Prayag Queer Pride

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Prayag Queer Pride 31 March 2026 द्वितीय LGBTQIA+ प्राइड परेड प्रयागराज | 2nd Prayag Q***r Pride Parade Allahabad

16/08/2026

क्या हम उसी समाज की नकल कर रहे हैं जिसने हमें सताया? 🏳️‍🌈🇮🇳

​जैसे समाज में जातियों और वर्गों ने खुद को श्रेष्ठ दिखाने के लिए हमेशा अपने से नीचे एक उपवर्ग खोजा, आज क्वीयर कम्युनिटी भी वही कर रही है।

​'टॉप' और 'बॉटम' के लेबल्स अब सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि 'बॉटम शेमिंग' और खुद को 'एलीट' दिखाने का हथियार बन गए हैं।

हम बाहरी दुनिया से समानता मांगते हैं, लेकिन अपने ही सुरक्षित दायरे (Safe Space) में अपनों को ही श्रेणियों के तराजू पर तौल रहे हैं।

​आइए, पितृसत्ता और ऊंच-नीच की इस खोखली मानसिकता को अपनी कम्युनिटी से उखाड़ फेंकें।

लेबल्स का खेल बंद करें और एक-दूसरे का सच्चा सहारा बनें

15/08/2026

बाहरी आज़ादी का जश्न, लेकिन क्या हम भीतर से आज़ाद हैं? 🏳️‍🌈🇮🇳

आज 15 अगस्त है।
पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत से मिली आज़ादी का जश्न मना रहा है।
एक देश के रूप में हमने गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया, लेकिन प्रयाग क्वीर प्राइड (PQP) आज एक बेहद गंभीर और आत्ममंथन वाले सवाल के साथ खड़ा है --

क्या हम सच में मानसिक और ढांचागत गुलामी से आज़ाद हो पाए हैं?

क्वीयर (Q***r) कम्युनिटी ने हमेशा बाहरी दुनिया के भेदभाव, घृणा, होमोफोबिया और पितृसत्ता का डटकर सामना किया है।
हमने समाज से अपने अस्तित्व की आज़ादी मांगी है
लेकिन इस आज़ादी के पर्व पर, हमें अपने खुद के बनाए दायरों में झांकने की सख्त जरूरत है।

एक कड़वा सच यह है कि जिस दमनकारी और क्रूर व्यवस्था (जैसे ऊंच-नीच, जातिवाद और पुरुष-वर्चस्व) के खिलाफ हम बाहरी दुनिया से लड़ रहे हैं, उसी का एक नया रूप हमने अपनी ही कम्युनिटी के भीतर पाल लिया है।

मानसिक गुलामी का नया रूप: आंतरिक पदानुक्रम
यह आज़ादी कैसी आज़ादी है, जहाँ हम अपने ही सुरक्षित दायरों (safe spaces) में एक-दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं?
समाज ने हमें सिखाया कि ताकतवर वह है जो दूसरों को दबाता है, और अनजाने में क्वीयर कम्युनिटी ने भी इसी सड़ी-गली सोच को अपना लिया है।

'टॉप' और 'बॉटम' के लेबल्स, जिनका संबंध नितांत व्यक्तिगत जीवन से है, आज हैसियत, ताकत और एक 'एलीट' (elite) वर्ग होने का पैमाना बन गए हैं।

* 'टॉप' होने को बेवजह एक झूठी श्रेष्ठता, नियंत्रण और शक्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।

* वहीं, 'बॉटम' होने पर मानसिक प्रहार किया जा रहा है, उसे कमजोर मानकर 'बॉटम शेमिंग' (bottom shaming) की जा रही है।

यह मानसिकता सीधे तौर पर उसी शोषक समाज की नकल है जहाँ हर ताकतवर अपने से कमजोर को कुचलकर अपना वजूद स्थापित करता है।
यह पितृसत्ता का ही वह रूप है जिसे हमने खुद पर ओढ़ लिया है।

असली स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?

