथ फसल चक्र जुड़ने से कम एवं बेमौसम वर्षा में भी फसले फैल नहीं होती है। इसी काम से लोगों का मन.मानस नदियों से जुड़ना शुरू हुआ है।
21वीं सदी में सामुदायिक देशज ज्ञान बहुत ही सफल एवं सार्थक है। इसे हमने अपने दस हजार छःसौ वर्ग किमी भूमि पर सफलतापूर्वक उपयोग किया है। इस ज्ञान को हम दुनिया भर में विस्तार दे रहे है। हमारे अनुभवों को पूरी दुनिया के व्यवहार में अपनाया जा रहा है।

Thanks & Regards

’रेगिस्तानी लोक विद्या से बने जोगासर तालाब ने जोगा गांव को पानीदार बनाया।’----रेगिस्तान में आज भी 100 एमएम औसत वार्षिक व...
02/05/2026

’रेगिस्तानी लोक विद्या से बने जोगासर तालाब ने जोगा गांव को पानीदार बनाया।’
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रेगिस्तान में आज भी 100 एमएम औसत वार्षिक वर्षा में कैसे पशु, लोग और खेती जीवित रह सकती है। मुझे लगता है कि, यह दुनिया का सबसे अलग अनोखा पारिस्थितिकी तंत्र है। इस पारिस्थितिकी तंत्र को यहां के लोगों ने अपने भारतीय ज्ञान तंत्र में संजो कर ऐसी व्यवस्था बनाई, जिससे एक-दूसरे का परस्पर पोषण होने लगा और उस पोषण से प्रकृति से जितना लिया, उतना ही अपने पसीने से प्रकृति को दिया। प्रकृति के साथ जो लेने और देने के रिश्ते थे वो भारतीय ज्ञान तंत्र में पोषणकारी पोषक रिश्ते थे। इसीलिए इन्हीं रिश्तों के कारण भारत का रेगिस्तान, मरुस्थल टिका रहा और पानीदार बना रहा। इस इलाके में दो साल, तीन साल के अकाल पड़ते रहे हैं। एक बार तो पाँच साल का अकाल पड़ा था, जिसे पचकालिया कहते हैं। फिर तीन साल का अकाल भी पड़ा था, उसे त्रिकालिया कहते हैं और जो दो साल का अकाल होता है, उसे दुकाल कहते हैं। यह जो अकाल पड़ने का क्रम है, वह रेगिस्तान के इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा है। फिर भी लोग कैसे अपनी जमीन पर बने रहे। यह यहां के लोगों का प्रकृति के पोषण करने वाला रिश्ता ही है जिसके कारण लोग अपनी जमीन पर बने रहे है। इस रिश्ते को बरकरार रखने और गहरा बनाए रखने के लिए तरुण भारत संघ काम ने इन लोगों के साथ मिलकर खडीन, बेरी, टांके, सरोवर जैसी प्राचीन व्यवस्था और जो देशज जल प्रबंधन का तंत्र था, उसी तंत्र को आज की जरूरत के अनुसार ध्यान में रखकर इंसानों, पशुओं, पेड़ों, प्रकृति की संवेदनाओं को समझकर जल प्रबंधन का अनोखा काम शुरू किया है। इस क्षेत्र में तरुण भारत संघ 40 साल पहले से कार्य कर रहा है लेकिन जोगा गांव में तीन साल पहले ही जल संरक्षण का कार्य शुरू हुआ था।
इसी क्षेत्र रामगढ़, जैसलमेर में 1 मई 2026 को Tarun Bharat Sangh के अध्यक्ष जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी ने नैब फाउंडेशन के अध्यक्ष व नाबार्ड में उप प्रबंध निदेशक श्री अजय सूद जी, जलवायु परिवर्तन स्थायित्व कोस के मुख्य प्रबंधक संजीव रोहला, बोर्ड के सदस्य मालिक, विभुकर, तरुण भारत संघ के निदेशक मौलिक सिसोदिया और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। इस बैठक में जैसलमेर में जल संरक्षण के विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा रही है। इसके बाद इन सभी साथियों के साथ जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी ने थोरियत की खडीन, जोगासर तालाब और उसके नीचे बनी बेरी का अवलोकन किया। इस यात्रा के अनुभव बताते हुए जलपुरुष जी ने बताया कि, यह