30/04/2026
विकास की बर्बादी रोकने हेतु मूल ज्ञान को सत्याग्रही बना दिया
प्रकाशनार्थ - जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
दिनांक- 30 अप्रैल 2026
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विकास की बर्बादी ने मुझे अपने खोए हुए मूल आदि ज्ञान की तरफ मुड़ने हेतु मजबूर किया है। 51 वर्ष पहले जब मुझे बर्बादी का एहसास हुआ था, उसी ने भारतीय मूल ज्ञान से पुनर्जनन का आभास कराया था। आवर्तन के बाद पुनार्वतन तो पुनर्जन्म प्रक्रिया द्वारा ही संभव है। इसलिए 51 वर्ष पूर्व मेरे मूल गांव डौला में बाढ़ मुक्ति के काम से शुरुआत हुई थी। जयपुर में अरावली खनन के विनाश ने अंतर्चेतना को जगाया। जयपुर विश्वविद्यालय परिसर के घरों में जले हुए चवालीस मजदूर परिवारों के राहत कार्यों से सीख मिलनी शुरू हुई।
46 वर्ष पूर्व जयपुर शहर में झालनाडूंगरी खनन से बढ़ते तापक्रम का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि विकास के नाम पर खनन से कितना पर्यावरण, स्वास्थ्य, आर्थिकी और पारिस्थितिकी का विनाश हो रहा है। इन्ही प्रेरक घटनाओं ने मुझे अपने मूल ज्ञान से सीखने की संपूर्ण तैयारी करा दी थी। बस यही मेरी शिक्षा की विद्या(करके सिखाने की प्रक्रिया) में बदलाव मेरे जीवन के बदलाव बिन्दु बन गया था।
वर्ष 1982 में यह समझ बनी कि, जहां से लोग उजड़कर शहरों में आ रहे हैं, वहीं जाकर उनके साथ काम करना चाहिए। इसी सोच ने जयपुर शहर छोड़कर गांव में जाने की तैयारी करा दी। वर्ष 1983 में मालपुरा, केकड़ी, टोंक आदि क्षेत्रों के गाड़ूलिया लूहारों के साथ उनके डेरों के पुनर्वास का प्रयास शुरू किया। उनकी अपनी जमीन और स्थिर जीवन की परंपरा न होने के बावजूद प्रयास जारी रहे। इसी काल में टोरडी सागर गांव में गोबर की गांव में ही खाद और गांव में ही बीज एकत्रित कर खेती के प्रयोग शुरू किए गऐ। काम करते समय विचार आया कि ऐसी जगह काम करना चाहिए जहां जल बिल्कुल नहीं है। तब गोपालपुरा, हरिपुरा, हमीरपुर, मालपुरा, रायपुरा, भाल, किशोरी, भीकमपुरा, जैतपुरा, सीलीबावड़ी और सत्ताईस गुवाड़ा-गुवाड़ी जैसे गांव मिले, जहां काम करने का निश्चय किया गया।
कुछ दिनों की तैयारी के बाद जब अलवर जिले के बिन पानी क्षेत्र में जाने का निर्णय हुआ तो कोई संपर्क नहीं था। जयपुर से जानकारी मिली कि, एक ही बस घाटगेट बस अड्डे से दोपहर दो बजे चलती है और शाम सात बजे किशोरी गांव पहुंचती है। बिना यह जाने कि किस गांव जाना है, बस में बैठ गए और कंडक्टर से अंतिम स्टॉप तक का टिकट ले लिया।
रास्ते में उजड़ा हुआ गांव अजबगढ़ को देखकर उतरने का मन हुआ, पर बस नहीं रुकी। अंततः 25 नवंबर 1985 की शाम सात बजे किशोरी गांव पहुंचे। वहां कुछ बुजुर्गों ने पहले हम पर संदेह किया और बोले कि, ये पंजाब के आतंकवादी जैसे लगते है। दूसरों ने कहा कि, आतंकवादी यहां नही ंआयेंगे। उजड़ते लोगों के पास सहारा देने आतंकवादी नहीं आते है। गांव के ही एक सज्जन किसान बोले की इन्हें मंदिर में ही ठहरा दो। किशोरी के हनुमान मंदिर में हमें ठहरने की व्यवस्था कर दी। तीन दिन बाद भीकमपुरा गांव में श्री सुमेर सिंह जी ने रहने की जगह दिलवा दी। मैंने वहीं से आसपास के गांवों में दवाई और पढ़ाई का काम शुरू किया।
आयुर्वेद स्नातक होने के कारण जल और जीवन के संबंध की समझ मिली। मेरी औपचारिक शिक्षा सीमित थी, लेकिन मेरे दादा हमेशा सिखाते थे कि शिक्षा का अर्थ तभी है जब उसका प्रभाव धरती, प्रकृति और जीवन पर समझा जाए। जो सीखा है उसे जमीन पर उतारकर अनुभव करना चाहिए। यही अनुभव आगे का मार्ग दिखाता है। मेरे छोटे बाबा(दादा) श्री लखपत सिंह जी के साथ खेतों में काम करते हुए प्रकृति से सीधा संबंध बना। वो 12 से 16 घंटे प्रकृति का काम करते थे। उन्होंने सिखाया कि धरती माता से जितना लिया जाए, उतना ही श्रम और पसीने से उसे लौटाना चाहिए। धरती हमें पोषित करती है। हम इसे पोषित करने का काम करें।