सच्ची आज़ादी तब तक नहीं मिल सकती जब तक दमनकारी सोच हमारे दिमागों में जिंदा है।
हमारी लड़ाई समावेशिता, समानता और गरिमा की है।
जब तक हम अपने ही समुदाय के भीतर एक-दूसरे को श्रेणियों और उप-श्रेणियों के तराजू पर तौलना बंद नहीं करेंगे, तब तक आज़ादी के मायने अधूरे हैं।

आज 15 अगस्त के दिन, प्रयाग क्वीर प्राइड (PQP) आप सभी से यह आह्वान करता है:

* खुद को डिकोलोनाइज (decolonize) करें:
अपने दिमाग से इस 'एलीट' बनने की होड़ और लेबल की राजनीति को निकाल फेंकें।

* आंतरिक भेदभाव मिटाएं: एक-दूसरे का सहारा बनें। 'शेमिंग' और 'मजाक' के नाम पर चल रही मानसिक हिंसा को खत्म करें।

* समानता का असली स्पेस बनाएं:
कोई भी किसी से ऊपर या नीचे नहीं है।
हमारा प्राइड हमारी एकजुटता में है, एक-दूसरे को बांटने में नहीं।

आइए, आज एक ऐसा स्वतंत्र समाज बनाने का संकल्प लें जहाँ कोई झूठा गुरूर न हो।
जहाँ हर इंसान अपनी पहचान के साथ, बिना किसी आंतरिक भेदभाव के, गर्व से सिर उठाकर जी सके।

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।
आज़ादी, हर तरह के दमन से!

✍️ Bhartendu Vimal Dubey
Founder - All India Satrangi Salaam Association (AISSA)

15/08/2026

अपनी ही बनाई बेड़ियों से आज़ादी का समय

प्रिय क्वीर कम्युनिटी और साथियों,

समानता और अधिकारों की लड़ाई हम रोज बाहरी दुनिया से लड़ रहे हैं
लेकिन आज, यह समय आत्मनिरीक्षण का है।

यह समय उस लड़ाई का है जो हमें खुद से और अपनी कम्युनिटी के भीतर पनप रही वर्चस्ववादी मानसिकता से लड़नी है।

हम एक ऐसे समाज का हिस्सा रहे हैं जहाँ हमेशा एक तथाकथित उच्च वर्ग या जाति ने दूसरी जातियों पर अपना बल प्रयोग किया है।
जातियों में उपजातियां हैं, वर्गों में उपवर्ग हैं, जहाँ हर कोई अपने से नीचे एक ऐसा इंसान खोज लेना चाहता है जिस पर वह अपना रौब झाड़ सके।
समाज के इस ढांचे में पुरुष हमेशा महिलाओं को दबाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करते आए हैं।

विडंबना यह है कि आज हमारी एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+) कम्युनिटी भी अनजाने में इसी पितृसत्तात्मक और ब्राह्मणवादी पदानुक्रम (Hierarchy) का शिकार हो रही है।

'टॉप' और 'बॉटम' के लेबल्स का खोखला गुरूर

यह बेहद चिंताजनक है कि हमारी कम्युनिटी के भीतर 'टॉप' और 'बॉटम' के शब्द, जो केवल व्यक्तिगत यौन प्राथमिकताओं तक सीमित होने चाहिए थे, आज एक "एलीट पदानुक्रम" (Elite Hierarchy) में बदल गए हैं। 'टॉप' होने को ताकत, नियंत्रण और पौरुष से जोड़कर एक झूठी शान के रूप में पेश किया जा रहा है।
वहीं, 'बॉटम' होने को कमजोरी और अधीनता का प्रतीक मानकर, कम्युनिटी के ही लोगों द्वारा 'बॉटम शेमिंग' (Bottom Shaming) की जा रही है।

यह कोई और नहीं, बल्कि उसी शोषक समाज की नकल है जिसने सदियों से भेदभाव की दीवारें खड़ी की हैं।
क्या हम इस कम्युनिटी में भी वही दमनकारी ढांचा खड़ा करना चाहते हैं जिससे बचकर हम यहाँ आए थे?