बिल्कुल वीरान सूखा इलाका है। यहां पर इस खडीन के बनने से अब हजारों जानवरों को पीने के पानी का इंतजाम हो गया और इस खडीन में जो पानी रिचार्ज हुआ वो पानी इस बेरी में निकल आया। ये पानी का पोषण करने वाला, धरती का पोषण करके लोगों, प्रकृति, पशुओं का पोषण करने वाला समग्र तंत्र है। यह तंत्र भारत के देशज ज्ञान का हिस्सा है। भारतीय ज्ञान तंत्र में एक दूसरे का पोषण करने और एक - दूसरे को पूरक मदद करने के लिए ये प्राचीन तंत्र पानी का था। इसी तंत्र के कारण ही भारत रेगिस्तान में जहां दुनिया की सबसे कम बारिश होती है, वहां के लोग भी अपने पानी पर जिंदा रह सके।
तभासं तीन वर्षों में इस इलाके में दर्जनों सरोवरों को ठीक किया और सैकड़ों टांके बनाए, खडीन बनाई। यहां जो बेरी बनाई गई है, वे सारी की सारी तकनीक लोगों की अपनी देशज ज्ञान की प्रौद्योगिकी है। यह लोगों की अपनी अभियांत्रिकी है।
यहां के तकनीकी, प्रौद्योगिकी को समझकर तरुण भारत संघ के कार्यकर्ताओं ने बहुत मुस्तैदी से इस इलाके को पानीदार बनाने का संकल्प लिया है।
आज का दिन तरुण भारत संघ के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि तरुण भारत संघ के इस उद्देश्य को समझकर नाबार्ड के अधिकारियों ने भीषण गर्मी के काल में जैसलमेर के रामगढ़ तहसील के जोगासर के क्षेत्र में भ्रमण किया। कामों को देखा, समझा और इन कामों को देख समझकर उन्होंने एक बड़े काम करने के निर्णय तरुण भारत संघ के साथ मिलकर किए।
इस क्षेत्र की महिलाएं और पुरुष दोनों मिलकर जल संरक्षण का काम करते हैं। यह जल संरक्षण की परंपरा जैसलमेर, बाड़मेर दोनों क्षेत्र में अनोखी हैं। यहां पर लोग अभी भी कम पानी में प्रसन्नचित्त रहते हैं, आनंद से जीते हैं, कम साधनों में अपने जीवन को पोषित करते हैं, वह सीखने लायक है। यहां की महिलाएं कम पानी में कपड़े धोती हैं। पानी को बार-बार उपयोग करने का यहां का बहुत गहरा चलन है। यहां की महिलाएं परात में बैठकर स्नान करती हैं और स्नान का पानी परात में इकट्ठा हो जाता है। फिर उसमें अपने अंदर के कपड़े उस पानी में धोती हैं और धोने के बाद उस पानी को जो वहां पेड़ हैं, उन पेड़ों में डाल देती हैं। इससे जल संरक्षण के महत्व को इस क्षेत्र से सीखा और समझा जा सकता है। अभी भी एक-एक बूंद को जिस तरीके से ये मान, सम्मान और के साथ सहित के उपयोग करते हैं, उसका यह एक आदर्श है।

30/04/2026

विकास की बर्बादी रोकने हेतु मूल ज्ञान को सत्याग्रही बना दिया
प्रकाशनार्थ - जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
दिनांक- 30 अप्रैल 2026
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विकास की बर्बादी ने मुझे अपने खोए हुए मूल आदि ज्ञान की तरफ मुड़ने हेतु मजबूर किया है। 51 वर्ष पहले जब मुझे बर्बादी का एहसास हुआ था, उसी ने भारतीय मूल ज्ञान से पुनर्जनन का आभास कराया था। आवर्तन के बाद पुनार्वतन तो पुनर्जन्म प्रक्रिया द्वारा ही संभव है। इसलिए 51 वर्ष पूर्व मेरे मूल गांव डौला में बाढ़ मुक्ति के काम से शुरुआत हुई थी। जयपुर में अरावली खनन के विनाश ने अंतर्चेतना को जगाया। जयपुर विश्वविद्यालय परिसर के घरों में जले हुए चवालीस मजदूर परिवारों के राहत कार्यों से सीख मिलनी शुरू हुई।