आगे चलकर सब को स्वस्थ रखने की विद्या ग्रहण करने के लिए भारतीय ऋषिकुल कॉलेज में दाखिल हुआ। वहां पहले ही दिन कॉलेज के प्राचार्य ने कहा कि, ‘धमार्थ, काम, मोक्ष, आयुर्वेद आरोग्य रक्षणम’’ जीवन तो धर्म, मोक्ष के लिए है। आयुर्वेद शिक्षा में भी यही समझ मिली कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का आधार ‘आरोग्य जीवन’ हैं। बिना औपचारिक शिक्षा की दौड़ में शामिल रहते हुए भी सरकारी सेवा कार्य करने का अवसर मिला। अंततः जीवन विद्या ने मुझे वहां टिकने नहीं दिया और मैं अलवर जिले के गोपालपुरा गांव पहुंच गया। यहां मैंने जो विद्या पायी थी, उसी से स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा का कार्य शुरू किया। यह क्षेत्र कुपोषण, जल संकट, रतोंधी रोग से ग्रस्त और बेरोजगारी से जूझ रहा था। युवा गांव छोड़कर बाहर जा रहे थे। मैनें यहां दवाई और पढ़ाई का काम किया। नौ महीने के भीतर ही स्थानीय समुदाय के मांगू मीणा और नाथी बलाई से सीखकर जल संरक्षण का कार्य शुरू किया। इसका प्रभाव अद्भुत रहा। गांव के कुॅओं में जल आते ही लोग शहरों से वापस अपने गांव लौटने लगे, खेती में हरियाली आई और कुओं में पानी भरने लगा।
जब मैं यहां आया तो लोग अपने दुख के गीतों में गाते थेरू-
‘बादल आते हैं, हर साल मेरे गांव में, पर बरसते नहीं है,
बिना बरसे वे कहां, चले गए हम जानते नहीं है।
जब से बादल ने रूठना शुरू किये है,
मेरा बेटा-बहू रूठ कर दिल्ली चले गए है,
अब कुएं में पानी नहीं है, जीवन में खुशहाली नहीं है।
1985 में घर-घर मैंने इन गीतों के शब्दों को सुना है। ये लोग इतने बुरे हालात में भी मुझसे कभी कुछ मांगते नहीं थे। बस कहते थे कि, केवल पानी हो जायेगा तो सभी कुछ अपने आप ही आ जायेगा। मैंने इन्हीे से पूछा कि, पानी का काम कैसे होगा। तब इन्होनें ही मुझे कुल दो दिनों में मेरी जल में दो पीएचडी करवा दी। ये शिक्षा की पीएचडी नहीं थी बल्कि ये विद्या में है। मुझे मेरे गुरू मांगू काका और अन्य साथियों ने 25 सूखें कंुओं में चमड़े की चरस से नीचे उतारकर धरती का पेट दिखाया-सिखाया था। बाहर कुंओं में से निकालकर, सवाल पूछकर ज्ञान का प्रमाणीकरण किया था। इनका लक्ष्य जल के वाष्पीकरण को रोकना था। यहां वर्षा जल बहुत कम ही था, फिर भी जो आता था, वह बहकर या वाष्प बनकर राजस्थान में अधिकतर उड़ जाता है। यह धरती के अंदर संग्रह करके वाष्पीकरण से बचाया जा सकता है। इसलिए मुझे यह सब प्रत्यक्ष ज्ञान विद्या द्वारा 25 कुंओं में विविध प्रकार की मिट्टी, पत्थर के स्तरों को देखकर समझा आ गया था।
जल कार्य में स्थानीय लोगों से ही गहन सीख मिली। धरती के भीतर के जल को समझने के लिए कुओं में उतरकर मिट्टी और पत्थरों की परतों की समझ आयी। यह ज्ञान पुस्तकों से नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव से मिला। एक ही दिन में पेड़-पौधे, घास, मिट्टी की विद्या को प्रत्यक्ष सीखना संभव हुआ। जो हम 19 वर्षों में शिक्षा की पीएचडी करके नहीं सीख सकते, वह एक दिन में सीखना संभव हो गया। ये इसलिए संभव हुआ क्योंकि यह भूविज्ञान कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बिना भूगर्भीय समझ के जल संरक्षण संभव नहीं है। यह विज्ञान आंकड़ों का नहीं, संवेदनशील समझ का विज्ञान है। संवेदनाओं से मिली सीख या सत्यशोधन आंकड़ों का विज्ञान नहीं है। यह तो आंतरिक अभ्यास से मिला ज्ञान ‘विद्या’ है। जो आंतरिक साधना और प्रकृति के साथ संवाद से प्राप्त होती है। यह बाहरी मशीनों, समीकरणों के बजाय आंतरिक आध्यात्मिक ही साधना है। साध्य तो साधन से शोधन और शुद्धि से सिद्धि(सत्य) मिल जाता है। साध्य सिद्धी की राह पर साधना सबसे पहला चरण है। साधना के लिए साधनों की शुद्धि से हुई साधना सिद्धी(सत्य) खोज ही देती है।