क्या है हमारा असली प्राइड?

प्राइड (Pride) का मतलब केवल सड़कों पर उतरकर समानता के नारे लगाना नहीं है।
प्राइड का असली अर्थ है - बिना किसी शर्त के एक-दूसरे को स्वीकार करना।
जब हम खुद ही लेबल्स, श्रेणियों और उप-श्रेणियों के इस बहुस्तरीय उत्पीड़न (Multi-layered Oppression) में उलझकर एक-दूसरे को नीचा दिखाएंगे, तो बाहरी दुनिया से समानता की उम्मीद कैसे करेंगे?

प्रयाग क्वीर प्राइड (PQP) की ओर से हमारी यह स्पष्ट दरख्वास्त है :-

* लेबल्स की राजनीति बंद करें:
इंसान की पहचान लेबल्स से तय नहीं होती।
अपने ही साथियों को 'टॉप' या 'बॉटम' के खांचे में डालकर उनका मूल्यांकन करना या उन्हें कमतर आंकना तुरंत बंद होना चाहिए।

* आंतरिक भेदभाव मिटाएं: चाहे वह ट्रांसजेंडर्स के प्रति पूर्वाग्रह हो, बायसेक्शुअल्स को लेकर मजाक हो, या 'बॉटम शेमिंग' हो - यह सब मानसिक हिंसा है।
हमें एक-दूसरे के लिए खड़ा होना है, एक-दूसरे को दबाना नहीं है।

* एलीटिज्म से आज़ादी: कम्युनिटी के भीतर किसी भी प्रकार का एलीट समाज (Elite Circle) बनाना हमारे मूल उद्देश्य की हत्या है। हमारी ताकत हमारी विविधता और समावेशिता में है, आंतरिक गुटबाजी में नहीं।

निष्कर्ष

आइए, यह संकल्प लें कि हम उन बेड़ियों को खुद पर हावी नहीं होने देंगे जिन्हें तोड़ने के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं। एक सुरक्षित, बिना किसी भेदभाव वाले स्पेस का निर्माण हमारी पहली जिम्मेदारी है।
सच्ची समानता केवल बाहरी समाज से नहीं, अपने भीतर के अहंकार को मिटाने से शुरू होती है।
जुड़े रहें, सशक्त रहें!

✍️ भारतेन्दु विमल दुबे
संस्थापक - अखिल भारतीय सतरंगी सलाम संगठन (AISSA)

13/06/2026

किसी भी समाज की मजबूती केवल उसकी सड़कों, इमारतों या संस्थाओं से नहीं मापी जाती।

वह इस बात से भी मापी जाती है कि लोग कितनी स्वतंत्रता से सीख सकते हैं, प्रश्न पूछ सकते हैं, संवाद कर सकते हैं और जिम्मेदार निर्णय ले सकते हैं।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ जानकारी पहले से कहीं अधिक उपलब्ध है, लेकिन समझ हमेशा उतनी तेज़ी से विकसित नहीं होती।

लोग जुड़े हुए हैं, लेकिन कई बार संवाद कम हो रहा है।

लोग बोल रहे हैं, लेकिन कई बार एक-दूसरे को सुन नहीं रहे।

लोग जानकारी प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन हमेशा उसके अर्थ पर विचार नहीं कर रहे।

लोग निर्णय ले रहे हैं, लेकिन हमेशा उनके परिणामों पर नहीं सोच रहे।

और कई बार लोग ऐसे विषयों पर चुप रहते हैं जो सीधे उनके जीवन, स्वास्थ्य, संबंधों, समुदायों और भविष्य को प्रभावित करते हैं।

यही वह स्थान है जहाँ Ignite Change अपनी भूमिका देखता है।

🔥 IGNITE CHANGE

Understanding Behaviour. Protecting Lives.