46 वर्ष पूर्व जयपुर शहर में झालनाडूंगरी खनन से बढ़ते तापक्रम का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि विकास के नाम पर खनन से कितना पर्यावरण, स्वास्थ्य, आर्थिकी और पारिस्थितिकी का विनाश हो रहा है। इन्ही प्रेरक घटनाओं ने मुझे अपने मूल ज्ञान से सीखने की संपूर्ण तैयारी करा दी थी। बस यही मेरी शिक्षा की विद्या(करके सिखाने की प्रक्रिया) में बदलाव मेरे जीवन के बदलाव बिन्दु बन गया था।
वर्ष 1982 में यह समझ बनी कि, जहां से लोग उजड़कर शहरों में आ रहे हैं, वहीं जाकर उनके साथ काम करना चाहिए। इसी सोच ने जयपुर शहर छोड़कर गांव में जाने की तैयारी करा दी। वर्ष 1983 में मालपुरा, केकड़ी, टोंक आदि क्षेत्रों के गाड़ूलिया लूहारों के साथ उनके डेरों के पुनर्वास का प्रयास शुरू किया। उनकी अपनी जमीन और स्थिर जीवन की परंपरा न होने के बावजूद प्रयास जारी रहे। इसी काल में टोरडी सागर गांव में गोबर की गांव में ही खाद और गांव में ही बीज एकत्रित कर खेती के प्रयोग शुरू किए गऐ। काम करते समय विचार आया कि ऐसी जगह काम करना चाहिए जहां जल बिल्कुल नहीं है। तब गोपालपुरा, हरिपुरा, हमीरपुर, मालपुरा, रायपुरा, भाल, किशोरी, भीकमपुरा, जैतपुरा, सीलीबावड़ी और सत्ताईस गुवाड़ा-गुवाड़ी जैसे गांव मिले, जहां काम करने का निश्चय किया गया।
कुछ दिनों की तैयारी के बाद जब अलवर जिले के बिन पानी क्षेत्र में जाने का निर्णय हुआ तो कोई संपर्क नहीं था। जयपुर से जानकारी मिली कि, एक ही बस घाटगेट बस अड्डे से दोपहर दो बजे चलती है और शाम सात बजे किशोरी गांव पहुंचती है। बिना यह जाने कि किस गांव जाना है, बस में बैठ गए और कंडक्टर से अंतिम स्टॉप तक का टिकट ले लिया।
रास्ते में उजड़ा हुआ गांव अजबगढ़ को देखकर उतरने का मन हुआ, पर बस नहीं रुकी। अंततः 25 नवंबर 1985 की शाम सात बजे किशोरी गांव पहुंचे। वहां कुछ बुजुर्गों ने पहले हम पर संदेह किया और बोले कि, ये पंजाब के आतंकवादी जैसे लगते है। दूसरों ने कहा कि, आतंकवादी यहां नही ंआयेंगे। उजड़ते लोगों के पास सहारा देने आतंकवादी नहीं आते है। गांव के ही एक सज्जन किसान बोले की इन्हें मंदिर में ही ठहरा दो। किशोरी के हनुमान मंदिर में हमें ठहरने की व्यवस्था कर दी। तीन दिन बाद भीकमपुरा गांव में श्री सुमेर सिंह जी ने रहने की जगह दिलवा दी। मैंने वहीं से आसपास के गांवों में दवाई और पढ़ाई का काम शुरू किया।
आयुर्वेद स्नातक होने के कारण जल और जीवन के संबंध की समझ मिली। मेरी औपचारिक शिक्षा सीमित थी, लेकिन मेरे दादा हमेशा सिखाते थे कि शिक्षा का अर्थ तभी है जब उसका प्रभाव धरती, प्रकृति और जीवन पर समझा जाए। जो सीखा है उसे जमीन पर उतारकर अनुभव करना चाहिए। यही अनुभव आगे का मार्ग दिखाता है। मेरे छोटे बाबा(दादा) श्री लखपत सिंह जी के साथ खेतों में काम करते हुए प्रकृति से सीधा संबंध बना। वो 12 से 16 घंटे प्रकृति का काम करते थे। उन्होंने सिखाया कि धरती माता से जितना लिया जाए, उतना ही श्रम और पसीने से उसे लौटाना चाहिए। धरती हमें पोषित करती है। हम इसे पोषित करने का काम करें।
