15/08/2026
बाहरी आज़ादी का जश्न, लेकिन क्या हम भीतर से आज़ाद हैं? 🏳️🌈🇮🇳
आज 15 अगस्त है।
पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत से मिली आज़ादी का जश्न मना रहा है।
एक देश के रूप में हमने गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया, लेकिन प्रयाग क्वीर प्राइड (PQP) आज एक बेहद गंभीर और आत्ममंथन वाले सवाल के साथ खड़ा है --
क्या हम सच में मानसिक और ढांचागत गुलामी से आज़ाद हो पाए हैं?
क्वीयर (Q***r) कम्युनिटी ने हमेशा बाहरी दुनिया के भेदभाव, घृणा, होमोफोबिया और पितृसत्ता का डटकर सामना किया है।
हमने समाज से अपने अस्तित्व की आज़ादी मांगी है
लेकिन इस आज़ादी के पर्व पर, हमें अपने खुद के बनाए दायरों में झांकने की सख्त जरूरत है।
एक कड़वा सच यह है कि जिस दमनकारी और क्रूर व्यवस्था (जैसे ऊंच-नीच, जातिवाद और पुरुष-वर्चस्व) के खिलाफ हम बाहरी दुनिया से लड़ रहे हैं, उसी का एक नया रूप हमने अपनी ही कम्युनिटी के भीतर पाल लिया है।
मानसिक गुलामी का नया रूप: आंतरिक पदानुक्रम
यह आज़ादी कैसी आज़ादी है, जहाँ हम अपने ही सुरक्षित दायरों (safe spaces) में एक-दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं?
समाज ने हमें सिखाया कि ताकतवर वह है जो दूसरों को दबाता है, और अनजाने में क्वीयर कम्युनिटी ने भी इसी सड़ी-गली सोच को अपना लिया है।
'टॉप' और 'बॉटम' के लेबल्स, जिनका संबंध नितांत व्यक्तिगत जीवन से है, आज हैसियत, ताकत और एक 'एलीट' (elite) वर्ग होने का पैमाना बन गए हैं।
* 'टॉप' होने को बेवजह एक झूठी श्रेष्ठता, नियंत्रण और शक्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।
* वहीं, 'बॉटम' होने पर मानसिक प्रहार किया जा रहा है, उसे कमजोर मानकर 'बॉटम शेमिंग' (bottom shaming) की जा रही है।
यह मानसिकता सीधे तौर पर उसी शोषक समाज की नकल है जहाँ हर ताकतवर अपने से कमजोर को कुचलकर अपना वजूद स्थापित करता है।
यह पितृसत्ता का ही वह रूप है जिसे हमने खुद पर ओढ़ लिया है।
असली स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?
सच्ची आज़ादी तब तक नहीं मिल सकती जब तक दमनकारी सोच हमारे दिमागों में जिंदा है।
हमारी लड़ाई समावेशिता, समानता और गरिमा की है।
जब तक हम अपने ही समुदाय के भीतर एक-दूसरे को श्रेणियों और उप-श्रेणियों के तराजू पर तौलना बंद नहीं करेंगे, तब तक आज़ादी के मायने अधूरे हैं।
आज 15 अगस्त के दिन, प्रयाग क्वीर प्राइड (PQP) आप सभी से यह आह्वान करता है:
* खुद को डिकोलोनाइज (decolonize) करें:
अपने दिमाग से इस 'एलीट' बनने की होड़ और लेबल की राजनीति को निकाल फेंकें।
* आंतरिक भेदभाव मिटाएं: एक-दूसरे का सहारा बनें। 'शेमिंग' और 'मजाक' के नाम पर चल रही मानसिक हिंसा को खत्म करें।
* समानता का असली स्पेस बनाएं:
कोई भी किसी से ऊपर या नीचे नहीं है।
हमारा प्राइड हमारी एकजुटता में है, एक-दूसरे को बांटने में नहीं।
आइए, आज एक ऐसा स्वतंत्र समाज बनाने का संकल्प लें जहाँ कोई झूठा गुरूर न हो।
जहाँ हर इंसान अपनी पहचान के साथ, बिना किसी आंतरिक भेदभाव के, गर्व से सिर उठाकर जी सके।
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।
आज़ादी, हर तरह के दमन से!
✍️ Bhartendu Vimal Dubey
Founder - All India Satrangi Salaam Association (AISSA)