यह केवल एक अभियान नहीं है।

यह व्यवहार को समझने, जिम्मेदार सोच को बढ़ावा देने, सुरक्षित विकल्पों पर विचार करने, सामाजिक कलंक को चुनौती देने, सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करने और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखने का एक प्रयास है।

हम मानते हैं कि जागरूकता केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है।

जागरूकता का अर्थ है:

• बेहतर प्रश्न पूछना

• बेहतर निर्णय लेना

• बेहतर संवाद करना

• दूसरों के अनुभवों को समझना

• जिम्मेदारी के साथ कार्य करना

• स्वयं के व्यवहार पर विचार करना

• और सीखते रहने की क्षमता बनाए रखना

इसी सोच के साथ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर प्रस्तुत है:

BEYOND THE YOGA MAT:
WHAT WE LEAVE UNSAID

यह कार्यक्रम केवल योग के बारे में नहीं है।

यह उन विचारों, व्यवहारों, निर्णयों, संबंधों, जिम्मेदारियों और सामाजिक वास्तविकताओं के बारे में भी है जो हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं।

यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए है जो सीखना चाहते हैं।

उन लोगों के लिए जो सोचते हैं।

उन लोगों के लिए जो प्रश्न पूछते हैं।

उन लोगों के लिए जो संवाद में विश्वास रखते हैं।

उन लोगों के लिए जो जिम्मेदारी को महत्व देते हैं।

और उन लोगों के लिए जो समाज को केवल जैसा है वैसा नहीं, बल्कि जैसा बेहतर हो सकता है वैसा भी देखना चाहते हैं।

📅 21 जून 2026 (रविवार)

🕗 प्रातः 8:00 बजे से

📍 रामबाग दुर्गा पूजा पार्क, प्रयागराज

आयोजक:

All India Satrangi Salaam Association (AISSA)

सहभागिता:

UP SACS

UPNP+

Ganga Social Foundation

🌐 satrangisalaam.in

आइए।

संवाद का हिस्सा बनिए।

समझ का हिस्सा बनिए।

जिम्मेदारी का हिस्सा बनिए।

और शायद बदलाव का भी।










12/06/2026

LGBTQIA+ समुदाय के बहुत से लोग यह जानते हैं कि कुछ व्यवहार लंबे समय में उनका नुकसान कर सकते हैं।

वे जानते हैं कि लगातार validation ढूँढना, अपनी वास्तविक पहचान या परिस्थितियों को छिपाना, हर समय दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर रहना, या बार-बार ऐसे लोगों और परिस्थितियों में जाना जो उन्हें भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं, उनके लिए अच्छा नहीं है।

फिर भी वे ऐसा करते रहते हैं।

क्यों?

क्या इसलिए कि उन्हें सही और गलत का फर्क नहीं पता?

अक्सर नहीं।

कई बार कारण जानकारी की कमी नहीं होता।

कारण होता है वह भावनात्मक खालीपन, अकेलापन, अस्वीकृति का डर, स्वीकार किए जाने की इच्छा, या वर्षों से जमा हुआ वह दर्द जिसे समाज, परिवार, स्कूल, रिश्तों या अपने अनुभवों ने पैदा किया होता है।

जब किसी व्यक्ति को लंबे समय तक यह महसूस कराया जाए कि वह "अलग" है, "गलत" है, या "कम" है, तो वह कई बार उन जगहों पर बार-बार लौटता है जहाँ उसे थोड़ी-सी भी स्वीकृति, ध्यान या जुड़ाव महसूस होता है।

समस्या यह नहीं कि वह जुड़ाव चाहता है।

जुड़ाव चाहना एक मानवीय आवश्यकता है।

समस्या तब शुरू होती है जब हम किसी भी कीमत पर जुड़ाव, मान्यता या ध्यान पाने लगते हैं, भले ही उसका परिणाम हमारे लिए नुकसानदायक हो।

इसलिए केवल यह कहना कि "ऐसा मत करो" अक्सर पर्याप्त नहीं होता।

एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है:

"मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?"