मेरी पहली सत्य खोज गोपालपुरा गांव से शुरू होकर अरवरी नदी पुनर्जीवन को आंखों से देखकर पूरी हुई थी। इन्ही जल, जंगल, जमीन संरक्षण, भूजल पुनर्भरण काम के 10 वर्ष बाद, अरवरी नदी पुनर्जीवित हुई, 12 वर्ष बाद सरसा, रूपारेल, भगाणी, जहाजवाली नदी पुनर्जीवित होकर बहने लगी, और पंद्रह वर्षों में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, उन्मूलन के सकारात्मक प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देने लगा। जल लौटने से जीवन, खेती, रोजगार और संस्कृति सब वापस आने लगे। यह स्पष्ट हुआ कि जल के बिना कुछ भी संभव नहीं है न जीवन, न जमीन, न जंगल, न समाज। इस तरह लोगों के गीत भी बदलने लगे, अब हमारे कार्यों के प्रभाव से आए बदलाव के गीत गाने लगे-
अब बादल आते है, मेरे गांव में,
रूठते नहीं है वे, अब बरसते है मेरे खेतों में।
पानी आ गया है, मेरे कुएं में,
जिस दिन से पानी आया मेरे कुएं में, मेरा बेटा बहू और पोती लौट आयी है अपने गांव में,
अब करते है ये खेती, खेतो में है, हरियाली
कुएं में है पानी और अब लौट रही है मेरे जीवन में खुशहाली।
मेरा बेटा-बहु बच्चें अब रहेंगे मेरे साथ।
भारतीय विद्या में ही जल का सम्पूर्ण ज्ञान सबसे पहले आरंभ हुआ था। भारतीय संस्कृति में जल को ब्रह्म माना गया है “आपः ब्रह्मास्मि।” जल ही सृष्टि का आधार है। यही ब्राहाण्ड को चलाने वाला है। सबसे पहले यह सृष्टि अग्नि का गोला था, अग्नि ही ब्राहांड थी। समय और सिद्धांतों से पूर्व साढे तीन खरब वर्ष पूर्व अग्नि के ब्राहांड में एक महाविस्फोट हुआ था, जिसमें अग्नि के दो अणु हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अणु अलग-अलग हुए। फिर दोनों ही हाइड्रोजन के दो अणु ऑक्सीजन के एक अणु से मिल गए और जल की उत्पत्ति हुई। बाद में भारत में जल विद्या और विज्ञान पर शोध शुरू हुई थी। मुझे भी इसमें रुचि थी। इसलिए मैंने वेदों और उपनिषदों को अध्ययन किया और समझा था। इसी समझ से 1992 में ‘‘भारतीय आस्था और पर्यावरण रक्षा’’ पुस्तक लिख दी थी।
1991 में पेरिस फ्रांस में दूसरे पृथ्वी शिखर सम्मेलन की तैयारी बैठक में 10 दिन के लिए यहां के राष्ट्रपति मित्राओ ने हमें बुलाकर दुनिया भर की जल, जंगल, जमीन को संरक्षित रखने हेतु सामुदायिक आस्थाओं के जानने हेतु भारत के अन्य पर्यावरणविदों के साथ मुझे भी बुलाया था। हमने प्रतिदिन भारतीय जल आस्था पर अपनी बातें रखी थी। तब तक मेरा सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन का अनुभव भी मुझे हो गया था। इस विषय में भी मैंने दो दिन अपनी बात रखी थी। ये बाते तो मेरी पुस्तक से भी जान सकते है। दूसरा भाषण था, ‘भारत का जल दर्शन व जल प्रबंधन’ यह भी मेरी दूसरी पुस्तकों से जाना जा सकता है। भारतीय जल विद्या और जल विज्ञान जानना भी जरूरी है।
वेदों और उपनिषदों के अध्ययन तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनुभव साझा करने से मेरी जल, जंगल, जमीन की यह समझ और गहरी हुई कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए सामुदायिक आस्था और पारंपरिक ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसी ज्ञान के आधार पर मेरे जीवन का काम शुरु हुआ था। गांव का अनपढ़ व्यक्ति ही मुझे जमीन पर काम करके वेद-उपनिषदों की बातों का व्यवहार एवं संस्कार सिखा रहा था।
