31/01/2026
विंध्यवासिनी की माया
जह्नवी भंडारी साधारण बालिका नहीं थी।
वह जन्म से पहले ही एक प्रार्थना थी और जन्म के बाद एक उत्तर।
प्रयागराज के एक साधारण से घर में वर्षों तक माँ-बाप की चुप्पी गूँजती रही।
श्रीमती भंडारी हर सुबह दीपक जलातीं, मानो हर लौ में एक अधूरी इच्छा रख देती हों।
“माँ, बस एक संतान…”
यही शब्द हर मंदिर, हर देवी, हर व्रत में दोहराए जाते।
अंततः वे विंध्याचल पहुँचे।
विंध्यवासिनी देवी के चरणों में श्रीमती भंडारी रोईं—माँ की तरह नहीं, बल्कि एक रिक्त पात्र की तरह।
उन्होंने माँगा नहीं, बस स्वयं को समर्पित कर दिया।
पुजारी ने राख दी और कहा,
“देवी देती हैं, पर जो देती हैं, वह लौटता भी है।”
उस वाक्य का अर्थ वे तब नहीं समझ पाईं।
एक वर्ष बाद, जह्नवी का जन्म हुआ।
जह्नवी अलग थी।
वह रोती नहीं थी—जैसे जानती हो कि संसार में सब कुछ क्षणिक है।
वह अँधेरे से नहीं डरती थी—क्योंकि शायद वह उसे पहचानती थी।
कभी-कभी वह खाली दीवारों को देखती रहती, मानो कोई अदृश्य शक्ति उससे संवाद कर रही हो।
नौ वर्ष की हुई तो माता-पिता उसे विंध्याचल ले गए।
“जहाँ से यह आई है, वहाँ इसे प्रणाम करना चाहिए,” माँ ने कहा।
मंदिर के आसपास पहुँचते ही हवा बदल गई।
घंटी की ध्वनि धीमी पड़ गई।
फूलों की टोकरी हाथ से गिर पड़ी।
गाँव वालों की आँखें फैल गईं।
“यह बच्ची…”
“इसे पहचानते हो?”
“यह तो… माया देवी है।”
यह नाम हवा में तैर गया—माया देवी।
श्रीमती भंडारी के हृदय में कंपन हुआ।
पर जह्नवी शांत थी—मानो अपना नाम सुन लिया हो।
माया—वह शक्ति जो दिखती नहीं, पर सब कुछ चला रही होती है।
मंदिर के भीतर पुजारी ने जह्नवी को देखा और पल भर को आँखें मूँद लीं।
“इसे यहाँ पहले लाना चाहिए था,” उन्होंने कहा।
आरती हुई।
भीड़ आगे बढ़ी।
और फिर बाहर निकलने का समय आया।
सब लोग बाहर गए।
पर जह्नवी नहीं।
जैसे ही उसने द्वार पार करने की कोशिश की—
अग्नि प्रकट हुई।
यह सामान्य आग नहीं थी।
न धुआँ, न जलन।
यह दिव्य अग्नि थी—रक्षक भी और बाधा भी।
लोग आग के बीच से निकल गए—बिना जले।
पर जह्नवी जैसे ही आगे बढ़ती, अग्नि ऊँची हो जाती।
माँ चीख पड़ीं।
पिता निरुत्तर रह गए।
पुजारी ने शांत स्वर में कहा,
“जो देवी को अर्पित किया जाता है, वह लौट नहीं सकता।”
रात हुई।
अग्नि विलीन हो गई।
जह्नवी मंदिर के भीतर अकेली खड़ी थी।
उसके चेहरे पर भय नहीं था—केवल स्वीकार।
“मैं कभी आपकी नहीं थी,” उसने माँ से कहा, “आप तो केवल माध्यम थीं।”
वह जान चुकी थी,
हर कर्म की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।
श्रद्धा का उत्तर भी संतुलन माँगता है।
वह मंदिर में रुक गई।
वर्ष बीते।
जह्नवी अब पुजारिन थी।
लोग उसे देवी कहते थे—
कुछ कहते थे, वह केवल सेविका है।
कुछ कहते थे, वह माया है—जो रूप बदलकर आई है।
और आज भी कहा जाता है,
जब मंदिर के द्वार रात्रि में बंद होते हैं,
एक दीप स्वयं जल उठता है।
मानो विंध्यवासिनी देवी याद दिला रही हों,
जो माँगा जाता है, वह मूल्य के बिना नहीं मिलता।
और जो दिया जाता है, वह सदा लौटकर माँ के पास जाता है।