स्वीकृति?

प्यार?

सुरक्षा?

साथ?

समझे जाने का एहसास?

या केवल यह महसूस करना कि मैं अकेला नहीं हूँ?

कई बार व्यवहार समस्या नहीं होता।

वह किसी गहरी और अनपूरी आवश्यकता का संकेत होता है।

और स्थायी बदलाव तब शुरू होता है जब हम केवल अपने व्यवहार को नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी जरूरतों और भावनाओं को भी समझना शुरू करते हैं।

अपने आप से कठोर प्रश्न पूछिए:

मैं क्या खोज रहा हूँ?

मैं किस दर्द से बच रहा हूँ?

मैं किस खालीपन को भरने की कोशिश कर रहा हूँ?

क्योंकि जागरूकता केवल शुरुआत है।

वास्तविक परिवर्तन उसके बाद शुरू होता है।

12/06/2026

🏳️‍🌈 क्या Community केवल Visibility से बनती है?

या संवाद, सहयोग, समझ और एक-दूसरे का साथ देने से भी?

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर हम आपको एक ऐसे कार्यक्रम में आमंत्रित करते हैं जहाँ केवल योग ही नहीं, बल्कि Community Wellbeing, Mental Health, Relationships, Responsible Choices और Meaningful Conversations पर भी ध्यान दिया जाएगा।

🧘 योग अभ्यास
🧘‍♀️ ध्यान सत्र
💬 सामुदायिक संवाद
🤝 सहभागिता एवं जुड़ाव
❓ प्रश्नोत्तर
🍪 अल्पाहार

दिनांक - 21 जून 2026 (रविवार)

समय - प्रातः 8:00 बजे से

📍 रामबाग दुर्गा पूजा पार्क, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

📞 Sangam: 8881870260

📞 Sanjay: 9651528719

🌐 satrangisalaam.in

यदि आपको लगता है कि स्वस्थ समुदाय केवल पहचान से नहीं, बल्कि समझ, सम्मान, जिम्मेदारी और संवाद से बनते हैं -- तो आपका स्वागत है।

12/06/2026

लोग अक्सर बदलाव की बात करते हैं।

लेकिन बदलाव वास्तव में होता कैसे है?

क्या बदलाव केवल बड़े भाषणों से आता है?

क्या बदलाव केवल कानूनों से आता है?

क्या बदलाव केवल अभियानों से आता है?

कई बार नहीं।

अधिकांश स्थायी बदलाव बहुत छोटे स्तर पर शुरू होते हैं।

एक नई जानकारी से।

एक नए अनुभव से।

एक नए दृष्टिकोण से।

एक ऐसे प्रश्न से जिसके बारे में हमने पहले कभी नहीं सोचा था।

एक ऐसी बातचीत से जिसने हमें अपने बारे में कुछ नया समझाया।

एक ऐसे निर्णय से जिसने हमारी दिशा बदल दी।

जीवन में बहुत कम लोग एक ही दिन में बदल जाते हैं।

लेकिन लगभग हर व्यक्ति धीरे-धीरे बदलता है।

हम अपनी आदतों से बदलते हैं।

हम अपने अनुभवों से बदलते हैं।

हम अपनी गलतियों से बदलते हैं।

हम अपनी सफलताओं से बदलते हैं।

हम उन लोगों से भी बदलते हैं जिनसे हम मिलते हैं।

और कभी-कभी हम केवल इसलिए बदल जाते हैं क्योंकि हमने पहली बार किसी विषय को एक नए नज़रिए से देखा।

यही कारण है कि जागरूकता का वास्तविक उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है।