मेरी आयुर्वेद विद्याा में मुझे पंचमहाभूत निर्मित हमारे शरीर के बारे में सिखाया गया था। हम और हमारी सृष्टि जल-जमीन से निर्मित हुई है। जीव का जन्मदाता जल ही है। पृथ्वी, नदी, पहाड़, आकाश सभी कुछ अग्नि से अलग होकर जल ने बनाए है लेकिन चलाने वाली शक्ति अग्नि ही है। जल ने मिट्टी बनायी और मिट्टी में वनस्पतियों का जन्म हुआ। जल में जलचरो की निर्मित हुई है। बस धीरे-धीरे पूरे ब्रह्मांड में जीव जगत बने।
जीव-जगत को प्राण वायु ने अग्नि से ऊर्जा लेना सिखाया। बस हम सभी चलने लगे, बढ़ने लगे। मिट्टी ने धरती, जल ने समुद्र, आकाश ने सभी को सहारा(आवास) दिया। हमारे आवासों ने दुनिया में लोभ, लालच, लाभ और विद्वान बनाऐ। इन्होने दुनिया को जटिल बनाना शुरू किया तो आर्वतन-परावर्तन शुरू हुए। सतयुग-त्रेता-द्वापर कलियुग बनते चले गए।
राजा और विद्वान बनने की लालसा-आकांक्षा से ‘त्रेता’ काल बन गया। राजा जब घमंडी, लुटेरे और काला बाज बनने लगा तो प्रकृति क्रोध से द्वापर बन गया। भौतिकता और मशीनों का राज आया तो ‘कलियुग’ बन गया। इस काल में प्रकृति और संस्कृति की संपूर्ण अनदेखी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने करनी शुरू कर दी। प्रकृति-संस्कृति के मानव प्रेम बोध-भाव को मार दिया। कृत्रिम बुद्धिमता ने हमारी प्राकृतिक बुद्धिमता को खाकर नष्ट करना शुरू कर दिया है।
भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर सृष्टि के आधार हैं। यही आध्यात्म और विज्ञान का संगम हैं। जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तब प्रकृति संकट में पड़ती है। आज भौतिकता, मशीनों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव ने प्रकृति और संस्कृति की अनदेखी शुरू कर दी है, जिससे बाढ़, सूखा और मानव निर्मित आपदाएं बढ़ रही हैं। विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। लोग गांव छोड़कर शहरों में लाचार, बेकार, बीमार असुरक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं। शहरों में इनका जीवन नरक हो रहा है। यदि इस शहरीकरण की बर्बादीकरण से बचना है तो हमें अपने आदि ज्ञान की ओर लौटना होगा।
आदिज्ञान पंचमहाभूतों के योग से बना ‘भगवान’ भ-भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि, न-नीर यह हमारे अध्यात्म और विज्ञान के संबंध को सिद्ध करता है। ये पंचमहाभूत ही हमे सृष्टि पृथ्वी, नदी, पहाड़, जंगलों को बनाते है। यह प्राचीन भारतीय आदिज्ञान ही है। जब यही व्यवहार-संस्कार जीवन में आता है, तभी जीवन प्रकृतिमय बनने लगता है। इसीमूल ज्ञान ने विकास की बर्बादी से मुझे मोड़कर सनातन-समृद्ध-प्राकृतिक पुनर्जनन की राह पकडाई है।
इसी से हम सनातन ‘सत्य’ को समझकर पृथ्वी पर हो रही बर्बादी रोकते है। सत्य की अभिव्यक्ति ही हमारी संस्कृति है। इसी से प्रकृति पोषण का हमारा जीवन जुड़ा था। हमारी आस्था में निर्मित व्यवहार एवं संस्कार बना है। मेरे व्यवहार ने उजड़े गांवों की सभ्यता को पुनर्जीवित किया है। मेरे काम के संस्कार से भारतीय संस्कृति समृद्ध हुई है। यही मेरे जीवन को प्रकृति-संस्कृति के साथ जोड़ता चला गया। देशज ज्ञान से पोषित व्यवहार ने प्राकृतिक आस्थावान-संस्कारवान बनाकर अपने शास्त्रों और लोकविज्ञान से सीखकर, काम करने हेतु प्रकृतिप्रेमी बना दिया था। इसी ने प्राकृतिक शोषण खनन के विरुद्ध अंतिम क्षण तक सत्याग्रही बना दिया।