आगे चलकर सब को स्वस्थ रखने की विद्या ग्रहण करने के लिए भारतीय ऋषिकुल कॉलेज में दाखिल हुआ। वहां पहले ही दिन कॉलेज के प्राचार्य ने कहा कि, ‘धमार्थ, काम, मोक्ष, आयुर्वेद आरोग्य रक्षणम’’ जीवन तो धर्म, मोक्ष के लिए है। आयुर्वेद शिक्षा में भी यही समझ मिली कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का आधार ‘आरोग्य जीवन’ हैं। बिना औपचारिक शिक्षा की दौड़ में शामिल रहते हुए भी सरकारी सेवा कार्य करने का अवसर मिला। अंततः जीवन विद्या ने मुझे वहां टिकने नहीं दिया और मैं अलवर जिले के गोपालपुरा गांव पहुंच गया। यहां मैंने जो विद्या पायी थी, उसी से स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा का कार्य शुरू किया। यह क्षेत्र कुपोषण, जल संकट, रतोंधी रोग से ग्रस्त और बेरोजगारी से जूझ रहा था। युवा गांव छोड़कर बाहर जा रहे थे। मैनें यहां दवाई और पढ़ाई का काम किया। नौ महीने के भीतर ही स्थानीय समुदाय के मांगू मीणा और नाथी बलाई से सीखकर जल संरक्षण का कार्य शुरू किया। इसका प्रभाव अद्भुत रहा। गांव के कुॅओं में जल आते ही लोग शहरों से वापस अपने गांव लौटने लगे, खेती में हरियाली आई और कुओं में पानी भरने लगा।
जब मैं यहां आया तो लोग अपने दुख के गीतों में गाते थेरू-
‘बादल आते हैं, हर साल मेरे गांव में, पर बरसते नहीं है,
बिना बरसे वे कहां, चले गए हम जानते नहीं है।
जब से बादल ने रूठना शुरू किये है,
मेरा बेटा-बहू रूठ कर दिल्ली चले गए है,
अब कुएं में पानी नहीं है, जीवन में खुशहाली नहीं है।
1985 में घर-घर मैंने इन गीतों के शब्दों को सुना है। ये लोग इतने बुरे हालात में भी मुझसे कभी कुछ मांगते नहीं थे। बस कहते थे कि, केवल पानी हो जायेगा तो सभी कुछ अपने आप ही आ जायेगा। मैंने इन्हीे से पूछा कि, पानी का काम कैसे होगा। तब इन्होनें ही मुझे कुल दो दिनों में मेरी जल में दो पीएचडी करवा दी। ये शिक्षा की पीएचडी नहीं थी बल्कि ये विद्या में है। मुझे मेरे गुरू मांगू काका और अन्य साथियों ने 25 सूखें कंुओं में चमड़े की चरस से नीचे उतारकर धरती का पेट दिखाया-सिखाया था। बाहर कुंओं में से निकालकर, सवाल पूछकर ज्ञान का प्रमाणीकरण किया था। इनका लक्ष्य जल के वाष्पीकरण को रोकना था। यहां वर्षा जल बहुत कम ही था, फिर भी जो आता था, वह बहकर या वाष्प बनकर राजस्थान में अधिकतर उड़ जाता है। यह धरती के अंदर संग्रह करके वाष्पीकरण से बचाया जा सकता है। इसलिए मुझे यह सब प्रत्यक्ष ज्ञान विद्या द्वारा 25 कुंओं में विविध प्रकार की मिट्टी, पत्थर के स्तरों को देखकर समझा आ गया था।
जल कार्य में स्थानीय लोगों से ही गहन सीख मिली। धरती के भीतर के जल को समझने के लिए कुओं में उतरकर मिट्टी और पत्थरों की परतों की समझ आयी। यह ज्ञान पुस्तकों से नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव से मिला। एक ही दिन में पेड़-पौधे, घास, मिट्टी की विद्या को प्रत्यक्ष सीखना संभव हुआ। जो हम 19 वर्षों में शिक्षा की पीएचडी करके नहीं सीख सकते, वह एक दिन में सीखना संभव हो गया। ये इसलिए संभव हुआ क्योंकि यह भूविज्ञान कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बिना भूगर्भीय समझ के जल संरक्षण संभव नहीं है। यह विज्ञान आंकड़ों का नहीं, संवेदनशील समझ का विज्ञान है। संवेदनाओं से मिली सीख या सत्यशोधन आंकड़ों का विज्ञान नहीं है। यह तो आंतरिक अभ्यास से मिला ज्ञान ‘विद्या’ है। जो आंतरिक साधना और प्रकृति के साथ संवाद से प्राप्त होती है। यह बाहरी मशीनों, समीकरणों के बजाय आंतरिक आध्यात्मिक ही साधना है। साध्य तो साधन से शोधन और शुद्धि से सिद्धि(सत्य) मिल जाता है। साध्य सिद्धी की राह पर साधना सबसे पहला चरण है। साधना के लिए साधनों की शुद्धि से हुई साधना सिद्धी(सत्य) खोज ही देती है।