उसका उद्देश्य सोचने की नई संभावनाएँ खोलना भी है।

Ignite Change किसी को बदलने का दावा नहीं करता।

लेकिन हम यह मानते हैं कि जब लोगों को बेहतर जानकारी, बेहतर संवाद, बेहतर संसाधन और बेहतर समझ मिलती है, तो वे अपने लिए बेहतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित कर सकते हैं।

और यही किसी भी सकारात्मक बदलाव की सबसे मजबूत नींव है।

बदलाव हमेशा तेज़ नहीं होता।

बदलाव हमेशा दिखाई भी नहीं देता।

लेकिन जब लोग सीखते हैं, सोचते हैं, समझते हैं और जिम्मेदारी लेते हैं, तब बदलाव संभव होता है।

शायद इसी कारण सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि दुनिया कब बदलेगी।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि:

हम आज क्या सीख रहे हैं जो हमारे कल को बेहतर बना सकता है?

🔥 IGNITE CHANGE

Understanding Behaviour. Protecting Lives.

📍 कार्यक्रम:
BEYOND THE YOGA MAT:
WHAT WE LEAVE UNSAID

21 जून 2026 (रविवार)

🕗 प्रातः 8:00 बजे से

📍 रामबाग दुर्गा पूजा पार्क, प्रयागराज

🌐 satrangisalaam.in











12/06/2026

हम सब सोचते हैं कि हम लोगों को समझते हैं।

लेकिन क्या सचमुच?

हम किसी व्यक्ति को कुछ मिनट देखकर उसके बारे में राय बना लेते हैं।

किसी की भाषा देखकर।

किसी के कपड़ों को देखकर।

किसी की पहचान देखकर।

किसी की उम्र देखकर।

किसी की सामाजिक स्थिति देखकर।

और कई बार बिना पूरी जानकारी के हम यह मान लेते हैं कि हम सच जानते हैं।

लेकिन मानव व्यवहार इतना सरल नहीं है।

जो व्यक्ति हमें घमंडी दिखाई देता है, वह शायद असुरक्षित महसूस कर रहा हो।

जो व्यक्ति हमें कमजोर दिखाई देता है, वह शायद वर्षों से संघर्ष कर रहा हो।

जो व्यक्ति हमें चुप दिखाई देता है, वह शायद भीतर बहुत कुछ झेल रहा हो।

जो व्यक्ति हमें अलग दिखाई देता है, वह केवल अलग अनुभवों के साथ जीवन जी रहा हो सकता है।

हमारे निर्णय केवल तथ्यों से नहीं बनते।

वे हमारे अनुभवों, पूर्वाग्रहों, धारणाओं, डर, सामाजिक प्रभावों और सीमित जानकारी से भी बनते हैं।

यही कारण है कि गलतफहमियाँ केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं हैं।

वे रिश्तों को प्रभावित करती हैं।

समुदायों को प्रभावित करती हैं।

संस्थाओं को प्रभावित करती हैं।

और कभी-कभी पूरे समाज को प्रभावित करती हैं।

Ignite Change का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य लोगों को केवल जानकारी देना नहीं है।

हम लोगों को यह सोचने के लिए भी आमंत्रित करते हैं कि:

क्या मैं जो मान रहा हूँ, वह सही है?

क्या मेरे पास पर्याप्त जानकारी है?

क्या मैं तथ्य देख रहा हूँ या केवल अपनी धारणा?

क्या मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ, या केवल निर्णय सुना रहा हूँ?

समझ हमेशा सहमति नहीं होती।

लेकिन समझ के बिना जिम्मेदार निर्णय संभव नहीं हैं।

और समझ के बिना संवाद भी अधूरा रह जाता है।

इसीलिए कभी-कभी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होता कि सामने वाला कौन है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि:

क्या मैं उसे सही समझ रहा हूँ?

🔥 IGNITE CHANGE

Understanding Behaviour. Protecting Lives.

📍 21 जून 2026
📍 रामबाग दुर्गा पूजा पार्क, प्रयागराज

🌐 satrangisalaam.in










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