मेरी पहली सत्य खोज गोपालपुरा गांव से शुरू होकर अरवरी नदी पुनर्जीवन को आंखों से देखकर पूरी हुई थी। इन्ही जल, जंगल, जमीन संरक्षण, भूजल पुनर्भरण काम के 10 वर्ष बाद, अरवरी नदी पुनर्जीवित हुई, 12 वर्ष बाद सरसा, रूपारेल, भगाणी, जहाजवाली नदी पुनर्जीवित होकर बहने लगी, और पंद्रह वर्षों में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, उन्मूलन के सकारात्मक प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देने लगा। जल लौटने से जीवन, खेती, रोजगार और संस्कृति सब वापस आने लगे। यह स्पष्ट हुआ कि जल के बिना कुछ भी संभव नहीं है न जीवन, न जमीन, न जंगल, न समाज। इस तरह लोगों के गीत भी बदलने लगे, अब हमारे कार्यों के प्रभाव से आए बदलाव के गीत गाने लगे-
अब बादल आते है, मेरे गांव में,
रूठते नहीं है वे, अब बरसते है मेरे खेतों में।
पानी आ गया है, मेरे कुएं में,
जिस दिन से पानी आया मेरे कुएं में, मेरा बेटा बहू और पोती लौट आयी है अपने गांव में,
अब करते है ये खेती, खेतो में है, हरियाली
कुएं में है पानी और अब लौट रही है मेरे जीवन में खुशहाली।
मेरा बेटा-बहु बच्चें अब रहेंगे मेरे साथ।
भारतीय विद्या में ही जल का सम्पूर्ण ज्ञान सबसे पहले आरंभ हुआ था। भारतीय संस्कृति में जल को ब्रह्म माना गया है “आपः ब्रह्मास्मि।” जल ही सृष्टि का आधार है। यही ब्राहाण्ड को चलाने वाला है। सबसे पहले यह सृष्टि अग्नि का गोला था, अग्नि ही ब्राहांड थी। समय और सिद्धांतों से पूर्व साढे तीन खरब वर्ष पूर्व अग्नि के ब्राहांड में एक महाविस्फोट हुआ था, जिसमें अग्नि के दो अणु हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अणु अलग-अलग हुए। फिर दोनों ही हाइड्रोजन के दो अणु ऑक्सीजन के एक अणु से मिल गए और जल की उत्पत्ति हुई। बाद में भारत में जल विद्या और विज्ञान पर शोध शुरू हुई थी। मुझे भी इसमें रुचि थी। इसलिए मैंने वेदों और उपनिषदों को अध्ययन किया और समझा था। इसी समझ से 1992 में ‘‘भारतीय आस्था और पर्यावरण रक्षा’’ पुस्तक लिख दी थी।
1991 में पेरिस फ्रांस में दूसरे पृथ्वी शिखर सम्मेलन की तैयारी बैठक में 10 दिन के लिए यहां के राष्ट्रपति मित्राओ ने हमें बुलाकर दुनिया भर की जल, जंगल, जमीन को संरक्षित रखने हेतु सामुदायिक आस्थाओं के जानने हेतु भारत के अन्य पर्यावरणविदों के साथ मुझे भी बुलाया था। हमने प्रतिदिन भारतीय जल आस्था पर अपनी बातें रखी थी। तब तक मेरा सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन का अनुभव भी मुझे हो गया था। इस विषय में भी मैंने दो दिन अपनी बात रखी थी। ये बाते तो मेरी पुस्तक से भी जान सकते है। दूसरा भाषण था, ‘भारत का जल दर्शन व जल प्रबंधन’ यह भी मेरी दूसरी पुस्तकों से जाना जा सकता है। भारतीय जल विद्या और जल विज्ञान जानना भी जरूरी है।
वेदों और उपनिषदों के अध्ययन तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनुभव साझा करने से मेरी जल, जंगल, जमीन की यह समझ और गहरी हुई कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए सामुदायिक आस्था और पारंपरिक ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसी ज्ञान के आधार पर मेरे जीवन का काम शुरु हुआ था। गांव का अनपढ़ व्यक्ति ही मुझे जमीन पर काम करके वेद-उपनिषदों की बातों का व्यवहार एवं संस्कार सिखा रहा था।
मेरी आयुर्वेद विद्याा में मुझे पंचमहाभूत निर्मित हमारे शरीर के बारे में सिखाया गया था। हम और हमारी सृष्टि जल-जमीन से निर्मित हुई है। जीव का जन्मदाता जल ही है। पृथ्वी, नदी, पहाड़, आकाश सभी कुछ अग्नि से अलग होकर जल ने बनाए है लेकिन चलाने वाली शक्ति अग्नि ही है। जल ने मिट्टी बनायी और मिट्टी में वनस्पतियों का जन्म हुआ। जल में जलचरो की निर्मित हुई है। बस धीरे-धीरे पूरे ब्रह्मांड में जीव जगत बने।
जीव-जगत को प्राण वायु ने अग्नि से ऊर्जा लेना सिखाया। बस हम सभी चलने लगे, बढ़ने लगे। मिट्टी ने धरती, जल ने समुद्र, आकाश ने सभी को सहारा(आवास) दिया। हमारे आवासों ने दुनिया में लोभ, लालच, लाभ और विद्वान बनाऐ। इन्होने दुनिया को जटिल बनाना शुरू किया तो आर्वतन-परावर्तन शुरू हुए। सतयुग-त्रेता-द्वापर कलियुग बनते चले गए।
राजा और विद्वान बनने की लालसा-आकांक्षा से ‘त्रेता’ काल बन गया। राजा जब घमंडी, लुटेरे और काला बाज बनने लगा तो प्रकृति क्रोध से द्वापर बन गया। भौतिकता और मशीनों का राज आया तो ‘कलियुग’ बन गया। इस काल में प्रकृति और संस्कृति की संपूर्ण अनदेखी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने करनी शुरू कर दी। प्रकृति-संस्कृति के मानव प्रेम बोध-भाव को मार दिया। कृत्रिम बुद्धिमता ने हमारी प्राकृतिक बुद्धिमता को खाकर नष्ट करना शुरू कर दिया है।
भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर सृष्टि के आधार हैं। यही आध्यात्म और विज्ञान का संगम हैं। जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तब प्रकृति संकट में पड़ती है। आज भौतिकता, मशीनों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव ने प्रकृति और संस्कृति की अनदेखी शुरू कर दी है, जिससे बाढ़, सूखा और मानव निर्मित आपदाएं बढ़ रही हैं। विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। लोग गांव छोड़कर शहरों में लाचार, बेकार, बीमार असुरक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं। शहरों में इनका जीवन नरक हो रहा है। यदि इस शहरीकरण की बर्बादीकरण से बचना है तो हमें अपने आदि ज्ञान की ओर लौटना होगा।

आदिज्ञान पंचमहाभूतों के योग से बना ‘भगवान’ भ-भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि, न-नीर यह हमारे अध्यात्म और विज्ञान के संबंध को सिद्ध करता है। ये पंचमहाभूत ही हमे सृष्टि पृथ्वी, नदी, पहाड़, जंगलों को बनाते है। यह प्राचीन भारतीय आदिज्ञान ही है। जब यही व्यवहार-संस्कार जीवन में आता है, तभी जीवन प्रकृतिमय बनने लगता है। इसीमूल ज्ञान ने विकास की बर्बादी से मुझे मोड़कर सनातन-समृद्ध-प्राकृतिक पुनर्जनन की राह पकडाई है।
इसी से हम सनातन ‘सत्य’ को समझकर पृथ्वी पर हो रही बर्बादी रोकते है। सत्य की अभिव्यक्ति ही हमारी संस्कृति है। इसी से प्रकृति पोषण का हमारा जीवन जुड़ा था। हमारी आस्था में निर्मित व्यवहार एवं संस्कार बना है। मेरे व्यवहार ने उजड़े गांवों की सभ्यता को पुनर्जीवित किया है। मेरे काम के संस्कार से भारतीय संस्कृति समृद्ध हुई है। यही मेरे जीवन को प्रकृति-संस्कृति के साथ जोड़ता चला गया। देशज ज्ञान से पोषित व्यवहार ने प्राकृतिक आस्थावान-संस्कारवान बनाकर अपने शास्त्रों और लोकविज्ञान से सीखकर, काम करने हेतु प्रकृतिप्रेमी बना दिया था। इसी ने प्राकृतिक शोषण खनन के विरुद्ध अंतिम क्षण तक सत्याग्रही बना दिया।

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